संस्कृति
बुलंद बुंदेलखंड- धुबेला के खंडहरों में महाराजा छत्रसाल की यादें

आशुचित्र- हालाँकि विश्व पर्यटन मानचित्र पर खजुराहो की मौजूदगी ने धुबेला जैसे इलाके को उपेक्षित कर दिया, लेकिन यहाँ छत्रसाल का कृतित्व हमें प्रतापगढ़, चाकन और पन्हाला में छत्रपति की टक्कर का नज़र आता है।

खजुराहो के मंदिर भारत की बेमिसाल स्थापत्य कला के जीवंत प्रमाण हैं। इनका मूल स्वरूप में बचे रहना भी किसी आश्चर्य से कम नहीं है। दिल्ली में सुलतानों-बादशाहों की 700 साल की हुकूमत के दौरान देश भर में हज़ारों ऐसे प्रमाण मिट्‌टी में मिलाए गए। मगर बुंदेलखंड का यह हिस्सा बचा रहा। शायद नियति ने भारत की काबिलियत के कुछ सबूत समय के आगोश में महफूज़ कर लिए। बुंदेलखंड का पुराना नाम जुझौती है और यह वह इलाका है, जो कभी सुलतानों-बादशाहों के सामने नहीं झुका। यहाँ के वीरों ने अपना रसूख भी बनाकर रखा। महाराजा छत्रसाल उसी वीरता की मिसाल हैं। वे मुगल बादशाह औरंगज़ेब के समकालीन हैं। उन्होंने लंबी उम्र पाई थी। वे पुणे में शिवाजी से मिले थे और बाजीराव पेशवा को अपनी बेटी मस्तानी दी थी। मध्य प्रदेश के छतरपुर शहर के पास महाराज छत्रसाल की समाधि का निर्माण खुद बाजीराव पेशवा ने कराया था।

मस्तानी महल

छतरपुर से करीब 20 किलोमीटर के फासले पर धुबेला नाम की जगह है, जो मऊ सहानियां गाँव के पास है। किसी समय यहाँ महाराज छत्रसाल की राजधानी रही। हरे-भरे पहाड़ों में दूर-दूर तक छत्रसाल और उनके राजवंश के बनवाए कई किले, महल, सभामंडल, मंदिर, समाधि और तालाब हैं। सबसे पहले धुबेला संग्रहालय, जो छत्रसाल महाराज के दरबार की इमारत में स्थापित किया गया। इसका उद्घाटन पहले प्रधानमंत्री पंडित नेहरू ने किया था। यहाँ आसपास के इलाके से इकट्‌ठा की गई मूर्तियों और शिलालेखों के अलावा छत्रसाल महाराज के उपयोग का राजसी सामान भी देखा जा सकता है। छत्रसाल का जन्म 1649 में हुआ था। दिल्ली-आगरा में तब शाहजहां की हुकूमत थी। छत्रसाल भी शुरू में मुगलों की नौकरी में थे और दक्षिण के ऐसे ही एक अभियान में 1671 में उनकी मुलाकात पुणे में छत्रपति शिवाजी से हुई। अंदाजा लगाइए-तब छत्रपति की उम्र 41 साल थी और छत्रसाल 22 साल के। छत्रपति शिवाजी तब तक पूरे देश में अपनी ताकतवर मौजूदगी दिखा चुके थे। शिवाजी से एक भेंट ने एक ऐसा गौरवशाली इतिहास रचा कि बीच हिंदुस्तान में होने के बावजूद बुंदेलखंड कभी दिल्ली के बेरहम बादशाहों के सामने कभी झुका नहीं।

धुबेला संग्रहालय में शिलालेख

प्रतापगढ़ के किले से बीजापुर के अफजल खान की विशाल फौज का खात्मा किया जा चुका था। पुणे में औरंगजेब के चचाजान शाइस्ता खान की एक लाख फौज में घुसकर शानदार सर्जिकल स्ट्राइक करके मुगलों को उनकी औकात दिखाई जा चुकी थी। पन्हाला में सीदी जौहर मुँह की खाकर कर्नूल भाग चुका था। उंबरखिंड में शाइस्ता खां के भरोसेमंद फौजी सिपहसालार करतलब खान की फौज का पहाड़ी जंगलों में सफाया हो चुका था। सूरत में छत्रपति शिवाजी के पहुँचते ही औरंगज़ेब के किलेदार इनायत खान को इतिहास ने भीगी बिल्ली बनकर छुपते हुए देख लिया था। छत्रपति शिवाजी ने इस मिथ को तोड़ दिया था कि भारतीय सिर्फ पराजित कौम हैंं और उनमें संगठन शक्ति का अभाव होता है। अपने सीमित साधनों से असीमित साधनों से लैस मुगलों, बीजापुर के आदिल शाह और अहमदनगर के निजामशाह की फौजों को अपनी शानदार नेतृत्व क्षमता और युद्ध कौशल से ही धूल चटाई थी। छत्रपति मराठों के लहू में दौड़ता करंट बन गए, जिसका असर सदियों तक  रहने वाला था।

इतिहास के ऐसे महान नायक छत्रपति से मुलाकात छत्रसाल के जीवन को भी दिशा देने वाली सिद्ध हुई। धुबेला में दर्ज है कि छत्रपति ने उनसे मुगलों की नौकरी छोड़कर स्वराज्य के लिए संघर्ष करने की सीख दी। अब छत्रसाल की धमनियों में बहने वाला रक्त एक नई ऊर्जा से भरपूर था। उन्होंने अपने जीवनकाल में ही बुंदेलखंड में अपनी ताकतवर सल्तनत कायम की और वो भी शुरुआती पाँच घुड़सवारों और 25 तलवारबाज पैदल साथियों के दम पर। ओरछा से लेकर छतरपुर और पन्ना तक इसके सबूत मौजूद हैं और वे प्राचीन मंदिर, जो इस ताकत की वजह से ही सुरक्षित खड़े रह पाए। हालाँकि विश्व पर्यटन मानचित्र पर खजुराहो की मौजूदगी ने धुबेला जैसे इलाके को उपेक्षित कर दिया, लेकिन यहाँ छत्रसाल का कृतित्व हमें प्रतापगढ़, चाकन और पन्हाला में छत्रपति की टक्कर का नज़र आता है।

