संस्कृति
200 से अधिक मंदिरों का जीर्णोद्धार करने वाले इस ट्रस्ट को मिलना चाहिए सम्मान
हर्षा भट - 3rd September 2018

प्रसंग
  • कर्नाटक में एक ट्रस्ट उपेक्षित मंदिरों और विशेष महत्व वाले अन्य ऐतिहासिक स्थलों के जीर्णोद्धार की अगुवाई कर रहा है। यह उनकी कहानी है।

कर्नाटक के एक छोटे से कस्बे का एक ट्रस्ट मृतप्राय मंदिरों को नया जीवन दे रहा है, यद्यपि यह चुपचाप अपने काम में लगा हुआ है। 200 से अधिक मंदिर जिन्हें भुला दिया जाता अब वे जीवंत हो रहे हैं और इसके लिए समर्पित उत्साही व्यक्तियों की टीम का धन्यवाद। लगभग तीन दशकों से श्री धर्मस्थल मंजुनाथेश्वर धर्मोथना (एसडीएमडी) ट्रस्ट उपेक्षित मंदिरों और ऐतिहासिक, वास्तुशिल्प और धार्मिक महत्व के अन्य स्मारकों का कायाकल्प करता रहा है।

उनकी कहानी कुछ यूं है:

इसे देखकर बस यही प्रतीत होता था कि यह महज एक घास का टीला है

इसे देखकर बस यही प्रतीत होता था कि यह महज एक घास का टीला है

इसके ऊपर चरती हुई गायों से पता चलता है कि लोग कितने अनजान हैं कि यह अपने गर्भ में इतिहास और विरासत की एक कृति समेटे हुए है।

लेकिन अगर आप देखें कि अब यह कैसा दिखता है, तो यह आपको निःशब्द कर देगा। मिट्टी और घास के इस हिस्से के नीचे अब हावेरी जिले के कब्बुरा में कलायाकल्प किया हुआ श्री कल्लेश्वर मंदिर है।

हावेरी जिले के कब्बुरा में श्री कल्लेश्वर मंदिर

हावेरी जिले के कब्बुरा में श्री कल्लेश्वर मंदिर

सावधानीपूर्वक खुदाई करके निकाला गया यह पुनर्निर्मित मंदिर अब श्रृद्धालुओं के लिए पूरी तरह खुला है। कर्नाटक के कई भूले-बिसरे विरासत स्थलों पर दो दशकों से ऐसा काम चल रहा है।

उक्त अवधि के दौरान राज्य भर में 200 से अधिक विरासती मंदिरों का जीर्णोद्धार हुआ है और समय-समय पर धर्माधिकारी श्री वीरेन्द्र हेगड़े के नेतृत्व और मार्गदर्शन में एसडीएमडी ट्रस्ट द्वारा उनकी वास्तविक गरिमा को वापस लाया गया है।

कायाकल्प कुछ इस प्रकार किया गया है कि जिन्होंने इन्हें बनाया था वे इनको देखकर गौरवान्वित महसूस करेंगे क्योंकि ये न सिर्फ मजबूत हैं बल्कि अपने वास्तविक स्वरुप में भी हैं।

विशेषतः, जब यदा-कदा मैं इन प्रयासों को देखता था तो यह एक कठोर कॉस्मेटिक सर्जरी की तरह नहीं दिखते थे। दीवारों पर कोई सफ़ेद पुताई नहीं थी, कोई प्रतिकृतियाँ या मूर्तियाँ नहीं थीं। मंदिर ऐसे दिखते थे मानो इनका वास्तव में “कायाकल्प” किया गया हो।

जैसे ही मैंने इन छवियों पर दृष्टि डाली जो समय और इतिहास के इन साक्ष्यों के चरण-दर-चरण पुनर्निर्माण को चित्रित करती हैं, तो ऐसा लगा जैसे मैं अतीत में सदियों पुराने मंदिरों का मूल निर्माण देख रहा था। ट्रस्ट के निदेशक ए एच हरिराम शेट्टी, डी सुरेंद्र कुमार के मार्गदर्शन में ट्रस्ट की गतिविधियों को व्यवस्थित करते हैं। वह प्रत्येक स्थल पर जाते हैं और प्रत्येक महत्वपूर्ण पहलू को रिकॉर्ड करते हुए एवं गलतियों की गुंजाईश न हो यह सुनिश्चित करते हुए पुनर्निर्माण के हर चरण की तस्वीरें खींचते हैं। छवियाँ न सिर्फ ट्रस्ट के लिए संदर्भ देने के उद्देश्य की पूर्ति करती हैं बल्कि इन्हें जीर्णोद्धार के एक मॉडल के दस्तावेजीकरण के रूप में भी देखा जा सकता है जिसका अनुकरण किया जा सकता है।

