संस्कृति
नर्मदा मैया का सौंदर्य अनुपम और महिमा अकथ लेकिन आज इसकी चिंता जनमानस करे

एक ऐसी नदी जिसे जितना देखो मन नहीं भरता। इसका जल मानों अमृत। घाटों की बात करो तो शब्दों से इनके सौंदर्य का वर्णन न हो पाए। इस कवितामय सरिता का वर्णन करने में अच्छे-अच्छे कवि व लेखक निःशब्द हो जाएँ। नर्मदा को जब भी देखो यह काव्यात्मक सरिता-सी लगती है जिसमे सभी छंद समय-समय पर अपने रंग बिखेरते रहते हैं।

भारत की प्रमुख नदियों में नर्मदा नदी का स्थान है। नदी न कहते हुए अधिकांश लोग माँ नर्मदा जी ही कहते हैं। नर्मदा के किनारे बसे गाँवों के लोग “नर्मदे हर” अभिवादन से ही अपनी बात शुरू करते हैं। नर्मदा नदी का हर घाट अद्भुत सौंदर्य से भरा है। नदी के बहते पानी से संगीतमय ध्वनि आती है।

जब भी नदी पर जाओं हर बार स्नान करने का मन होता है। मैं सबसे पहले 20 वर्ष पहले नर्मदा के धारा जी घाट पर अपने दादाजी के साथ गया था। तब से लेकर आज तक बहुत बार इस सौंदर्य की नदी के दर्शन प्राप्त करने का फल प्राप्त हुआ है। बांधों ने इसके कई घाटों को जलमग्न कर दिया जिससे इसके सौंदर्य को बहुत क्षति पहुँची है।

नर्मदा नदी के तट पर मोहन जोदड़ो जैसी नगर संस्कृति नहीं रही, लेकिन एक आरण्यक संस्कृति अवश्य रही। भारतीय संस्कृति मूलत:आरण्यक संस्कृति है। नर्मदा तटवर्ती वनों में मार्कण्डेय, भृगु, कपिल, जमदग्नि आदि अनेक ऋषियों के आश्रम रहे। यहाँ की यज्ञवेदियों का धुआँ आकाश में मंडराता रहता था। ऋषियों का कहना था कि तपस्या तो बस नर्मदा-तट पर ही करनी चाहिए।

इन्हीं ऋषियों में से एक ने नर्मदा का नाम रेवा भी रखा। रेव यानी कूदना। उन्होंने इस नदी को जब चट्टानों में कूदते-फाँदते देखा, तो इसका नाम रेवा रखा। एक अन्य ऋषि ने इस नदी का नाम नर्मदा रखा। नर्म यानी आनंद। उनके विचार से यह सरिता सुख या आनंद देने वाली नदी है, इसलिए उन्हें नर्मदा नाम ठीक जान पड़ा।

नर्मदा का भूगोल

नर्मदा मध्य भारत की एक नदी और भारतीय उपमहाद्वीप की पाँचवीं सबसे लंबी नदी है। यह गोदावरी नदी और कृष्णा नदी के बाद भारत के अंदर बहने वाली तीसरी सबसे लंबी नदी है। विंध्याचल पर्वत माला व सतपुड़ा के पहाड़ों को चिरती जब यह नदी बहती है मानों कोई क्षत्राणी शत्रु की सेना को तहस-नहस करते सघन वनों में से शर्प की तरह चल रही है।

मध्य प्रदेश राज्य में इसके विशाल योगदान के कारण इसे “मध्य प्रदेश की जीवन रेखा” भी कहा जाता है। यह उत्तर और दक्षिण भारत के बीच एक पारंपरिक सीमा की तरह कार्य करती है। यह अपने उद्गम अमरकंटक से पश्चिम की ओर 1,312 किमी चल(बहकर) कर खंभात की खाड़ी, अरब सागर में जा मिलती है।

नर्मदा हमारे देश की नदियों के बड़े परिवार की एक सदस्या है। लंबाई के लिहाज से ही इसका स्थान सातवाँ है। लेकिन इसकी विशेषता इसके जल की मात्रा में नहीं, इसके चट्टानी स्वभाव में है। इसके उन्मत्त प्रपातों में है। इसके प्रपाती दर्रों में है। इसकी सँकरी घाटियों में है, इसके वनों में है, इसके तट पर निवास करती जनजातियों में है और इसके पहाड़ी परिवेश में है।

साहस और शौर्य का जैसा इतिहास नदियों ने रचा है, वैसा प्रकृति के और किसी घटक ने नहीं रचा। नदियाँ मानों हमसे कहती हैं- राही! राह कहीं नहीं होती। राह बनाने से बनती है। ऐसे ही साहस का नाम नर्मदा है।

