संस्कृति
वामपंथियों का गढ़ जेएनयू अपने नए संस्कृत विद्यालय के माध्यम से भारतीय पुनर्जागरण की करना चाहता है अगुवाई

प्रसंग
  • जेएनयू ने संस्कृत अध्ययन के विशेष केंद्र [स्पेशल सेंटर फॉर संस्कृत स्टडीज] को एक पूर्ण स्वंतत्र संस्कृत एवं भारतीय अध्ययन के विद्यालय [स्कूल ऑफ़ संस्कृत एंड इंडिक स्टडीज’(एसएसआईएस)] में अद्यतित किया है।
  • अब वे एक ही छत के नीचे संस्कृत, पाली, प्राकृत, वैदिक संस्कृति, योग दर्शन और बहुत सारे विषयों पर माध्यमिक तथा बहु-विषयक पाठ्यक्रम चला सकते हैं।
  • अपेक्षित रूप से, इस कदम की आलोचना हुई लेकिन जेएनयू भारतीय पुनर्जागरण की घोषणा में अटल दिखाई देता है, जो शायद बहुत सारे लोगों के लिए आश्चर्य का विषय है।

जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय (जेएनयू) भारतीय पुनर्जागरण के प्रयासों की अगुवाई करना चाहता है। जी हाँ, आपने बिल्कुल सही सुना।

सार्वजनिक कल्पना से अब तक अनुपस्थित रहा जेएनयू, जिसके लिए वामपंथी मुखालिफ़त का शुक्रिया, तीन साल पहले राष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में था जब कुछ वामपंथी छात्र भारत को तोड़ने वाले नारे लगाते हुए और एक मृत आतंकवादी, जिसने भारतीय लोकतंत्र के ह्रदय भारत की संसद पर हमला किया था, की शहीदी का जश्न मनाते हुए एक राष्ट्रवाद-विरोधी शर्मनाक प्रदर्शन में शामिल हुए थे।

हालाँकि माहौल बदल रहा है, जिसका श्रेय पिछले कुछ वर्षों में की गयी पहलों को जाता है। इन पहलों में साम्यवादी गुट के बोलबाले को तोड़ने के लिए शिक्षकों की नियुक्तियों में सुधार करना, छात्रों का ध्यान विश्वविद्यालय की जहरीली राजनीति से हटाकर शिक्षा की तरफ खींचने के लिए उनकी 75% उपस्थिति का होना अनिवार्य करना तथा नयी जान फूंकने के लिए अति आवश्यक इंजीनियरिंग और प्रबंधन पाठ्यक्रमों को शामिल करना इत्यादि शामिल है। इन पहलों ने ‘लाल सलाम’ गैंग की नीव को झकझोरना शुरू कर दिया है और असफल तथा आयातित विचारधाराओं, जो सरलता से प्रभावित हो जाने वाले युवाओं को संक्रमित करती हैं, के महापुरोहितों को क्रोधित किया है।

इस परिवर्तन का अधिकांशतः श्रेय प्रोफेसर जगदेश कुमार को जाता है जिन्होंने 2016 में विश्वविद्यालय के कुलपति का पद संभाला था। हालाँकि उनके वामपंथी आलोचक सार्वजनिक रूप से उनकी निंदा करने के लिए और उनके बहिष्कार की मांग करने के लिए उनके सुधारों का हवाला देते हैं।

पिछले साल दिसम्बर में एक महत्वपूर्ण कदम के तहत जेएनयू प्रशासन ने संस्कृत अध्ययन के अपने विशेष केंद्र को एक पूर्ण स्वंतत्र ‘स्कूल ऑफ़ संस्कृत एंड इंडिक स्टडीज’(एसएसआईएस), [संस्कृत एवं भारतीय अध्ययन] में अद्यतित करने का निर्णय लिया था। एक विश्वविद्यालय के पास कई विद्यालय होते हैं जिनके साथ कई केंद्र तथा शिक्षा के विशेष केंद्र जुड़े हुए होते हैं। इसलिए एक विद्यालय के पास इसके विभाग, पाठ्यक्रम और केंद्र हो सकते हैं और यह जरुरत के हिसाब से इनका विस्तार कर सकता है। इस तर्क ने एक विशेष केंद्र को एक विद्यालय में अद्यतित करने की वजह को पुख्ता किया था। शिक्षक सदस्यों ने इस कदम का समर्थन करते हुए तर्क दिया कि एक पृथक विद्यालय में वे एक ही छत के नीचे संस्कृत, पाली, प्राकृत, वैदिक संस्कृति, योग दर्शन और बहुत सारे विषयों पर माध्यमिक तथा बहु-विषयक पाठ्यक्रम चला सकते हैं।इसके अलावा, वे अधिक केंद्र खोलने के बजाय भविष्य में सभी भारतीय पाठ्यक्रमों के लिए डिग्री प्रदान कर सकते हैं।

इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि आजादी गैंग समर्थकों में भिनभिनाहट मची थी। जेएनयू शिक्षक संघ (जेएनयूटीए) ने इस कदम का यह कहते हुए बड़े पैमाने पर विरोध किया कि इस कदम के लिए उचित मंत्रणा नहीं की गयी और यह कदम वैचारिक उद्देश्यों से प्रेरित था। उन्होंने तर्क दिया कि संस्कृत भारतीय भाषाओं के लिए विद्यालय का हिस्सा हो सकती है लेकिन एक विशेष विचारधारा “यह मानती है कि संस्कृत एक भाषा से कहीं बढ़कर है, यह एक दर्शन है।”

खैर, विद्यालय कुछ ही सप्ताह के भीतर ही कार्यरत हो गया था।

विद्यालय की स्थापना में एक अहम भूमिका निभाने वाले अंदरूनी सूत्रों ने नाम उजागर न करने की शर्त पर स्वराज्य को बताया कि इस कदम का उद्देश्य था कि “भारतीय” शब्द को व्यापक अस्तित्व प्रदान किया जाए और भारतीय संस्कृति एवं इतिहास से सम्बंधित शोध के किसी भी क्षेत्र को कमजोर करने वाले परोक्ष वैचारिक उद्देश्यों के साथ जुड़े निहित हितों को रोका जाए।यह पाली और प्राकृत जैसे क्षेत्रों के लिए अलग-अलग केंद्र बनाने की आवश्यकता को भी समाप्त कर देगा। पाली और प्राकृत के क्षेत्र स्वयं के बल पर पर्याप्त मात्रा में विदेशी वित्त पोषण प्राप्त कर सकते हैं और ये शोध के संभावित क्षेत्र हैं जहाँ संदेहपूर्ण विद्वता का इस्तेमाल करके भारत के जातिगत और धार्मिक दोषों का शोषण किया जा सकता है।

भारत में 17 विश्वविद्यालय और 200 विभाग संस्कृत अध्ययन में काम कर रहे हैं, लेकिन वे प्रतिभा को आकर्षित करने या उत्कृष्टता हासिल करने वाले केन्द्रों के रूप में छाप छोड़ने में असफल रहे हैं। जेएनयू के नए विद्यालय का जो लक्ष्य है, वह है एक उत्कृष्ट संस्थान बनना, जहाँ सर्वश्रेष्ठ मस्तिष्क आ सकें और 18 प्रस्थान एवं 64 कलाओं पर ध्यान केन्द्रित करते हुए भारत की हजारों वर्ष पुरानी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का अध्ययन कर सकें।

एसएसआईएस के डीन प्रोफेसर गिरीश नाथ झा ने स्वराज्य को बताया, “जेएनयू उत्कृष्ट नेतृत्व प्रदान कर सकता है। हमारा लक्ष्य इस विद्यालय को एक मॉडल के रूप में ऐसे विकसित करना है कि देश भर के अन्य विश्वविद्यालय इसका अनुकरण करें।” झा ने भाषाविज्ञान में स्नातक किया और जेएनयू से मशीन अनुवाद में पीएचडी की डिग्री प्राप्त की और इसके बाद वह इलिनोइस विश्वविद्यालय से भाषाविज्ञान में एक और स्नातक करने चले गए।संयुक्त राज्य अमेरिका (यूएस) में एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर के रूप में एक संक्षिप्त कार्यकाल के बादझा भारत वापस आ गए।इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ इन्फोर्मेशन टेक्नोलॉजी, हैदराबाद से जुड़े आंध्र सरकार के एक उच्च रैंकिंग वाले अधिकारी ने झा को संस्थान में शामिल होने का सुझाव दिया लेकिन उन्होंने अपनी मातृसंस्था के स्पेशल सेण्टर फॉर संस्कृत स्टडीज को चुना जिसके साथ वह कम्प्यूटेशनल भाषाविज्ञान के सहायक प्रोफेसर के रूप में 2002 में जुड़े और फिर उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।

