संस्कृति
श्रीराम के माध्यम से महिला शक्ति की सामाजिक स्वीकार्यता को रेखांकित करते निराला

प्रसंग- सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की कविता राम की शक्ति पूजा के माध्यम से श्रीराम के मानवीय व्यक्तित्व और देवी पूजा की परंपरा पर विचार।

नवमी के साथ नवरात्रि की समाप्ति होती है। नौ दिवस नारी के नौ रूपों का स्मरण करके, नन्हीं शैलसुते से गौरी का युवा होती कन्या के तपश्चर्या करता विद्यार्थी रूप, से बढ़कर एक सृष्टि की निर्मात्री माता कुष्मांडा स्वयं में सृष्टि का उद्भव समेटे हुए स्त्री रूप से आगे समाज की निर्मम व्यवस्थाओं से छूटे मातृहीन स्कंद को ज्येष्ठ पुत्र के रूप में स्वीकार करने वाली स्कंदमाता, सामाजिक विकारों एवं क्रूर रक्तबीजों से निरंतर युद्धरत कठोर कालरात्रि से होते हुए माँ जगदंबा के रूप में, ब्रह्मा-विष्णु-महेश एवं समस्त देवताओं द्वारा सशक्त किया हुआ रूप नवरात्रि की समाप्ति की सूचना देता है। अंतिम दिवस शस्त्र पूजा एवं शौर्य के स्मरण का होता है। भिन्न भिन्न रूप में माता को देखने वाले भक्त बहुधा यह भूल जाते हैं कि नवरात्रि अपने आप में कई परिप्रेक्ष्यों को समेटे है। इसमें महिला के प्रत्येक रूप का सम्मान है, उसके समक्ष समर्पण है।

पाशविक शक्ति पर आधारित समाज व्यवस्था इसे पूर्णतया समझ पाने में असमर्थ है। दुखद यह है कि आधुनिक काल में जैसे-जैसे धार्मिक विमर्श भारतीय सामाजिक मंथन से बाहर निकालता गया, हम अपनी परंपराओं और उनमे निहित दूरगामी सत्य को समझ पाने में असमर्थ होते चले गए। जैसे प्रत्येक धार्मिक परंपरा के स्थूल एवं सूक्ष्म आयाम होते हैं, नवरात्रि के भी हैं। एक अपरिष्कृत, पाशविक समाज शारीरिक बल पर आधारित होता है, वह एक अत्यंत आदिकालीन समाज होता है जिसमें शारीरिक शक्ति से विहीन वर्ग- स्त्रियों, वृद्धों के लिए स्थान नहीं होता है। यहाँ आदिकालीन को आदिवासी समाज समझना बहुत बड़ी भूल होगी।

नवरात्रि में स्त्री रूप पर्वतों में रहने वाली पारवती होती है, गौरवर्ण देवी भी होती है, श्यामल-वर्णा माँ कालरात्रि भी होती है। एक पुरुष-प्रधान हिंसा पर आधारित समाज में स्त्री भारतीय पुराणिक व्यवस्था के अनुसार ब्रह्मा के सामान अंश से नहीं उत्पन्न होती है एवं भारतीय प्रकृति-पूजक आदिवासी संस्कृति, ईरान की पुरातन परंपरा स्त्री या पश्तो की शेजा या प्राचीन अफ़ग़ानिस्तान की ‘इस्त्री’ अर्थात पुरुष की समकक्ष सृष्टि-निर्माता प्रकृति न होकर, शक्तिशाली के शारीरिक उपभोग की वास्तु यानि औरत अर्थात अरबी ‘अवरा’ या पाँचवी सदी के ईरान की ‘ओवरत’ हो जाती है।

जैसे-जैसे दार्शनिक विमर्श पीछे छूटता जाता है, प्रकृति-प्रधान धर्मों के विश्वासों को उपहासों और निंदा का सामना करना पड़ता है, परंपराएँ रूढ़ियाँ बन जाती हैं। धर्म का दर्शन और विचार समझने वाले लोगों की अनुपस्थिति में धीरे-धीरे पाखंड परंपरा का स्थान लेती जाती है। जैसे ईसाई धर्म में चर्च का अपना बौद्धिक समाज था, मुस्लिम समाज में उलेमा होते हैं, वैसे ही हिंदू समाज में ब्राह्मण विचारक हुआ करते थे। जाति से वर्ण को जोड़कर, वर्ग संघर्ष के माध्यम से जातिगत विद्वेष को हवा देकर और बौद्धिक दमन के द्वारा उस वर्ग को लगभग समाप्त ही कर दिया गया।

