संस्कृति
उदयपुर को उद्धार की प्रतीक्षा, मध्य प्रदेश में उदयादित्य के बसाए शहर की हैरिटेज वॉक

मैं हर बार उदयपुर में उस संकरी गली से मंदिर जाकर लौट आता था। हमेशा यह सोचता हुआ कि इस बस्ती में यह हीरा रखा हुआ है लेकिन कोई हीरे को घूरे पर सजाने की कला हमसे सीखे। मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से पूरे 150 किलोमीटर दूर गंज बासौदा से आगे है उदयपुर।

अब 8,000 आबादी की ग्राम पंचायत है लेकिन 1,000 साल पहले यह एक व्यवस्थित, मालदार और सलीकेदार बस्ती रही होगी। सबसे बड़ा सबूत है 11वीं सदी का भव्य शिव मंदिर। राजा भोज के वंशज महाराज उदयादित्य ने बनवाया था। उन्हीं के नाम पर है उदयपुर।

अंग्रेजी कैलेंडर के नए साल के पहले मैंने तय किया कि अब की बार मंदिर से ही नहीं लौटूँगा। गलियों में जाऊँगा। पत्थरों से बात करूँगा। मैं मंदिर के पीछे से दाईं तरफ गई गली में दाखिल हुआ। बरसों पहले बचपन में कभी गया था। इसलिए सब कुछ पुरानी पहचान-सा लगा।

यह ऐसी बस्ती है, जहाँ बहुत कुछ पुराना और बेशकीमती बहुत सुरक्षित बचा रह गया है। जैसे इस इलाके के ज्यादातर खंडित मंदिरों के बीच उदयपुर के मंदिर का अपने पूरे आकार में बचा रह जाना किसी चमत्कार से कम नहीं है। हालाँकि इतिहास के अंधड़ यहाँ से भी गुजरे हैं। मंदिर के बाहर और कुछ भीतर तोड़फोड़ के निशान साफ हैं। मूर्तियाँ खंडित की गई हैं। लेकिन विदिशा के बीजामंडल की तरह यह मिट्‌टी में मिलने से रह गया।

बस्ती में घूमिए। संकरी गलियों में जाइए। वे किसी न किसी पुरानी बंद या टूटी-फूटी इमारत, मंदिर, बावड़ी, टीले या दरवाजे़े तक ले जाती हैं। यह मालवा के परमार राजवंश के समय आबाद एक शहर था। परमार शैव परंपरा के शासक थे। उन्होंने शिव मंदिर बनवाए। लेकिन यहाँ एक गली मुझे मलबे से घिरे एक प्राचीन जैन मंदिर तक ले गई, जहाँ तीर्थंकरों की कई विशाल मूर्तियाँ यहाँ-वहाँ रखी थीं। वे सब खंडित थीं।

जब मैं कह रहा हूँ कि खंडित थीं तो यह स्पष्ट कर दूँ कि किसी प्राकृतिक कारण से टूटी-फूटी नहीं, बल्कि हाथों से तोड़ी गईं। और ये तब की बात है जब दिल्ली में खुद को सुलतान-बादशाह कहने वाले मुसलमानों के कब्जे हो गए थे। वे तुर्क-मुगल बेरहम विदेशी लुटेरे थे। उनके हमलों में लगातार यह इलाका रौंदा गया है। 1235 में सबसे पहले इल्तुतमिश ने दिल्ली से यहाँ हमला बोला था। विदिशा का बीजामंडल पहली बार तभी तोड़ा गया।

वे जाहिल अपनी फौजों को इस्लामी फौज कहते थे। उदयपुर का इस्लाम से परिचय ऐसे ही किसी हमले में कभी हुआ होगा, जब उन विदेशी गंवारों ने कुछ हद तक नुकसान तो पहुँचाया, लेकिन अल्लाह का ही शुक्र है कि मंदिर बचा रह गया।

धूल खाती इस उदास बस्ती में भी काफी कुछ पुराना भारतीय स्थापत्य गलियों में स्पष्ट है। बहुत कुछ कहता है। एक महिला वहाँ तेज़ आवाज़ में भगवान आदिनाथ की महिमा गा रही थी। तीर्थंकर के तप-त्याग का गुणगान। मूर्तियों को तोड़कर क्रूर उत्पातियों ने अपने हिस्से का काम तो पूरा किया था लेकिन वे आस्था को भारत के मन से कैसे मिटाते? वही आस्था यहाँ मलबे से घिरे इस मंदिर में आज की ठंडी सुबह हवाओं में गूंज रही थी।

