संस्कृति
मध्य प्रदेश में कटनी के पास खंडहरों में खोई प्राचीन पुष्पावती

भारत के दामन में ज़ख्मों का कोई अंत नहीं है। बीती सदियों में दिल्ली पर काबिज विदेशी हुक्मरानों ने किस तरह हमारे प्राचीन मंदिरों को तहस-नहस किया, इसके सबूत हर कहीं दिखाई देते हैं। मध्य प्रदेश में कटनी के पास ऐसी ही एक जगह है बिलहरी। यहाँ एक पूरे नगर को ही नष्ट किया गया, जहाँ अनगिनत महल-मंदिर रहे होंंगे। तबाही की दास्तान खंडहर कहते हैं। सिर्फ बिलहरी ही नहीं कटनी के पास कारीतलई और करणबेल भी ऐसे ही विकसित नगर रहे होंगे, जहाँ हमलावरों ने एक भी पत्थर साबुत नहीं छोड़ा। देखिए बिलहरी की एक झलक, जिसका पुराना नाम भी अलग है…

कटनी से दस किलोमीटर के फासले पर है आज की बिलहरी। पुराना नाम है पुष्पावती। टूटी-फूटी डामर की सड़क कटनी को इस पुरानी वैभवशाली बस्ती से जोड़ती है। बिलहरी बमुश्किल तीन हज़ार आबादी का एक उजाड़ और उदास सा कस्बा है, जिसके भीतर दाखिल होते ही दाईं तरफ एक विशाल तालाब है। बाईं तरफ सड़क से सटी बेतरतीब घरों की लंबी बदसूरत कतार। जहाँ तालाब की सीमा खत्म होती है, वहाँ दाईं तरफ दूर तक पुराने घाटों और मंदिरों के अवशेष जमीन में से झाँकते हैं। बेहिसाब मूर्तियाँ और प्राचीन मंदिरों के खंडित हिस्से यहाँ-वहाँ बिखरे हुए हैं। एक पुलिस चौकी ऐसे ही एक मंदिर और उससे जुड़े तालाब तक गए रास्ते के बीचों-बीच खड़ी है। किसी समय नीचे घाट तक बहुत ही शानदार रास्ता बनाया गया होगा। यह निश्चित ही किसी राजपरिवार के लिए विशेष रूप से बना हुआ मंदिर होगा, जिनके लिए तालाब से जोड़कर बेहतरीन नक्काशीवाले दरवाजों के साथ रास्ता बनाया गया होगा।

बिलहरी में ऐसी कई विशाल बावड़ियाँ हैं- बावड़ी के भीतर जाने का रास्ता- वर्तमान में बदहाल बावड़ी

जैसे ही आप गाँव में दाखिल होते हैं तो हैरान रह जाते हैं। गली-गली में और घरों के सामने, खाली ज़मीन के टुकड़ों पर झाड़ियों और धूल-मिट्‌टी के टीलों में अनगिनत खंडित मूर्तियों के ढेर हैं। सिर्फ मूर्तियाँ ही नहीं किन्हीं महल-मंदिरों के टूटे हुए पत्थर इतनी बड़ी संख्या में हैं कि लगता है कि कोई पुराना शहर ही यहाँ दफन है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के अभीक्षक (केयरटेकर) आशीष दुबे ने कहा कि एएसआई के सरंक्षण में काफी कुछ बचा हुआ है। वरना गाँव के लोग बताते हैं कि पहले काफी पुरातात्विक संपदा यहाँ-वहाँ हो चुकी है।

