संस्कृति
सबरीमाला की तीर्थयात्रा क्यों हो चुकी है कष्टदायक और दुष्कर

प्रसंग
  • केरल में सबरीमाला अयप्पा मंदिर का भ्रमण करने का अब क्या अनुभव है? स्वराज्य के कार्यकारी संपादक खुद वहाँ गए और स्थिति का जायजा लिया। लीजिए पेश है उनकी रिपोर्ट –

एक ऐसा व्यक्ति जो कई बार सबरीमाला गया है, उसे चेन्नई सेंट्रल रेलवे स्टेशन पर कदम रखते ही बदलाव स्पष्ट दिखने लगता है। प्लैटफार्म, जहाँ से चेन्नई-तिरुवनंतपुरम-सुपरफास्ट एक्सप्रेस प्रस्थान करती है, पर सबरीमाला जाने वाले श्रद्धालु दिखाई पड़ते हैं।

जब सबरीमाला मंदिर पाँच दिन ओणम के लिए और दो दिन स्वाथि थिरूनल के लिए खुलने के अलावा मलयालम कैलेंडर के हर महीने में शुरुआती पाँच दिनों के लिए खुलता है तो उस समय कोई समारोह न होते हुए भी वहाँ पर कोई व्यक्ति श्रद्धालुओं की जितनी भीड़ देखता है, मंडला पूजा समारोह के दौरान उतनी भी भीड़ मौजूद नहीं है। केरल में पिनाराई विजयन सरकार की कड़वी सच्चाई यह है कि वह उच्चतम न्यायालय के उस फैसले को लागू करने की कोशिश कर रही है, जिसमें न्यायालय ने कहा था कि प्रजनन आयु वाली महिलाओं को भी सबरीमाला मंदिर में प्रवेश की अनुमति दी जाए, इसका प्रभाव तब देखने को मिलता है जब आप कोट्टायम स्टेशन पर ट्रेन से बाहर कदम रखते हैं क्योंकि आपको पहले से कम श्रद्धालु दिखाई देते हैं। यहाँ तक कि चेंगन्नुर जाने वाले लोग भी कम ही मिलते हैं, पंबा तक पहुँचने के लिए बहुत से लोग चेंगन्नुर को सुविधाजनक मानते हैं।

ट्रेन में या रेलवे स्टेशनों पर शरण घोषम के उद्घोष के स्वर मंद हैं। कोट्टायम में वाहन पार्किंग क्षेत्रों में सामान्य हलचल भी नहीं है।

किसी ऐसे व्यक्ति के लिए, जो मंडला पूजा समारोह के दौरान ज्यादा भीड़भाड़ से डरता है, उसके लिए वहाँ पर भीड़ की कमी होना अच्छा है। 16 नवंबर 2018 से मंडला पूजा का समय चल रहा है जो 28-29 दिसंबर के दौरान तीन दिवसीय अवकाश के साथ 20 जनवरी 2019 तक चलेगा।

जैसे ही आपका वाहन नीलक्कल की तरफ बढ़ना शुरू करता है तो आपको नहीं पता होता है कि आगे क्या होने वाला है। यात्रा तो शांतिमय लगती है परंतु पूरे मार्ग पर आपको गश्त करती हुई असामान्य पुलिस जरूर देखने को मिलती है। पुलिस द्वारा पहने गए ओवरकोट पर लगी परावर्तक पट्टी ऐसे कोहरे में भी उनकी उपस्थिति की जानकारी देती है जिसमें 10 मीटर से ज्यादा दूर देखना मुश्किल होता है।

जैसे ही वाहन पथनमथिट्टा के करीब पहुँचता है, कोई भी पुलिस की भारी उपस्थिति अनुभव कर सकता है। एक सुरक्षाकर्मी गाड़ी रुकवाकर पूछता है कि गाड़ी कहाँ जा रही है, गाड़ी की पंजीकरण संख्या नोट करता है और फिर ड्राइवर का मोबाइल नंबर ले लेता है।

