संस्कृति
अय्यप्पा और उनके भक्तजन: सबरीमाला मुद्दे के बारे में सब कुछ जो आपको जानना चाहिए

प्रसंग
  • समय और परीक्षणों के जरिये अय्यप्पा और सबरीमाला के बारे में जानना

इसको एक महीने से ज्यादा हो गया हैI मैंने 28 सितम्बर से, जिस दिन धर्म के लिए संघर्ष फिर से तेज हो गया था, शांति नहीं देखी है,I

जो लोग सबरीमाला मुद्दे के बारे में जानना चाहते हैं, उन लोगों की संख्या केवल बढ़ती जा रही है। जहाँ तक मेरी समझ है, एक बार फिर से यह सबरीमाला की कहानी को बताने का प्रयास है और आशा है कि यह और कई दूसरी और कहनियों को खत्म कर देगीI

अय्यप्पा कौन थे?

ब्रह्मांड पुराण के भूतनाथोथाख्यण से मिले सबरीमाला मंदिर का पुराणिक प्रकरण इस प्रकार है, शस्थ का जन्म मोहिनी से हुआ था जो विष्णु और शिव का अवतार थाI क्योंकि वह शिव और विष्णु की ऊर्जा का संगम था, उन्हें ‘हरि हर सुता’ कहा जाता है। उसके बाद उन्होंने देवी पुराण और पुष्काला से शादी की और कैलासा में अपनी दुनिया में शासन किया।

राक्षसी महिषी का वध करने के लिए उन्होंने मानव रूप धारण कियाI उनके इस रूप को ‘मनिकंदा’ का नाम मिला, क्योंकि नवरत्न हार पहने पैदा हुई थीं, जो उन्हें शिव ने प्रदान किया थाI (चित्रों में उनकी गर्दन के चारों ओर एक घंटी बंधी हुई दिखती है जो इस धारणा पर आधारित है कि लोगों ने मणि शब्द का अर्थ गहने की बजाय घंटी समझ लिया।)

राजा राजशेखर पंड्या ने मनिकनान्दा को पाला, जिसने महिषी को ख़त्म करने के बाद खुद योग के लिए समर्पित कर दिया और हमेशा के लिए सबरी पहाड़ों पर रहने लगाI वह वहाँ तपस्या करने बैठ गया और यह प्रतिज्ञा कि की साल में एक बार मकर संक्रमण को दर्शन देने के लिए अपनी आँखे खोलेगाI

कहा जाता है कि पांड्य वंश के गुरु आगास्त्य महर्षि ने वर्था नियम या सबरीगिरी की यात्रा करने के लिए नियमों को निर्धारित करने के लिए कहा है; इसमें एक मंडल (जो 41 दिनों का होता है) के लिए पूर्ण ब्रह्मचर्य के साथ तपस्या शामिल थीI          

अगस्य और परशुराम सबरिमाला में विग्रह को संकलित करते हुए  इतिहास में आयप्पा

पुराणिक प्रकरण के सदियों बाद- करीब 10वीं शताब्दी में, पंड्या वंश अपनी मात्रभूमि चला गया और पुंजार और पांडलम के रूप में बंट गया। पांडलम साम्राज्य की शुरुआत करीब 904 ईस्वी हुई थी जब तमिलनाडु में मदुरै के खत्म होते पांड्य साम्राज्य के एक वंशज ने केरल में शरण ली। सबरीमाला में सस्था मंदिर प्राचीन काल से आसपास जंगलों के पास लोगों और शासकों के अभिभावक देवता के रूप में वहाँ हैI जब पांडलम वंश की स्थापना हुई थी तब राजा ने सस्था को अपने परिवार के देवता के रूप में स्वीकार किया था और नव गठित रियासत पर सस्था के भक्त के रूप में शासन किया।

उस क्षेत्र में व्यापारियों के आंदोलन ज्यादा थे क्योंकि यह तब मलयालम और तमिल क्षेत्रों के बीच की सीमा पर था और इससे यह डकैतों की चपेट में भी थाI कहा जाता था कि इस तरह के एक डाकू नेता, उधाना, ने मंदिर को आगकर उसे नष्ट कर दिया।                      

