संस्कृति
श्रीलंका के तमिल और सीता की अमर स्मृतियाँ

राम की जीवन कथा भी खूब है। राजपाट संभालने को थे कि वनवास हो गया। युवा ही थे। नवविवाहित भी। सीता के संग महलों से निकलकर जंगलों में भटके। उस आयु में 14 साल उन्हें अयोध्या लौटना नहीं था। उनके जीवन में वह विकट संघर्ष का समय ही होगा। किंतु क्या योग रहा होगा कि युगों बाद भी इधर अयोध्या में और उधर श्रीलंका में राम और सीता की राह आसान नहीं रही। अयोध्या में राम आज भी एक टेंट में विस्थापित हैं और श्रीलंका में भी सीता मंदिर का निर्माण स्थानीय सिंहलियों के विरोध के बाद ही संभव हो सका। श्रीलंका के तमिल समुदाय ने सीता की स्मृतियों को सहेजा है।

श्रीलंका की राजधानी कोलंबो से 220 किलोमीटर दूर है नुवारा एलिया। लंका के इस दूरदराज कोने में हिंदी कोई नहीं जानता मगर हरे-भरे ऊँचे पहाड़ों की तलहटी में बने एक छोटे से मंदिर परिसर में हनुमान चालीसा की गूंज अयोध्या और चित्रकूट की अनुभूति कराती है। दक्षिण भारतीय शैली का यह सीता अम्मन टेंपल है। श्रीलंका के सबसे लोकप्रिय पर्यटन केंद्र नुवारा एलिया की चहल-पहल से सिर्फ पाँच किलोमीटर दूर इस मंदिर के आसपास दिवाली के दिनों में बारिश का मौसम होता है। उन दिनों समुद्र तल से 6200 फुट ऊँचाई पर औसत तापमान 15 डिग्री होता है। हिंदी और तमिल में राम, सीता और हनुमान की स्तुतियाँ कड़कड़ाती ठंडी हवाओं में अमृत घोलती हैं।

मैं अपनी भारत यात्राओं के दौरान अयोध्या कई बार गया था। त्रेतायुग में राम के वनवास के समय अयोध्या से चित्रकूट होकर पंचवटी आने और फिर रामेश्वरम् होकर लंका पहुँचने का मार्ग हज़ारों किलोमीटर का दुर्गम फासला है। मैं इस यात्रा मार्ग के कई पड़ावों पर गया हूँ। कुछ साल पहले एक बार दिवाली के मौके पर रामेश्वरम में ही था और वहाँ धनुषकोडि नाम के उस रेतीले टापू के सामने लहराते समुद्र को भी देखा था, जिसके पार सीधी दूरी में श्रीलंका के तट सिर्फ 15 किलोमीटर रह जाते हैं। यहीं कहीं से राम ने लंका विजय के लिए प्रस्थान के पहले सेतु का निर्माण कराया था। विभीषण से राम की भेंट भी यहीं हुई थी। विभीषण का एकमात्र मंदिर रामेश्वरम् से धनुषकोडि के रास्ते में ही है।

सीता मंदिर पर लेखक विजय मनोहर तिवारी (बाएँ) व उनके साथ फोटो जर्नलिस्ट ताराचंद गवारिया (दाएँ)

एक और दिवाली पर श्रीलंका जाना हो ही गया। उदयपुर राजस्थान के फोटो जर्नलिस्ट ताराचंद गवारिया इस यात्रा में साथ थे। नुवारा एलिया की गगनचुंबी पहाड़ियों पर यहीं कहीं अशोक वाटिका थी। यह एकमात्र मंदिर आज लंका में हजारों साल पहले रावण के अपहरण के बाद सीता की उपस्थिति का प्रतीक है। ठंडे मौसम ने यहां आने का आनंद दो गुना कर दिया था। दिन में हल्की बारिश थी और बारिश के रुकते और सूरज के बादलों से झांकते ही दिन की चमकती रोशनी में मंदिर की छवियां लीं। मंदिर के पुरोहित ने राम, लक्ष्मण, सीता और हनुमान की प्राचीन प्रतिमाएं पांच हजार साल पुरानी बताईं। दिवाली के एक दिन पहले गुजरात और दिल्ली के कई श्रद्धालु भी मिले।

