संस्कृति
संगीत में सरस्वती को संजोने वाले श्याम
संगीत में सरस्वती को संजोने वाले श्याम

कृष्ण को भारत का सबसे बड़ा संगीतकार कहा जा सकता है। वह बांसुरी वादक, अनादि लीला के जनक और उसे प्रसारित करने वाले, जादूगर और कलाकार हैं। उन्हें संगीत सुनने और सुनाने वालों को सम्मोहित करने वाले सम्मोहक बल के रूप में माना जाता रहा है।  वह अपने आप में साक्षात सरस्वती को संजोए हुए हैं। कृष्ण जन्माष्टमी के पावन अवसर पर हम पाँच ऐसे भक्ति गीतों की बात करने जा रहे हैं जो जन्माष्टमी पर शास्त्रीय गायकों और जनता को साथ लाते हैं।

पहला

गिरिजा देवा अक्सर कहा करती थीं की वह बनारस घराने से ताल्लुक रखतीं हैं और बनारस भगवान शिव तथा गंगा का घर है। हालांकि, आज भी उनके संगीत से पता चलता है कि जितना वह बनारस से ताल्लुक रखती थीं उतना ही  राधा, कृष्ण और उनकी लीलाओं की साक्षी रही बृज भूमि से। बनारस में ही उन्होंने राग, ख्याल और हिन्दुस्तानी संगीत के अन्य रूपों की खोज की थी। बृज उनके बनारस का ही हिस्सा था। जब भी आपको कृष्णमय होने  में कोई बाधा हो तो बस आप अप्पा जी के संगीत में डूब जाइये।

गिरिजा देवी के पास अपने संगीत के जरिए कृष्ण जी का गुणगान करने का जो तरीका था वह अन्य संगीतकारों और गीतकारों से जुदा था (इस पर रसिक और कृष्ण भक्त किसी और दिन चर्चा कर सकते हैं)। कृष्ण जी में उनकी तल्लीनता पर कोई रोक टोक नहीं थी, और उनकी सभी विलक्षणताओं से यह बात साफ तौर पर जाहिर होती है। ख्याल और उनके राग के अन्य रूपों में ही कृष्ण के गुणगान की असल और मीठी भावना देखने को मिलती है। कभी-कभी तो वह कृष्ण जी को सीधे संबोधित न करते हुए भी संबोधित करती थीं। तो फिर जरा सोंचिए कि उनकी उन रचनाओं में गायन का क्या जादू रहा होगा जिसमें वह कृष्ण जी को सीधे संबोधित करती थीं।

कृष्ण जी के जीवन का हर पहलू- उनकी सुंदरता से लेकर, जिसको उन्होंने अपनी अलग-अलग रचनाओं में एक या कई बार परिभाषित करने का प्रयास किया है, आध्यात्म में उनकी अभिव्यक्तियों के डूबने तक गिरिजा देवी का गायन रसिका में दिखाई देता है।

कृष्ण जी के सुंदर नैनों की प्रशंसा में गाया गया गीत ‘अंखियाँ रसीली उनकी ऐसी ही एक रचना है। इसमें “रसीली” शब्द स्वयं में ही कई-कई भावों और गुणों को संजोए हुए है। इसमें कृष्ण जी के शरारती नैनों का वर्णन किया गया है।

कृष्ण की भक्ति में उन्होंने तीन शब्दों, “अंखियाँ”, “रसीली” और “श्याम”, का सबसे ज्यादा उपयोग किया है। वह उनको गमका में लपेटती हैं। इस रचना में गिरिजा देवी ने कहीं-कहीं पर श्रृंगार मनोदशा में भी बदलाव कर दिया है। यह खुशी उनको एक अलग ही स्तर पर ले जाती है जैसा कि वह स्वयं भगवान कृष्ण की आँखों में डूब गईं हों।

दूसरा

‘म्हारो प्रणाम’ कहीं न कहीं से किशोरी आमोनकर के संगीत विरासत का एक केन्द्र है जिसको उन्होंने अपने रसिकों के लिए छोड़ा है। इस भजन में कई श्रोता अक्सर उनके “किरदार” पर चर्चा करते रहते हैं। यह रूप यकीनन बेजोड़, विचलित कर देने वाले और हानिकारक है। इसमें किशोरी जी के गायन और शैली का असल रूप दिखाई देता है।

