संस्कृति
मुश्किल कुशा की दरगाह मध्य प्रदेश में कहाँ से आ गई? अवैध अतिक्रमणों की दास्तान

नुसरत फतह अली खान की आवाज में सूफियों के कई कलाम हम सबने सुने हैं। अली मौला का नाम भी अनगिनत बार सुना है। उर्दू के कुछ आसान और कुछ मुश्किल कलामों को बार-बार सुनने के बाद यह तो जाहिर हो जाता है कि मौला अली इस्लाम में किसी बहुत पाक और ताकतवर हैसियत की शख्सियत हैं, जिन्हें मुश्किल कुशा भी कहा जाता है। सूफी कलामों में मुश्किल कुशा का नाम भी बार-बार आता है। आम अकीदतमंद उनसे अपनी मुश्किलों को दूर करने की इल्तजा करते हैं। उन्हें उनकी ताकत याद दिलाते हैं।

अचानक मुझे आज मुश्किल कुशा क्यों याद आ गए? मैं अक्सर खाली वक्त में किसी पुराने मंदिर, किले, महल, तालाब या खंडहरों में भटकने पहुँच जाता हूँ। ऐसी उजाड़ जगहें, जो हमारे आसपास हैं, लेकिन हमारी नज़रों में नहीं आतीं।

हमारी बेखबरी के एक सुरक्षित कोने में उदास और उजाड़-सी पुरानी इमारतें, धूल-धक्कड़, झाड़ी-जंगलों में खो रहे अतीत के शानदार स्मारक। हम कई दफा इनके पास से गुज़रते रहते हैं, लेकिन कभी वे हमारा ध्यान नहीं खींचती। मुमकिन है ध्यान जाता भी हो, लेकिन दिलचस्पी की कमी बहुत गहराई से ताक-झाँक करने का मौका नहीं देती।

मैं एक ऐसी ही जगह से होकर आया हूँ, जहाँ थोड़ा भीतर जाने पर एक पुरानी इमारत के ऊपर मुश्किल कुशा का नाम देखकर कान खड़े हो गए। उस पर लिखा था-मुश्किल कुशा की दरगाह! मुश्किल कुशा का नाम पढ़ते ही नुसरत के कलाम याद आ गए।

वह जगह है मध्य प्रदेश में विदिशा जिले की गंजबासौदा तहसील में उदयपुर नाम का गाँव। गाँव बहुत बड़ा नहीं है, लेकिन आज़ादी के पहले यह एक परगना था, जिसके तहत बासौदा एक गाँव था। आज बासौदा एक तहसील है और उदयपुर उसके अंतर्गत एक गाँव। उदयपुर एक हजार साल पुराने भव्य शिव मंदिर के लिए दूर तक प्रसिद्ध है। उदयपुर परमार वंश के राजा उदयादित्य के नाम पर बसा एक नगर रहा था, जहाँ परमारों ने गजब के निर्माण कार्य कराए थे।

इस शिव मंदिर को भी किसी सदी में काफी नुकसान पहुँचाया गया है। आसान पहुँच में आने वाली मंदिर की हर मूर्ति को खंडित किया गया। गनीमत यही रही कि मंदिर अपने मूल आकार में बचा रह गया।

कारोबारी लिहाज से यह एक बड़ा नगर रहा होगा इसलिए मुस्लिम कालखंड में यहाँ कब्ज़े और धर्मांतरण की वही कहानी दोहराई गई होगी, जो पूरे भारत की है। गांव में एक मस्जिद और मुस्लिम आबादी भी है, जो बताती है कि परमारों के बाद की किसी सदी में यहाँ हुए हमलों में मंदिर को नष्ट करने की कोशिशें हुईं। कारण जो भी रहा हो लेकिन मंदिर ध्वस्त होने से बच गया।

उदयपुर से सटा हुआ एक पहाड़ है। यह किसी विशाल शिवलिंग के आकार में तराशा हुआ मालूम पड़ता है। एक मूल पहाड़ से अलग एक विशाल मंदिर जैसा एक हिस्सा भी है, जो दूर से ऐसा लगता है कि रॉक टेम्पल जैसा कुछ बनाने के लिए इसे तरीके से काटकर अलग किया गया होगा। इस पहाड़ी शिखर के चारों तरफ एक किले की प्राचीर के खंडहर भी तीन तरफ फैले हुए हैं। यह पत्थर की खदानों के लिए मशहूर इलाका है।