यह नया विद्यालय क्या दे रहा है, इस पर एक नज़र डालते हैं: संस्कृत, पाली, संस्कृत कम्प्यूटेशनल भाषाविज्ञान, योग दर्शन, और वैदिक संस्कृति में प्रवीणता प्रमाणपत्र (सर्टिफिकेट ऑफ़ प्रोफ़ीसियेंसी-सीओपी) पाठ्यक्रम;वेद, साहित्य, दर्शन, कम्प्यूटेशनल भाषाविज्ञान, संस्कृत भाषाविज्ञान, सामाजिक विचार, भारतीय सौंदर्यशास्त्र और काव्यशास्त्र, पाली, प्राकृत, और वैदिक अध्ययन में विशेषज्ञता के साथ मास्टर डिग्री। यह आगम प्रणालियों, संस्कृत साहित्य, भारतीय दार्शनिक प्रणालियों, भारतीय व्याख्या विश्लेषण, नव्य न्याय भाषा और पद्धति, भारतीय और पाश्चात्य लॉजिकल सिस्टम, भारतीय सामाजिक-राजनीतिक विचार और महाकाव्यों इत्यादि में विशेषज्ञता के साथ एमफिल और पीएचडी की डिग्री भी प्रदान करता है।

समझा जा सकता है कि विद्यालय पर सभी की नज़रे हैं। कुछ महीने पहले, संस्कृत विद्वान शेल्डन पोलॉक ने एक छोटा विवाद खड़ा किया था जब उन्होंने इंडियन एक्सप्रेस को दिए एक साक्षात्कार में कहा था कि “तीन साल की संस्कृत की डिग्री के साथ आपको सिर्फ हवन कराने का रोजगार मिलेगा और मुझे लगता है कि जेएनयू आज कल पुजारियों को प्रशिक्षण दे रहा है।” हालाँकि उनका केन्द्रीय तर्क यह था कि एक लिबरल आर्ट्स कॉलेज को वो कौशल प्रदान करने चाहिए जो किसी को सशक्त बनाए। उन्होंने पूछा, “अपने जीवन को समृद्ध करने के अलावा, आप क्यों जीवित रहना चाहेंगे यदि आपको आपके आस-पास की सुन्दरता की समझ नहीं है? यह एक कारण है संस्कृत सीखने का, यह एक कारण है अपनी प्राचीन परंपराओं को समझने की क्षमता के विस्तार का और यह सोचने की आपकी क्षमता को बढ़ाने का भी एक कारण है।” हालाँकि नौकरी बाज़ार में संस्कृत की उपयोगिता की कमी वाली उपेक्षा करने वाली उनकी टिप्पणी पर उनके आलोचकों ने उन्हें आड़े हाथों लिया।

जेएनयू में पुजारियों को प्रशिक्षण देने वाले पाठ्यक्रमों के बारे में झा को खेद नहीं है। वह पूछते है, “ऐसे रोजगार-उन्मुखी पाठ्यक्रमों की शुरुआत करने में गलत क्या है? देश भर में हजारों मंदिर हैं और कुशल, ज्ञानी हिन्दू पुजारियों की मांग सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि उन सभी देशों में बढ़ रही है जहाँ जीवंत और समृद्ध हिन्दू आबादी मौजूद है।भारतीय सशस्त्र बलों में पुजारियों के लिए धर्मगुरु के पद हैं। महानगरों में अपनी इच्छानुसार विशिष्ट अनुष्ठानों और पूजाओं के लिए पुजारियों को ढूंढना वाकई टेढ़ी खीर है। भविष्य में इसके लिए मोबाइल एप्लीकेशन बनाई जा सकती हैं। हम इतनी बड़ी सम्भावना की अनदेखी कैसे कर सकते हैं।” वह आगे कहते हैं, “यह जमीनी हकीकत है कि कर्मकांड में जेएनयू के पीजी डिप्लोमा का मजाक उड़ाने वाले लोग समझते नहीं हैं। आज कल उचित प्रशिक्षण की अनुपस्थिति में, सभी प्रकार की विसंगतियों ने अपनी जगह बना ली है।यदि हम इन्हें ठीक नहीं करेंगे, तो कौन करेगा?”