हावेरी जिले के कब्बुरा में श्री कल्लेश्वर मंदिर के जीर्णोद्धार के अलग-अलग चरण

हावेरी जिले के कब्बुरा में श्री कल्लेश्वर मंदिर के जीर्णोद्धार के अलग-अलग चरण

ट्रस्ट अब तक 224 विरासती ढांचों का जीर्णोद्धार कर चुका है और 16 स्थलों पर कार्य प्रगति पर है जिसे अगले 6 महीनों में पूरा किया जाना है। सभी कायाकल्पित मंदिर अब उपासनाओं और स्थानीय मेलों के साथ कार्यरत हैं। अपने सूत्रपात से लेकर एक दशक से अधिक समय तक ट्रस्ट ने समाजसेवियों और कार्य के लिए वित्तपोषण करने वाले स्थानीय लोगों के साथ अपने कार्यों को स्वयं ही अंजाम दिया। जिसके बाद 2001-02 में कर्नाटक सरकार का कन्नड़ और संस्कृति मंत्रालय हो रहे कार्य की नवीनीकरण की 40 प्रतिशत लागत साझा करने के लिए आगे आया और विरासत संरक्षण के लिए एक समझौते का पहला सार्वजनिक-निजी-भागीदारी (पीपीपी)) मॉडल स्थापित करने के लिए हाथ बढ़ाया।

श्री मल्लेश्वर मंदिर अघालय, के. आर. पेट तालुका, जिला मांड्या

श्री मल्लेश्वर मंदिर अघालय, के. आर. पेट तालुका, जिला मांड्या

इसके बाद से लागत का 40 प्रतिशत भाग ट्रस्ट द्वारा वहन किया जाता है और 20 प्रतिशत हिस्सा स्थानीय लोगों द्वारा स्थापित मंदिर समितियों द्वारा वहन होता है। वित्त वर्ष 2017-18 तक इस योजना के तहत 25 जिलों को कवर करते हुए 169 मंदिरों का कार्य पूरा हो चुका है। हालाँकि सरकार ने ट्रस्ट को आवंटित होने वाले राशि की सीमा 80 लाख रुपए प्रति वर्ष और 8-10 लाख रुपए प्रति मंदिर निर्धारित कर रखी है, अतः इस योजना के तहत प्रति वर्ष औसतन 10-12 मंदिरों का जीर्णोद्धार किया जाता है।

यह रही सोच:

यह सब धर्माधिकारी के खुद के विचारों के साथ शुरू हुआ। दूरदर्शी, सुधारक, समाज-सेवी और तीन दशकों से अधिक समय से धर्मस्थल के धर्माधिकारी, डॉ हेगड़े यह देख कर बहुत ही आहत हुए कि, एक तरफ वह विरासतीय संरचनाएं, जो कभी शाही संरक्षण में थीं उनको ऐसे ही बर्बाद होने के लिए छोड़ दिया गया था, वहीं दूसरी तरफ विभिन्न स्थानों पर अनौपचारिक “आधुनिक” संरचनाएं आ रही थीं, जिन स्थानों पर कभी मंदिर निर्मित थे जो उस क्षेत्र में शासन करने वाले विभिन्न राजवंशों की कला और स्थापत्य उत्कृष्टता का प्रमाण थे।

