संस्कृति
मंदिर की यात्रा भारत से भारत तक, विभिन्न प्रदेशों में विराजे भगवान राम से जुड़ी गाथाएँ
तृषार - 4th August 2020

प्रसंग- देश के विभिन्न स्थानों के राम मंदिर और उनसे जुड़ी मान्यताएँ।

यदि हम कड़ियों को जोड़ लेंगे तो इतिहास बन जाएगा और उलझनों को सुलझा लेंगे तो धर्म बन जाएगा। चलिए भारत के विभिन्न प्रदेशों के राम मंदिरों से जुड़ी ऐसी ही कुछ कड़ियों को जोड़ते हैं और उलझनों को सुलझाते हैं।

भारतवर्ष के हृदय में बसा ओरछा का छोटा-सा नगर और इस नगर में सैंकड़ों वर्षों से चली आ रही लोकोक्तियाँ- यहाँ के कृष्णभक्त राजा और रामभक्त रानी में भक्ति की श्रेष्ठता के लिए अनबन इतनी बढ़ गई कि रानी ने नगर छोड़कर अयोध्या अपने आराध्य के धाम में प्रयाण किया।

सरयू नदी के तट पर भीषण तपस्या के बाद रानी ने “राम राम” का जाप करते हुए अपने आप को नदी में आहूत कर दिया लेकिन कृपालु रामचंद्र ने बालक वेश में प्रकट होकर उन्हें रोक लिया और वे सशर्त उनके साथ ओरछा चलने के लिए तैयार हो गए।

ओरछा संभवतः एक मात्र स्थान है जहाँ राम राजा के रूप में पूजे जाते हैं। ओरछा की लोकोक्तियों में कहा जाता है कि भगवान अयोध्या में दिन बिताते हैं, लेकिन प्रत्येक रात आराम करने के लिए ओरछा लौटते हैं। यहाँ एक और ध्यानाकर्षक बात यह भी है कि रानी की अयोध्या से वापसी सन 1575 में हुई, जबकि बाबरी का निर्माण अयोध्या में 1527/28 में हो चुका था। इसका स्पष्ट अर्थ यह है कि 1528 में बाबर द्वारा मंदिर के विध्वंस के बाद भी अयोध्या भगवान राम के उपासकों के लिए एक तीर्थ स्थान बना रहा।

यह तो सभी को ज्ञात है कि उस युग में विधर्मियों के आक्रमण की स्थिति में महत्त्वपूर्ण मंदिरों की देव प्रतिमाओं को गुप्त स्थान पर सुरक्षित कर लिया जाता था, क्या यह सभी कड़ियाँ इस बात का संकेत नहीं हैं कि अयोध्या की राम प्रतिमा को ओरछा में सुरक्षित कर लिया गया था? वैसे भी ओरछा का एक अर्थ “छुपा हुआ नगर” भी है।

अब चलते हैं थोड़ा पश्चिम की ओर, पंचवटी, राम वनवास का एक महत्वपूर्ण स्थान जिसे आज नासिक के नाम से पहचाना जाता है। सातवाहन वंश के अलावा नासिक कभी किसी बड़े राज्य की राजधानी नहीं रहा किंतु यह व्यापार और अर्थतंत्र का केंद्र प्राचीन काल से बना रहा है और भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में भी इस नगर ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

यहाँ गोदावरी के तट पर चौलुक्य, यादव और पेशवाओं ने अनेक घाटों और मंदिरों का निर्माण कराया था जिसमें से कालाराम भी एक प्रमुख मंदिर है। सातवीं शताब्दी में राष्ट्रकूट काल में निर्मित मंदिर विदेशी आक्रमणों की बलि चढ़ गया और जनमानस ने उसे भूला दिया।

सन 1792 में सरदार रंगाराव ओडेकर को स्वप्न में गोदावरी के जल में सहस्र वर्ष पूर्व विसर्जित की गई भगवान राम की प्रतिमा के दर्शन हुए जो कालाराम मंदिर के निर्माण का संकेत बना। एक मत यह भी है कि साधुओं के समूह को नदी से राम प्रतिमा प्राप्त हुई जिसे गोपिका बाई पेशवा के निर्देश पर मंदिर में स्थापित किया गया।

काले पत्थरों से हेमाडपंती शैली में 18वीं शताब्दी में बने इस नयनरम्य मंदिर के प्रांगण में हनुमानजी विराजित हैं। मंदिर के आधार स्वरूप 84 स्तंभ 84 लाख योनियों का प्रतीक हैं और 14 चरण राम वनवास के 14 वर्षों का प्रतीक हैं। मंदिर के निकट ही भगवान दत्तात्रेय और कपालेश्वर महादेव के देवालय हैं। ओरछा का मंदिर राम की राजा के स्वरूप में पूजा करता है तो कालाराम मंदिर उनके वनवास के वर्षों का साक्षी है।