इसी तरह, कल्प वेदांग, वास्तु शास्त्र (दोनों एसएसआईएस समन्वय समिति द्वारा अनुमोदित हैं; इन्हें जेएनयू अकादमिक परिषद के सामने प्रस्तावित होना है) और धार्मिक पर्यटन में पीजी डिप्लोमा जैसे पाठ्यक्रमों, योग में एमए पाठ्यक्रम और आयुर्वेद में बीएससी पाठ्यक्रम से अपेक्षा है कि ये पाठ्यक्रम ऐसे छात्र देंगे जो इन विशेष क्षेत्रों की मांगों को पूरा करेंगे। हर तरह से यह मांग, देश-विदेश में योग केन्द्रों, आयुर्वेदिक चिकित्सकों, धार्मिक ऐतिहासिक स्थलों पर टूर गाइडों, भवन निर्माण कंपनियों में वास्तु विशेषज्ञों की आवश्यकताओं इत्यादि के साथ बढ़ रही है।

दिलचस्प बात यह है कि इसमें कुछ ऐसा है जो जातिवाद का विरोध करने वाले लोगों को खुश कर सकता है, बल्कि उन्हें खुश होना चाहिए।चूंकि जेएनयू इन सभी पाठ्यक्रमों में सीट आवंटन में भारत सरकार की आरक्षण नीति का पालन करेगा, इसलिए पुजारी या पंडित बनने के लिए सभी जातिगत बाधाएं ख़त्म हो जाएंगी।

कर्मकांड उन असीम संभावनाओं का मात्र एक अंश है जो संस्कृत या अन्य भारतीय भाषाओं के स्नातकों के लिए आगे दिखाई दे रही हैं। उन्हें ई-कॉमर्स फर्मों द्वारा नियुक्त किया जा रहा है, टेक कम्पनियाँ मोबाइल एप्लीकेशन, ई-लर्निंग प्लेटफार्म, मीडिया, सोशल मीडिया प्लेटफार्म बना रही हैं। भारत की वह आबादी, जिनमें से अधिकांश को अंग्रेजी समझ नहीं आती, गुणवत्तायुक्त पेशेवरों के लिए मांग पैदा करने में मदद कर रही है; चाहे वे स्टार्टअप हों या बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ हों, तकनीक और प्रतिभा में निवेश हर वर्ष बढ़ रहा है ताकि ग्रामीण इलाकों में अनछुई आबादी पर ध्यान दिया जा सके। भारत का युवा और इसका बढ़ता हुआ मध्यम वर्ग भी अपने इतिहास और विरासत में सच्चे और वास्तविक पांडित्य के लिए तीव्र लालसा रखता है। बढ़ती समृद्धि, अरबों का बाज़ार, वाणिज्यिक हित और सभ्यता के मूल को समझने की भावना का मजबूत होना, इत्यादि कई कारकों का अभिसरण भारतीय अध्ययन की अभूतपूर्ण संभावनाओं से सम्बंधित पाठ्यक्रमों को करने में रूचि रखने वाले छात्र उपलब्ध करा रहा है।

इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि जेएनयू के भारतीय अध्ययन कार्यक्रम के भूतपूर्व छात्र गूगल, माइक्रोसॉफ्ट और अन्य बड़ी कंपनियों के साथ काम कर चुके हैं। जेएनयू से एम.फिल स्नातक एशा बनर्जी, जो वर्तमान समय में गूगल में काम कर रही हैं, ने स्वराज्य को बताया कि उन्होंने अंग्रेजी-उर्दू के लिए माइक्रोसॉफ्ट मशीन अनुवाद प्रणाली और ईजेडडीआई, अहमदाबाद से व्याख्यात्मक कार्यों पर झा के साथ काम किया। उन्होंने कहा ये उद्योग सहकार्यता झा की देन थी। बनर्जी ने मानव संसाधन मंत्रालय द्वारा वित्त पोषित इंडियन लैंग्वेजेज कॉर्पोरा इनिशिएटिव (आईएलसीआईए) पर काम किया, जिसके बारे में उन्होंने कहा कि इससे उन्हें नेचुरल लैंग्वेज प्रोसेसिंग (एनएलपी) कार्पस के विकास में बहुत सारी जानकारी हासिल करने में मदद मिली।