एक मोड़ पर मुझे कुछ पुराने खंडहर कतार से नज़र आए। वहीं पॉलीथिन जलाकर आग ताप रहे कुछ लड़के मिले। उनसे पूछा तो बताया कि यहाँ किसी ज़माने में बाज़ार रहा होगा। यह पुरानी दुकानों की कतार है, जो अब नए बने सीमेंट-ईंटों के मकानों में गुमती जा रही है।

एक पुराना दरवाजा भी एक गली से पार होते हुए दिखा, यह परमारों का स्थापत्य था। एक लंबे किले के पीछे का हिस्सा नजर आया। वहाँ अनोखीलाल पंथी नाम के एक सेवानिवृत्त शिक्षक मिल गए। उन्होंने बताया कि यह महाराज उदयादित्य का महल है। लेकिन कहीं से भी इसमें दाखिल होना मुमकिन नहीं है।

इसे पूरी तरह दशकों से लावारिस छोड़ा हुआ है। भीतर जाने वाले मलबे, झाड़ियों और धूल से भरे रास्ते गंदे हैं। प्रधानमंत्री के लिए यहीं से सूचित किए देता हूँ कि भारत स्वच्छता अभियान इस किले के भीतर पहुँचा ही नहीं है। भूले-भटके पर्यटकों को बाहर से ही मना कर दिया जाता है कि वहाँ मत जाइए!

वाकई यह एक शानदार महल रहा होगा। इसके ठीक पीछे लोग मनमाफिक मकान बनाते जा रहे हैं। लेकिन महल के ऊपरी हिस्से में मोटे पत्थरों से बनीं कमरों की खिड़कियां बहुत कमाल हैं। यह पूरा परिसर पर्यटकों के लिए साफ-सुथरा होना चाहिए। लेकिन पंचायती राज के पंच परमेश्वरों की निद्रा गहरी रही होगी, यहाँ एक बार भी झाड़् नहीं लगी होगी।

प्रशासन की निगाहों में भी यह जगह आना शेष है। उन्हें कौन बताए कि यह हमारे पुरखों की बची-खुची विरासत है। इसे सहेजना और इसके बारे में लोगों को बताना भी हमारी ड्यूटी का हिस्सा है। उदयपुर की 8,000 आबादी में 20-2500 हजार मुसलमान भी हैं।

हिंदू-मुस्लिम दोनों यहां एक जैसे हैं। इतिहास से बेखबर। धरोहर से अज्ञानी। वे मंदिर के पीछे की सड़क और गली में हो रहे कब्जों और बेतरतीब फैलाव के बीच नुक्कड़-तिराहों पर बीड़ी पीते हैं। पान-गुटका खाकर सड़कों की नमी बनाए रखते हैं। सोई हुई सल्तनत की अवाम!

पंथीजी मुझे कुछ और गलियों से होकर एक उजाड़ परिसर की तरफ ले गए। यह पिसनहारी का मंदिर था। मगर बाहर से सुबह दरवाजा बंद था इसलिए दूर से ही इसे देखा। किसी अनाज पीसने वाली ने इसे बनवाया था, ऐसी मान्यता है। यह बहुत सादा पत्थरों से बना ऊँचा और बड़ा मंदिर है। रास्तों में कुछ खुले मैदान मिले, जिन्हें पांच-छह फुट की दीवार से घेरकर बनाया गया था। कह नहीं सकते कि दूर तक फैले खंडहर अपने भव्य रूप में यहाँ कैसे नज़र आते होंगे?

उदयादित्य के पहले और बाद में यहाँ भोज राजवंश के स्थानीय सामंत कौन रहे होंगे? जब उदयपुर का नीलकंठेश्वर महादेव का मंदिर बन रहा होगा तब यहां कैसी हलचल रही होगी? जब कभी बाहरी हमलावरों ने यहां धावे बोले होंगे तो उनका मुकाबला कैसे हुआ होगा? क्या उदयपुर की संगठित सेना के कारण यह मंदिर और यह बस्ती बरबाद होने से बच गई थी? इतिहास के अंधड़ यहाँ न्यूनतम नुकसान करते हुए क्यों निकले होंगे? हम सिर्फ अंदाज़े लगा सकते हैं?