डॉ वीरेंद्र हेगड़े (बीच में) परिवार के सदस्यों के साथ जो ट्रस्ट के सदस्य भी हैं।

डॉ वीरेंद्र हेगड़े (बीच में) परिवार के सदस्यों के साथ जो ट्रस्ट के सदस्य भी हैं।

हर बार जब उन्हें कई ”नए” मंदिरों के कुंभाभिशेकम में आमंत्रित किया जाता था, जिनको पुराने ढांचे की जगह पर पुनः निर्मित किया जाता है, उन्होंने यह पाया कि पुराने मंदिरों में जो कला और वास्तुकला के सौंदर्य के स्मृति चिन्ह थे, नए मंदिर उस कला से कहीं दूर थे। इन दोनो परिदृश्यों के लिए कुछ कर गुजरने की इच्छा से वह एक ट्रस्ट स्थापित करने के लिए प्रेरित हुए, जो किसी भी ऐसे मंदिर या धार्मिक केंद्र को पुननिर्मित करेगा जिसे सब भूल गए होंगे। इस प्रकार एसडीएमडी ट्रस्ट का जन्म हुआ, जिसका उद्देश्य है, “आने वाली पीढ़ी को हम वह देगें जो हमें इतिहास ने प्रचुर मात्रा में दिया है।”

एक व्यक्ति और उसका लक्ष्य

हेगड़े ने इस दिशा में सोचते हुए प्रयास शुरू किए कि “बहुत अधिक पैसा खर्च करके कई नए मंदिरों का निर्माण करवाने के बजाय प्राचीन पत्थर के मंदिरों को पुनःस्थापित और संरक्षित करना बेहतर है।”

और तब से उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा।”  बस एक ही शर्त थी कि मंदिर पुराना होना चाहिए, वास्तविक प्राचीन होना चाहिए और कम से दो शताब्दी पुराना होना चाहिए। गुणवत्ता और लागत के साथ समझौता न किया जाए यह सुनिश्चित करने के लिए ट्रस्ट की अपनी कारीगरों और मजदूरों की टीम है जिसे विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों के एक सलाहकार बोर्ड और हेगड़े परिवार के सदस्यों द्वारा संचालित किया जाता है। इंजीनियरों, सेवानिवृत्त पुरातात्विकों, आर्किटेक्ट्स और मूर्तिकारों की टीम यह सुनिश्चित करती है कि मंदिर को जितना अधिक हो सके उतना मूल मंदिर के जैसा ही फिर से बनाएं।

डॉ. वीरेन्द्र हेगड़े ने पुनःनिर्मित मंदिरों में से एक की निगरानी करते हुए।

डॉ. वीरेन्द्र हेगड़े ने पुनःनिर्मित मंदिरों में से एक की निगरानी करते हुए।

धन और निर्माण

ऐसे देश में जहाँ धन और संसाधनों के अभाव में विरासत को नजरअंदाज कर दिया जाता है और भुला दिया जाता है वहां पर, ट्रस्ट परियोजनाओं के लिए निजी एजेंसियों द्वारा उद्धृत लागत के पांचवे हिस्से पर कुशलतापूर्वक संरचनाओं को पुनःनिर्मित कर रहा है।

श्री चेनकेश्व मंदिर, अनेकेरे चेन्नारायपत्ना तालुक, हसन जिला

श्री चेनकेश्व मंदिर, अनेकेरे चेन्नारायपत्ना तालुक, हसन जिला

वित्त पोषण – वह परियोजनाएं जो पीपीपी मॉडल के तहत नहीं है, ट्रस्ट उन परियोजनाओं की लागत का 50 प्रतिशत लगाता है और बाकी के लिए स्थानीय लोगों को धन जुटाने के लिए कहता है। ट्रस्ट के निदेशक कहते हैं, “हम 100 प्रतिशत धन का योगदान भी कर सकते हैं, लेकिन फिर यह इसके लिए जरूरी है कि स्थानीय लोगों के अन्दर उसके प्रति स्वामित्व और जिम्मेदारी की भावना बनी रहे। और इसके पूरा होने पर यह वही लोग होंगे जो इसकी देखभाल करने की सोचेंगे, यही कारण है कि उनका बढ़-चढ़ कर योगदान करना क्यों आवश्यक है।” पीपीपी मॉडल के तहत, स्थानीय लोग कुल लागत का केवल 20 प्रतिशत ट्रस्ट के साथ लगाते हैं और सरकार प्रत्येक पर 40 प्रतिशत लगाती है।

शेट्टी बताते हैं, “चूंकि आज ऐसे श्रमिकों को ढूंढना मुश्किल है जो विरासत के वारिस हों, जिन्होंने सबसे अच्छे मंदिर बनाए हों, हम उन्हे विशेषज्ञ बनाते हैं क्योंकि हम राज्यामिस्त्रियों को प्रशिक्षित करते हैं।”

