संस्कृति
संस्कृत की त्रासदी- कैसे इसे लोगों के मध्य स्थापित किया जा सकता है

आशुचित्र- किसी अतिश्योक्ति नहीं लेकिन मात्र भाषा के रूप में संस्कृत पर ध्यान देने की आवश्यकता है जिससे भारतीयों में इसे लोकतांत्रिक रूप से स्थापित किया जा सके।

पिछले कुछ दशकों से जब भी कभी संस्कृत का नाम चर्चा में आया है तब काफी हद तक यह माना जा सकता है कि यह ग़लत कारणों से ही होगा। इस चलन के चलते हाल ही में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्रीय विद्यालय में संस्कृत प्रार्थना के विरुद्ध चल रहे मामले को बड़ी बैंच को सौंपने का निर्णय लिया है। न्यायालय यह जानना चाहता है कि क्या सही में यह प्रार्थना संविधान के अनुच्छेद 28(1) (जिसके अनुसार राज्य के किसी भी वित्त पोषित विद्यालय में धर्म निर्देश नहीं दिया जा सकताता है) के खिलाफ है?

भारत में ध्रुवीकरण के साथ सबसे ज़्यादा हानि जिसे पहुँची है, वह है संस्कृत भाषा। वर्णक्रम के एक तरफ संस्कृत के प्रणेता हैं जो सभी आधुनिक समस्याओं का समाधान संस्कृत को मानते हैं। वे अति महत्वाकांक्षी व अपूर्ण दावे करते नज़र आते हैं जैसे कि नासा (नेशनल एयरोनॉटिक्स एंड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन) में संस्कृत का प्रयोग हो रहा है (यहाँ तक कि कई वेब फोरम में भी ये सवाल उठने लगे कि क्या नाया में संस्कृत को अनिवार्य कर दिया गया है!)

इस दावे का खंडन करने के लिए change.org पेटीशन भी चलाई गई जिसमें संस्कृत पर नासा के रुख को स्पष्ट करने का आग्रह था। इस दावे का परीक्षण हुआ और पाया गया कि 1985 में नासा के एक कर्मचारी रिक ब्रिग्स द्वारा एक पेपर लिखा गया था ‘नॉलेज रिप्रेज़ेन्टेशन इन संस्कृत एं एआई’। इसका अर्थ यह नहीं कि कंप्युटेशनल संस्कृत पर हुए शोध को नज़रअंदाज़ कर दिया जाए पर इसपर हम आगे चर्चा करेंगे।

वर्णक्रम की दूसरी ओर ऐसे लोग हैं जो संस्कृत के साथ तुरंत ब्राह्मणवाद, जातिवाद, अत्याचारी और विभाजक जैसे शब्द जोड़ देंगे। अधिकांश ऐसे दावे वे करते हैं जिन्होंने भाषा पर गंभीर तो छोड़ दीजिए, हल्का-फुल्का अध्ययन भी नहीं किया होगा।

निस्संदेह, संस्कृत विश्व की सबसे सुरचित और सुंदर भाषाओं में से एक है। लेकिन यह स्वयं अरण्य रोदन (जंगल में विलाप) के चरण से गुज़र रही है, वह भी अपने उद्गम स्थल पर और यही सबसे बड़ी त्रासदी है। संस्कृत की विशिष्टता यह है कि इसके सूत्रों या कहावतों का प्रयोग कई भाषा प्रतिनिधियों में दिखता है।

सूत्रों की इतनी सटीक संरचना होती है कि आवश्यकता के बिना एक स्वर या व्यंजन भी नहीं जोड़ा जाता है। कई ऐसे आत्मनिर्भर सटीक सूत्र मिल जाएँगे सरलता से गूढ़ चीज़ें समझा देते हैं, बिना किसी परिकल्पना के। किसी अतिश्योक्ति नहीं लेकिन मात्र भाषा के रूप में संस्कृत पर ध्यान देने की आवश्यकता है जिससे भारतीयों में इसे लोकतांत्रिक रूप से स्थापित किया जा सके जो नैसर्गिक रूप से इसके सौंदर्य और समृद्धि को सराहेंगे।

