संस्कृति
कमल और सोने का सिक्काः लक्ष्मी पर दिवाली की प्रतिछाया

प्रसंग
  • आइए देवी लक्ष्मी को न केवल धन-समृद्धि की बल्कि नैतिकता और आध्यात्मिक ज्ञान की देवी मानकर दीपावली मनाएं।
  • यह हमारे जीवन में ‘वास्तविक’ धन के महत्व पर विचार करने का अवसर भी है।

‘दीवाली ’ शब्द का अर्थ प्रबंधन या दीपकों की पंक्ति से है। परंपरागत रूप से दीवाली  वर्ष की सबसे अंधेरी रात को मनाई जाती है जब प्रकाश की शोभा और आवश्यकता को वास्तविक रूप से समझा जा सकता है। भारत की प्राचीनता, धार्मिक परंपराओं की विविधता और यहां के लोगों के बीच पारस्परिक प्रभाव/प्रेम को देखते हुए हमें आश्चर्य नहीं करना चाहिए कि विभिन्न धार्मिक समुदायों द्वारा दीवाली  मनाई जाती है। प्रत्येक समुदाय में दीवाली मनाने के विशिष्ट कारण हैं जो इसके मतलब को समृद्ध बनाते हैंI

बात की जाए हिंदू समुदाय की तो इसमें भी दीवाली  से जुड़ी कई परंपराएँ हैं। दीवाली  से जुड़ी सबसे महत्वपूर्ण परंपराओं में से एक है अत्याचारी रावण पर भगवान राम की जीत और 14 वर्ष के वनवास के बाद अयोध्या में उनके वापस लौटने का आनंद। अयोध्या की प्रजा ने हजारों मिट्टी के दीपक जलाकर आनंदपूर्वक श्रीराम का स्वागत किया और आज भी एशिया, अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका महाद्वीप में करोड़ों हिंदू ऐसा करते हैं। कुछ लोग दुष्ट नरकसुर पर कृष्ण की विजय की खुशी के रूप में दीवाली  मनाते हैं। अन्य के लिए, दीवाली का त्योहार नववर्ष में और नए पंचांग (कैलेण्डर) की शुरुआत में मनाया जाता है। यह प्राप्त आशीर्वादों के लिए धन्यवाद करने और भविष्य में कल्याण की प्रार्थना करने का अवसर है। सुख-समृद्धि के लिए धन की देवी लक्ष्मी की पूजा अर्चना की जाती है। सम्पूर्ण हिंदू समुदाय में लक्ष्मी पूजन दीवाली  की सबसे व्यापक रूप से प्रचलित विशेषताओं में से एक है और मैं इस अनुष्ठान पर अपने विचारों पर ध्यान केंद्रित करना चाहता हूँ।

यह बात मायने रखती है कि धन की देवी लक्ष्मी हिंदू परंपरा में एक महत्वपूर्ण देवी हैं। इससे मुझे पता चलता है कि संपत्ति के अर्जन और उपयोग से संबंधित मामलों को हमारी धार्मिक प्रतिबद्धताओं से अलग नहीं किया जा सकता है। हम धन को अलग वर्गों या श्रेणियों में विभाजित नहीं कर सकते जो ऐसे क्षेत्र से संबंधित है जिसमें देवत्व और हमारे धार्मिक जीवन से कोई लेना-देना नहीं है। जीवन के हर महत्वपूर्ण आयाम को देवता या देवी को समर्पित करते हुए हिंदू परंपरा जीवन की एकता और मिल-जुलकर रहने पर बल देती है। लक्ष्मी, देवी के रूप में असंख्य शक्ति की पुष्टि हैं, लेकिन कई बार नजरअंदाज की जाती हैं, जैसे कि महिलाएं दुनिया की समृद्धि में अपना योगदान देती हैंI

इनमें से कुछ तरीकों में देवी लक्ष्मी को ज्ञान, साहस, शक्ति और सफलता के दैवीय रूप में निरूपित किया जाता है।