राजकुमार आर्य केरल वर्मा

बाद में, आर्य केरल वर्मा, जो पन्दाला राजा के परिवार में जन्मा था, ने उस मंदिर को फिर से  बनवाया और उसकी महिमा को बहाल कियाI कहा जाता है कि उसके बाद उसने खुद को देव धर्मसस्था के साथ जोड़ लियाI लेकिन इस राजकुमार का नाम ‘अय्यप्पन’ भी था, इसलिए कई कहानियाँ इन दोनों को भ्रमित करती हैंI और इस राजकुमार के समय के दौरान मुस्लिम वावर का प्रकरण सामने आया था।

नाटकीय अंदाज में खो गया

1940 के दशक की शुरुआत में, जाने-माने नाटककार नवाब राजमनिच्कम पिल्लई ने अलपुझा का दौरा किया,  एक भक्त ने उनसे अय्यप्पा की कहानी को नाटक में करने का अनुरोध किया। हालांकि शुरुआत में वह ऐसा नहीं करना चाहते थे, नाटककार जो देवता की कहानी सुनते थे, ने इतना ज्यादा अनुरोध किया कि उन्होंने न केवल “स्वामी अयप्पा” खेल का मंचन किया बल्कि सबरीमला की पवित्र पहाड़ी पर भी चढ़ाई की।

नवाब राजमनिच्कम पिल्लई

लेकिन फिर इस नाटक में दो अयप्पा को एक नाटककार के रूप में मिला दिया था, और दोनों अयप्पा (भक्ति और राजा) के जीवन से उपाख्यानों को जोड़कर इसे ख़त्म कर दिया गया। ऐतिहासिक इतिहास के साथ पौराणिक कथाओं को मिलाने की वजह से ऐतिहासिक कहानियों ने झूठी मान्यताओं को जन्म दिया।

उदहारण के लिए, समुद्री तट पर समुद्री डाकू नेता वावर को चित्रित करने वाला नाटक का हिस्सा इतना प्रभावशाली था कि यह दर्शकों के दिमाग में घर कर गया। और इसकी वजह से श्रद्धालु एरुमेली में स्थित वावर मस्जिद को देखने के लिए नियमित रूप से जाने लगेI

अयप्पा के नाटक की सूचना– 1943

मंगलरी नारायणन, जिन्होंने नाटककार के साथ यात्रा की, बाद में नंबियार गुरुस्वामी एमएन नंबियार के नाम से जाने गए, पुणुर सुब्रमण्यिया अय्यर जैसे प्राचीन गुरु, मेरे दादा सीवी श्रीनिवास अय्यर, थैलिपाराम्पारा नेगेलकंद अय्यर, थानुलिंगदा नादरन सभी ने सबरीमाला यात्रा के हिस्से के रूप में मस्जिद में नित्य जाने के अभ्यास को खारिज कर दियाI लेकिन बाद में छपीं पुस्तकों में एक ही कहानी दी गईI

ऐसी एक और कहानी मलिकपुरम देवी की थी। उनकी कन्नडी बिंबम, या पारंपरिक दर्पण के रूप में मूर्तिकला वाली छवि पत्थर के रूप में पूजा की जाती है। मीनाक्षी देवी को पांडलम शाही परिवार अपने परिवार की देवी मानता ​​था। पौराणिक कथाओं में उनके अय्यपन से शादी करने के इंतजार की कहानियाँ कहीं भी नहीं मिलती हैंI से सब चीज़ें कहानी को नाटकीय स्वरूप देने के लिए जोड़ी गई थीं।

यह अयप्पा की माँ हैं और पुराणों में इसके अलावा किसी अन्य अर्थ में इसका उल्लेख नहीं किया गया हैI यहाँ तक ​​कि मकर विलाकू के बाद जुलूस में निकाली गई मूर्ति भी अय्यपन की है, देवी की नहीं, जैसा कि कई लोगों द्वारा माना जाता थाI जो मूर्ति को ध्यान से देखते हैं उन्हें उसपर मूँछ स्पष्ट रूप से दिखती हैI

सबरीमाला और त्रावणकोर का राज्य 

जब टीपू सुलतान ने 1780 में केरल पर हमला किया तो पन्दलम साम्राज्य को अपनी संपत्तियों को त्रावणकोर के राजा को गिरवी रखने के लिए मजबूर होना पड़ाI लेकिन क्योंकि गिरवी रखने के बाद वापस नहीं ले पाए, सबरीमाला मंदिर के साथ उनकी सभी संपत्तियाँ त्रावणकोर राज्य की संपत्ति हो गईं। मंदिर के गहने ही रह गए बस। परंपरा को ध्यान में रखते हुए, त्रावणकोर के राजसी लोगों ने पांडला राजाओं को तिरुवाराणम (आभूषण) रखने दीये, जिसे हर ‘मकर ज्योति’ में मंदिर में लाया जाएगा।

