संस्कृति
भित्ति-चित्र महाभारत: एक महान कला जिसका समय आ गया है

प्रसंग
  • प्रिंस थोंनाक्कल और उनके कलाकरों की टीम भित्ति कला को दुनिया के कोने-कोने में ले जाने के मिशन पर है और ‘मुरल महाभारतम’ ऐसा ही एक महाकाव्य हैI

महाभारत को पाँचवा वेद भी माना जाता हैI जैसा कि ऋषि व्यास ने बताया, ‘लेखक’ गणपति ने इस भव्य महाकाव्य को लिखा था, जिसे हर भारतीय जानता हैI

रामायण और महाभारत, भारत के दो महाकाव्य हैं, जिन्हें समय के साथ कई लेखकों ने कई भाषाओं में लिखा हैI सी. राजगोपालाचारी ने हमें भारतीय विद्या भवन द्वारा छापी गयी महाभारत का अनोखा संस्करण उपहार स्वरूप दिया हैI इसका तमिल संस्करण व्यासर विरुन्धू (वेद व्यास के द्वारा दावत) के नाम से जाना जाता हैI

इसी कड़ी में, ‘भित्ति-चित्र महाभारतम’ पूर्ण भित्तिचित्र कलाकार राजकुमार थोंनाक्कल और उनके 35 कलाकार शिष्यों द्वारा यथार्थ विरुंधु (दावत) है जिन्होंने रातें जागकर भित्ति पर महाभारत को फिर से उकेरा हैI राजकुमार थोंनाक्कल और कई अनुभवियों की पहल को धन्यवाद कि केरल की मुरल दुनिया भर में घूम रही हैI

भित्ति-चित्र महाभारत का कार्य

हालाँकि, महाकाव्य ने अब ऐसे विभिन्न भारतीय शहरों की यात्रा शुरू कर दी है, जिनके मूल कार्यों को हाल ही में प्रिंस थोंनाक्कल और उनकी टीम को तमिलनाडु की शिल्प परिषद के तहत कोयंबतूर में कस्थुरी श्रीनिवासन आर्ट गैलरी में प्रदर्शित किया गया था।

पिछले दो वर्षों से थोंनाक्कल द्वारा प्रशिक्षित 35 वर्ष से 75 वर्ष के बीच आयु वर्ग की महिला कलाकारों के एक समूह ने इन कृतियों को बनाया है। उनमें डॉ. रेमा देवी, जिन्होंने रामायण पर 2013 में भारत के दौरे के दौरान जापान के सम्राट अकिहितो को अपनी भित्ति चित्रकला प्रस्तुत की थी; प्रसिद्ध फिल्म अभिनेता मेनका सुरेश; युद्ध के अनुभवी स्वर्गीय कर्नल एन जयचंद्रन की पत्नी मंजू नायर; और सांता गोपीनाथन पिल्लई आदि शामिल हैं।

थोंनाक्कल ने कहा, “इन मूर्तियों को पूरा करने में तीन साल लग गए और हम कार्य का (ऑर्डर) आदेश लेने के लिए तैयार हैं,” हालाँकि हम पूरे संग्रह को किसी एक व्यक्ति या संस्थान को देना चाहते हैं।

“मैं 17 महिला कलाकारों के दो समूहों द्वारा ‘मुरल रामायणम’ और ‘मुरल विनायक’ जैसी परियोजनाओं पर एक दशक से अधिक समय तक काम करने के लिए भाग्यशाली था।”

यूआरएफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स द्वारा इस कार्य की पहचान की गई है। जटिलता और विवरण के आधार पर प्रत्येक कार्य को औसतन तीन महीने लगते थे।

भित्ति महाभारत की शुरुआत कैसे हुई?

