संस्कृति
जब मस्जिद में हुआ था रामनवमी का जलसा

क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि किसी मस्जिद में कभी रामनवमी का जबर्दस्त जलसा मनाया जाए। इसी रौनक में अगले दिन गोकुल उत्सव भी जुड़ जाए। सुसज्जित चंदन की थालियों की शोभायात्रा गलियों से निकलकर मस्जिद पहुँचे। ध्वजाएँ मस्जिद के दोनों तरफ फहराई जाएँ। हिंदू-मुस्लिम एक साथ इसमें शरीक हों। पोहा-दही का प्रसाद बटे। सामाजिक समरसता का ऐसा क्रांतिकारी प्रयोग करने की हिम्मत आज हिंदुस्तान के किस माई के लाल सेकुलर में है? लेकिन एक माई के लाल ने बिल्कुल यही कर दिखाया। आप जानते हैं कौन है वह?

वे हैं शिरडी के साई बाबा। जिस मस्जिद में उन्होंने असली गंगा-जमुनी रवायत का शुभारंभ किया, जहाँ वे जीवन भर रहे, उसका नाम भी सुन लीजिए- द्वारकामाई मस्जिद। यह वाकया है 1911 का। बाबा के निर्वाण के ठीक आठ साल पहले। गोविंदराव रघुनाथ दाभोलकर ने इस ऐतिहासिक प्रसंग के लाइव किस्से लिखे हैं। दाभोलकर बाबा के प्रिय शिष्य थे। बाबा की जीवनी लिखने का उनका प्रबल भाव था। शामा नाम के एक और करीबी शिष्य के जरिए उन्होंने बाबा के सामने अपने दिल की ख्वाहिश जाहिर की थी। कुछ समय बाद बाबा ने उन्हें यह आज्ञा दी।

बाबा ने उन्हें एक बार दाभाेलकर साहब को हेमाड पंत कहकर पुकारा। यह नाम हेमाद्रि पंत का अपभ्रंश था। दाभाेलकर चौंके कि बाबा ने उन्हें हेमाड पंत क्या सोचकर कहा? दरअसल हेमाद्रि पंत देवगिरि के शासक महादेव और रामदेव के इतिहास प्रसिद्ध प्रधानमंत्री थे, जो बड़े ही विद्वान और कई किताबों के रचयिता थे। बहुत कम लोगों को पता है कि हिसाब-किताब की बहीखाता प्रणाली के आविष्कार का श्रेय उन्हें ही है। वे शासन तंत्र में कुशल होने के साथ ऊंचे दरजे के विद्वान भी थे। तो साई बाबा के हेमाड पंत ने 300 पेज में बाबा के जीवन पर 51 अध्याय लिखे।

महाराष्ट्र में शिरडी की प्रसिद्धि साई बाबा से है। न तो बड़े उद्योग हैं, न संपन्न खेती। फिर भी बारहों महीने लोगों का तांता लगा है। 1918 में दशहरे के दिन बाबा का निर्वाण हुआ। तब से साल दर साल साई के प्रति श्रद्धा की जड़ें गहराती गई हैं। वे एक ऐसे चमत्कारी संत के रूप में तेजी से मशहूर हुए, जिनके दरवाजे से कोई खाली हाथ नहीं लौटता। जो हर आने वाले की मन्नत पूरी करते हैं। कई को फर्श से अर्श तक पहुँचाने, बीमारों को सेहतमंद करने और दिल की बात पढ़ लेने के अनगिनत किस्से लोगों को कंठस्थ हैं।

1850 के आसपास कभी महाराष्ट्र के एक गुमनाम से गाँव में चले आए थे, जिनका नाम भी किसी को नहीं मालूम था। सिर्फ उनके कारण वही गाँव आज दुनिया भर में प्रसिद्ध है। कोई सदियों पुरानी परंपरा नहीं है साई की। वे पुराण प्रसिद्ध भी नहीं हैं। न तो उन्होंने रावण का वध कर रामायण रची- राम की तरह। न महाभारत के सूत्रधार बनकर गीता जैसा ज्ञान दिया- कृष्ण की तरह। राजपाट से मुँह मोड़कर सत्य की खोज में नहीं निकले- बुद्ध और महावीर की तरह। देश के कोनों को नापने नहीं निकले- शंकराचार्य की तरह। भारत की आध्यात्मिक प्रखरता का परचम पश्चिम में नहीं फहराया- विवेकानंद की तरह। 20 साल की उम्र में शिरडी में कदम रखे। वहाँ 60 साल तक डटे। ट्रेन तक की सवारी नहीं की। दो गाँव हैं- राहाता और नीमगांव। शिरडी के दोनों तरफ। इनकी सीमाओं के पार नहीं गए। ताजिंदगी।