पंथी मुझे पुरानी कचहरी बताकर एक जगह पर ले गए, जो दरअसल एक पुरानी मस्जिद थी। उसके मिंबर को वे कचहरी में अफसर के बैठने की जगह समझ रहे थे। वहीं कुछ कब्रें भी थीं। ये भी तीनेक सौ साल पुराने लगे। इसका मतलब है कि मुसलमानों की रिहाइश बहुत बाद की है। 17वीं सदी के बाद इसे कुरवाई रियासत का हिस्सा बताया गया, जो भोपाल की तरह एक मुस्लिम नवाब की रियासत थी। कुरवाई के किले में भी पुराने राजपूताना स्थापत्य की छाप स्पष्ट है।

उदयपुर की गलियाँ सर्द हवाओं के कारण सूनी पड़ी थीं। सर्दी से बचने के लिए ज़ोर से गुनगुनाते हुए कभी कोई गुज़र जाता। यह बस्ती मंदिर के कारण दूर-दूर तक पहचानी जाती है। मुझे एक बार जर्मनी की एक महिला पर्यटक यहाँ मिली थी। उसने मुझे बताया था कि वह कई सालों से भारत के दूरदराज इलाकों में बने मंदिरों-महलों को देखने आ रही है। उसकी रुचि ताजमहल या कुतुबमीनार जैसे प्रसिद्ध स्थानों में नहीं थी। इस बार वह अपने पति को लेकर भी आई थी। उसने अफसोस जाहिर किया था कि इतनी खूबसूरत जगह को कैसे यहाँ के लोगों ने और सरकार ने बरबाद होने के लिए छोड़ रखा है? “क्या हम अपने इतिहास पर गर्व नहीं करते?’ उसने पूछा था।

उदयपुर के मंदिर के तीनों प्रवेश द्वारों पर 20 से ज्यादा शिलालेख हैं, जिनमें कुछ शब्द और संवत् साफ पढ़े जा सकते हैं। ये कई सदियों पहले के हैं। भीतर के हर पत्थर पर कोई नाम या कोड खुदा हुआ साफ नजर आएगा। वहां आज भी पूजा होती है। भारत के स्थापत्य के ये महान चमत्कार हैं। एक ऐसी कला, जिसने बेजान पत्थरों में प्राण फूँक दिए।

जहाँ कहीं ऐसे विशाल मंदिर बनते थे, उस समय के वास्तुविद और निर्माता राजवंश आसपास ही कोई बड़ा जलस्त्रोत भी बनवाते थे। उदयपुर के पीछे वह आयताकार जलाशय गूगल मैप पर भी साफ दिखता है। अब दो तरफ से दुकानों और मकानों के कब्जे में गुम हो रहा है।

मंदिर तक पहुँचने वाली संकरी गली में अतिक्रमण है। एक मकान पर जामा मस्जिद का बोर्ड टंगा है, जिसकी छत से उग रही मीनारों पर टीन की गोल पाइपनुमा टोपियां पहनाकर ऊंचा किया जा रहा है। कुछ सालों में सामने दूर से दिखने वाला मंदिर इन मीनारों के पीछे छिपना तय है। धीमी गति से होने वाले बदलाव एकदम नज़र नहीं आते।

घने कोहरे में हमें कहाँ कुछ नज़र आता है। इतिहास भी एक गहरी धुंध में है। उसके पार कुछ असल इबारतें हैं, जो हमारी आँखों से ओझल हैं। हमें अपने आज और आने वाले कल की फिक्र इतनी है कि बरबादी से बचकर आया बीता हुआ कल हमारे सामने ही एक बार फिर बरबाद होने की कगार पर है।

यहाँ कोई नहीं जानता कि परमार कौन थे? धार उनकी राजधानी थी। भोज उनमें सबसे प्रसिद्ध हुए, जिन्होंने भोजपुर का मंदिर, भोपाल के तालाब के लिए कोलांस नदी पर मानवनिर्मित बांध और पुराने भोपाल का डिजाइन बनाया था। वे महान भवन निर्माता राजवंश के स्थापत्य, कला और संस्कृति की समझ वाले शासक थे।

उदयपुर को अपने उद्धार की प्रतीक्षा है। यहाँ कई छोटे-बड़े नेता पनपे। खदानों ने उन्हें बनाया। कई अफसर आए-गए। खदानों का प्रसाद उन तक भी गया होगा। नीलकंठेश्वर मंदिर में बैठे महादेव को भी उसकी प्रतीक्षा है, जो यहाँ सुरक्षित बची रह गई विरासत को बचा ले। इस बस्ती को कुछ साफ-सुथरा कर दे। पता नहीं किस टीले या खंडहर में कौन सी कहानी सामने आ जाए?

विजय मनोहर तिवारी भारत के काेने-कोने की आठ से ज्यादा परिक्रमाएँ करने वाले सक्रिय लेखक हैं। उनकी छह पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। वे स्वराज्य में सहयोगी लेखक हैं। संपर्क- vijaye9@gmail.com