कई मंदिर अपने उजाड़ शिखरों के साथ अमूल्य भग्नावशेषों को अपने दामन में लिए खड़े हैं। वाराह मंदिर इनमें से ही एक है। मंदिर के चबूतरे पर एक वाराह की प्रतिमा है। सदियों से वीरान गर्भगृह में खंडित मूर्तियाँ सहेजी गई हैं। इन्हीं में एक-दो पंक्तियों का शिलालेख मौजूद है। यह मंदिर कभी पीछे की तरफ एक घुमावदार छोटी नहर के किनारे बनाया गया होगा। घाटों के अवशेष आज भी देखे जा सकते हैं। अब यह एएसआई के अधीन एक स्मारक है। एएसआई के केयरटेकर आशीष दुबे बताते हैं कि पूरे गाँव में प्राचीन विरासत बिखरी हुई है। वे हमें एक ऐसे ही परिसर में ले जाते हैं, जिसे तापसी मठ कहते हैं। यहाँ एक बावड़ी है, जिसमें घोड़ों और हाथियों को नीचे ले जाने के लिए लंबी ढालनुमा सीढ़ियाँ हैं। भीतर एक मंदिर है। इस विशाल परिसर के चप्पे-चप्पे में किसी पुरानी बस्ती के अवशेषों को ही इस्तेमाल में लाया गया और अब ये भी दम तोड़ते स्मारक की शक्ल में खड़े हैं।

पुराने मलबे से गोंड राजाओं द्वारा बनवाया मंदिर- मंदिर की छत पर पुरानी चित्रकारी- मंदिर के शिखर का भाग

गाँव के दूसरे सिरे पर एक चंडी मंदिर परिसर है। यहाँ आज भी पूजा होती है। एक प्राचीन सूखी और मिट्‌टी कूड़े से भरी बावड़ी इस परिसर में भी है। कई मूर्तियाँ यहाँ भी हैं। शायद ही कोई साबुत हो। एक मंदिर में देवी की मूर्ति है। गाँव में जैन धर्म का एकमात्र परिसर तरण-तारण तीर्थ ऐसा है, जिसकी देख-रेख समाज के स्तर पर हो रही है और यह कुछ रौनकदार है। चारों तरफ खंडित मूर्तियों, स्तंभों और द्वारों के बीच यह अकेला ऐसा टापू है। सड़क पर इसी से सटा एक प्राचीन दरवाजा करीब पंद्रह फीट नीचे अंधेरी सीढ़ियों की तरफ जाने का इशारा करता है। इन सीढ़ियों की सफाई भी बरसों से नहीं हुई। नीचे उतरते जाने पर एक और शाानदार बावड़ी सामने नज़र आती है। जिसमें वैसी ही ढलान वाली सीढ़ियाँ दूसरी तरफ से उतरती हुई हरी काई से भरे पानी तक लेकर आती हैं। इस शानदार निर्माणकार्य में इस्तेमाल की गई सामग्री में भी साफतौर पर इससे भी पुराने किसी मंदिर-महल के पत्थरों का इस्तेमाल दिखाई देता है। गाँव का कोई कोना ऐसा नहीं है, जहाँ कोई खंडित पत्थर का टुकड़ा दिखाई न दे। बाद में बनी इमारतों में पुराने अवशेषों को भरपूर इस्तेमाल किया गया है। अब ये इमारतें भी अपनी उम्र पूरी कर चुकी हैं।

कुछ बातें एकदम स्पष्ट हैं-
एक- बिलहरी कभी एक भव्य और व्यवस्थित छोटे शहर के रूप में चहल-पहल से भरी बस्ती रही होगी, जहाँ बड़ी तादाद में मंदिर, महल, घाट, रास्ते और चौराहे रहे होंगे। खंडित पाषाणों का स्थापत्य दसवीं और ग्यारहवीं सदी के चंदेल और परमार राजवंशों के समय बने मंदिरों से मिलता-जुलता है। यानी करीब 1000 साल पहले तक यह अपने मूल स्वरूप में एक विकसित नगर रचना रही होगी।