त्रावणकोर के महाराजा चिथिरा थिरुनाल बलारामा वर्मा ने स्वतंत्रता के बाद सरकार से अपनी पूर्व रियासत में मंदिर चलाने के लिए एक अलग, स्वायत्त निकाय बनाने के लिए कहा  और 1950, त्रावणकोर देवस्वाम बोर्ड (टीडीबी) की स्थापना हुई। इस तरह सबरीमाला प्रशासन, त्रावणकोर देवस्वाम बोर्ड के प्रबंधन के अंतर्गत चला गया। लेकिन बोर्ड मंदिर की परंपराओं का पालन करने के लिए मान गया और मूल रीति-रिवाजों से हटकर कुछ भी नहीं करने का आश्वासन दिया।

लेकिन 1957 में केरल राज्य बनने के साथ, टीडीबी केरल राज्य सरकार के अधीन हो गया। 1960 के दशक तक, शाही परिवार का एक सदस्य टीडीबी में होता था। लेकिन इस प्रथा को जल्द ही बोर्ड द्वारा बंद कर दिया गया था।

सबरीमाला की आग और विग्रह

यह माना जाता है कि अयप्पा की योगिक तपस्या की वजह से मंदिर में आग दुर्घटनाएँ होने वाली हैं, और मंदिर में वास्तव में समय के साथ कई दुर्घटनाएँ हुई हैं।1800 के दशक में, लकड़ी (धाहरू शिला) से बनी हुई मूर्ति को पंचालोहा (पांच धातु) मूर्ति द्वारा प्रतिस्थापित किया गया थाI लेकिन 1902 में आग लग गई और पूरा मंदिर राख में तब्दील हो गयाI लेकिन मूर्ति को बचाया लिया गया और इसे 1904 में फिर से स्थापित किया गया। आज हम जो मंदिर देखते हैं वह इस समय का हैI

पूरा मंदिर जो आधार से बनाया गया था, उसे नष्ट कर दिया गया और पहाड़ी ले जाया गया। परंपरागत लंबे रास्ते के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं था और सभी निर्माण की सामग्री को इस रास्ते से मंदिर तक पहुँचना पड़ा। पांडलम महल से लकड़ी के खंभे इरुमली तक लाए गए थे। मजदूर तब तक पेड़ ले जाते रहे जब तक अज़ुथ ने अपनी ऊर्जा खो दी और उसके बाद वह पेड़ों को आगे ले जाने में असमर्थ थे।

कहा जाता है कि एक भक्त अचानक प्रकट हुआ और उसने घोषित किया, “जो लोग इन खंभे को उठा लेते हैं उन्हें तब तक कोई बोझ महसूस नहीं होगा जब तक वे मंदिर तक नहीं पहुँच जाते।” कहा जाता है कि इन शब्दों ने श्रमिकों को ऊर्जा से भर दिया, और पहाड़ी पर चढ़ते हुए बोझ महसूस नहीं किया। भक्त जिन्होंने उन सभी का नेतृत्व किया था, गायब हो चुके थे। आज हम जो सबरीमाला मंदिर देखते हैं, वह इस तरह बना थाI

चूँकि सबरीमाला की प्रतिष्ठा दिन प्रतिदिन बढ़ती गई, मंदिर की परंपरा को नष्ट करने का प्रयास शुरू हुआ।

अय्यप्पन की खंडित मूर्ति

1950 में षड्यंत्र के तहत सबरीमाला में एक बड़ी आग लग गई और मंदिर नष्ट हो गया। अयप्पा की मूर्ति भी टूट गई थी। मूल रूप से, षड्यंत्रकारी हमेशा के लिए मंदिर को नष्ट करना चाहते थे। लेकिन भगवान अयप्पा की योजना अलग थी। इस आग की घटना के बाद, सबरीमाला मंदिर,  जो केवल कुछ लोगों द्वारा जाना जाता था, ने अकल्पनीय महिमा प्राप्त की और दुनिया भर के लोग मंदिर में आने लगेI