क्षेत्र में इतनी गंभीर सुरक्षा व्यवस्था देखकर कोई भी बाहरी व्यक्ति चौंक जाएगा। जैसे ही गाड़ी नीलक्कल में प्रवेश करती है, आक्रामक तरीके से हाथ हिलाते लोगों के द्वारा गाड़ी रोक दी जाती है जो गाड़ी के लिए पार्किंग शुल्क वसूल करते हैं। जबकि वाहनों को पंबा तक जाने की अनुमति थी फिर भी इस तरह पार्किंग शुल्क वसूल करने वाले लोग आक्रामक थे लेकिन करीब 20 साल की आयु वाले ये युवा तो उन लोगों से भी बढ़कर हैं।

जैसे ही आप और आगे बढ़ते हैं, एक पुलिसकर्मी गाड़ी रोककर पार्किंग पास देता है और चालक को निर्देश देता है कि आगे किस तरह से जाना है। लेकिन आपकी असल परीक्षा तो तब शुरू होती है जब आप आपने वाहन से उतर कर केरल राज्य परिवहन निगम की बस में पंबा की यात्रा करने के लिए तैयार होते हैं।

जैसे ही आप नीलक्कल में केएसआरटीसी बस स्टेशन पर पहुँचते हैं तो यहाँ पर आपको कुछ बसें खचाखच भरी हुई तो कुछ आती हुई दिखाई देती हैं। जब बसें आती हैं तो प्रतीक्षारत श्रद्धालु आपको भागते पशुओं की याद दिलाते हैं। उचित कतारें बनाने के लिए कोई प्रयास नहीं किए गए हैं ताकि बसों में आसानी से चढ़ा और उतरा जा सके।

एक केएसआरटीसी कर्मचारी से टिकट के लिए पूछने पर मुझे बताया गया कि “बस के अंदर।” बस में चढ़ते ही आपको पता चलता है कि यहाँ पर तो केवल खड़े होने भर का ही स्थान है।

हर बस में दो से तीन लोग होते हैं जो पंबा से वापसी का किराया वसूलते हैं। वापसी का किराया 2 रुपये प्रति किलोमीटर की दर से वसूल किया जाता है ऐसा लगता है कि केएसआरटीसी राज्य के दूसरे हिस्सों से होने वाले नुकसान को यहीं से पूरा कर रही है।

एक बार जब उन्हें महसूस हो जाता है कि उन्होंने बस के अंदर उपस्थित सभी यात्रियों का किराया वसूल लिया है, इसके बाद वे टिकट चेक करने वाले दो निरीक्षकों को भेजते हैं। टिकट चेक करने वाले निरीक्षक बस के अंदर उपस्थित यात्रियों के साथ टिकटों का मिलान करने की कोशिश करते हैं। ऐसा लगता है कि कुछ गलती हो गई है और फिर वे खुद को इस बात से संतुष्ट करने से पहले कि सभी ने टिकट ले लिया है यात्रियों की गिनती शुरू करते हैं और फिर चालक को पंबा के लिए 20 किलोमीटर लंबी यात्रा शुरू करने की अनुमति देते हैं।

बस में खड़े होकर यात्रा करने में ऐसा कुछ नहीं है जो असाधारण हो। लेकिन जैसे ही बस मोड़ों पर घूमती है या यू-टर्न लेती है तो 45 मिनट की यात्रा के दौरान संतुलन बनाए रखना एक जटिल काम होता है।

बाढ़ आने से पहले इस खाली जगह पर सबरीमाला तीर्थयात्रियों के लिए एक बड़ा हॉल बना हुआ था।