दीवाली  के अवसर पर लक्ष्मी पूजन प्रतिष्ठित और सम्मानित जीवन सुनिश्चित करने के लिए धन की मानवीय आवश्यकता को रेखांकित करता है। प्रसन्नता, सदाचार और आध्यात्मिक विकास के साथ, धन हिंदू जीवन के चार न्यायसंगत उद्देश्यों में से एक है। देवी लक्ष्मी इस तथ्य की साक्षी हैं कि हिंदू परंपरा भौतिकता-विरोधी नहीं है। गरीबी परेशान है और महाभारत इस समृद्धि के प्रति सतर्क कर रही है।

हालाँकि अगर हम लक्ष्मी की सबसे लोकप्रिय मूर्तियों या प्रतीकों में से एक को सावधानीपूर्वक देखें तो पाते हैं कि उनके चार हाथों में से एक से धन की वर्षा हो रही है। वह कमल के फूल पर विराजमान हैं या खड़ी हैं और ऊपरी दो हाथों में कमलपुष्प धारण किए हुए हैं। लक्ष्मी की मूर्तियों या तस्वीरों में कमल, जो कि हिंदू परंपरा में शुद्धता और अच्छाई का सबसे शक्तिशाली प्रतीक है, एक महत्वपूर्ण प्रतीक है। तथ्य यह है कि धन को ही मानव जीवन का एकमात्र उद्देश्य न माना जाना चाहिए बल्कि नैतिकता और आध्यात्मिक विकास को भी जीवन का उद्देश्य माना जाना चाहिए। हमें देवी लक्ष्मी के सभी हाथों पर नज़र डालनी चाहिए; हमें पवित्रता और नैतिकता का आशीर्वाद मांगे बिना धन के आशीर्वाद की प्रार्थना नहीं करनी चाहिए। महाभारत हमें प्रेरणा देती है कि धन और सद्गुण हमेशा एक दूसरे से संयुक्त होने चाहिए और धन प्राप्ति से पूर्व सद्गुण होने अनिवार्य हैं।

धन कब नैतिकता को अलग करता है? सबसे पहले महाभारत का उदाहरण लेते हैं, जब धन दमनकारी और अन्यायपूर्ण तरीकों से प्राप्त होता है जो प्रकृति समेत अन्य प्राणियों के लिए कष्ट और पीड़ा का कारण बनता है। आज हमें धन अर्जन, जो कि नुकसानदायक है, के तरीकों की हमारी समझ का दायरा बढ़ाना है। इनमें अनिवार्य मजदूरी न देना, अमानवीय कार्य परिस्थितियाँ, असुरक्षित परिस्थितियों में लोगों के श्रम का शोषण, बाल मजदूरी, मानव तस्करी और जोखिम भरे तथा भ्रष्ट व्यवसाय जो प्रलोभन देकर घातक उत्पाद खरीदने के लिए आकर्षित करके लोगों को निशाना बना रहे हैं, आदि जरूर शामिल होना चाहिए। उदाहरण के लिए, वेल्स फारगो बैंक को हाल ही में वित्तीय उत्पादों के अनैतिक विपणन में शामिल होने का पर्दाफाश किया गया था। धन कमाने के इस तरह के तरीके भगवद्गीता में अनुचित तरीके से धनार्जन की श्रेणी में शामिल हैं।

महाभारत के अनुसार, उचित तरीके से अर्जित धन को खर्च करने की कसौटियों में से एक यह है कि इसे धर्म के अनुसार दान कर दिया जाना चाहिए या धार्मिक अनुष्ठानों में उपयोग किया जाना चाहिए। एक अवधारणा है कि केवल न्यायोचित ढंग से अर्जित धन ही दान योग्य है। अन्यायपूर्ण तरीके से अर्जित किए गए धन को दान में देने से अच्छे परिणाम नहीं मिलते हैं।