शिरडी में वे एक बारात में आए थे। बारात लौट गई। वे यहीं रह गए। पौधे लगाए। हाथों से सींचकर दरख्त बनाए। एक मस्जिद में डेरा डाला। मस्जिद का नाम- द्वारकामाई। इससे पहले कि लोग उन्हें मुस्लिम समझें, उन्होंने मस्जिद में धूनी रमा ली- हिंदू योगियों की तरह। लेकिन दो शब्द हमेशा दोहराते- अल्लाह मालिक। न चेलों की फौज, न दौलत के ढेर। लिबास और भिक्षा पात्र के सिवा अपना कुछ नहीं। नाम तक अपना नहीं। बारात के स्वागतकर्ताओं में एक सज्जन थे- म्हालसापति। बैलगाड़ी में आए युवा फकीर को देखा। झुककर कह दिया- आओ साई। अनजान गांव में एक अनाम फकीर को नाम मिल गया- साई।

साई अपने पास आए दुखियारों को ढांढस बंधाते। सबको भले काम की तालीम देते। बुरा सोचने वालों को खूब फटकार लगाते। दिखावे से दूर। सीधे। सहज। सरल। बाबा ने चमचमाते आश्रम और डेरे नहीं बनाए। अमीर भक्तों की जमात नहीं जोड़ी। एक दरिद्र कोढ़ी को अपनी सेवा में सबसे करीब आने दिया। उसका नाम था- भागोजी शिंदे। दक्षिणा में सैकड़ों रुपए मिलते। दूसरों में बाँटकर खुद जमीन पर सोते। रोज हर सुबह पाँच घरों के सामने हाथ पसारे दिखते। उनके शिष्य हेमाड पंत ने गजब के किस्से लिखे हैं।

बाबा की जिंदगी का एक सबसे दिलचस्प अध्याय भी है। चमत्कारी किस्से-कहानियों से एकदम अलग। कम लोगों का ध्यान इस तरफ गया है। श्रद्धा के सैलाब में छिपा एक बेशकीमती प्रयोग। बड़े से बड़ा सुधारवादी भी आज इसकी कल्पना नहीं कर सकता। 1911 की बात है। बाबा के निर्वाण के सात साल पहले। बाबा ने रामनवमी का जबर्दस्त जलसा शुरू किया। वो भी उसी मस्जिद में। वे इतने से ही नहीं माने। इस प्रयोग को और बढ़ाया। रामनवमी के उत्सव में गोकुल उत्सव और जोड़ दिया। उर्स-मोहर्रम भी। इस क्रांतिकारी प्रयोग में हाजी अली भक्तों के माथे पर चंदन का टीका लगाते। काका साहेब दीक्षित उर्स में आने वालों को पानी का इंतजाम करते।

हेमाड पंत ने साई सच्चरित्र के अध्याय छह में पेज-33 पर द्वारकामाई मस्जिद में रामनवमी और गोपाल उत्सव के सचित्रण विवरण लिखे हैं। अखबार की भाषा में कहूं तो लाइव रिपोर्ट। सबसे पहले 1897 में जब रामनवमी उत्सव के विचार पर बाबा की मुहर लगी तो कलेक्टर के सामने उत्सव का आवेदन दिया गया। पटवारी ने कुछ आपत्ति की। लेकिन अंतत: मंजूरी मिल गई। गाँव में दो कुएँ थे। एक में खारा पानी था। दूसरा अक्सर सूखा रहता था। खारे पानी के मीठा होने का किस्सा किताब में है। जब रामनवमी उत्सव शुरू हुआ तो सबसे पहले ध्वज का चल समारोह निकला। दो ध्वजाएँ मस्जिद के दोनों तरफ फहराई गईं। अमीर शक्कर नाम के एक शिष्य की पहल पर थालियों में चंदन सजाकर शिरडी में जुलूस निकला। राम जन्म के लिए एक खूबसूरत पालना लाया गया। उसे सजाया गया। जमकर रंग-गुलाल उड़ा। श्रद्धालुओं के शोरशराबे और उत्साह के अतिरेक में गुलाल के कुछ कण बाबा की आंखों में चले गए। वे गुस्सा हुए। बाबा को क्रोध में देख लोग घबराए और पालना हटाने का विचार किया। मगर बाबा ने शांत चित्त होकर रोका और कहा-अभी क्यों हटाते हो, उत्सव पूर्ण करो। अगले दिन गोपाल उत्सव हुआ। पोहा-दही का प्रसाद बटा।

अब्दुल बाबा साई के सेवक थे। उनकी दरगाह भी बाबा के समाधि मंदिर के बगल में ही है। समाधि मंदिर में जब हर दिन हजारों कंठों से बाबा की आरती गूंजती है तो दरगाह में मौजूद मालेगांव के माेहम्मद अशरफ मियां की हथेलियाँ भी बरबस ताली बजाने लगती हैं। दरगाह से उठी लोभान की खुशबू मंदिर से लौटते इंदौर के डॉक्टर राजेश पी. माहेश्वरी के कदम अब्दुल बाबा की पनाह में मोड़ देती है। 30,000 की बस्ती है शिरडी। हर दिन 20,000 और तीज-त्योहार के दिनों में एक लाख लोग शिरडी की चौखट पर आते हैं। अनगिनत अशरफ और न मालूम कितने माहेश्वरी। जहाँ मंदिर-मस्जिद और दरगाह-समाधि एक साथ महकते हैं। 24 घंटे। साल के 365 दिन। पूरे 100 से।