बचाव टीम (पुलिस और अग्नि सेवा) जो पम्बा पहुँची थी, वहाँ आश्चर्य से खड़ी थी कि तपस्या के बिना पहाड़ी पर कैसे चढ़ा जाएI उन्हें देवता के क्रोध का डर सता रहा था। मैंने अपने पड़दादा से यह सुना है कि वह वहाँ मौजूद अन्य गुरुओं के साथ बचाव दल को विभूति देता था और उन्हें अपने कर्तव्य के साथ आगे बढ़ने का आशीर्वाद देता था।

आज के अय्यप्पा मूर्ति की प्रतिष्ठा

इसके बाद, सबरीमाला में प्रतिभा के लिए एक नया विग्रह बनाया गया था।

अय्यप्पा के वर्तमान विग्रहम (मूर्ति)

तीन एक जैसी मूर्तियाँ बनाई गई थीं। एक स्वामी विमोचनानंद द्वारा, जो केरल के मूल निवासी थे, दूसरी तमिलनाडु के पीटी राजन और नवाब राजमानिकम पिल्लई द्वारा और तीसरी मेरे दादा सी वी श्रीनिवास अय्यर (कल्प्ति, पलक्कड़) द्वारा। एक देव प्रश्नं (भगवान की इच्छा) आयोजित की गई थी और पी टी राजन और राजमानिकम पिल्लई द्वारा लाए गए अयप्पा (आज हम जो टोपी देखते हैं) की मूर्ति का चयन किया गया था। गौरवशाली प्रतिस्थापन कंधारू संकरारू द्वारा किया गया था।

लोगों को अयप्पा के बारे में शिक्षित करने के लिए, राजन के नेतृत्व में दक्षिण भारत में एक और मूर्ति बनाई गई थी। बाद में हरिद्वार में इस मूर्ति को स्थापित किया गया था।

स्वामी विमोचनंद द्वारा बनाई गई मूर्ति काशी में 18 चरणों के साथ स्थापित की गई थी। मेरे परदादा श्रीनिवास अय्यर द्वारा की गई मूर्ति अभी भी पलक्कड़ में हमारे मूल घर में रखी हुई है। अय्यप्पन की टूटी हुई पुरानी मूर्ति को एक विशाल घंटी में ढाल दिया गया और मंदिर के सामने लटका दिया गया हैI  प्रतीकात्मक रूप से, इसके बाद, सबरीमाला की गूँज पूरी दुनिया में फैल गई।

तीर्थ प्रथाएँ

केरल के भक्तों ने सबरीमाला धर्मस्थस्थान की उनके उद्धारकर्ता के रूप में पूजा करनी जारी रखी लेकिन केवल पुरुषों ने ही तीर्थयात्रा की। सबरीमाला की तीर्थयात्रा गाँवों में एक प्राचीन प्रथा थी। वे अपने घरों से इरुमुडी के साथ चलते थे। इरुमुडी में जैसा मनीकंदन था, वैसे ही लोग गाय के दूध से बने हुए शुद्ध घी को लाते थे ताकि योगी राज्य में भगवान को समर्पित किया जा सके।

भक्त जिस पहले बिंदु पर पहुँचेंगे वह एरुमेली है। यहाँ, 1800 के दशक में, कालारकाडु अपु अय्यार नामक एक भक्त, जो सबरीमाला मंदिर के सबसे शुरुआती वेलीचप्पा (भविष्यवाणी) थे, ने लंबे रस्ते की रक्षा की और केवल उन भक्तों को ही अनुमति दी जिन्होंने वास्तव में आगे बढ़ने के लिए उपवास किए थे। जिन्होंने ऐसा नहीं किया उन्हें लौटना पड़ा। माणिकंदन द्वारा लिए गये रास्ते को पेरियापाथाई (लंबा रास्ता) कहा जाता है जो पारंपरिक रास्ता है। यही वह है जिसे भगवान के पूनकवनम (स्वर्ग) के रूप में जाना जाता है। एक 41-मील मार्ग एरुमेली से शुरू होता है, करिमालाई के माध्यम से गुजरता है और मंदिर तक पहुँचता है। प्राचीन काल में, तीर्थयात्रियों ने अरुमली में प्रार्थनाओं के साथ यात्रा शुरू की, पेरियापाथाई से गुजरने, 18 चरणों पर चढ़ने, सस्था की पूजा करने और पेरियापाथाई के माध्यम से वापस चले जाने के लिए, पेरियापाथाई पर चढ़कर वंदिपीरियुर कुमिली मार्ग के माध्यम से पुलमडे (घास के निशान मार्ग) के साथ वापस लौटना शुरू कर दिया। सबरीमाला तीर्थयात्रा आमतौर पर पेरियापाथाई के माध्यम से सात से आठ दिनों तक चलती है। भक्तों के घर वापस आने में लगभग 15-20 दिन लगते हैं।