विशेष रूप से, भाषा के क्षेत्र में झा के शोध और वर्षों की मेहनत के साथ जुड़े तकनीक के उनके ज्ञान ने उन्हें माइक्रोसॉफ्ट जैसे शीर्ष तकनीकी दिग्गजों के साथ काम करने का मौका दिया, जहाँ उन्होंने भारतीय भाषाओँ के लिए मशीन अनुवाद के साथ सहायता की। वह देवनागरी के लिए हस्तलेख मान्यता पर अपने प्रोजेक्ट के साथ-साथ भारतीय भाषाओँ के लिए पार्ट ऑफ़ स्पीच (शब्दखंड) टैगिंग प्रोजेक्ट के सलाहकार थे।यदि आप एंड्रॉइड डिवाइस पर सबसे लोकप्रिय कीबोर्ड एप्लिकेशन स्विफ्टकी पर इडियन-लैंग्वेज कीबोर्ड का उपयोग करते हैं, तो शायद आपको झा को धन्यवाद देना पड़ सकता है क्योंकि उन्होंने छोटी भारतीय भाषाओं के लिए प्रिडिक्टिव कीबोर्ड विकसित करने में उनकी मदद करने में अहम भूमिका निभाई थी।

लेकिन, शायद इस लेखक की राय में सबसे रोमांचक और सबसे प्रभावशाली परियोजना 2011 में पेंसिल्वेनिया विश्वविद्यालय में भाषाई डेटा सहायतासंघ के साथ उनकी सहभागिता थी, जहां उन्होंने एक कंप्यूटर सॉफ्टवेयर विकसित करने में मदद की जो केवल कुछ बोले गए शब्दों को सुनकर लोगों द्वारा बोली जाने वाली भाषाओं की पहचान कर सकता था। झा ने बताया, शायद यह एक राष्ट्रीय सुरक्षा परियोजना थी जिसे अमेरिकी आप्रवासन द्वारा भाषा के उच्चारण के आधार पर प्रवासी नागरिकों की पहचान करने के लिए शुरू किया गया था। कोई भारत के लिए, जहां प्रवासी अंतर्वाह काफी कम है, इस तरह के एक महत्वपूर्ण कार्यक्रम के निहितार्थ की कल्पना करने में मदद नहीं कर सकता। मिसाल के तौर पर, भारत पाकिस्तान के विभिन्न क्षेत्रों में बोली जाने वाली लहजे और भाषाओं का डेटाबेस बना सकता है और जब भी दहशत फैलाने वाला हवाई अड्डे या मेट्रो पर सुरक्षा जांच के माध्यम से गुजरता है तो उसके संभावित निवास क्षेत्र का पता लगाया जा सकता है।

झा इस तरह की परियोजना से भारत की भी मदद क्यों नहीं करते? इस पर वह कहते हैं, “मुझे भारत के लिए इस तरह की एक परियोजना पर काम करना अच्छा लगेगा लेकिन किसी ने मुझसे अभी तक राय नहीं ली।”

उनकी सफलता में कौशल-उन्मुख पाठ्यक्रमों और प्रोजेक्टों की भूमिका को और ज्यादा बढ़ाचढ़ा कर पेश नहीं किया जा सकता है। एसएसआई की कम्प्यूटेशनल भाषाई शोध एवं विकास पहल के तहत छात्रों को अनुसंधान एवं विकास में प्रायोगिक प्रशिक्षण प्रदान किया जाता है, इस पहल को 2002 में झा के संरक्षण में शुरू किया गया था। अनुसंधान के छात्रों ने कई उपयोगी उपकरण और साधन विकसित किए हैं जो उनके जूनियरों के लिए ही लाभदायक नहीं हैं बल्कि निजी कंपनियाँ भी अपने व्यापार में इस्तेमाल के लिए भुगतान के बदले इनकी माँग कर रही हैं। इस भुगतान से आने वाले पैसे से आगे के शोध में मदद मिलेगी।

