संस्कृति
क्षीण होती एक संस्था- सरकारी नियंत्रण का हिंदू मंदिरों पर दुष्प्रभाव
आशुचित्र-
  • सरकारी नियंत्रण के बावजूद मंदिरों में कुप्रबंधन, परेशानी और व्यावसायिक संस्कार होते हैं।
  • विडंबना यह है कि बिना किसी नियंत्रण के भारत में मंदिरों को मुग़ल व अंग्रेज़ काल में भी कोई परेशानी नहीं आई।
पिछले हफ्ते ओडिशा के पुरी में प्रसिद्ध श्री जगन्नाथ मंदिर भक्तों के लिए बंद रहा क्योंकि सेवायतों (सेवादारों) ने पुलिस के साथ हाथापाई के बाद मंदिर के द्वार खोलने से इनकार कर दिया।
पिछले कुछ महीनों में मंदिर की सेवादारों और ओडिशा सरकार के बीच सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बाद तनाव बढ़ गया था जो मंदिर पर नए ‘सुधारों ’को लागू करता है।
यह आदेश उन याचिकाओं के जवाब में आया जिसमें सेवायतों द्वारा उत्पीड़न, अपर्याप्त स्वच्छता, अतिक्रमण, व्यावसायिक अनुष्ठानों और सामान्य “तीर्थस्थल के प्रबंधन में कमियों” के बारे में चिंता व्यक्त की।
अब भक्त श्री जगन्नाथ मंदिर के कानूनी विवादों की एक लंबी श्रृंखला में एक और प्रकरण के गवाह बनेंगे। जब से सरकार ने 1950 के दशक की शुरुआत में मंदिर के नियंत्रण के लिए कानून पारित किया तब से मंदिर प्रशासन, सेवायत, गजपति या पुरी के शासक और भक्तों के बीच बार-बार टकराव की स्थिति पैदा हो रही है।
स्वाभाविक रूप से यह मामला एक बड़ी कहानी का हिस्सा है। दशकों से राज्य के नौकरशाहों ने हिंदू मंदिरों के वित्त को नियंत्रित करने से लेकर अनुष्ठानों की निगरानी तक के प्रबंधन में हस्तक्षेप किया है। जिस तरह से राजनेताओं और न्यायाधीशों ने अक्सर कुप्रबंधन की निंदा की है जिसका वे दावा करते हैं कि वे मंदिरों में पर्याप्त नहीं हैं और इन दावों का इस्तेमाल सरकारी नियंत्रण के चल रहे विस्तार को सही ठहराने के लिए किया किया जा रहा है।
यहाँ एक विडंबना है। यह ठीक उन मंदिरों के बारे में है जिन्होंने दशकों से सरकारी घुसपैठ को देखा है और जो संघर्ष और कुप्रबंधन के भी केंद्र बने हुए हैं। जगन्नाथ मंदिर जैसे मंदिरों में कमियों के लिए उपाय खोजने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने जून 2018 में एक आदेश जारी किया जिसमें उसने केंद्र सरकार और ओडिशा सरकार को समितियों का निर्माण करने का निर्देश दिया जो प्रमुख तीर्थस्थलों के “प्रबंधन योजनाओं” का अध्ययन करें।
इनमें तिरुपति मंदिर, वैष्णो देवी मंदिर और कर्नाटक में धर्मस्थला का निजी स्वामित्व वाला मंदिर शामिल थे। पहले एक विशाल सरकारी अधिग्रहण के लिए जगह बनाने के बाद अदालत ने अब सरकार को मंदिरों के उचित प्रबंधन के बारे में अधिक ज्ञान जुटाने के लिए अन्य साइटों को देखने की सलाह दी क्योंकि समस्याओं को ‘सर्वोत्तम प्रथाओं’ की सूची को संकलित करके हल किया जा सकता है।
मुद्दा यह नहीं है कि कोई भी सुव्यवस्थित ‘सार्वजनिक’ मंदिर (सरकार द्वारा नियंत्रित) मौजूद नहीं हैं या निजी तौर पर प्रबंधित सभी मंदिर सद्भाव के प्रतीक हैं। कुछ और महत्वपूर्ण है दांव पर। भारत के बड़े मंदिर अत्यधिक जटिल संगठन हैं। हर दिन किए जाने वाले कई कार्य  हैं। मंदिर परिसर को साफ करना, विभिन्न प्रकार के पानी को विशिष्ट कुओं से खींचना और कई बार पूजा (अनुष्ठान) करनें होते हैं। इन गतिविधियों के लिए विभिन्न प्रकार के फूलों और अन्य सामग्रियों की आवश्यकता होती है जिन्हें खेती या अधिग्रहित करके प्राप्त किया जाता है।
इसके अलावा विभिन्न प्रकार के प्रसाद (भोजन की पेशकश) के साथ पके हुए भोजन को अनुष्ठानों के लिए तैयार करने की आवश्यकता होती है। मंदिर में बड़ी संख्या में आने-जाने वालों और उनकी हरकतों पर नजर रखी जाती है। कुछ मंदिरों में हजारों लोगों को भोजन परोसा जाता है और प्रमुख त्योहारों के आसपास कई अन्य बड़े और छोटे कार्यक्रम होते हैं।
इसलिए मंदिर के कामकाज में शामिल कई लोगों के काम को अच्छी तरह से समन्वित करने की आवश्यकता है और टकराव को लगातार हल करने या उन्हें रोकने की आवश्यकता है।