आज़ादी से पहले तिरुनेलवेली, कन्याकुमारी और कोयंबटूर के लोग, पलक्कड़, नियमित रूप से सबरीमाला तीर्थयात्रा करते थे। मेरे परदादा कृष्णा अय्यर 1920 के दशक में सबरीमाला के तीर्थयात्रा पर गए थे। शेष तमिल लोगों के लिए, सबरीमाला तीर्थयात्रा तपस्या के रूप में नई थी।

छोटा पथ पंबा मार्ग

इन घटनाओं के बाद, मंदिर लोकप्रिय हो गया और हर साल सबरीमाला का दौरा करने वाले भक्तों की संख्या बढ़ती रही।

वर्ष 1960 में, वी वी गिरि, जो केरल के गवर्नर थे, सबरीमाला जाना चाहते थे लेकिन वह पेरियापाथाई (लंबे मार्ग) के लिए तैयार नहीं थे। राज्यपाल के लिए चालाकायम के माध्यम से एक छोटा मोटर वाहन मार्ग तैयार किया गया था। तब से, छोटा रास्ता या पंबा रास्ता नियमित रूप से बन गया। पंबा गणपति मंदिर और राम मंदिर जिसे हम आज देखते हैं, वह बहुत बाद में बने गए थेI

आज भी, पारंपरिक भक्तों को पता है कि पवित्र स्थान जहां अयप्पा एक शिशु के रूप में दिखाई देते हैं, जो हम देखते हैं वह पम्बा नहीं हैं – लेकिन पेरियानवट्टम में नदी के किनारे जो लंबे मार्ग का हिस्सा हैं।

एक अतिरिक्त शहरी किंवदंती भी है कि वी वी गिरि सबरीमाला में डॉली प्रणाली के पीछे कारण थे। चूँकि गिरि 5 किलोमीटर के छोटे मार्ग तक यात्रा करने में असमर्थ थे, उन्होंने अनुरोध किया कि उन्हें कुर्सी पर बैठाया जाए। ऐसा कहा जाता है कि चूंकि शुरुआत में कोई भी इस बात से डरता नहीं था कि यह सबरीमाला के मानदंडों के खिलाफ होगा, उन्होंने उन लोगों के लिए सरकारी नौकरी का वादा किया जो उन्हें ले जाने के लिए आगे आयेI कहा जाता है कि इस तरह सबरीमाला में डोली प्रथा की शुरुआत हुईI

इन घटनाओं का उल्लेख यह स्पष्ट करने के लिए किया गया है कि पुरुषों के लिए भी सबरीमाला जाना आसान नहीं था और वहाँ आने वाली महिलाओं के बारे में कोई सवाल नहीं पैदा होताI

महिलाओं की स्थिति

आज, कई लोग अविश्वसनीय उदाहरणों का हवाला देते हुए दावा करते हैं कि 1991 तक सबरीमाला में महिलाओं को अनुमति दी गई थी। यह सच नहीं है। तथ्य यह है कि 1991 में प्रवेश के संबंध में एक स्पष्ट कानून पारित किया गया था। लेकिन कानून के परे जाते हुए कुछ चीजों को आश्वस्त नहीं किया जाना चाहिए।

भारतीयों की मानसिकता के अन्दर पारंपरिक विश्वास है। भारत में, यह बताने के लिए तख्ती की ज़रूरत नहीं है कि कोई भी चप्पल पहने हुए मंदिर में प्रवेश न करे। इसकी ज़रूरत तभी है जब समझ की कमी हो, नियमों को साफ़ तौर पर आदेश के ज़रिये स्पष्ट किया गया था।

1820 का ब्रिटिश प्रकाशन

 ब्रिटिश साम्राज्य में भी, केरल सरकार के सर्वेक्षण के दौरान, वार्ड और कॉनर (त्रावणकोर और कोचीन राज्यों के सर्वेक्षण के ज्ञापन – खंड 2 – पृष्ठ 137) के 1820 का रिकॉर्ड स्पष्ट रूप से यह बताता है कि सबरीमाला पहाड़ियों और मंदिर में उन महिलाओं के लिए प्रवेश प्रतिबंधित है, जिन्होंने युवावस्था प्राप्त की है और मासिक धर्म को पार नहीं किया हैI