जैसा कि कहते हैं साहित्य समाज का दर्पण होता है, एक निराशा साहित्य में भी दृष्टिगोचर होती है। एक विकास-विरोधी, प्रतिगामी परंपरा होने का बोध हिंदुओं में ऐसा भरा गया कि शक्ति की उपासना और उसका अर्थ समझना कठिन ही होता चला गया। किस प्रकार भारतीय साहित्य से वीररस का लोप होता गया और भक्तिरस ने उसका स्थान लिया, इस र आचार्य रामचंद्र शुक्ल अपनी पुस्तक ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ के अध्याय- पूर्व-मध्यकाल: भक्तिकाल- में बिना लाग लपेट के लिखते हैं –

“देश में मुसलमानों का राज्य प्रतिष्ठित हो जाने पर हिंदू जनता के हृदय में गौरव, गर्व और उत्साह के लिए  अवकाश न रह गया। उसके सामने ही उसके देवालय गिराए जाते थे, देवमूर्तियाँ तोड़ी जाती थी और पूज्य पुरुषों का अपमान होता था….. ऐसी दशा में अपनी वीरता के गीत न तो वे गा ही सकते थे और न बिना लज्जित हुए सुन सकते थे।”

युद्ध, महामारी जैसी विभीषिकाओं के घाव सभ्यता के सीने पर घटित होने के पश्चात बहुत वर्ष तक रहते हैं। विभाजन के साथ स्वतंत्र हुए भारत के पुनर्जीवन के साथ उसी साहित्यिक सामर्थ्य की पुनर्स्थापना हुई जो शताब्दियों तक लज्जित रहा था। एक बार पुनः पुराण, रामायण, महाभारत के माध्यम से नव-स्वतंत्र सभ्यता के स्वाभिमान की नत-ग्रीवा को उन्नत करने का प्रयास हुआ। भारतीय लेखन का लौटता तेज़ हमें दिनकर के काव्य में दिखा जब वे पाटलिपुत्र की गंगा से पूछते हैं-

‘तुझे याद है चढ़े पदों पर कितने जय-सुमनों के हार?
कितनी बार समुद्रगुप्त ने धोयी है तुझमें तलवार ?’

उभरते हुए वामपंथ के अंतर्राष्ट्रीय सरोकारों के साथ एक रीढ़धारी राष्ट्रीयता नहीं जाती थी सो साहित्य का यह स्वर्णकाल बहुत समय नहीं रहा और अपनी ही लज्जा में सिमट गया। आज संभवतः आपातकाल और उसके बाद बने राजनैतिक समीकरणों से साहित्य पुनः मुक्त हो रहा है जो हम निराला की राम की शक्तिपूजा पर वार्ता कर रहे हैं।

विषय पर रहते हुए नवरात्रि के गूढ़ अर्थ को देखें। यह एक शक्तिशाली महिला का पर्व नहीं है, उसकी शक्ति की सामाजिक स्वीकार्यता का पर्व है। इन दोनों में बहुत महीन अंतर है। मेरी समझ में यही अंतर महाकवि सूर्यकांत निराला की कविता ‘राम की शक्तिपूजा’ में उभरकर आता है।

देवी की शक्ति देवी के लिए ही आवश्यक नहीं थी, देवी की महिमा के लिए अनिवार्य नहीं थी। देवी जोआन ऑफ़ आर्क की भाँति साम्राज्य की रक्षा के लिए युद्ध नहीं कर रही थीं। देवी संपूर्ण समाज की शक्ति का पर्याय हैं। देवी पुरुष के अस्तित्व में स्त्री की भूमिका कर वर्णन हैं। यह बहुत महीन अंतर है। स्त्री का शक्तिशाली होना उसके अपने लिए ही नहीं वरन समाज के लिए, समाज के पुरुषों के लिए भी आवश्यक हैं क्योंकि मातृशक्ति ही समाज के नैतिक मानदंड का निर्धारण करती है। पुरुष प्रकृति का यह परस्पर संबंध ही भारतीय विचार दर्शन के मूल में है जो इसे पाश्चात्य विचारों से भिन्न करता है।