युग बीत गए। उधर भारत की चेतना में राम बसे हैं तो इधर श्रीलंका की स्मृतियों में सीता भी सुरक्षित हैं। दो दिशाओं में आधे आसमान तक ऊँचे ऐसे ही एक पहाड़ी कोने में सीता का मंदिर है। इस इलाके में कई मंदिर हैं मगर वानर सिर्फ सीता मंदिर में ही नज़र आते हैं। मंदिर के प्रवेश द्वार से लेकर अंदर तक हनुमान यहाँ वीर योद्धा के रक्षक रूप में अनेक प्रतिमाओं में हैं। मंदिर के पीछे एक चट्‌टान पर हनुमान के चरण चिह्न भी हैं। एक खास किस्म का अशोक वृक्ष सीता निवास के इसी दायरे में पाया जाता है, जिसमें अप्रैल के महीने में लाल रंग के फूल आते हैं।

गॉल नाम के क्षेत्र में ऐसी जड़ी-बूटियों की भरमार है, जो पूरे श्रीलंका में कहीं नहीं होतीं। कथा है कि हनुमान संजीवनी बूटी के लिए जिस पहाड़ को उठा लाए थे, उसमें आईं वनस्पतियों का ही यह विस्तार हैं। सिंहली आयुर्वेद में यह औषधियाँ आज भी वरदान मानी जाती हैं। देवुरुम वेला नाम की जगह के बारे में प्रसिद्ध है कि यहाँ सीता की अग्नि परीक्षा हुई थी। एक और रोचक तथ्य-यहाँ की मिट्‌टी आश्चर्यजनक रूप से काली राख की परत जैसी है, जबकि देश भर में भूरी और हल्के लाल रंग की मिट्‌टी पाई जाती है। वी. राधाकृष्णन मंदिर ट्रस्ट के चेयरमैन भी हैं। वे श्रीलंका के शिक्षा राज्यमंत्री भी थे।  उन्होंने बताया-रावण की लंका का दहन यहीं हुआ। मिट्टी में मोटी काली परत स्थानीय लोकमान्यता में इसी दहन कथा से जुड़ती है। सीता की स्मृतियों से जुड़ा यह स्थान अब एक पवित्र तीर्थ बन चुका है। आस्था की दृष्टि से हमारे लिए यह स्थान उतना ही महत्त्वपूर्ण है, जितना भारत में अयोध्या। जिस तमिल नाडु में एक समय प्रबल हिंदी विरोध रहा, जहाँ बाकायदा सरकार ने सरकारी स्कूलों से हिंदी को बेदखल किया उसी तमिल नाडु के लोगों ने श्रीलंका में हिंदी क्षेत्र की एक पौराणिक पात्र की स्मृतियों को अब तक पूरे मन और प्राणों से सेहजा हुआ है। सीता से जुड़ी स्मृतियाँ तमिल समुदाय के लिए भारत से जोड़ने वाली एक मजबूत कड़ी हैं। यहाँ उनकी तमिल पहचान बाद में है, पहले भारतीयता है। सीता मंदिर इसी का प्रमाण है, जिसे एक तीर्थ के रूप में विकसित किया गया है।