जैसे ही बस पंबा के निकट पहुँचती है, इस साल अगस्त में आई भीषण बाढ़ द्वारा मचाई गई तबाही की असलियत आपके सामने आने लगती है। लगता है कि पंबा नदी संकुचित हो गई है, स्नान करने के लिए बनी सीढ़ियाँ और तीर्थयात्रियों के आराम करने के लिए बना हॉल भी बह चुका है। त्रिवेणी पहले से ज्यादा गंदी और उथली हो गई है।

पंबा के घाटों पर केरल सरकार ने नए शौचालय बनवा दिए हैं लेकिन नदी के घाटों और कन्नीमूला गणपति मंदिर को जाने वाले मार्ग पर और ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है। जैसे ही आप पंबा के ठंडे जल में डुबकी लगाते हैं जो एकदम स्थिर लगता है, आप यह भी देखते हैं कि सीसीटीवी कैमरे आप पर कड़ी दृष्टि रखे हुए हैं।

स्नान करने के पश्चात, अब चढ़ाई करने तथा अन्य अधिक कड़ी विपत्तियों के लिए उद्यत होने का क्षण है। जैसी ही आप पैड़ियों पर चढ़ते हैं तो आप आपकी प्रतीक्षा करता एक मेटल डिटेक्टर पाते हैं। पुलिसकर्मी यह सुनिश्चित करने के लिए आपकी पूरी जाँच करता है कि आप कोई अस्र-शस्र या गोला बारूद तो नहीं ले जा रहे हैं।

कन्नीमूला गणपति मंदिर परिसर में पुलिस की अच्छी उपस्थिति है इनमें से आधा दर्जन पुलिसकर्मी तब आपकी प्रविष्टि को चिह्नित करते हैं यदि आपने त्वरित दर्शन के लिए ऑनलाइन विकल्प का चयन किया था। लेकिन परिसर में पुलिसकर्मियों का जूतों के साथ विचरण करना अति कष्टदायक है।

जब आप नीलीमाला जाने हेतु उद्यत होने के लिए कन्नीमूला गणपति मंदिर से नीचे प्रस्थान करते हैं तो आप स्वास्थ्य केंद्र के निकट बैठी बड़ी भीड़ देखते हैं।

नीलीमाला की तलहटी से प्रारंभ करने से पहले, आपको एक और मेटल डिटेक्टर से गुजारने के पश्चात एक पुलिसकर्मी द्वारा एकबार पुनः आपकी तलाशी ली जाती है।

जैसे ही आप नीलीमाला के शीर्ष पर चढ़ते हैं और फिर अप्पचिमेदु की ओर प्रस्थान करते हैं और फिर मराकोट्टम तक पहुँचने से पूर्व आप सबरी पीदम को स्पर्श करते हैं, आप सर्वत्र पुलिस की उपस्थिति देखते हैं। मराकोट्टम में वे व्यक्ति जिनके पास ऑनलाइन बुकिंग होती और जिनके पास नहीं होती है, विलगित होते हैं। आपको आश्चर्य होता है कि आपको नीलीमाला से नीचे की ओर से आने वाले तार्थयात्री क्यों नही दिखाई दे रहे हैं।

जिन लोगों ने ऑनलाइन बुकिंग करवाई होती है, सरमकोठी की ओर चढ़ाई करते हैं और वे तकनीक के ज्ञानी होने के लाभ का अनुभव करते हैं। जिन व्यक्तियों ने ऑनलाइन बुकिंग नहीं करवाई होती है उनके लिए मार्ग कम चढ़ाई के अलावा ऊबड़-खाबड़ और पथरीला होता है। यह आपके नाडा पंडाल या उस गलियारे, जो आपको उस प्रवेश द्वार तक ले जाता है जो आपके 18 पवित्र पैड़ियों के मार्ग को प्रशस्त करता है, तक पहुँचने से पहले थोड़ा घुमावदार और कष्टदायक मार्ग है।

