संस्कृति
छत्रपति शिवाजी महाराज से राम मंदिर निर्माण तक भारतवर्ष का सांस्कृतिक पुनरुत्थान
तृषार - 6th December 2020

सन 1565 में तालिकोटा का युद्ध समाप्त होते ही सल्तनत की सेनाओं ने विजयनगर (हम्पी) के कलात्मक स्थापत्यों का विध्वंस आरंभ किया। कृष्णदेव राय की स्वप्नसृष्टि समान इस भव्य और कलात्मक स्थापत्य-वैभव से भरे-पूरे नगर का विनाश आने वाली लंबी कालरात्रि का संकेत दे रहा था।

यह युद्ध इसलिए भी महत्त्वपूर्ण था क्योंकि इस युद्ध में भारत के अंतिम हिंदू साम्राज्य का अस्त हुआ। लग रहा था कि इस युद्ध के बाद भारतीयों ने नूतन हिंदू मंदिरों का निर्माण करने का सामर्थ्य खो दिया।

देश के सभी बड़े योद्धा विधर्मी सत्ताओं से पराजित हो चुके थे या फिर उनका आधिपत्य स्वीकार कर उनकी ही सेना में शामिल होने पर विवश कर दिए गए थे। सहस्र वर्षों से वैश्विक सभ्यताओं के दैदीप्यमान सूर्य समान हमारी सभ्यता और संस्कृति का ह्रास हो चुका था।

लेकिन हम्पी विध्वंस के मात्र 65 वर्ष पश्चात् महाराष्ट्र में छत्रपति शिवाजी महाराज के जन्म के साथ ही क्षात्रतेज का फिर से उदय हुआ। अब दीपावली और नवरात्र जैसे पारंपरिक उत्सवों के साथ साथ गणेशोत्सव तथा गुड़ी पाड़वा जैसे उत्सव भी प्रजा निर्भीक होकर मना सकती थी।

बीजापुर से शिवाजी महाराज को समाप्त करने की मंशा से चले अफ़ज़ल ख़ान ने प्रतापगढ़ युद्ध से पहले तुलजा भवानी और पंढरपुर जैसे देवस्थानों को ध्वस्त किया। परिणाम स्वरूप शिवाजी राजे ने उस धर्मांध का मस्तक काट कर माँ भवानी के चरणों में अर्पित किया। शिवाजी महाराज का यह कृत्य प्रतीकात्मक रूप से सभी विध्वंसक विदेशी सत्ताओं के लिए चेतावनी थी।

महाराष्ट्र तथा दक्षिण भारत के अन्य प्रदेशों में महाराज के कार्यकाल में अनेक मंदिरों का जीर्णोद्धार कराया गया। चेन्नई के एक मंदिर में शिवाजी महाराज की गुप्त मुलाकात का किस्सा भी प्रसिद्ध है। अयोध्या में राम मंदिर भी महाराज का ही स्वप्न था।

तालिकोटा का युद्ध और दक्खण में हिंदवी सत्ता के उदय ने सिद्ध कर दिया था कि राजकीय तथा शासकीय शक्तियों के बिना कला, स्थापत्य, संस्कृति और सभ्यता की रक्षा कर पाना संभव नहीं था। शिवाजी महाराज के पश्चात् तंजावुर, ओरछा जैसे अन्य प्रदेशों में भी नूतन हिंदू देवालयों का निर्माण और जीर्णोद्धार कार्य हुआ।

पंजाब में सिक्ख पंथ का उदय हुआ और गुरुद्वारों के रुप में विधर्मी सत्ताओं को नई चुनौती का सामना करना पड़ा। गुजरात में गायकवाड़ ने धर्मस्थलों के रखरखाव और निर्माण का प्रशंसनीय कार्य किया। मैसूर और त्रावणकोर के राजपरिवारों ने भी धर्मोदय के इस अभियान में महत्वपूर्ण योगदान दिया। अनेक छोटे-बड़े रजवाड़ों ने अपनी क्षमतानुसार इस यज्ञ में भाग लिया।

इन सभी प्रयासों में सबसे महत्वपूर्ण कार्य महेश्वर की महारानी अहिल्याबाई होलकर ने किया। काशी विश्वनाथ से सोमनाथ तक शांतिपूर्ण तरीके से उन्होंने भारतीय मंदिरों का जीर्णोद्धार कराया। रानी अहिल्याबाई ने बिना विद्रोह और संघर्ष किए एक ऐसी क्रांति की जिसने उनका नाम भारतीय इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में अंकित कर दिया।

रानी अहिल्याबाई होलकर ने गंगोत्री से गया और रामेश्वरम से द्वारिका तक सभी पौराणिक स्थलों का पुनर्निर्माण कराया। सांस्कृतिक पुनर्जागरण का यह काल आने वाले समय में हिंदू धर्माभिमान को बनाए रखने में सहायक होने वाला था।