दूसरा, जब धन अनुपयोगी हो और इसका प्रयोग गलत ढंग से करके इसे बरबाद कर दिया गया हो। भगवत गीता में धन के इस तरह के दूषित प्रयोग दो तरफ़ा हैं। पहला मनोवैज्ञानिक प्रयोग है- किसी को श्रेष्ठ बनाने और अन्य लोगों की गरिमा को घटाने के लिए धन का प्रयोग। जब धन का प्रयोग प्रतिष्ठा के प्रतीक और उच्च मानवीय स्थिति के प्रदर्शन के लिए किया जाता है तो धन दूषित हो जाता है। भगवद गीता के अनुसार, दूसरा प्रयोग है धन को ऐसे लोगों पर शासन करने और उन्हें तबाह करने के लिए खर्च करना जो प्रतिद्वंदी या प्रतियोगी माने जाते हैं। यह दूसरों की सुख समृद्धि को नियंत्रित करने, अधीन करने और बाधित करने के लिए धन का उपयोग है। धन का दुरुपयोग तब होता है जब व्यापार निगम प्रचारकों या समर्थकों को बड़ी रकम का भुगतान करते हैं और ऐसी नीतियों को लागू करने के उद्देश्य से राजनेताओं का समर्थन करते हैं जो निगम या व्यापारसंघ के तो अनुकूल होती हैं लेकिन सार्वजनिक हित के लिए नुकसानदायक होती हैं।

आज हम निगमित संपत्ति के प्रभाव पर विचार किए बिना देवी लक्ष्मी और धन पर सूक्ष्म रूप से व्याख्या नहीं कर सकते हैं। हाल ही के एक अध्ययन के मुताबिक, दुनिया की 100 अर्थव्यवस्थाओं में 69 निगम और 31 देश शामिल हैं। अगर यह एक देश होता तो वॉलमार्ट का 482 बिलियन डॉलर का वार्षिक राजस्व इसे दुनिया का 12वां सबसे बड़ा देश बना देता। हालांकि व्यक्तिगत नागरिकों को दिए गए कई अधिकारों और विशेषाधिकारों के आनंद, और संपत्ति तथा सत्ता जो कुछ को छोड़कर सभी देशों में सर्वश्रेष्ठ है, ने स्वयं को सार्वजनिक हित के साथ संबद्ध नहीं किया है।

हाल के दिनों में, हम देखते हैं कि औषधि निगम जीवन रक्षक औषधियां बनाने की बात करते हैं और इनके दाम इतने अधिक बढ़ा देते हैं कि गरीब के लिए ये दुर्लभ हो जाती हैं। आइए एक उदाहरण लें। गिलाड साइंसेज द्वारा बेची जाने वाली सोलवाडी दवा हेपेटाइटिस सी वायरस से पीड़ित लोगों की जीवन रक्षक दवा है। इस दवा के 12 हफ्ते के कोर्स की कीमत 84,000 डॉलर (54 लाख रूपए) या 1,000 डॉलर प्रति गोली है। इलाज के कोर्स की वास्तविक उत्पादन लागत 68 डॉलर से 136 डॉलर के बीच है। बिक्री के पहले वर्ष में, गिलाड ने 12.4 बिलियन डॉलर कमाए, और यह कमाई कंपनी शुरू करने योग्य शुरुआती धन से अधिक हो गई। यहाँ मुद्दा निवेश पर उचित लाभ अर्जित करने का नहीं है। जब लालच, मानव कल्याण और सार्वजनिक हित की चिंता को नकार देता है तब इसे धन की बर्बादी कहा जाता है।