आपके नाडा पंडाल में पहुँचने से पूर्व, जैसे ही आप त्रावणकोर देवस्वाम बोर्ड द्वारा स्थापित की गई सुविधाओं में से एक, औषधीय जल का एक गिलास लेते हैं, वैसे ही मंडला पूजा महोत्सव के दौरान 60 दिनों के लिए 400 रुपये प्रतिदिन के वेतन पर लगाया गया एक दैनिक कार्यकर्ता आपको नाडा पंडाल में शरणम घोषम का उद्घोष न करने की चेतावनी देता है।

वह आगाह करता है, “कल (25 नवंबर) को उन्होंने शरण घोषम के उद्घोष के लिए 89 लोगों को गिरफ्तार कर लिया था। उन्होंने धारा 144 लागू कर दी है। इसलिए, आप वहाँ पर शरण घोषम जोर से न कहें।”

एक बार जब आप नाडा पांडाल में प्रवेश करते हैं, तो यह आपको कड़ी सुरक्षा के किले की याद दिलाता है। पुनः आप एक मेटल डिटेक्टर से गुजरते हैं, आपकी जाँच होती है और आप एक अमित्रवत पुलिसकर्मी का सामना करते हैं। नाडा पंडाल दायीं ओर भोजनालयों से दूर है और बाईं ओर किसी गतिविधि के संकेत नहीं हैं जहाँ पर ठहरने के लिए कक्ष बने हुए हैं।

18 पैड़ियों के सामने स्थित प्रवेश द्वार की सीढ़ियों तक जाने के लिए नाडा पंडाल में चलना अति आनन्ददायक है। लेकिन इससे पूर्व, नाडा पंडाल के किनारे से बहुत पहले ही आपको एक अन्य मेटल डिटेक्टर से गुजरना पड़ता है जो हमेशा वहाँ रहता है।

जैसे ही आप सीढियाँ चढ़ते हैं और प्रवेश द्वार से कुछ यार्ड दूर 18 पैड़ियों के सामने आते हैं, आप वहाँ न्यूनतम मानव गतिविधि पाते हैं। 18 पैड़ियों पर चढ़ने वाले कुछ तीर्थयात्रियों को चढ़ाई में आसानी के लिए कर्मचारियों के द्वारा सहायता की जाती है।

पवित्र अट्ठारह पैड़ियों के प्रवेश द्वार पर तैनात सुरक्षाकर्मी। उनमें से अधिकतर जूते पहने हुए हैं, इससे तीर्थयात्रियों की आस्था प्रभावित होती है।

इसके सामने, जब आप अपने बाएँ देखते हैं, आप देखते हैं कि पुलिस ने पूरे क्षेत्र पर कब्जा कर रखा है। जैसे ही आप 18 पैड़ियों पर चढ़कर आगे बढ़ते हैं तो आप पाएंगे कि फ्लैग पोस्ट के आसपास जाने की अनुमति किसी को भी नहीं है। और जैसे-जैसे आप पवित्र मंदिर के चारों तरफ के ऊँचे स्थान पर सबसे पवित्र स्थल की ओर आगे बढ़ते हैं तो आप देखेंगे कि भीड़ कम होती जाती है। यह मंदिर के आम समय से भी कम है।

जब आप ऊँचे स्थान से नीचे पवित्र स्थान की ओर बढ़ते हैं तो आप इसके आसपास और फ्लैग पोस्ट के आसपास सशस्त्र पुलिसकर्मी देख सकते हैं। कतार में लगे हुए एक भक्त ने दु:ख प्रकट करते हुए कहा, “पवित्र स्थल के पास पुलिस की उपस्थिति आघात पहुँचा रही है। इस बात पर आश्चर्य होता है कि क्या आप अन्य मंदिरों में भी ऐसी चीजें देखते हैं।”