तापसी मठ में भी खंडित मूर्तियों का प्रचुर इस्तेमाल हुआ

तापसी मठ में भी खंडित मूर्तियों का प्रचुर इस्तेमाल हुआ

दो- बाद की किसी सदी में यहाँ कोई जबर्दस्त हमला हुआ है। इस हमले के दौरान व्यापक स्तर पर तोड़-फोड़ की गई होगी और एक भी मंदिर, घाट, महल को साबुत नहीं छोड़ा गया। यह एकदम स्पष्ट है कि बिलहरी किसी प्राकृतिक कारण से वीरान हुई बस्ती नहीं है। पूरे गाँव में जितनी भी प्राचीन मूर्तियाँ नजर आती हैं, वे सब खंडित की गई हैं। एक भी साबुत नहीं है। सब तोड़ी गई हैं। उनके चेहरे और हाथ-पैरों के तोड़े जाने के निशान अब तक साफ हैं। पुराने राजवंशों पर दिल्ली में काबिज हुए सुलतानों-बादशाहों की फौजों के ऐसे हमलों में लूट एक बड़ा मकसद होता था। निश्चित ही हमलावरों को यहाँ एक समृद्ध शहर मिला होगा, जहाँ यह तोड़फोड़ लंबी चली होगी।

तीन- एक या एक से अधिक हमलों को झेलने के बाद जल्दी ही यह शहर वीरान खंडहरों में गुम हो गया होगा। लेकिन बाद की सदियों में स्थानीय लोगों ने मलबे में बदल चुके इस शहर को फिर से बसाने की कोशिश की होगी। इसी कोशिश में एक बार फिर मंदिरों को बनाया गया होगा। इन मंदिरों, तालाबों और बावड़ियों में पुराने टूटे-फूटे खंडित टुकड़ों को ही निर्माण सामग्री के रूप में व्यापक रूप से इस्तेमाल किया गया। दूसरे चरण के ये निर्माण कार्य भी चार सौ साल पुराने हो चुके हैं।

आखिर था क्या- पुरातत्वशास्त्री डॉ. नारायण व्यास बताते हैं कि यह नौंवी-दसवीं सदी के कलचुरि राजवंश के महान निर्माण कार्य हैं। कलचुरि राजाओं की राजधानी थी त्रिपुरी में। जबलपुर के पास तेवर नाम का गाँव प्राचीन त्रिपुरी ही है। लगभग एक हजार साल पहले इनके राजाओं ने कटनी के पास आज की बिलहरी और कारीतलई और करणबेल जैसी जगहों पर हज़ारों मंदिर बनवाए थे। बिलहरी जैसे ही असंख्य अवशेष कारीतलई और करणबेल में बिखरे हुए हैं। कारीतलई में विष्णु के दस अवतारों पर भव्य मंदिर थे। यह इलाका उस समय डहालमंडल कहलाता था। बिलहरी में एक लद्दाकी का टीला है, जहाँ कभी विशाल बौद्ध स्तूप रहा होगा। इन अवशेषों को देखकर यह तो एकदम स्पष्ट है कि इन्हें 12वीं-13वीं सदी में दिल्ली के सुलतानों की फौजों के लगातार हमलों में मटियामेट किया गया। यह प्राकृतिक कारणों से नष्ट नहीं हुए। इन्हें बड़े पैमाने पर तोड़ा गया है। हालाँकि इन हमलों का कोई रिकॉर्ड नहीं है। बिलहरी, कारीतलई, करणबेल और दमोह के पास नोहटा में भी कलचुरि राजाओं ने मंदिर, महल और तालाब बनवाए। अब यह सब गुजरे हुए कल की कहानी है। सदियों की धूल याददाश्त पर जमा है। खोजने के लिए अंतहीन संभावनाएँ हैं। ज़रूरत अलेक्झेंडर कनिंघम जैसे किसी जिद्दी जिज्ञासु की है, जो समय की धूल को साफ करके सच को सामने लाए।

विजय मनोहर तिवारी भारत के काेने-कोने की आठ से ज्यादा परिक्रमाएँ करने वाले सक्रिय लेखक। उनकी छः पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। वे स्वराज्य में सहयोगी लेखक हैं। संपर्क- vijaye9@gmail.com