संस्कृति
गणेश विघ्नहर्ता ही नहीं, बल्कि ऐसे लोकदेवता जो भारत की स्वतंत्रता का प्रतीक बन गए

गणेश महोत्सव अत्यंत धूम-धाम और भव्यता से भारत के अधिकांश क्षेत्रों में मनाया जाता है और साथ ही एक काल-खंड में जापान, चीन, कंबोडिया, इंडोनेशिया, थाईलैंड, मलाया और सुदूर मैक्सिको तक में इसका प्रचलन था। इन देशों में बहुतायत से वर्तमान में भी भगवान् गणेश की प्रतिमाओं का उपलब्ध होना इस बात का प्रमाण है कि गणेश पूजा को विश्व व्यापी मान्यता प्राप्त थी और उन्हें गणराज्य के अध्यक्ष के रूप में स्वीकार किया जाता था।

गणेश की प्रतिष्ठा संपूर्ण भारत में समान रूप में व्याप्त है। महाराष्ट्र उन्हें मंगलकारी देवता के रूप में व मंगलपूर्ति के नाम से पूजता है। दक्षिण भारत में इनकी विशेष लोकप्रियता ‘कला शिरोमणि’ के रूप में है। मैसूर तथा तंजौर के मंदिरों में गणेश की नृत्य-मुद्रा में अनेक मनमोहक प्रतिमाएँ हैं।

गणेश चतुर्थी के उत्सव पर पूजा प्रारंभ होने की सही तीथि किसी को ज्ञात नहीं है, हालाँकि इतिहास के अनुसार, यह अनुमान लगाया गया है कि गणेश चतुर्थी 1630-1680 के दौरान छत्रपति शिवाजी महाराज (मराठा साम्राज्य के संस्थापक) के समय में एक सार्वजनिक समारोह के रूप में मनाया जाता था। शिवाजी के समय, यह गणेशोत्सव उनके साम्राज्य के कुलदेवता के रूप में नियमित रूप से मनाना शुरू किया गया था।

पेशवाओं के अंत के बाद, यह एक पारिवारिक उत्सव बना रहा, यह 1893 में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक (भारतीय स्वतंत्रता सेनानी और समाज सुधारक) द्वारा पुनर्जीवित किया गया। तिलक ने गणोत्सव को जो स्वरूप दिया, उससे गणेश राष्ट्रीय एकता के प्रतीक बन गए। तिलक के प्रयास से पहले गणेश पूजा परिवार तक ही सीमित थी।

पूजा को सार्वजनिक महोत्सव का रूप देते समय उसे केवल धार्मिक कर्मकांड तक ही सीमित नहीं रखा, बल्कि स्वतंत्रता की लड़ाई, छुआछूत दूर करने और समाज को संगठित करने तथा आम आदमी का ज्ञानवर्धन करने का माध्यम उसे बनाया और एक आंदोलन का स्वरूप दिया। इस आंदोलन ने ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिलाने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।

विनायक दामोदर सावरकर और कवि गोविंद ने नासिक में ‘मित्रमेला’ संस्था बनाई थी। इस संस्था का काम था देशभक्तिपूर्ण पोवाड़े (मराठी लोकगीतों का एक प्रकार) आकर्षक ढंग से बोलकर सुनाना। इस संस्था के पोवाड़ों ने पश्चिमी महाराष्ट्र में धूम मचा दी थी। कवि गोविंद को सुनने के लिए लोग उमड़ पड़ते थे। राम-रावण कथा के आधार पर वे लोगों में देशभक्ति का भाव जगाने में सफल होते थे।

उनके बारे में वीर सावरकर ने लिखा है कि कवि गोविंद अपनी कविता की अमर छाप जनमानस पर छोड़ जाते थे। गणेशोत्सव का उपयोग स्वतंत्रता की लड़ाई के लिए किए जाने की बात पूरे महाराष्ट्र में फैल गई। बाद में नागपुर, वर्धा, अमरावती आदि नगरों में भी गणेशोत्सव ने स्वतंत्रता का नया ही आंदोलन छेड़ दिया था। अंग्रेज़ भी इससे घबरा गए थे।

इस बारे में रोलेट समिति रिपोर्ट में भी चिंता जताई गई थी। रिपोर्ट में कहा गया, “गणेशोत्सव के दौरान युवकों की टोलियाँ सड़कों पर घूम-घूम कर अंग्रेज़ी शासन-विरोधी गीत गाती हैं व विद्यालयी बच्चे पर्चे बाँटते हैं जिसमें अंग्रेज़ी हुकूमत के खिलाफ हथियार उठाने और मराठों से शिवाजी की तरह विद्रोह करने का आह्वान होता है। साथ ही अंग्रेज़ी सत्ता को उखाड़ फेंकने के लिए धार्मिक संघर्ष को ज़रूरी बताया जाता है।”

गणेशोत्सवों में भाषण देने वाले में प्रमुख राष्ट्रीय नेता थे – वीर सावकर, लोकमान्य तिलक, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, बैरिस्टर जयकर, रेंगलर परांजपे, पंडित मदन मोहन मालवीय, मौलिकचंद्र शर्मा, बैरिस्टर चक्रवर्ती, दादासाहेब खापर्डे और सरोजिनी नायडू। यहाँ भारतीय स्वंतत्रता में सांस्कृतिक आंदोलन की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही और जब “आज़ादी का अमृत महोत्सव (75 वर्ष)” मनाया जा रहा है तो इसकी प्रासंगिकता बढ़ जाती है।

गणेश को हिंदू संस्कृति में आदि देव (प्रथम पूज्य) भी माना गया है। अनंतकाल से अनेक नामों से गणेश दुख, भय, चिंता इत्यादि विघ्न के हरणकर्ता के रूप में पूजित होकर मानवों का संताप हरते रहे हैं। वर्तमान काल में स्वतंत्रता की रक्षा, राष्ट्रीय चेतना, भावनात्मक एकता और अखंडता की रक्षा के लिए गणेश जी की पूजा और गणेश चतुर्थी के पर्व का उत्साह पूर्वक मनाने का अपना विशेष महत्व है।

गणेश जी ने उत्तर-दक्षिण और पूरब-पश्चिम की संस्कृति को आपस में मिलाने का अद्भुत काम किया। हमारे देश को स्वतंत्रता दिलाने के लिए जब समाज के संगठन की आवश्यकता महसूस की गई, तब तिलक को गणेश जी से बड़ा कोई पुरोधा, कोई लोकदेवता नहीं मिला। तिलक ने गणेशोत्सव मनाने की जो राष्ट्रीय परम्परा एक बार डाल दी, वह 100 वर्ष पूरे होने के बाद भी चल रही है। जब तक गणेश पूजे जाते रहेंगे, तब तक हमारा लोक-जीवन विघ्नों को पार कर नये से नये युग में प्रवेश करने का सामर्थ्य जुटाता रहेगा।