और वह इस तरह काम को अंजाम देते हैं:

प्रक्रिया

स्थानीय ग्रामीण अपने आसपास के इलाके में जीर्ण-शीर्ण विरासतीय संरचनाओं की  ध्यान/सूचना देने के लिए ट्रस्ट को पत्र लिखते हैं। इसके बाद ट्रस्ट की टीम स्मारक की स्थिति का मूल्यांकन करती है और पुष्टि करती है कि क्या यह ट्रस्ट की शर्तों को पूरा करती है। स्वीकृत होने पर भारतीय पुरातात्त्विक सर्वेक्षण के सेवानिवृत्त अधिकारियों के साथ विशेषज्ञों की एक अन्य टीम स्थल का सर्वेक्षण करती है और तब इनकी रिपोर्ट इंजीनियरों और मंदिर के वास्तुकला विशेषज्ञों द्वारा परिष्कृत की जाती है। इसके बाद वे मरम्मत में लगने वाली लागत की योजना बनाते हैं। फिर अवशेषों के आधार पर चित्र तैयार किए जाते हैं जिनके आधार पर आगे की प्रक्रिया की जा सकती है। जिन हिस्सों को बचाया नहीं जा सकता है, उन्हें वास्तविक संरचना से मेल खाता हुआ दोबारा निर्मित किया जाता है, जिसके बाद अनुमानित कार्य योजना तैयार की जाती है। इसके बाद  गुद्दाली पूजा (प्रारंभिक अनुष्ठान) के साथ कार्य प्रारंभ हो जाता है। कार्य के प्रत्येक कदम की बारीकी से निगरानी की जाती है, डॉ हेगड़े स्वयं दौरा करते हैं और बदलावों का सुझाव देते हैं।

श्री काशीविश्वेशवर मंदिर होसाबुदानुरु, मांड्या

श्री काशीविश्वेशवर मंदिर होसाबुदानुरु, मांड्या

कार्य प्रगति की तस्वीरों को देखने से लगता है कि लेगो ब्लॉक को नष्ट कर दिया गया है और फिर से स्थापित किया जा रहा है। ट्रस्ट दिखाता है कि यह कितना आसान है- ट्रस्ट द्वारा प्रयोग की गई कुशल प्रणाली का सबसे उत्तम प्रमाण है।

नानजगुडू के श्री श्रीकांतेश्वर मंदिर का 16-स्तंभों वाला मंडप मरम्त से पहले (बाएं) और मरम्मत के बाद (दाएं)।

नानजगुडू के श्री श्रीकांतेश्वर मंदिर का 16-स्तंभों वाला मंडप मरम्त से पहले (बाएं) और मरम्मत के बाद (दाएं)।

नानजगुडू के श्री श्रीकांतेश्वर मंदिर का 16-स्तंभों वाले मंडप पर मरम्मत का कार्य मरम्मत से पहले (बाएं) और मरम्मत के बाद (दाएं)।

नानजगुडू के श्री श्रीकांतेश्वर मंदिर का 16-स्तंभों वाले मंडप पर मरम्मत का कार्य मरम्मत से पहले (बाएं) और मरम्मत के बाद (दाएं)।

लाल किले जैसी विरासतीय संरचनाओं के रख-रखाव के लिए पीपीपी की घोषणा पर किए गये हो-हल्ला के बावजूद यह ट्रस्ट बिना कोई शोरगुल किए चुपचाप अपना कार्य कर रहा है। गतिविधियों की विशेषता हैं जिनकी जड़ें “धर्म निवास” से जुड़ी होती हैं।

कई पाठकों ने योगदान करने के तरीकों के बारे में पूछते हुए लिखा है। योगदान करने के इच्छुक लोग सीधे ट्रस्ट से संपर्क कर सकते हैं।

यह लेख भारतीय विरासत पर स्वराज्य की श्रृंखला का एक हिस्सा है। अगर आपको यह लेख पसंद आया है और चाहते हैं कि हम ऐसे और लेख लिखें, तो हमारे प्रायोजक बनने पर विचार करें – आप 2,999 रुपये जितना कम योगदान दे सकते हैं।

हर्षा ‘स्वराज्य’ की एक स्टॉफ राइटर हैं।