भित्ति कला की जानकारी देते प्रिंस थोंनाक्कल

प्रिंस थोंनाक्कल परियोजना में शामिल विभिन्न शहरों और कस्बों के प्रत्येक कलाकार के पास गये और अपने मार्गदर्शन की पेशकश की, ताकि प्रत्येक भित्तिचित्र एक अद्वितीय चरित्र हासिल कर सके। थोंनाक्कल ने कहा, “जब तक कलाकार विवरण से पूरी तरह रूबरू नहीं होते, तब तक पूरे समूह का कार्य एक कलाकार की कृति प्रतीत होती है।”

पूरी परियोजना को मूर्तियों की तस्वीर वाली पुस्तकों की बिक्री से उत्पन्न राजस्व के साथ स्वयं कलाकारों द्वारा वित्त पोषित किया गया था।

प्रिंस थोंनाक्कल, जिन्होंने कई लोगों को प्रशिक्षित किया था और कई अन्य लोगों के कौशल को सम्मानित किया था, की कृतियों को कुड्डावूर महादेवक्षेत्र, श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर, देवी मंदिर (कुमारनेलूर, कोट्टायम) और पांडवपुरा में साईं ग्राम केरल (30 चित्रों में भगवतम) जैसे कई मंदिरों में प्रदर्शित किया गया है।

भित्ति चित्रों के इतिहास को, विशेष रूप से केरल के, संक्षेपित करते हुए थोंनाक्कल ने कहा, “भित्ति चित्र आठवीं शताब्दी से लेकर अठारहवीं शताब्दी तक बहुत लोकप्रिय थे। वर्ष 1970 में गुरुवायूर मंदिर में आग ने इसके भित्ति चित्रों को नुकसान पहुँचाया और उन्हें पुनर्जीवित करने के लिए बहुत कम कलाकार उपलब्ध थे।”

भित्ति-चित्र कला

सौभाग्य से, गुरुवायूर देवस्वॉम बोर्ड के के. ए. चन्द्रवासन ने भित्तिचित्र चित्रकारी संस्थान शुरू करने के लिए पहल की थी। गुरू ममियूर कृष्णकुट्टी नायर इसके प्रिंसपल बने और एम जी ससि भूषण इसके संस्थापक प्रशासक बने थे।

प्रिंस थोंनाक्कल ने मुस्कुराते हुए कहा कि “पारंपरिक भित्तिचित्र चित्रकारी से राष्ट्रीय डिप्लोमा के अपने पाँचवे साल के दौरान मैंने इस महान गुरू के संरक्षण में प्रशिक्षण प्राप्त किया था। संस्थान ने पिछले कुछ दशकों में बहुत ही शानदार काम किया है और भारत में इस श्रेणी का कोई भी अन्य संस्थान इस तरह की बड़ी संख्या में छात्रों का दावा नहीं कर सकता है। अब, यह कला प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से कई लोगों को आजीविका चलाने में मदद कर सकता है। यह एक वास्तविक पुनरुत्थान है।”

तिरुवनंतपुरम के प्रिंस थोंनाक्कल के काम को कुछ फिल्मों में दिखाया गया है। थोंनाक्कल कोयंबतूर में पढ़ाने के लिए तैयार है।

भित्तिचित्र की तकनीकि को समझाते हुएः थोंनक्कल ने कहाः भित्तिचित्रों को केवल पाँच – लाल, पीले, हरे, नीले और काले रंग से बनाना पड़ता है और यह एक कठिन प्रक्रिया है।

भित्तिचित्र महाभारतम प्रदर्शनी की पीआरओ शक्कीला सत्यन ने बताया कि इस कला को महिलाओं तक पहुँचाने और गुरुवायुर में इसका प्रसार करने का श्रेय थोंनाक्कल को जाता है। सत्यन ने बताया, “सर महिलाओं के लिए भित्तिचित्र कला शुरू करने वाले पहले व्यक्ति हैं। मूल रूप से यह केवल गुरुवायुर में पढ़ाया जाता था।

उन्होंने आगे बताया, “’मुरल महाभारतम’ प्रिंस थोंनाक्कल, जो हर साल 100 से अधिक छात्रों को शिक्षा देते हैं, के लिए एक ड्रीम प्रोजेक्ट है। 112 में से 39 भित्तिचित्र, जिनकी माप 38” * 29” है, भगवद्गीता पर आधारित हैं और छविकार शास्त्र के सार को आश्चर्यजनक रूप से सामने लाते हैं।”

उन्होंने कहा, “कलाकारों को विषयों का सुधार करने में पूरी आजादी दी गई थी, और उनमें से प्रत्येक ने अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया है।”

‘मुरल महाभारतम’ एक महाकाव्य परियोजना है और उम्मीद है कि बहुत से लोग इसका पालन करेंगे। आज दुनिया भर के कला संग्रहकर्ता भित्तिचित्र कला का संरक्षण कर रहे हैं और शायद, इस कला का युग आ गया है।