अब निम्नलिखित बातों पर विचार करें- भारतीय मंदिर इस स्तर की जटिलता के साथ सबसे प्राचीन प्रकार के संगठन हैं। जो हज़ारों सालों से चले आ रहे हैं। संगठन के रूप में सहस्राब्दियों से मंदिर अत्यंत शत्रुतापूर्ण वातावरण में भी जीवित रहे। उन्हें इस्लामी आक्रमणकारियों और शासकों का सामना करना पड़ा जिन्होंने मंदिरों को झूठे धर्म और शैतान पूजा के स्थलों के रूप में देखा। ब्रिटिश औपनिवेशिक सरकारों ने मंदिरों को ना केवल उसी तरह से देखा बल्कि राजस्व के स्रोतों के रूप में उनका शोषण भी किया। बेशक ताजा हमला आज़ादी के बाद सरकार का मंदिरों का अधिग्रहण करना था।
मंदिरों को 20वीं और 21वीं शताब्दी के तेज-तर्रार सामाजिक, तकनीकी, और जनसांख्यिकीय घटनाक्रमों के अनुकूल बनाया गया। आज के भारत में सैकड़ों हज़ारों मंदिर पनप रहे हैं और उनकी संख्या बढ़ती जा रही है। इसलिए भारतीय मंदिरों को एक उच्च लचीला और अनुकूलनीय संगठन होना चाहिए जो कम से कम एक मध्यम आकार की कंपनी के रूप में जटिल हो ऐसी चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में पनपने सके।
आज़ादी के बाद के भारत में कई राज्य सरकारों ने कानून पारित किए जिन्होंने सार्वजनिक हिंदू मंदिरों को राज्य नौकरशाही की शाखाओं में बदल दिया जो कि अनुष्ठानों और देवताओं के बजाय शराब लाइसेंस या भूमि रिकॉर्ड से निपटने के लिए बना दिया है। पुरी मंदिर के मामले में यह कुछ अन्य लोगों और सर्वोच्च न्यायालय के उत्साही समर्थन की वजह से हुआ। फिर भी दशकों से लोगों ने इस बात को फिर से खोजा रहे हैं कि इस तरह के मंदिर कुप्रबंधन, उत्पीड़न और व्यवसायिक अनुष्ठानों के स्थल बन गए हैं।
जब पुजारी कानून द्वारा निचले स्तर के सरकारी कर्मचारियों में बदल दिए जाते हैं तो और क्या उम्मीद की जा सकती है? मुख्य रूप से वे भारत के सार्वजनिक मंदिरों के राजस्व का हिस्सा भी चाहते हैं। मंदिर बोर्डों पर बैठे नेताओं और नौकरशाहों का भी यही हाल है। अफसोस की बात है कि निजी हितों को साधने के लिए मंदिरों ने काम करना शुरू कर दिया है।
यह ठीक उसी तरह का नुकसान है जैसा मंदिरों का सरकारी नियंत्रिकरण करना है। यह मंदिरों में शामिल लोगों के विभिन्न समूहों के बीच सहयोग के पैटर्न के टूटने की ओर अग्रसर है जिसने उन्हें इतने सदियों तक फलने-फूलने दिया। इस तरह से आजादी के बाद के भारत में शायद अपने ही मंदिरों के सामने सबसे शत्रुतापूर्ण माहौल बन दिया है। राज्य के नौकरशाहों के हाथों में इन संस्थानों को छोड़ना  इन संस्थाओं को और नीचे गिराने का एक तरीका है।
मंदिरों का सरकारी नियंत्रण जोड़ना कई परंपराओं और मंदिरों में अनुष्ठानों के संबंध में न्यायिक हस्तक्षेप है। धार्मिक स्वतंत्रता के संवैधानिक अधिकार को मान्यता देने का दावा करने वाले देश में रहने वाले लोगों को इन बाधाओं का सामना क्यों करना पड़ रहा है? क्या हमें मंदिरों और उनकी परंपराओं के कामकाज में व्यवधान पैदा करने वाले राजनीतिक और न्यायिक हस्तक्षेप को समाप्त नहीं करना चाहिए?
इस समय की त्रासदियों में से एक हिंदू मंदिरों की दुर्दशा की वर्तमान स्थिति के बारे में हमारी अज्ञानता है। सामाजिक वैज्ञानिकों के लिए यह पता लगाने का समय है कि भारत में मंदिरों ने कैसे काम किया है, वे किस तरह के संगठन हैं और पिछले सात दशकों में क्या गलत हुआ है।
हमें सरकारी नियंत्रण प्रणाली के कानूनी आधारों की जाँच करने और प्रभावी साधन बनाने की आवश्यकता है ताकि हम अदालतों में चुनौती दे सकें। यही कारण है कि प्रोफेसर एस एन बालगंगाधर के मार्गदर्शन में एक शोध परियोजना शुरू की गई है जिसका उद्देश्य इन मुद्दों का व्यवस्थित विश्लेषण करना है। यह परियोजना मंदिरों में राज्य के हस्तक्षेप की कानूनी और वैचारिक नींव, ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन में इसकी ऐतिहासिक उत्पत्ति, मंदिरों और उनके पारंपरिक प्रथाओं पर प्रभाव और धार्मिक स्वतंत्रता के बारे में अंतरराष्ट्रीय कानूनी सिद्धांतों और न्यायशास्त्र के संबंध की जाँच करेगी।
इसमें शामिल कानूनी मुद्दों से निपटने के लिए वे ‘हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्त’ और सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों के निर्णयों के बारे में मंदिर प्रबंधन और मंदिर के प्रवेश से जुड़े मामलों की पुन: जांच करेंगे जिनका सभी एक न्यायिक बिंदु से नाता ​​है।
अंत में जाँच भारत के संविधान और धर्म की स्वतंत्रता से संबंधित इसके लेखों पर भी ध्यान केंद्रित करेगी।
एमएस चैत्रा बेंगलुरु आधारित आरोही शोध संस्था के निदेशक हैं।