रॉक को एक मंदिर की तरह बनाने की शुरुआत के सबूत

मंदिर कई बार जाना हुुआ। पुरानी बस्ती की गलियों में भी खूब घूमा। इतिहास के प्रति हमारी बेखबरी की एक अजीब-सी मिसाल है यह जगह। किसी को कोई लेना-देना नहीं है कि हमारे आसपास हमारी बेशकीमती विरासत का क्या हाल है? हम उसे किस तरह चमकाकर दुनिया को दिखा-बता सकते हैं? चारों तरफ कब्ज़े हो रहे हैं। न पंचायत को कोई सरोकार, न कलेक्टर को यह देखने की फुरसत कि हमारे देखते-देखते कैसे इतिहास पर धूल की परत गहरा रही है।

पहली बार पहाड़ पर चढ़ाई की तो दिमाग हिल गया। सबसे ऊपर पहाड़ी चट्‌टानों पर परमारों के समय किसी बड़े टेम्पल प्रोजेक्ट के लक्षण साफ नज़र आए। वे यहाँ वाकई महाराष्ट्र में एलोरा के कैलाश मंदिर जैसा एक रॉक-टेम्पल बना रहे थे। पहाड़ को काटने के निशान अब तक मौजूद हैं। कटे हुए मंदिरनुमा हिस्से की बाहरी चट्‌टानों पर मूर्तियों काे उभारने का काम भी शुरू हो चुका था। हालाँकि यह बहुत शुरुआती दौर में ही बंद हो गया होगा। इसलिए प्रतिमाओं के अनगढ़ से फ्रेम बन पाए, वही आज तक देखे जा सकते हैं।

पहाड़ी पर ऊपर दो-चार कब्रें हैं, लेकिन उन पर किसी के नाम नहीं हैं। छोटे और पत्थर से ढके हुए कुछ बरामदे हैं। इनमें से ही एक मंडप को दरगाह की शक्ल हाल ही में कभी दी गई साफ नज़र आती है। बाहर दरवाज़े के ऊपर लिखा है- मुश्किल कुशा की दरगाह! मेरा दिमाग ठनका कि ये मुश्किल कुशा कौन हैं, जिनकी दरगाह मध्य प्रदेश के इस गाँव में है? क्या वे यहाँ दफनाए गए थे? क्या वे कोई सूफी संत थे? क्या वे कोई सुलतान या बादशाह या नवाब थे? इस नाम के कौन सज्जन पुरुष यहाँ कभी थे?

मैंने ये सवाल यहाँ कई मुसलमानों से पूछा, जो ज्यादातर मजदूर या छोटे-मोटे कारोबारी हैं। ज्यादातर किसी मदरसे में पढ़े हुए। मुझे हैरत हुई इनमें से किसी को नहीं पता कि यहाँ दफन मुश्किल कुशा कौन थे? क्या वे कोई स्थानीय शख्सियत थे? थे तो कब थे? किसी को कुछ नहीं पता।

लेकिन पत्थर के स्तंभों पर खड़े एक बहुत पुराने छोटे-से कमरे के फर्श पर आधुनिक चमचमाते टाइल लगाकर एक कोने में दरगाह जैसी शक्ल दे दी गई थी। यह भी कोई आदमकद नहीं, मुश्किल से तीन फुट आकार में। बाहर दो-चार हरे झंडे यह एलान करने के लिए लगा दिए गए हैं कि यह मिल्कियत मुसलमानों की है। बहुत मुमकिन है कि आने वाले सालों में एक विशाल दरगाह यहाँ नज़र आने लगे और पूरा पुराना उजाड़ पहाड़ी किला अवैध कब्जे में चला जाए, क्योंकि स्थानीय प्रशासन, पंचायत और आम लोग पूरी तरह बेखबर हैं।

आइए अब पता करते हैं कि मुश्किल कुशा कौन थे? दरअसल इस्लाम के पैगंबर हजरत मोहम्मद के दामाद थे अली। वे चाैथे खलीफा भी हैं। उनकी बीवी का नाम था फातिमा। पिता अबू तालिक। शिया मुसलमान उन्हें अपना पहला इमाम मानते हैं। उनकी सादगी और समझदारी के कई किस्से हैं।

उनके कुछ कथन बड़े मशहूर हैं-

  • कभी भी किसी के पतन को देखकर खुश मत होना, क्योंकि तुम्हें पता नहीं है, भविष्य में तुम्हारे साथ क्या होने वाला है।
  • महान व्यक्ति का सबसे अच्छा काम होता है, माफ कर देना और भुला देना।
  • जिसको तुमसे सच्चा प्रेम होगा, वह तुमको व्यर्थ और नाजायज़ कामों से रोकेगा।

मैंने कहीं पढ़ा कि नमाज़ के दौरान अली को कत्ल किया गया था। यह घटना सिंध में भी इस्लाम के कब्ज़े (712 ईस्वी) से पहले की मक्का-मदीना की है। जब इस्लाम का ही भारत में दूर-दूर तक अता-पता नहीं था। कोई मुसलमान नहीं था तो मुश्किल कुशा यहाँ कैसे दफन हो गए?