सीता मंदिर के बाहर का दृश्य

शुरू में मंदिर विरोध यहाँ भी-

नुवारा एलिया श्रीलंका के मध्य प्रांत में है। यहाँ की 15 लाख आबादी में 10 लाख तमिल हैं। सबसे पहले 1818 में ब्रिटिश शासक तमिल लोगों को यहाँ लेकर आए थे। आज इस क्षेत्र में संसद की आठ सीटों में से पाँच पर तमिल सांसद हैं। वी राधाकृष्णन इन्हीं में से एक हैं, जो अपकंट्री पीपुल्स फ्रंट के लोकप्रिय नेता रहे हैं। बीस साल पहले भव्य सीता मंदिर के निर्माण को लेकर एक विरोध यहाँ भी हुआ। दरअसल स्थानीय बौद्ध सिंहली नहीं चाहते थे कि सीता के मंदिर को किसी प्रकार की बड़ी पहचान मिले। तब राधाकृष्णन ही थे, जिन्होंने इलाके के तमिलों को एकजुट कर मंदिर को भव्य रूप दिलाया। तत्कालीन पर्यटन मंत्री धर्मश्री सेनानायक मंदिर के लिए अलग से जमीन देने को राजी हुए। यहाँ मोरारी बापू की कथा हुई। कुंभाभिषेकम् में श्रीश्री रविशंकर आए। लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन भी यहाँ आकर गईं। अब हर दिन कई भारतीय यहाँ आते हैं।

सीता कितने समय रहीं-

वनवास के 14 सालों में राम, लक्ष्मण और सीता ने कहाँ-कितना समय गुज़ारा और सीता कितने दिन लंका में रहीं? रामेश्वरम् में रह चुके और इन दिनों पंचवटी के पास त्र्यंबकेश्वर में मौजूद पंडित विष्णु शास्त्री कहते हैं कि भगवान राम ने वनवास के शुरुआती 12 वर्ष तो चित्रकूट में ही बिताए थे। फिर वे वर्तमान महाराष्ट्र की ओर बढ़े। लगभग एक वर्ष नासिक के पास पंचवटी में रहे। यहीं से रावण ने सीता का हरण किया। फिर उनकी तलाश में यहीं से राम ने किष्किंधा की ओर प्रस्थान किया, जहां हनुमान और सुग्रीव से उनकी मित्रता हुई। बालि वध हुआ। रामेश्वरम् में जटायु के भाई संपाति ने ही सीता की तलाश में निकले वानरों को सीता का पता बताया था। फिर राम का रामेश्वरम् आगमन, सेतु निर्माण और युद्ध के लिए लंका प्रस्थान के प्रसंग क्रम से हैं। ऐसा अनुमान है कि लंका में सीता लगभग 11 माह रहीं। सीता मंदिर के एक ट्रस्टी एस. थियागु भी स्थानीय मान्यता के आधार पर इसकी पुष्टि करते हैं।

मुद्रिका प्रसंग और रिंग फेस्टीवल-

हर महीने श्रीलंका में पोएडे यानी पूजा का एक दिन तय है। इस दिन देशभर के मदिरालय बंद रहते हैं और लोग शाकाहार पर ज़ोर देते हैं। सीता अम्मन टेंपल में तब सबसे ज्यादा चहलपहल होती है। सैकड़ों पर्यटक भी स्थानीय श्रद्धालुओं के साथ मिथिला के राजा जनक की बेटी और अयोध्या के राजा राम की अर्धांगिनी सीता की कहानी रावण की लंका के इस कोने में आकर सुनते हैं और बुराई पर अच्छाई की जीत की प्रतीक राम-रावण के युद्ध की कथा स्मृतियों में ताजा हो जाती है। जनवरी में पोंगल के एक महीने पहले से तमिल समाज के गांव-गांव में भजन गाए जाते हैं। 15 जनवरी को पूर्णाहुति पर शोभायात्रा निकलती है। राम के दूत के रूप में हनुमानजी ने यहीं अशोक वाटिका में मुद्रिका भेंट की थी। यह दिन रिंग फेस्टीवल के रूप में प्रसिद्ध है।

विजय मनोहर तिवारी भारत के काेने-कोने की आठ से ज्यादा परिक्रमाएँ करने वाले सक्रिय लेखक। उनकी छः पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। वे स्वराज्य में सहयोगी लेखक हैं। संपर्क- vijaye9@gmail.com