जब आप पवित्र स्थल तक पहुँच जाते हैं तो आप भगवान अयप्पा के सामने होते हैं। लेकिन आप “स्वामी” शब्द सोच भी पाएं इससे पहले एक अशिष्ट हाथ पीछे से आपको पवित्र स्थल से दूर ले जाने के लिए खींचता है। फिर आप घूमकर उस व्यक्ति को यह बताने के बारे में सोचते हैं कि, “मैं बहुत दूर से आया हूँ, कृपया मुझे कुछ और क्षणों के लिए दर्शन कर लेने दीजिए।”

लेकिन वहाँ पर खड़े कुछ लोग आपको वहाँ से निकलने और दूसरी बार दर्शन करने की उम्मीद देते हैं। इसके बाद जब आप ज्ञात निकास स्थलों में से एक से बाहर निकलना चाहते हैं तब एक पुलिसकर्मी आपको यह बताने के लिए हाथ हिलाता है कि रास्ता बंद कर दिया गया है।

जैसे ही आप बाहर निकलने के लिए नजर दौड़ाते हैं, दूसरा पुलिसकर्मी आपको बताता है, “केवल मलिगा पुरथु अम्मा परिसर से होकर बाहर जा सकते हैं।” इसलिए आप अम्मा की प्रार्थना करने के लिए पास के परिसर में जाते हैं और फिर घी अभिषेकम के लिए टिकट खरीदने के लिए आगे बढ़ते हैं।

जैसे ही आप नारियल, जिसमें आपने अयप्पा के लिए घी खरीदा है, तोड़ने के लिए एक स्थान की तलाश करते हैं तो आप देखते हैं कि कई स्थानों पर भक्तों ने घी गिराया हुआ है और वे भक्त एक संकुचित स्थान पर एकत्र होते हुए दिखाई देते हैं।

तीर्थयात्री नारियल के अंदर का घी निकालने के लिए खुले स्थानों पर नारियल तोड़ने को मजबूर हैं। ऐसे स्थानों पर घी छलक जाता है क्योंकि लोगों को मुश्किल से स्थान मिलता है।

पहले के समय में, आप अपने कमरे में जाते थे और अपने कमरे में पड़े पत्थर की सहायता से नारियल को फुरसत से तोड़ते थे लेकिन अब चीजें बदल गई हैं और ऐसी सुविधा उपलब्ध नहीं है।

आप नारियल तोड़ते हैं, घी को एक छोटे से स्टील के बर्तन में रखते हैं, घी अभिषेकम टिकट लेते हैं और एक बार फिर लाइन में लगने के लिए ऊपर की ओर जाती सीढ़ियों की ओर लपकते हैं। एक अन्य मेटल डिटेक्टर आपका स्वागत करता है, लेकिन शुक्र है घी अभिषेकम के लिए कतार में बहुत कम लोग होते हैं। मेटल डिटेक्टर के पास पुलिस थोड़ी अभद्र होती है, फिर वह आपके कंधे से लटक रहे थैले की जाँच करती है।

जैसे ही आप घी अभिषेकम के लिए फिर से पवित्र मंदिर की ओर बढ़ते हैं, एक अन्य मेटल डिटेक्टर बाधा उत्पन्न करता है। इस बार जब आप इससे होकर आगे बढ़ते हैं तो पुलिस आपके स्टील के बर्तन की जाँच करने की मांग करती है। कंटेनर दिखाने का यह आदेश निश्चित रूप से आपको परेशान करता है, लेकिन अन्य कोई रास्ता नहीं होता है।

इसके बाद घी अभिषेकम करना एक आसान अनुष्ठान है, और फिर आप नीचे की ओर जाकर ऊपर की ओर जाती सीढ़ियों की तरफ बढ़ते हैं, जो अनिवार्य इरुमुदी के बिना भक्तों को फिर से दर्शन करने की इजाजत देती हैं। इस बार लाइन में लगना बुद्धिमानी है जिससे आप पवित्र स्थल के सामने रैम्प पर पहुँचते हैं और जहाँ सामान्यतः मंदिर के अधिकारी आपको अधिक देर तक दर्शन करने देते हैं।