अपनी सार्वत्रिक प्रकृति के कारण, अधिकार और शक्ति निगम फायदा उठाते हैं और इन्हें प्रायः शेयरधारकों द्वारा प्रयोग में लाया जाता है जिन्हें स्थानीय समुदायों के कल्याण से कोई मतलब नहीं होता है। उनमें से अधिकतर की सफलता का एकमात्र उद्देश्य लाभ तथा बाजार हिस्सेदारी की उच्चतम सीमा पाना है। फिलहाल, उपभोक्तावाद को बढ़ावा दिया जाता है और निरंतर विज्ञापन सार्वजनिक हितों की क्षति तथा और अधिक पाने की कृत्रिम वासना को जन्म देते हैं। लक्ष्मी का कमल, पवित्रता और अच्छाई का मानक जिसके द्वारा हमें धन के अर्जन और प्रबंधन का फैसला करना चाहिए, निगमों पर लागू किया जाना चाहिए। सार्वजनिक हित का मामला निगमों के उद्देश्यों से अलग नहीं हो सकता लेकिन इसे इनके मामलों के केंद्र में स्थानांतरित किया जाना चाहिए।

अंततः, जब धन को आधारभूत वास्तविकता मानकर इसका पीछा किया जाता है तो यह बरबाद हो जाता है और हमें भी बरबाद कर देता है। कथा उपनिषद स्पष्ट रूप से हमें याद दिलाता है कि मानव जाति को कभी भी केवल धन से संतुष्टि नहीं मिलेगी। धन अर्जित करने के माध्यम से संतुष्टि तलाशने की उम्मीद कभी न समाप्त होने वाली मंजिल वाला एक खतरनाक मार्ग है। यह हमें व्याकुलता और असुरक्षा की स्थिति की ओर ले जाता है जो दूसरों की समझ में हमें प्रतिद्वंदी साबित करता है और आत्मविश्वास के लिए खतरा है। देवत्व, अंतिम वास्तविकता और मानव तृष्णा का वास्तविक नाश महत्वहीन है और धन लाभ के लिए केवल एक साधन मात्र है। अज्ञानता की नींद से जागृत होकर करुणामय प्राणी बनने का धर्म का मौलिक उद्देश्य कभी अनुभव नहीं किया जाता है। लक्ष्मी का चौथा हाथ निडरता का प्रतीक है। यह उनके आशीर्वादों में सबसे महान है, जो केवल तभी प्राप्त होता है जब हम धन की सीमाओं को समझते हैं और एक अंत की तलाश करते हैं जो भौतिक वस्तुओं के परिमाण से भी बढ़कर है।

आइये इस दीवाली पर न केवल सुख-समृद्धि बल्कि पुण्य और आध्यात्मिक ज्ञान की भी स्रोत देवी लक्ष्मी की पूजा करें और उनके प्रति अपना सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करें। आइये हम केवल उन हाथों को ही न देखें जिनसे सोने के सिक्के गिरते हैं। आइये उन हाथों को भी देखें जो कमल का फूल धारण किए हुए हैं, जो शील और शुद्धता के अपरिहार्य मूल्य की घोषणा करते हैं और उस चौथे हाथ को भी देखें जो हमें ऐसे लक्ष्य की ओर संकेत करता है जो धन की क्षणभंगुरता से परे है। इस दीवाली पर अपने दर्शन को पूरा होने दीजिए, यह हमारे घरों, मंदिरों और समुदायों (समाज) में हमारे जीवन में धन के महत्व पर नैतिक प्रतिबंध के लिए एक अवसर हो सकता है।

डॉ. अनंतानंद रामबचन यूएसए के मिनेसोटा में सेंट ओलाफ कॉलेज में धर्म के प्रोफेसर हैं। उनकी किताबों में ‘एकम्पलिसिंग दि एकम्पलिस्डः दि वेदास एज ए सोर्स ऑफ वेलिड नॉलेज इन शंकर ‘, ‘दि लिमिट ऑफ स्क्रिप्चरः विवेकानंदस रिइंटरप्रेसन ऑफ दि अथॉरिटी ऑफ दि वेदास ‘, दि अद्वैत वर्ल्डव्यूः गॉड, वर्ल्ड एंड ह्यूमिनिटी ‘ और ‘ए हिंदू थियोलॉजी ऑफ लिबरेशनः नॉट-टू इज नॉट वन ‘ शामिल हैं।