छात्रों द्वारा विकसित किए गए टूलों में बहुभाषीय टेक्स्ट खोजने योग्य ऑनलाइन अमरकोष शामिल है। अमरकोशजो कि संस्कृत का एक शब्दकोष है जहाँ पर कोई भी उपयोगकर्ता एक यूनिकोड डेटाबेस बना सकता है और टेक्स्टका विश्लेषण कर सकता है। भाषा के विद्वान अनुमतिके साथ इसका संपादन कर सकते हैं और इसमें प्रविष्टियाँ कर सकते हैं। प्रत्येक शब्द में श्रेणी, लिंग, संख्या ज्ञान, और विस्तृत व्याख्या के साथ 50 समानार्थी शब्द होते हैं। महाभारत, रामायण, वेद, आयुर्वेद, उपनिषद, रामायण और अन्य प्राचीन ग्रंथ इसके अन्य स्रोत हैं जहां से खोज की जा सकती है। एसएसआईएस वर्तमान में एक संस्कृत-हिंदी अनुवादक (SaHiT) उपकरण विकसित कर रहा है। विद्वानों ने भी कई भाषा-प्रसंस्करण उपकरण विकसित किए हैं, जिनमें से, शायद भारतीय भाषा अनुवादक सबसे महत्वपूर्ण है, जिससे किसी एक भारतीय भाषा की लिपि को दूसरी लिपि में परिवर्तित किया जा सकता है, जैसे देवनागरी से तमिल में।

इसके साथ ही एसएसआईएस अपनी शारदा परियोजना को कार्यान्वित कर रहा है। आज शारदा लगभग एक विलुप्त लिपि है जिसका एक हजार साल पहले कश्मीर में इस्तेमाल किया जाता था। जेएनयू लिपि पढ़ने और लिखने में दर्जनों छात्रों को प्रशिक्षित करने के लिए कार्यशालाएं आयोजित कर रहा है। अब यह इसके लिए एक कीबोर्ड बनाने पर काम कर रहा है क्योंकि जिन छात्रों ने इसे सीखा है, उनके पास इसका ऑनलाइन उपयोग करने का तरीका नहीं है। झा ने स्वराज्य को बताया, “शारदा लिपि में लिखित लगभग 5,000 संस्कृत पांडुलिपियां हैं जिन्हें पढ़ने में हम सक्षम नहीं हैं। हमारे सॉफ्टवेयर के माध्यम से, हम इसे किसी अन्य भारतीय भाषा की लिपि में अनुवादित कर सकते हैं। इस तरह हम अपनी विरासत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा पुनः प्राप्त कर सकेंगे। हमें यकीन है कि इससे हमें उस युग की महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त होगी।

वर्तमान में, एसएसआईएस दिल्ली के आसपास के गांवों में दवा और अन्य क्षेत्रों में स्थानीय ज्ञान प्रणाली के प्रलेखीकरण प्रक्रिया को पूर्ण करने की योजना बनाने के अंतिम चरण में है। इसके लिए इसने अपने कुछ सर्वश्रेष्ठ छात्रों को सूचीबद्ध किया है। विद्यालय ने उत्तर-पूर्व की 18 भाषाओं के प्रलेखीकरण और उत्तर-पूर्व अध्ययन के लिए विशेष केंद्र हेतु उनके लिएकीबोर्ड बनाने के लिए एक परियोजना प्रस्तावित की है। उत्तर-पूर्व लोकसाहित्य के प्रलेखीकरण के बाद यह किया जाएगा।

200-250 छात्र स्कूल से संबद्ध हैं। विशेष केंद्र से अद्यतन के बाद, इसने कई पाठ्यक्रमों के लिए कक्षा में दाखिलों की बढ़ोत्तरी की है। यह आयुर्वेद जीवविज्ञान से बीएससी, योग से एमए, और संस्कृत से बीए पाठ्यक्रम शुरू करने की प्रक्रिया में है। झा ने कहा कि पतंजलि ने जेएनयू छात्रों को प्रशिक्षण देने की भी पेशकश की है। वर्तमान समय में 15 शिक्षक हैं और स्कूल अगले 10 वर्षों में इनकी संख्या 50 तक बढ़ाने की योजना बना रहा है। स्कूल उम्मीद करता है कि सुभाष काक और राजीव मल्होत्रा भी अपने छात्रों की सहायता करेंगे। उन्हें क्रमशः जेएनयू स्कूल ऑफ इंजीनियरिंग और स्कूल ऑफ मीडिया स्टडीज में विजिटिंग प्रोफेसरों के रूप में नियुक्त किया गया है।