श्री रामविलास शर्मा लिखते हैं- राम की शक्तिपूजा जैसी रचनाओं में दीर्घ पंक्तियाँ लहरों की तरह पछाड़ खाकर गिरती हैं। राम की शक्तिपूजा उनकी सबसे ओजपूर्ण कविता है। ईश्वर भी प्रारब्ध के अधीन है। ईश्वर एवं प्रारब्ध के मध्य का संबंध बड़े अनुत्तरित प्रश्न ईश्वरीय शक्ति के संबंध में छोड़ जाता है। यदि कृष्ण और राम ईश्वर थे तो क्यों कृष्ण को महाभारत का विनाश देखना पड़ा और क्यों राम को वनों में भटकना पड़ा। इसका उत्तर यह है कि ईश्वर जब मनुष्य का रूप धारण करते हैं तो मनुष्य के समस्त अवगुणों, अशक्तियों को भी स्वीकार करते हैं। प्रत्येक हिंदू अवतार या देव सामान्य मनुष्यों के लिए आदर्श स्थापित करते हैं। वे नैतिकता के मानदंड के अनुसार जीवन के कर्तव्यों का अनुपालन इस लिए नहीं करते हैं क्योंकि एक अवतार होने के कारण वह उनके लिए सरल है, वरन इसलिए करते हैं क्यों कि सब अवरोधों के बाद भी वही धर्म है। श्रीराम के व्यक्तित्व में एक विश्वसनीय ठहराव है जिसे अपने संघर्ष की नैतिकता और उसकी अंतिम सफलता के प्रति एक निश्चिंतता हैं। परंतु ‘ राम की शक्तिपूजा’ में श्रीराम एक मानवीय भय और अनिश्चितता के सम्मुख खड़े दिखते हैं। निराला लिखते हैं-

‘स्थिर राघवेंद्र को हिला रहा फिर फिर संशय,
रह रह उठता जग जीवन में रावण-जय-भय।’

स्थिरप्रज्ञ राम अपने वरिष्ठ योद्धाओं के मध्य चिंतित बैठे हैं, राम-स्वयं विष्णु के अवतार, जय-पराजय के, प्रारब्ध के स्वामी स्वयं रावण की जय को लेकर भय एवं संशय में हैं। इस उहापोह, स्व-संशय के काल में श्रीराम, मर्यादा-पुरुषोत्तम (पुरुषों में उत्तम), कहाँ से वह साहस, विश्वास स्वयं ईश्वर प्राप्त करेंगे तो उन्हें सत्यनिष्ठ रखते हुए धर्म के पक्ष में विजयी भी करेगा? जानकी के प्रेम की विकलता योद्धा के शौर्य को व्याकुल करती थी। और इस दुर्बल क्षण में जब श्रीराम के नेत्रों से अश्रुबूंदें हनुमान को भी विचलित कर देती हैं तो माता अंजना विचलित हुए हनुमान का मार्गदर्शन करती हैं। माता अंजना पूछती हैं-

‘तुम सेवक हो, छोड़कर धर्म कर रहे कार्य –
क्या असम्भाव्य हो राघव के लिए धार्य।’

संशय में लिप्त सेनापति की विचलित सेना को मातृ रूप अंजना भटकने से रोकती है। पथ कठिन हो, विश्वास हीन तो माता ही पुत्र को नैतिक पथ पर अविचलित रखती है। अधर्म की क्रूर वीभत्स विकरालता के समक्ष धर्म अपनी सादा सत्यता के साथ कितना निरीह दिखता है यह हम आज भी देखते हैं। सत्य का मार्ग कितना कठिन और असत्य का मार्ग कितना सरल। श्रीराम भी एक बार के लिए हतोत्साहित हो कर कह उठते हैं-

‘बोले रघुमणि – “मित्रवर, विजय होगी न समर;
यह नहीं रहा नर-वानर का राक्षस से रण,’

और इस निराशा के समय, जब श्रीराम, यह मानकर पराजय स्वीकार कर चुके थे कि देवी का आशीर्वाद तो रावण के साथ है, जांबवान उन्हें समझाते हैं कि श्रीराम देवी स्तुति करें, और जब सत्यतः धर्म एवं स्त्री सम्मान को माता समझ जाएँगी उनका आशीर्वाद श्रीराम को प्राप्त होगा एवं निश्चय ही युद्ध में रावण की पराजय होगी, क्योंकि रावण की स्त्री संवेदना राजनीतिक है, राम का देवी पूजन सत्य है। जांबवान कहते हैं-