जैसे ही आप रैम्प पर चढ़ते हैं और द्वितीय दर्शन करने लगते हैं, फिर से एक हाथ आपको बाहर खींचता है। इस बार बुद्धिमानी से काम लेकर आप वह हाथ हटाने के लिए कंधा हिलाते हैं, और कुछ और पलों तक मंदिर तक पहुँचाने में मदद के लिए भगवान अयप्पा को धन्यवाद देते हैं।

घड़ी पर एक नजर डालने से पता चलता है कि पम्बा से आए हुए आपको चार घंटे हो चुके हैं। इस थकाऊ यात्रा के बाद, अगर आप थोड़ी देर तक बैठने या लेटने की जगह तलाशते हैं तो दूर-दूर तक आपको ऐसी जगह नहीं दिखती।

भोजनालय, जहाँ कुछ तीर्थयात्री भोजन करते हैं, आपको नाश्ता करने, बैठने और आराम करने का कुछ समय प्रदान करते हैं। तीर्थयात्रियों के समूह में से एक कहते हैं कि बैठने और आराम करने के लिए स्थान हैं लेकिन कोई भी सुनिश्चित नहीं है और न ही उस स्थान के लिए संकेत या दिशानिर्देश हैं।

लगभग 45 मिनट बाद, पंबा वापस जाने का समय होता है और यह ऐसा नहीं है जिसमें अच्छे दर्शन के बाद आप दिलचस्पी लेंगे। और यह आपको जवाब देता है, जब आप चकित थे कि वापसी के रास्ते में कोई तीर्थयात्री क्यों नहीं था।

वहाँ से वापसी नाडा पांडाल के ऊपर पैदल चलने से शुरू होती है, जैसे ही आप सरमकोठी की तरफ बढ़ते हैं, आप बहुत सारे ढोली श्रमिकों को आराम करते हुए देखते हैं, जो ढोलियों पर तीर्थयात्रियों को ले जाते हैं। सबरी पीदम तक वापसी का रास्ता सुगम है जब तक कि आपको एक और झटका, हमारे अनुसार, नहीं लगता।

सबरी पीदम के पास, पुलिस आपको एक अंडरपास से गुज़रने के लिए कहती है, जिसका आमतौर पर वाहनों द्वारा उपयोग किया जाता है। यह पास के माध्यम से पूर्व साहसिक कार्य की याद ताजा करता है, जिससे इस मार्ग पर कभी न जाने का संकल्प मन में उठता है।

लेकिन इस समय आगे पुलिस तैनात है और आपके पास कोई दूसरा विकल्प नहीं है। इस बार आपकी पैदल यात्रा बहुत ही दुर्गम और बहुत ही कष्टदायी होती है। जी हाँ, कष्टदायी है क्योंकि टूटी फूटी सड़क के छोटे-छोटे पत्थर लगातार आपके पैरों में घुसते जाते हैं।

चूँकि यह सड़क कहीं-कहीं अधिक ढालू है, इसलिए इस पर नीचे की ओर चलने से आपको पैरों में अत्यधिक दर्द का अनुभव होता है। कुछ बच्चों को बड़े लोगों से ऊपर उठाने की मांग करते हुए देखा जा सकता है, कुछ बच्चे लंगड़ाते हुए देखे जा सकते हैं, और साथ चलने वाले एक सम्बन्धी पम्बा पहुँचते-पहुँचते गतिहीन हो जाते हैं।

वापस आना अधिक कष्टदायक और दुष्कर इसलिए है क्योंकि आपको एक ही दिन में वहाँ जाकर वापस आना पड़ता है। इससे पहले, एक तीर्थयात्रा दिन के दौरान पहाड़ी पर जा सकता था, मंदिर की यात्रा कर सकता था, और तीर्थयात्रियों के लिए उपलब्ध कमरों में आराम कर सकता था।