सन् 1780 में विध्वंस के 111 वर्ष बाद काशी विश्वनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण कराया गया। काशी की चेतना फिर से जाग्रत हुई। ज्योतिर्लिंग के मूल स्थान पर विधर्मी धर्मस्थल को बिना हटाए नया मंदिर एक आशा की किरण रूप है और अनंत प्रतीक्षा के प्रतीक नंदी महाराज आज भी मस्जिद की ओर टकटकी लगाए मूलस्थान पर महादेव की पुनर्स्थापना के लिए प्रतीक्षा में तपस्यारत बैठे जान पड़ते हैं।

महादेव भक्त अहिल्याबाई ने काशी विश्वनाथ के उपरांत ॐकारेश्वर, त्र्यंबकेश्वर, सोमनाथ, भीमाशंकर, बैद्यनाथ और रामेश्वरम जैसे ज्योतिर्लिंगों का भी जीर्णोद्धार/निर्माण कार्य कराया। काशी, अयोध्या, महेश्वर, प्रयाग और नासिक क्षेत्रों में पवित्र नदी के तटों पर घाट निर्माण हो या प्राचीन पवित्र नगरों में यात्रियों के ठहरने हेतु धर्मशाला का निर्माण हो, अहिल्याबाई ने हर पहलू का ध्यान रखा।

पानिपत के पश्चात जब अहिल्याबाई होलकर सांस्कृतिक पुनर्जागरण का शांतिपूर्ण अभियान चला रही थीं तब दूसरी ओर से अंग्रेज़ी सत्ता के रूप में भारतीय संस्कृति पर नया संकट मंडरा रहा था।

अंग्रेज़ भी धर्मांध थे लेकिन इन्होंने देवालयों को ध्वस्त करने के बदले कुटिल नीति से हिंदू सभ्यता पर वार किया।‌ एक ओर मिशनरी के जरिए धर्म प्रसार किया जा रहा था तो दूसरी ओर शैक्षणिक संस्थानों के माध्यम से शिक्षित वर्ग के मस्तिष्क में अपनी ही संस्कृति के प्रति हीन-भावना का बीज बोया जा रहा था।

नई चुनौती का सामना करना आसान नहीं था लेकिन स्वामी विवेकानंद और वीर विनायक दामोदर सावरकर जैसे महापुरुषों के प्रयासों ने प्रजा का मनोबल कमजोर नहीं होने दिया।

एक ओर गांधीजी का अहिंसक आंदोलन चल रहा था तो दूसरी ओर एचएसआरए, आज़ाद हिंद फौज़ और गदर पार्टी जैसे सशस्त्र आंदोलन भी सक्रिय थे लेकिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ तथा आर्य समाज जैसी संस्थाओं ने संस्कृति रक्षा के लिए ज़मीनी स्तर पर कार्य किया।

राजकीय स्वाधीनता के साथ सांस्कृतिक राष्ट्र की पहचान बनाए रखना भी उतना ही महत्त्वपूर्ण था। बाल गंगाधर तिलक जैसे नेताओं ने गणेशोत्सव के माध्यम से स्वतंत्रता आंदोलन को सांस्कृतिक पुनर्जागरण से जोड़ने का काम किया।

1947-50 में अंग्रेज़ों ने देश छोड़ा लेकिन उनकी शिक्षा पद्धति शैक्षणिक संस्थानों में अपने हेतु को पूरा करती रही। वामपंथी विचारधारा के लोगों का शिक्षा तंत्र पर एकाधिकार था और इसका मुकाबला किसी शस्त्र से नहीं किया जा सकता था।

शिक्षा विभाग के साथ साथ प्रचार माध्यमों पर भी वामपंथी विचारधारा का प्रभाव था।‌ बारंबार हिंदूओं को अपनी सांस्कृतिक परंपराओं और विरासतों के लिए हीन-भावना का महसूस करवाई जाती।

फिल्मों तथा टेलीविज़न के माध्यम से हिंदू त्यौहारों, देवी-देवताओं और परंपराओं का उपहास बनाना आम बात थी।‌ हिंदुओं को अपने ही धर्मग्रंथों से दूर कर दिया गया। प्राचीन कला स्थापत्य और गणित से पीढ़ियों को काट दिया गया।

विदेशी सत्ताएँ जा चुकी थीं लेकिन उनका प्रभाव अभी तक हमारे देश पर बना हुआ था।‌ हताशा के इस दौर में 1990 के दशक में चला राम मंदिर आंदोलन निराश हो चुके हिंदुओं के लिए संजीवनी सिद्ध हुआ। साथ ही कैसेट्स और वीडियो सीडी जैसे इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों ने अदृश्य रूप से वामपंथी विचारधारा के एकाधिकार को समाप्त करने का कार्य किया।