‘रावण अशुद्ध हो कर भी यदि कर सका त्रस्त,
तो निश्चय ही तुम हो सिद्ध करोगे उसे ध्वस्त ,
शक्ति की करो मौलिक कल्पना, करो पूजन,
छोड़ दो समर जब तक न सिद्धि हो, रघुनन्दन।’

श्रीराम प्रार्थना पर 108 पुष्पों के साथ बैठते हैं और अंतिम दिवस, स्वयं देवी दुर्गा ध्यानमग्न श्रीराम के पास से पुष्प ले कर चली जाती हैं। राम अंतिम पुष्पांजलि से पूर्व पुष्पों की अनुपलब्धता के कारण प्रार्थना का अपूर्ण मान दुखी होते हैं परन्तु तब श्रीराम को ध्यान आता हैं कि उनकी माता उन्हें राजीवनयन अर्थात कमल नयन कहती थी तो इस प्रकार उनके पास पुष्पद्वय तो हैं देवी आराधना पूर्ण करने के लिए। दृगदान के लिए जब श्रीराम ब्रह्मशर उठाते हैं, भगवती प्रकट होकर उन्हें साधुवाद देती है। और अंततः युद्ध में जय का आशीर्वाद श्रीराम को प्राप्त होता है।

‘होगी जय, होगी जय, हे पुरुषोत्तम नवीन,
कह महाशक्ति राम के बदन में हुई लीन।’

विचारणीय यह है कि विष्णुरूप और महादेव के प्रिय श्रीराम को भी शक्ति का आशीर्वाद आवश्यक होता है धर्म के पक्ष में विजय प्राप्त करने को। यह भी कि जहाँ ‘मर्द बनो’ का विचार विजय के लिए दिया जाता है और चूड़ियाँ शक्तिहीनता के संकेत के रूप में बाँटी जाती है, राम को शक्ति को आत्मसात कर के ही विजय प्राप्त होती है।

परंतु यह विचार रामायण में अकेला नहीं है। संभवतः इसी मूलभाव से जुड़ा एक प्रसंग एक अर्थ में हम देवी भागवतपुराण में भी पाते हैं जब ब्रह्मा जी विष्णु को तपश्चर्या में लिप्त देख कर पूछ बैठते हैं कि आप, मैं और शिव तो सर्वोच्च देव हैं फिर आप किसकी प्रार्थना करते हैं। इसके उत्तर में विष्णु उन्हें कहते हैं कि आप सृष्टि की रचना, मैं पालन एवं महादेव विनाश तभी कर सकते हैं जब हमारे पास इन कर्तव्यों का निर्वहन करने की शक्ति हो। अतः शक्ति से इतर कोई नहीं है, ईश्वर भी नहीं। उस शक्ति के अभाव में न आप निर्माण कर सकते हैं न मैं पालन, और न शंकर विनाश। सृष्टि चक्र के चलने के लिए शक्ति आवश्यक है।

‘तया विरहितस्तस्त्वं न तत्वकर्मणे प्रभुः।
नाहं पालयितुं शक्तः संहर्तुं नापि शङ्करः।।

(बिना इस शक्ति के न आप सृष्टि का निर्माण कर सकते हैं, न मैं पालन और न ही शंकर संहार ही कर सकते हैं। )

शक्तिहीन के लिए धर्म का पालन भी संभव नहीं है। विज्ञान के अनुसार भी समस्त संसार पदार्थ एवं ऊर्जा या शक्ति के संतुलन से ही निर्मित होता है। अतः निराला की राम की शक्तिपूजा धर्म और शक्ति के आवश्यक सामंजस्य का ही सम्बन्ध है। शक्ति की प्राप्ति के विषय में लज्जित होना किसी समाज के लिया अनुचित नहीं है। शक्तिहीन समाज शीघ्र ही विद्या एवं श्रीहीन हो कर पतित हो जाता है। राम की शक्तिपूजा में धर्म एवं शक्ति के इसी सामंजस्य की कथा है। नवरात्री के शुभ पर्व पर इसी शक्ति की कृपा हमारे समाज, हमारी सभ्यता और विश्व पर बनी रहे, यही मंगलकामना है।

साकेत लेखक व ब्लॉगर हैं जो @saket71 के माध्यम से ट्वीट करते हैं।