यहाँ तक ​​कि ब्रिटिश शासकों ने भी हमारी परंपराओं और हमारे मंदिर प्रथाओं का सम्मान किया और इसमें कभी हस्तक्षेप या बदलने की कोशिश नहीं की। 1950 के दशक तक,  हमारे पास सबरीमाला जाने वाली महिलाओं के बारे में कोई अभिलेख या सबूत नहीं है।

इस अवधि के दौरान मंदिर का प्रशासन त्रावणकोर राज्य से संबंधित था। यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि जब मंदिर उनके अंतर्गत था, तब भी त्रावणकोर की रानी, पार्वती भाई 1942 में गर्भाशय को हटा दिए जाने के बाद ही सबरीमाला पहुंच सकीं।

पम्बा गणपति मंदिर और छोटे मार्ग के साथ पंबा के विस्तार के बाद -1960 के दशक के बाद ही महिलाओं ने सबरीमाला का दौरा करना शुरू कर दिया। फिर भी, सबरीमाला का दौरा करने वालों में से  युवा लड़कियां बिलकुल नहीं थीं। कोई उन्हें साथ भी नहीं लाया।

50 वर्ष की आयु के बाद में एंडिपट्टी की एक बूढ़ी महिला 40 सबरीमाला तीर्थयात्राओं को पूरा करने के लिए बहुत लोकप्रिय है।

भजन गायक बैंगलोर रामानियामल ने भी 55 वर्ष की उम्र पूरी करने के बाद अपनी सबरीमाला तीर्थयात्रा शुरू की और बाद में अपने साथ कई और लोगों को ले लिया। यह जानना भी दिलचस्प है कि सबरीमाला और अयप्पा से जुड़े पारंपरिक परिवारों, जैसे थज़मान बीम, कंबांगुडी परिवार, पांडलम रॉयल्स, अंबालापुझा और अलांगद पेटता संगम ने इस परंपरा का पालन किया है और अपनी महिलाओं को सबरीमाला में नहीं ले गए।

1800ई. के अंत में और 1900 ई. के प्रारंभ में सबरीमाला मंदिर मकर संक्रमा के लिए साल में केवल एक बार खोला जाता था। लेकिन बाद में मंदिर मंडला पूजा और मकरा विलाकू के लिए भी खुलने लगा। फिर वे 40 दिनों की पूरी मंडला पूजा की के दौरान मंदिर खोलने लगे। और उसके बाद मंदिर हर दो महिने में खुलने लगा तथा 1960 तक यह हर महिने खुलने लगा।

एक छोटा रास्ता बनाने और साथ में कुछ ज्यादा सुविधाओं की वजह से सबरीमाला तीर्थयात्रा पर और अधिक महिलाएँ जाने लगीं। 1975 से 80 के बाद में आंध्र प्रदेश और कर्नाटक के भक्तों ने अपने परिवारों को साथ लाने की परंपरा शुरू की। वे महिलाओं को पम्बा में छोड़ देते और आगे छोटे रास्ते पर चढ़ते हुए जाते। निश्चित रूप से, इनमें से कुछ महिलाओं ने पहाड़ियों पर चढ़ने की कोशिश की। मासिक पूजा के समय यह खाली रहता था और उत्साहित महिलाओं ने मंदिर में जाने के लिए नियमों के उल्लंघन करने की कोशिश की। कुछ अधिकारियों ने “आसानी से” इसे अनदेखा किया।

सबरीमाला में सत्ता या जान-पहचान के दुरूपयोग की हद तो तब हो गई जब साल 1986 में सबरीमाल सानिध्यम में एक फिल्म की शूटिंग की गई थी। इसमें एमएन नंबियार जैसे जाने माने लोग शामिल थे। चालक दल जयश्री और सुधा चंद्रन जैसी युवा अभिनेत्रियों को सबरीमाला में ले आया था। इसके बाद ही, भक्त इस मुद्दे की गंभीरता को समझ गए थे और इसका नतीजा यह हुआ था कि यह समस्या और बढ़ गई थी।