इस बार, तीर्थयात्रियों को कोई कमरा उपलब्ध नहीं कराया जा रहा है जिससे सभी उसी दिन वापस आने के लिए मजबूर हैं। विक्रेता आपको बताते हैं कि रात 10 बजे के बाद सबरीमाला की चोटी पर रहने की अनुमति नहीं है, जिससे तीर्थयात्री चढ़ाई के बाद कुछ ही घंटों के भीतर नीचे आने को मजबूर हैं। पुलिस द्वारा कई जाँचों के अलावा एक ही दिन में ऊपर चढ़ने और नीचे उतरने से भक्तों को बहुत कष्ट होता है।

एक बार जब आप पंबा पहुँच जाते हैं, तो आपको त्रिवेणी से बस लेने का निर्देश दिया जाता है, लेकिन वहाँ सड़क पर भरा हुआ कीचड़ आपकी अगवानी करता है। एक पानी का टैंकर लगातार पानी छिड़कता हुआ दिखाई देता है, जो कीचड़ पर चलने में कठिनाई उत्पन्न करता है। जैसे ही आप बस-अड्डे पर पहुँचते हैं, जल्दी से सीट पाने की कहानी फिर से शुरू हो जाती है।

नीलक्कल वापस जाने वाली बस पर कोई जाँच निरीक्षक दिखाई नहीं देता, और इसलिए बस तेजी से प्रस्थान करती है।

नीलक्कल में, अगर आप उस स्थान को भूल जाते हैं जहाँ आपका वाहन पार्क किया गया था, तो आपको इसे खोजने के लिए एक लंबा सफर तय करना होता है अगर पार्किंग का स्थान केएसआरटीसी बस अड्डे के पास कहीं है। कुछ ऑटो-रिक्शा ड्राइवर भी वहाँ पहुँचाने के लिए 50 रुपये मांग सकते हैं जो कि एक किलोमीटर से भी कम दूरी पर है।

जैसे तैसे करके, जब आप नीलक्कल पहुँचते हैं और वाहन वापस लेते हैं, तो आप पाते हैं कि सबरीमाला मंदिर जाने और लौटने में नौ घंटे से अधिक समय व्यतीत हुआ है। लेकिन एक ही दिन में ऊपर चढ़ने के बाद इतने पथरीले रास्ते, जो आपके पैर की उंगलियों को घायल कर देने वाले पत्थरों वाला है, पर वापस आना बहुत ही कष्टदायी है।

शाम को, जैसे ही आप रात में ठहरने के लिए निकटतम स्थान पर जाने के लिए अपने वाहन में बैठते हैं तो आपको पैरों में तेज दर्द, जलन और सुन्नपन महसूस होता है।

क्या केरल की वामपंथी डेमोक्रेटिक फ्रंट की सरकार तीर्थयात्रियों को सबरीमाला जाने से हतोत्साहित करने की कोशिश कर रही है? दर्द और परेशानी कुछ लोगों को अगली बार सबरीमाला जाने से हतोत्साहित कर सकती है। लेकिन यह एक संदेह है जो बहुत लोगों को है और जो आप अपनी तीर्थयात्रा के दौरान लोगों से बातचीत में जानते हैं।

फिलहाल, हर कोई कार्यवाही पर ध्यानपूर्वक नजर रख रहा है क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय 22 जनवरी को समीक्षा याचिकाओं की सुनवाई के लिए तैयार है। समीक्षा याचिकाओं पर सर्वोच्च न्यायालय का फैसला शायद लोगों द्वारा भगवान अयप्पा के मंदिर की यात्रा के निर्णय को प्रभावित करेगा।

(छवियाँ-एम आर सुब्रमणि)

एम आर सुब्रमणि स्वराज्य के कार्यकारी संपादक हैं। इनका ट्विटर हैंडल @mrsubramani है।