व्याकरण पर अत्यधिक ध्यान और अंक उन्मुख शिक्षण से बच्चे विद्यालय में तीन-चार साल संस्कृत पढ़ने के बाद भी इसे बोलने में अक्षम होते हैं। कंप्यूटर पर कार्य करने के लिए संस्कृत सबसे अच्छी भाषा है या इस बात को पूर्णतः नकारने पर वाद-विवाद करने से बेहतर है कि हम संस्कृत के अति आवश्यक उत्पादक सिद्धांतों को सिखाया जाए।

भारत बड़ी संख्या में कंप्यूटर में स्नातक विद्यार्थी उत्पन्न कर रहा है, ऐसे में नेचुरल लैग्वेंज प्रोसेसिंग ऑटोमेशन के साथ संस्कृत के कंप्युटेशनल भाषाई तत्वों को उभारना इसे विश्व पटल में स्थापित करने में सहायक सिद्ध होगा। कई ऐसे संस्थान हैं जो कंप्युटेशनल संस्कृत पर ध्यान दे रहे हैं जैसे जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय लेकिन इस मुख्यधारा में लाने ेक लिए अभी भी बहुत प्रयास किया जाना आवश्यक है। विद्यालयों में संस्कृत को बुरी तरह पढ़ाए जाने के बावजूद एक सकारात्मक पहलू यह है कि स्वाध्याय से उत्सुकतावश कई युवा संस्कृत पर शोध कर रहे हैं।

यह बात हमें इस प्रश्न पर भी ला खड़ा करती है कि क्या विद्यालयों में संस्कृत को अनिवार्य किया जाना चाहिए। मेरा मानना है कि ऐसा करना आवश्यक नहीं है। इसकी बजाय इसकी श्रेष्ठ बातें मसालों की तरह छिड़की जाएँ और इसकी सुगंध को फैलने दिया जाए। इससे यह होगा कि जिसे इसका स्वाद पसंद आएगा, वे स्वयं इसे चुन लेंगे और आगे बढ़ाएँगे।

उदाहरण स्वरूप, गणित के पैटर्न पढ़ाते समय चित्र काव्य (संस्कृत में एक काव्य विधा जो अनेक पैटर्न पर आधारित होती है) का प्योग किया जाए जो विषय को देखन में आकर्षक और समृद्ध बनाए।

अंत में हम हाल ही में उठे केंद्रीय विद्यालय के विवाद पर आते हैं। इसपर अंतिम निर्णय न्यायालय का ही होगा कि क्या केंद्रीय विद्यालयों में संस्कृत प्रार्थनाएँ अनुच्छेद 28 (1) का उल्लंघन हैं या नहीं।

लेकिन जब भी ऐसा प्रश्न उठता है तो एक बार परीक्षण करना आवश्यक है। संभवतः इस परीक्षण का नाम “जस्टिस एचआर खन्ना टेस्ट ऑफ सेक्युलरिज़्म” रखा जा सकता है। संस्कृत को एक ऐच्छिक विषय के रूप में पढ़ाना धर्मनिरपेक्षता का हनन नहीं है, यह 1994 में सर्वोच्च न्यायालय के एक निर्णय में कहा गया था। इसपर जस्टिस एचआर खन्ना ने कहा था, “धर्मनिरपेक्षता न ईश्वर संर्थक है और न हीं विरोधी, यह धार्मिक, नास्तिक और अज्ञेयववादी से समान व्यवहार करती है।” ऐसे में गैर-धार्मिक उपनिषद की प्रार्थना “असतो मा” का जब अनुवाद करके देखा जाये तो यह सबसे सामान व्यव्हार करती है और इसलिए जस्टिस एचआर खन्ना टेस्ट में उत्तीर्ण होती है।

नागेंद्र सेतुमाधवराव ने इनोवेशन प्रबंधन में पीएचडी किया है और वर्तमान में केओस छियोरी और मेटाफिज़िक्स विषयों पर कार्यरत हैं। उनका ट्विटर हैंडल @dr_nagendra है।