ह्दय शाह महल

धुबेला संग्रहालय से लगा हुआ ही मस्तानी महल। महाराज छत्रसाल की बेटी मस्तानी, जो एक मुगल फौजदार मोहम्मद बंगश के खिलाफ युद्ध में छत्रसाल की मदद के लिए आए बाजीराव पेशवा की पत्नी हुईं। छत्रसाल के बाद राजा हुए उनके बड़े बेटे ह्दयशाह का शानदार महल खंडहर में तब्दील हो रहा है। धुबैला तालाब के दूसरी तरफ पहाड़ी गोद में छत्रसाल की पहली रानी कमलापति का महल स्थानीय शिल्पियों की कमाल की कारीगरी का नमूना है, जहाँ 300 साल पुरानी दीवारों पर 180 शानदार पेंटिंग हैं। इनमें से कई अब तक कायम हैं। यह कल्पना की जा सकती है कि मूल में रंगा-पुता यह महल दूर से तालाब के किनारे और पहाड़ के नीचे किसी हीरे जैसा ही चमकता रहा होगा।

शीतलगढ़ी के अवशेष बुंदेलों की सामरिक शक्ति का प्रतीक हैं, जहाँ से दूर-दूर तक नज़र रखी जा सकती थी। छत्रसाल महाराज के गुरू प्राणनाथ की समाधि के पास ही एक विशाल इमारत है, जिसे 1731 में बाजीराव पेशवा ने बनवाया था। यह खामोश वीरानों में खड़ी महाराज छत्रसाल की भव्य समाधि है। इसी परिसर में महाराजा छत्रसाल के घोड़े भलेभाई की समाधि भी है। कहते हैं कि महाराज के देहावसान के बाद उनके प्रिय घोड़े ने भी जीवन त्याग दिया था। प्राणनाथ उनके गुरू थे, जिन्होंने एक तलवार राजा को भेंट की थी। इस आशीर्वाद के साथ कि आप हमेशा विजेता रहेंगे और आपकी जमीन पर हीरे की खदानें होंगी। प्राणनाथजी उनके गुरू ही नहीं, सलाहकार भी थे। इन वीरान इमारतों के बीच अकेले प्राणनाथजी की समाधि ही है, जो आज भी ऐसे चमक रही है, जैसे अभी बनकर तैयार हुई हो।

गुरु प्राणनाथ की समाधि

पत्रकार आशीष खरे ने स्थानीय विरासत पर खूब लिखा है। वे इसे बुंदेलखंड का ताजमहल कहते हैं और यह है भी उससे बढ़कर। बस इतिहास में चर्चा ताजमहल की ज्यादा है, क्योंकि वह दिल्ली के पास है और इतिहास को  देखने-समझने की हमारी पक्षपातपूर्ण एकतरफ दृष्टि वैसी है। वर्ना ऐसे हजारों मंदिर-महल हैं, जिनके आगे ताज की सफेदी फीकी है। पत्थर, पकी हुई ईंटों, गारे और रंगों के इस्तेमाल से बनी छत्रसाल की समाधि अपने आकार, निर्माण की शैली और लोकेशन के हिसाब से ताज को चुनौती देती है।

दुर्भाग्य ही है कि झड़ते पलस्तर, टूटकर गिरती ईंटों, धुंधलाते रंगों के बीच दूर बुंदेलखंड के इस पहाड़ी कोने को मध्य प्रदेश की सरकारों ने भी लावारिस छोड़कर रखा। और यह बेपरवाही सिर्फ बुंदेलखंड तक सीमित नहीं है। हमने शायद यह मान ही लिया है कि ये खंडहर धूल में मिलने के लिए ही हैं। जबकि इन इमारतों को फिर से पुरानी चमक में लौटाया जा सकता है। ये बिल्कुल साबुत खड़ी हैं। लेकिन वीरान होने के लिए अभिशप्त हैं, क्योंकि इनकी ताज जैसी महिमा नहीं है। भारतीय स्थापत्य के ये शानदार महल और किले बुरी तरह बरबाद हो रहे हैं। हमारे ही पर्यटकों ने इनकी दीवारों को बुरी तरह छीलछीलकर अपने नाम खोद डाले हैं। कोई रोकने-टोकने वाला नहीं है। धुबेला संग्रहालय की एक गैलरी प्राचीन शिलालेखों पर ही है। इसमें करीब आठ फुट चौड़ा और चार फुट ऊँचा सबसे बड़ा शिलालेख है, जिस पर करीब 40 पंक्तियों का लेख है। ऐसे कई शिलालेख हैं। लेकिन कोई ये बताने वाला नहीं है कि इन पर लिखा क्या है, जबकि बहुत आसानी से हिंदी और अंग्रेज़ी में इन्हें अनुवाद करके बताया जा सकता है।

विजय मनोहर तिवारी भारत के काेने-कोने की आठ से ज्यादा परिक्रमाएँ करने वाले सक्रिय लेखक हैं। उनकी छः पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। वे स्वराज्य में सहयोगी लेखक हैं। संपर्क- vijaye9@gmail.com