झा ने बताया, “भविष्य में, हमारा उद्देश्य मल्टीमीडिया प्रयोगशालाओं का निर्माण करना है जहां हम अपने क्षेत्र में विशेषज्ञ सेवानिवृत्त प्रतिष्ठित प्रोफेसरों के लेक्चर रिकॉर्ड कर सकें। हम इन्हें भुगतान के बदले ऑनलाइन उपलब्ध करायेंगे, ताकि संस्थान और प्रवक्ता दोनों को वित्तीय लाभ प्राप्त हो सके। इससे हमें एक लाभदायक और आत्मनिर्भर पारिस्थितिकी तंत्र बनाने में मदद मिलेगी।”

एसएसआईएस ने अपने भविष्य के विस्तार के लिए व्यापक योजनाएं तैयार की हैं। स्कूल की तेजी से बढ़ती आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए, प्रोफेसर झा ने प्रारंभिक मूल्यांकन के लिए जेएनयू के इंजीनियरिंग विभाग में एक नई सात मंजिला इमारत का एक प्रस्ताव प्रस्तुत किया है। इस दरम्यान स्कूल बाहरी अनुदान के लिए आवेदन कर रहा है। नए आयुर्वेद उद्यान के लिए पहले ही निधि सुरक्षित की जा चुकी है। अगर प्रोफेसर झा की संभावित योजना स्वीकार की जाती हैतो मौजूदा इमारत, जिसे 2000-01 में एक सुंदर स्वास्तिक संरचना के रूप में बनाया गया था, विशेष रूप से एक प्रतिष्ठित डिजिटल मनुस्मृति पुस्तकालय के लिए समर्पित की जाएगी जहां उनका संरक्षण, संचयन और विश्लेषण किया जाएगा। नए परिसर में स्कूल में सभी कक्षाएं, सभागारऔर विभिन्न प्रयोगशालाएं होंगे, जैसे कि आयुर्वेद जीवविज्ञान, भाषा-शिक्षण के लिए भाषण प्रयोगशालाएं, कम्प्यूटेशनल भाषा विज्ञान और स्वर विज्ञान के लिए प्रयोगशालाएं आदि। जेएनयू वीसी प्रोफेसर जगदेश कुमार ने प्रोफेसर झा के साथ वित्त पोषण के लिए 300 अमीर दानदाताओंकी सूची तैयार की है और उन्हें लिखा है। झा ने स्वराज्य को बताया, “हमने जानबूझकर लोगों से पैसे मांगने के इस तरीके को अपनाया है क्योंकि एक बार जब आप अपना पैसा कहीं लगाते हैं तो आप उत्तरदायित्व और गुणवत्ता मानकों की भी मांग करते हैं।”

एसएसआईएस स्वयं को केवल ईंट-गारे से बनी कक्षाओं तक सीमित नहीं करना चाहता है। इसके अतिरिक्त यह ऑनलाइन पाठ्यक्रमों की पेशकश करके शिक्षा को लोकतांत्रिक बनाने की योजना बना रहा है। अकादमिक योग्यता मानदंडों को पूरा करने वाला कोई भी व्यक्ति, दुनिया भर से कहीं भी भारतीय पाठ्यक्रमों के लिए ऑनलाइन पंजीकरण करके जेएनयू से स्नातक कर सकता है। स्कूल ने संस्कृत में एमए ई-लर्निंग कोर्स शुरू कर दिया है, जिसके लिए किसी मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय से किसी भी डिग्री में स्नातक व्यक्ति प्रवेश परीक्षा बिना दिए बिना आवेदन कर सकता हैं और सरल तरीके से पाठ्यक्रम पूरा कर सकता है। जेएनयू की अकादमिक परिषद द्वारा संस्कृत से परास्नातक जैसे पाठ्यक्रम और कम्प्यूटेशनल भाषा-विज्ञान एवंपाली भाषा में सर्टिफिकेट अनुमोदित किए गए हैं। प्रोफेसर झा ने कहा, “हम 2019 में अगले सत्र से इन्हें शुरू करने का प्रयास कर रहे हैं। यह सुविधा अन्य क्षेत्रों में भी विस्तारित की जाएगी।”

अरिहंत स्वराज्य के डिजिटल कंटेंट मैनेजर हैं।