मौला अली या मुश्किल कुशा को याद रखने का यह क्या तरीका हुआ? किसी पुरानी उजाड़ इमारत पर बाहर यह लिखकर टांग दो कि यह मुश्किल कुशा की दरगाह है। अपने इतिहास से अज्ञानी समाज कैसे धोखों में पड़ा रहकर गाफिल होता है और बड़े गड्‌ढों में गिरता है, यह इसके नमूने हैं।

मध्य प्रदेश के ही ओरछा शहर में दो साल पहले एक पहाड़ी पर ऐसे ही एक कब्ज़े की कहानी मुझे एक स्थानीय गाइड ने बताई थी। वह ओरछा के प्राचीन राजघराने के किसी सदस्य की हवेली या महल का हिस्सा था, जिसे स्थानीय मुसलमानों ने अपना अड्‌डा बनाकर एक दरगाह घोषित कर दिया गया था। पहाड़ी के नीचे बाकायदा एक साइनबोर्ड भी लगा दिया गया था, जो ऊपर एक दरगाह की घोषणा थी।

जबकि बुंदेलखंड के स्थानीय हिंदू राजाओं की राजधानी रही ओरछा में ऐसे किसी सूफी या सुलतान के दफनाए जााने के कोई ब्यौरे इतिहास में कहीं दर्ज नहीं हैं। यह विशुद्ध रूप से राजा राम के ऐतिहासिक मंदिर के लिए प्रसिद्ध बेतवा किनारे बसा एक शानदार शहर है, जहाँ भारतीय स्थापत्य के कई बेमिसाल नमूने हैं।

मध्य प्रदेश के ही रतलाम जिले में जावरा एक मुस्लिम नवाब की रियासत रही है। वहाँ एक दरगाह है, जो मानसिक रूप से विक्षिप्त लोगों के इलाज के लिए जानी जाती है। यह एक भीड़भाड़ वाली जगह है। लेकिन आप कभी मध्य प्रदेश से राजस्थान में चित्तौड़ की तरफ जाएँगे तो आपकी निगाहों में साफ आएगा कि जावरा के आसपास के इलाके में भी अचानक हाल के सालों या महीनों में बनी दरगाहें उग रही हैं।

कोई नहीं जानता कि वहाँ कौन साहब दफनाए गए हैं। लेकिन अचानक ही किसी जगह पर आपको पत्थरों के चौकोर ढेर पर हरी चादरें बिछी दिखाई देने लगेंगी। हरे झंडे फहराते नज़र आएँगे। कुछ दिन बाद वहाँ एक साइनबोर्ड टंग जाएगा। उनके नाम भी ऐसे होंगे, जो आसपास रहने वाले सभी समुदायों के बहुसंख्यक लोगाें के लिए एकदम अपरिचित होंगे।

टूटे-फूूटे पत्थरों पर हरी चादर से एक मजार के बनने का पहला चरण

खुद मुसलमान भी उनके बारे में कुछ नहीं बता पाएँगे। एक रटा-रटाया सा जवाब होगा- पीर साहब की दरगाह है! होशंगाबाद जिले के एक छोटे-से कस्बे में कुछ साल पहले एक दरगाह ऐसी चर्चा में आई थी, जो अजमेर से लाई गई ईंटों को दफनाकर ही बना दी गई थी। एक बार कारोबार जमने के बाद हिंदू-मुस्लिम एकता की गंगा-जमनी कहानियां, चंदों से उर्स के आयोजन, कव्वालियाँ, नेताओं की धूमधाम, ऐसे कब्जों की हकीकत है।

उदयपुर में मुश्किल कुशा की दरगाह क्या इशारे करती है? ये कौन लोग हैं, जो अपने आसपास पड़ी उपेक्षित और वीरान ऐतिहासिक विरासत पर कब्ज़े के लिए मजहबी आड़ ले रहे हैं? क्या उनकी ऐसी कोशिशों से मुश्किल कुशा या गरीब नवाज़ या औलिया या पीर साहब (जो असल में कहीं और दफन हैं। यहाँ उनका कुछ है ही नहीं। सिर्फ उनके नाम से एक अतिक्रमण। एक गैरकानूनी हरकत।) खुश होंगे? उनकी मन्नतें पूरी करेंगे? जन्नत में उनकी जगह आरक्षित करने में मददगार बनेंगे?

या इलाही ये माजरा क्या है?