यात्रा को आगे बढ़ाते हुए अब चलते हैं दक्षिण की ओर एक प्राचीन नगर कुंभकोणम। कुंभकोणम को मंदिरों की नगरी कहा जाता है और यहाँ का भव्य रामास्वामी मंदिर अपनी कलाकृतियों के लिए ख्यात है। यहाँ मारुति को एक हाथ में रामायण महाकाव्य धारण कर भगवान राम की महिमा गाते हुए वीणा वादन करते देखकर लगता है कि कुंबकोणम जैसे नगरों की वजह से ही आज तक भाषा और संस्कृति की रक्षा संभव हो पाई है।

रामास्वामी मंदिर से थोड़ा आगे चलते छठी-नौवीं शताब्दी में द्रविड़ शैली में निर्मित थिरुपुल्लभुटुंगुडी मंदिर है। यहाँ चतुर्भुज विष्णु को कोलावल्ली रामार और उनकी पत्नी लक्ष्मी को सीता के रूप में पूजा जाता है। वनवासी राम अपने पिता दशरथजी के अंतिम संस्कार नहीं कर पाए थे इसीलिए ग्लानि निर्मूलन हेतु उन्होंने इस स्थान पर अपने पितातुल्य जटायू पक्षी का तर्पण कर के अपने मन को सांत्वना दी। यह मान्यता है कि जो लोग किन्हीं कारणवश अपने माता-पिता के अंतिम संस्कार का कर्त्तव्य निभाने में विफल रहते हैं उन्हें इस मंदिर के दर्शन करने पर पितृ दोष से मुक्ति मिलती है।

जम्मू का रघुनाथ मंदिर हमारी यात्रा का अंतिम पड़ाव है। इस मंदिर का निर्माण सन 1822-60 के दौरान महाराजा गुलाब सिंह और उनके पुत्र महाराजा रणबीर सिंह के समयकाल में कराया गया था। प्रचलित किंवदंती बताती है कि मंदिर का निर्माण मूल रूप से कुल्लू के राजा जगत सिंह ने किया था और मंदिर के अंदर रखी मुख्य प्रतिमा को अयोध्या से लाया गया था। विविध वास्तु शैलियों से प्रभावित इस भव्य मंदिर परिसर में सात शिखरों का समूह है।

जम्मू नगर की पहचान बन चुके इस मंदिर पर सन 2002 के एक ही वर्ष में लश्कर-ए-तय्यबा के फ़िदायीन हमलावरों ने मार्च और नवंबर में दो आत्मघाती हमले किए। ग्रेनेड्स और आधुनिक शस्त्रों से किए गए इन आक्रमणों ने प्राचीन काल से चली आई इस विध्वंसकारी विचारधारा का भद्दा चेहरा एक बार फिर से उजागर किया। आतंकियों ने अनेकों श्रद्धालुओं के रक्त से परिसर को नहला दिया। सहस्र वर्षों में इस राष्ट्र पर किए गए किसी भी आक्रमण में इतनी शक्ति नहीं थी कि वे हमारी चेतना को मिटा सकें। हम हर बार राख से वापिस खड़े होते रहे।

अयोध्या से ओरछा भगवान राम का स्थानांतर हो या गोदावरी में तिरोभूत कालाराम का पुनःनिर्माण हो, रामास्वामी मंदिर में संस्कृति रक्षा हो या थिरुपुल्लभुटुंगुडी में परंपराओं को सहेजे रखने की जद्दोजहद हो। ओरछा, नाशिक, कुंभकोणम, जम्मू जैसे मंदिर इस बात की साक्षी देते खड़े हैं की यह राष्ट्र विदेशी आक्रमणों से अपनी सभ्यता और संस्कृति की रक्षा करता रहा है और करता रहेगा।

अयोध्या की विजय इसी शृंखला में एक अध्याय जोड़ रही है। वादों विवादों के बीच एक बात स्पष्ट है कि जैसे भक्तों के हृदय से प्रभु श्रीराम के प्रति श्रद्धा को अलग नहीं किया जा सकता वैसे ही अयोध्या से और भारतवर्ष से राम को अलग नहीं किया जा सकता।

गंतव्यों के बारे में न सोचकर निरंतर चलते जाने वाले तृषार @wh0mi_ के माध्यम से ट्वीट करते हैं।