नर्मदा की महिमा

नर्मदा समूचे विश्व में दिव्य व रहस्यमयी नदी है। सहस्रों वर्षों से नर्मदा नदी पौराणिक गाथाओं में स्थान पाती रही है। पुराणों में इसपर जितना लिखा गया है, उतना और किसी नदी पर नहीं। इसकी महिमा का वर्णन चारों वेदों की व्याख्या में श्री विष्णु के अवतार वेदव्यास ने स्कंद पुराण के रेवाखंड में किया है।

विश्व में नर्मदा ही एक ऐसी नदी है जिसकी परिक्रमा की जाती है और पुराणों के अनुसार जहाँ गंगा में स्नान से जो फल मिलता है नर्मदा के दर्शन मात्र से ही उस फल की प्राप्ति होती है। यहाँ तक कि मार्कंडेय परिक्रमा तो 12 वर्ष तक चलती है। नर्मदा नदी पूरे भारत की प्रमुख नदियों में से एक ही है जो पूर्व से पश्चिम की ओर बहती है।

विगत दिनों जब मैंने अमृतलाल वेगड़ की किताब “तीरे-तीरे नर्मदा” पढ़ी, तो इस पुस्तक में नर्मदा नदी का अद्भुत प्राकृतिक सौंदर्य चित्रण मिला। यह पुस्तक पढ़कर ऐसा लगता है कि जैसे लेखक के साथ पाठक भी नर्मदा की परिक्रमा कर रहा है। वेगड़ इस नदी के अद्भुत सौंदर्य का जीवंत चित्रण नर्मदा परिक्रमा के माध्यम से करते हैं।

अभी पिछले सप्ताह नर्मदा में स्नान करने गए तो परिक्रमावासियों का दर्शन करने का भी सौभाग्य प्राप्त हुआ। इन्हें देखकर मन ऊर्जा व आस्था से भर गया। वेगड़ अपनी पुस्तक में नदी के सौंदर्य का ऐसे चित्र खीचते है मानों जीवंत हो, एक जगह वे लिखते हैं-

“रात को नर्मदा की मर्मर ध्वनि बराबर सुनाई देती। प्रायः हर रात कल-कल बहती नर्मदा का रव सुनाई देता। दिन में वह भले ही नर्मदा हो, रात में रेवा है। दिन में वह दृश्य है तो रात में श्रव्य।”

सुदूर केरल से आकर एक बालक शंकर ने नर्मदा नदी के सबसे महत्वपूर्ण घाटों में एक ओंकारेश्वर पर गुरु गोविंदपाद के आश्रम में रहकर विद्याभ्यास किया था। वह बालक और कोई नहीं आदि शंकराचार्य थे, जो हमारे देश के सर्वश्रेष्ठ परिव्राजक रहे। भारत की भावनात्मक एकता के लिए उन्होंने जो किया, वह अनुपम है।

ऐसे आद्य शंकराचार्य की पावन स्मृति ओंकारेश्वर से जुड़ी है। “त्वदीय पाद पंकजम नमामि देवी नर्मदे!” ( चरणकमल मरण नमन तुम्हारे, स्वीकारो हे देवि नर्मदा), जैसी महान् रचना आद्य शंकराचार्य द्वारा रचित नर्मदा स्तुति या कहें नर्मदा जी का काव्य के माध्यम से सौंदर्य का चित्रण है।

मध्य प्रदेश की जीवनदायिनी या कहें कि ऐसी नदी जिसका कंकर-कंकर शंकर है। जिसके हर घाट की अपनी विशेषता है। शायद ही किसी नदी में इतने मोड़, घुमाव, लचक, अल्हड़पन, नैसर्गिक सौंदर्य, कहीं शांति, तो कहीं पहाड़ों को चिरती हुई सतत बहती यह किसी कविता की सरिता से कम नहीं है।

लेकिन पिछले 30 वर्षों में जितना नर्मदा-तट का भूगोल बदला है, उतना इससे पहले 2,500 वर्षों में नहीं बदला होगा। यह बात मन को दुखी करती है। बांधों व जंगलों की कटाई से इस नदी के सामने भी आज बहुत से संकट आ खड़े हैं। रेत माफियाओं ने इस सौंदर्य की सरिता का हृदय छलनी कर दिया है जिससे कि इसका प्रवाह तो बाधित हुआ ही है, लेकिन आज इसके साथ रहने वाले सहस्रों जीव-जंतुओं पर भी गहरा संकट आ खड़ा हुआ है।

लोकसंस्कृति व प्रकृति को साथ लेकर चलने वाली इस नदी का वास्तविक स्वरूप बना रहे, इसके लिए जनमानस को साथ आना होगा। जिस नदी ने हमेशा से भारतीय लोकजीवन को समृद्ध किया व जीवंत रखा। उस संस्कृति सरिता की ओर भी हमें ध्यान देना चाहिए।