किसी के सामने आत्मसमर्पण करने, अपनी बुराइयों को समाप्त कर निष्कलंक होने और वाणी पर पूर्ण नियंत्रण रखने के लिए नतमष्तक होना पहली शर्त है। इन गुणों के अलावा, किशोरी जी का मधुर गायन कृष्ण के प्रति मीरा के प्रेम को देखने का भी एक साधन है।

किशोरी जी ने निजी तौर पर सामान्य या आध्यात्मिक रूप से प्रेम के जितने रंगों का पता लगाया है, यह गायन शायद उनमें से एक है। यहाँ पर भी उनका गायन विषय को संबोधित करने में उनको भीतर की ओर ले जाता है।

तीसरा

कृष्ण आपके दिलोदिमाग में तब तक नहीं समाते जब तक कि आप थियेटर/रंगमंच में पंडित राजन और साजन मिश्रा के गायन से परिपूर्ण कल्पनिक चित्रों को अपने पास आते हुए महसूस नहीं करते। कृष्ण को समर्पित उनकी गायन सेवा, जो गायन और संगीत के माध्यम से एक भक्तिमय सेवा है, के रूप में परिलक्षित होती है।

कृष्ण का जीवन और उनके आसपास के लोग सुगंधों, ध्वनियों और दृश्यों के एक फव्वारे के रूप में प्रस्फुटित होते हैं। ‘बिरी नवल’  श्रंगार रस से परिपूर्ण है। यह चौताल, मृदंग का एक ताल चक्र, जिससे ध्रुपद बनता है और जो प्राचीन संगीत की आत्मा का निर्माण करती है, से सुसज्जित उनके धैर्य और दृढ़ता की एक मीठी सी यादगार है।

कृष्ण के श्रृंगार पर, विशेष रूप से उनकी लीलाओं पर उनके द्वारा व्यक्त भावों पर ध्यान दीजिए। इस पर भी ध्यान दें कि “श्री विठ्ठल गिरधारी” का यह श्रंगार उत्सव कैसे समाप्त होता है। श्रृंगार का उच्च रूप। ब्रज के लिए बनारस का उच्च रूप।

चौथा

यह शास्त्रीय और विनम्र लोगों के शीर्ष के बीच एक ऐसी शैली है जिसे कुछ माहिर लोग ही अपनाना पसंद करते हैं। यह शैली शास्त्रीय लोगों तथा जनसाधारण के बीच संपर्क स्थापित करती है। यह शैली वर्णनात्मक, संवाद और व्यवहारिक शब्दों के लिए उपयुक्त है।

पंडित भीमसेन जोशी, जो कि एक महान पुरुष हैं, इस तरह के ही एक महान गायक हैं। उनके भजन जनसाधारण के लिए माध्यम थे और भक्ति संगीत उनकी भाषा, जिसे उन्होंने संगीत में पिरोकर तैयार किया था, की वर्णमाला के समान था। ‘चलो री’’ (यहाँ पर तीन भजन) पंडित जी के विचारों और प्रश्नों से सराबोर रसिक/चंचल प्रस्तुतियों में से एक है। यह बांसुरी की धुन सुनने का एक निमंत्रण है। श्रीकृष्ण की बांसुरी को नमन है।

पांचवां

पंडित जसराज कृष्ण की बांसुरी का अनुसरण करते हैं। आप कौन हैं इसकी परवाह किए बिना वह आपको गीत में शामिल करते हैं। वह आपको कृष्ण की महान लीला का हिस्सेदार बनने देते हैं। पंडित जसराज ने गायक दल की अवधारणा का उपयोग करके व्याख्यानों/ग्रंथों को सबसे शानदार तरीके से जनसाधारण के सामने प्रस्तुत किया है।

उन्होंने कृष्ण से संबंधित अपने गीत में अन्य लोगों को शामिल होने का अवसर प्रदान किया। ऐसा करने में, वह किसी भी मानसिक अवरोध या अनुभूति की बाधा को समाप्त कर देते हैं जिसे ग्रंथों का सस्वर पाठ करने वाले लोगों द्वारा अन्य लोगों को ग्रंथों का गायन करने से रोका जाता है।

श्री दामोदर स्त्रोतम् की इस प्रस्तुति में संगीत सुबद्धता और गायकदल का पूर्ण उपयोग उनकी शैली के लिए स्वाभाविक है। यह आपको बताता है कि भक्ति और ईमानदारी से निर्देशित एक कलाकार के लिए ग्रंथों का गायन करने से पहले अपने स्थान से नीचे उतरना कितना अहम है।

सुमति महर्षि स्वराज्य की वरिष्ठ संपादक हैं।