इन्हीं वर्षों में लगातार हो रहे सत्ता परिवर्तन और आतंकवादी आक्रमणों ने भारतीयों को अपनी निर्बल हो चुकी मानसिकता पर पुनर्विचार का समय दिया। 1990 का दशक पूर्ण होने तक समय ने करवट बदलना आरंभ कर दिया था।

सन् 2001 में कच्छ भूकंप के पश्चात गुजरात में नरेंद्र भाई मोदी ने सत्ता सूत्र संभाले। मोदीजी ने मुख्यमंत्री के रूप में विकास कार्यों के साथ अहिल्याबाई होलकर के बाद निश्चेतन हो चुका मंदिर पुनर्जागरण का अभियान फिर से शुरू किया।

गुजरात के अंबाजी, द्वारिका, प्रभास और डाकोर जैसे दर्शनीय स्थलों पर नव-निर्माण और यात्रियों के आवागमन हेतु सुविधाएँ बढ़ाई गईं। मुख्यमंत्री ने सन् 2002 में गांधीनगर अक्षरधाम पर हुए आतंकवादी हमले के पश्चात मंदिरों की सुरक्षा व्यवस्था पर भी महत्त्वपूर्ण कार्य किया।

सुचारु व्यवस्था के कारण डाकोर जैसे यात्रा-धामों में भगदड़ से घटने वाले हादसों की खबरें अखबारों से गायब हो गईं। इन्हीं वर्षों में मुख्यमंत्री क्रांतिकारी श्यामजी कृष्ण वर्मा की अस्थियों को वापस ले आने में मुख्यमंत्री सफल हुए और राज्य भर में अस्थि-कलश की शोभायात्रा के पश्चात मांडवी क्रांति-तीर्थ में इन्हें स्थापित किया गया।

इन्हीं छोटे-छोटे प्रयासों ने जनमानस में नवचेतना का संचार किया। इसके उपरांत इंटरनेट का आगमन भी इन कार्यों में सहायक सिद्ध हुआ। प्रधानमंत्री पद संभालने के पश्चात नरेंद्र मोदी जी ने सबसे पहले 2013 में तहस-नहस हुए केदारनाथ मंदिर को फिर से खड़ा करने का फैसला किया। पिछले वर्षों में प्रधानमंत्री द्वारा केदारनाथ की मुलाकातें उनके केदारनाथ धाम के विकास कार्य के दृढ़ निश्चय का प्रतीक है।

केदारनाथ उपरांत प्रधानमंत्री ने अपने निर्वाचन क्षेत्र वाराणसी के विकास पर भी विशेष ध्यान दिया। प्रधानमंत्री के इन्हीं प्रयासों के परिणामस्वरूप काशी विश्वनाथ कॉरिडोर और गंगा स्वच्छता अभियान के सुखद दृश्य भी सामने आने आरंभ हो चुके हैं।

पिछले सात वर्षों में अयोध्या राम मंदिर के निलंबित मामले का भी शांतिपूर्ण समाधान किया गया।‌ पूरी प्रक्रिया का पालन करते हुए हिंदुओं ने अपने अधिकारों को प्राप्त करने में सफलता प्राप्त की।

इन बड़े मंदिरों के उपरांत गिरनार रोप-वे जैसे विकास कार्य भी समांतर रूप से चलते रहे हैं जिनपर स्वतंत्रता के बाद किसी सरकार ने लक्ष नहीं दिया था। योग दिवस के रूप में योग और आयुर्वेद के पुनरुत्थान के प्रयास भी सफल रहे। मथुरा में कृष्ण जन्मभूमि के उदय के संकेत भी प्राप्त होने आरंभ हो चुके हैं।

जब प्रधानमंत्री विदेशी अतिथियों को महाबलीपुरम के स्थापत्यों और काशी की गंगा आरती में शामिल करते हैं तब वैश्विक प्रचार माध्यम भी हमारी इन विरासतों का प्रसारण करने के लिए विवश हो जाते हैं। हमारे यात्रा-धामों से विश्व के यात्रियों को आकर्षित करने का यह अनूठा तरीका है।

तालिकोटा युद्ध के बाद हुए इस पूरे घटनाक्रम पर विचार करें तो हम समझ पाएँगे कि मिस्र, रोम जैसी सभ्यताओं की तुलना में हमारी सभ्यता और संस्कृति को बचाए रखने में हम कैसे सफल हुए। हर बार चुनौतियां नया रूप धारण कर हमारे समक्ष प्रकट होती रही हैं लेकिन जंबुद्वीप की धरा में पैठ जमा चुकी हमारी संस्कृति की कोंपलें फिर से नवपल्लवित होती रही हैं और होती रहेंगी।