फिल्म के रिलीज होने पर एक मामला दर्ज कराया गया था, जिसमें केरल हाई कोर्ट ने एक निश्चित आयु की महिलाओं का मंदिर में प्रवेश प्रतिबंध की पुरानी प्रथा को बरकरार रखा था। अदालत ने फैसला सुनाया था कि केवल 50 साल से ऊपर और 10 साल से कम आयु वाली महिलाओं को ही मंदिर में प्रवेश की अनुमति दी जाएगी।

यह कोई आश्चर्य की बात नहीं थी कि मंदिर के अधिकारियों ने महिलाओं और फिल्म जगत के लोगों को मंदिर में जाने दिया क्योंकि वे ऐसे कई कार्यों में शामिल थे। 2017 में, जब नए ध्वज स्तंभ स्थापित करने के लिए पुराने ध्वज स्तंभ को हटा दिया गया था, तो परंपरा के अनुसार लकड़ी के एक ही लट्ठे से बने ध्वज स्तम्भ के स्थान पर कंकरीट से निर्मित पीतल की चादर चढ़े हुए नए ध्वज स्तंभ को देखकर भक्तगण बहुत ही आश्चर्यचकित थेI और यह बात 1960 के दशक तक गुप्त रही I

आनंद विकातन-1972

1972 में  भरनीधरन ने तमिल साप्ताहिक ‘आनंद विकातन’ में एक श्रृंखला केरल विजयम लिखी थी। वह एक घटना के बारे में बात करते हैं, जिसमें एक बुजुर्ग भक्त सबरीमाला सन्निधानम में एक प्रदर्शन बोर्ड, जो बच्चों के अन्नप्राशन (पहली बार भोजन) को प्रदर्शित करता है, को इंगित करते हुए मंदिर के अधिकारियों के साथ तर्क वितर्क करता है। कहा जाता है कि भक्त ने अधिकारियों से पूछा था, “एक बच्चा बिन माँ के कैसे जन्म ले सकता है? आप यहाँ पर युवा लड़कियों को अप्रत्यक्ष रूप से प्रोत्साहित क्यों करते हैं ?”

1994 में, भारतीय प्रशासनिक सेवा अधिकारी वत्सला कुमारी ने आधिकारिक कर्तव्य के रूप में 42 वर्ष की उम्र में सबरीमाला मंदिर में प्रवेश की अनुमति के लिए अदालत से अपील की। यह बात उल्लेखनीय है कि अदालत ने उसे सबरीमाला जाने की अनुमति तो दी, लेकिन उन्हें 18 सीढ़ियाँ चढ़ने या मंदिर के बिल्कुल नजदीक जाने की अनुमति नहीं दी। वत्सला कुमारी ने तब तक इंतजार किया जब तक वह मंदिर में प्रवेश के लिए 50 वर्ष की नहीं हो गईं।

इस प्रकार, भक्तों को एहसास हुआ कि यह मंदिर परंपरा के खिलाफ था और इसलिए नियमों का पालन किया गया। नियमों का उल्लंघन होने पर उन्होंने जोरदार विरोध किया।

सबरीमाला की मौजूदा स्थिति

आज सबरीमाला पूरी तरह से बदल चुका है। कई भक्त पुराने कड़े अभ्यासों का पालन करने के इच्छुक नहीं हैं। मंडल व्रतम के 41 दिन घटकर अब तो तुरंत व्रतम वाले रह गए हैं। सवाल उठाए गए हैं कि महिलाओं का मंदिर में जाना गलत क्यों है?

यह समझना बहुत ही अहम है कि सिर्फ इसलिए कि कुछ लोग नियमों का पालन करने के लिए तैयार नहीं हैं – सदियों पुरानी प्रथाओं को हमारी सुविधाओं के हिसाब से ढाला नहीं जा सकता है या इनको छोड़ना न्यायसंगत नहीं हो सकता है। जो लोग अयप्पा तत्वम में विश्वास करते हैं वे कभी भी इस तंत्र या परंपरा का उल्लंघन नहीं करेंगे। तो यह बात तो साफ है कि जो लोग इनका उल्लंघन करने के बारे सोचते हैं – उनको अयप्पा पर पूरी तरह से भरोसा नहीं है।

आज भी, ऐसे लोग हैं जो प्राचीन शुद्धता के साथ नियत प्रथाओं का पालन करते हैं। ऐसे भी भक्त हैं जो 40 से ज्यादा सालों से एक ही गुरू के साथ अपनी तीर्थयात्रा पूरी कर रहे हैं।

एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र होने के नाते, भारत में कभी भी उन धारणाओं (परंपराओं) पर सवाल नहीं उठाया गया है जिसका अन्य धर्मों के द्वारा पालन किया गया हो। हालाँकि, परंपरागत विश्वास प्रणाली को बदलने का हाल ही में जो विकास हुआ है वह निराशाजनक है। सम्मानीय उच्चतम न्यायालय का फैसला केवल सनातन धर्म की धीमी क्षय को दिखा रहा है।

पहाड़ी पर स्थित मंदिर पूजा करने की एक अनूठी जगह होती है। भगवान मानव के रूप में इस धरती पर प्रकट हुए और इस महा योगपीठम में नैष्ठिक ब्रह्मचर्य योग में विराजमान हुए थे। मनीकंदन अभी भी अपनी योगिक अवस्था में यहाँ पर स्थित हैं। इसी वजह से किसी और मंदिर में 41 दिन के व्रतम के सख्त नियम नहीं हैं। किसी और मंदिर में न तो ये 18 सीढ़ियाँ हैं और न ही ऐसी पूजा की प्रथाएँ हैं। किसी और मंदिर में इरूमुडी की अवधारणा नहीं है और घी अभिषेक के रूप में देवता को अपनी आत्मा की पेशकश नहीं की जाती है।

जब मंदिर और 18 सीढ़ियाँ बनकर तैयार हो गए, तो अयप्पा स्वयं बैठ गये और योग में तल्लीन हो गये। अयप्पा के लिए प्रतिबंध केवल सबरीमाला में हैं, न कि भारत भर के किसी अन्य अयप्पन मंदिरों में। यहाँ यौगिक ऊर्जा क्षेत्र इतना शक्तिशाली है कि, एक सामान्य इंसान उनकी शक्ति का सामना नहीं कर सकता है। यौगिक शक्ति पवित्र 18 सीढ़ियों से भी जुड़ी हुई है। यही कारण है कि प्रतिदिन पवित्र 18 सीढ़ियों के लिए एक विशेष तांत्रिक अनुष्ठान किया जाता है। परिसर में निकलने वाली इस यौगिक सिनर्जी का सामना करने के लिए, एक व्यक्ति को सच्ची तपस्या का पालन करने की सलाह दी जाती है। न्यायालय के आदेश से इस प्रकार के अभ्यासों का खंडन हो रहा है। लेकिन भक्तों के लिए यह एक परीक्षा की घड़ी है। जैसे -जिस तरह अयप्पा ने ब्रह्मांड में अपनी ख्याति फैलाने के लिए चारों ओर आग की तरह फैलीअपनी साजिश को एक कारण में बदल दिया था, वैसे ही कठिन समय को भी वह एक आसान जीत में बदल देगें। देश भर से लाखों श्रद्धालु इकट्ठा हो रहे हैं – अपने प्रिय अयप्पा की परंपरा को तोड़ने के खिलाफ अपनी आवाज उठाते हुए।

‘सबरीमाला बचाओ’ का विरोध प्रदर्शन

थुलम (17-22 अक्टूबर) का महीना गुजर चुका है लेकिन उच्चतम न्यायालय के आदेश के बावजूद भी एक भी युवा महिला मंदिर तक नहीं पहुँच सकी है। शरण गोशम का जप करते हुए भक्त अपनी परंपरा की रक्षा करने के लिए मानव दीवार की तरह खड़े हैं।

हाथ जोड़कर वे अयप्पा से प्रार्थना करते हैं। वे इस यह सुनिश्चित कर रहे हैं कि ऐसा न हो। जब तक ऐसे सच्चे भक्त मौजूद हैं, मंदिर की परंपराएँ और प्रथाएँ संरक्षित रहेंगी।

अरविंद सुब्रमण्यम को लोकप्रिय रूप से सस्था अरविंद के नाम से भी जाना जाता है, जिन्होंने भगवान सस्था के बारे में करीब 10 किताबें लिखी हैं। उनकी पुस्तकों में श्री महा सस्था विजयम सबसे ज्यादा उल्लेखनीय है। उन्होंने पिछले 22 सालों से सस्था पूजा पर काफी व्यापक शोध किया है और शिक्षा, धर्म, भारतीय विरासत, पुराणों और देवी पूजा के बारे में काफी किताबें और शोध लेख प्रकाशित किए हैं।