संस्कृति
कैसे एक कैथोलिक रूपांतरण ने भारतीय दंतकथा के उद्देश्य को किया नष्ट

प्रसंग
  • परमार्थ गुरु और शिष्यों के विचित्र कृत्यों का उद्देश्य आत्म-मूल्य और आत्म-परीक्षण की भावना को उद्दीप्त करना था, लेकिन इसे ईसाई मिशनरी द्वारा घृणित उद्देश्य के लिए चोरी से हड़प लिया गया था।

किसी समय की बात है, एक ‘गुरु’ हुआ करते थे जो कि एक मूर्ख थे। विडम्बना है कि उनका नाम था ‘परमार्थ गुरु’। उनके पांच शिष्य थे मत्ती (मंदबुद्धि), मादयन (मूर्ख), पेथाई (अज्ञानी) मूदन (पागल) और मिलेचन (अति मंदबुद्धि)। वे एक मठ में रहते थे और काफी समृद्ध थे।

एक बार एक यात्रा के दौरान उन्हें एक नदी पार करनी थी लेकिन उन्हें डर था कि यह उन्हें निगल जाएगी। इसलिए यह जांच करने के लिए कि नदी सो रही है या जाग रही है, सबसे पहले उन्होंने पानी को छूने के लिए एक जलती हुई छड़ी का इस्तेमाल किया और ‘हिस्स’ की आवाज आने पर नदी के सो जाने की प्रतीक्षा की। जब उन्होंने दुबारा गीली छड़ी का इस्तेमाल किया तो उन्हें कोई आवाज नहीं सुनाई दी। इसलिए उन्होंने निर्णय लिया कि अब नदी सो गयी है और उन्होंने नदी पार कर ली।

नदी पार करने के बाद उन्हें शंका हुई कि वे सभी जीवित हैं या नहीं। उन्होंने गिनती की। उनमें से जो व्यक्ति गणना कर रहा था हर बार उसने स्वयं को गिना ही नहीं इसलिए स्वाभाविक रूप से एक व्यक्ति कम हो रहा था। उन्होंने शोक प्रकट करना शुरू कर दिया और नदी को एक पवित्र भिक्षु को निगल जाने के लिए श्राप दिया। उसी समय एक पथिक ने उन्हें शोक मुद्रा में देखा और इसका कारण पूछा। जो उन्होंने जवाब दिया वह सब सुनने के बाद वह समझ गया कि ये सब मूर्ख हैं। उस पथिक ने उनसे कहा कि वह जानता है कि उस व्यक्ति को वापस कैसे लाया जाए और इसके लिए उसे पुरस्कार मिलना चाहिए। वे सहमत हो गए। अब उसने उन सबसे खड़े होने के लिए कहा और एक बेंत उठाया। उसने कहा कि जब वह उनमें से किसी को बेंत मारेगा तब उसे अपना नाम बोलना है। उसने सबसे पहले कठोरता से गुरु को मारा, जिसने कहा “मैं गुरु हूँ”, और पथिक ने जोर से चिल्लाकर गिनती की, “एक”। उसने बाकी सब के साथ ऐसा ही किया और उन्हें दिखलाया कि वे सभी जीवित हैं। गुरु और इसके शिष्य प्रसन्न हो गए और अपने साथ लाया हुआ सारा धन उसे दे दिया।

बहुत सारे तमिल लोगों ने इस कहानी को बचपन में पढ़ा होगा। उपर्युक्त उद्धरण ईस्ट इंडिया कम्पनी द्वारा नियुक्त किये गए पाखंडी प्रचारक कॉन्स्टैंटिन जोसेफ बेस्ची (1680-1742) द्वारा लिखे गए ‘गुरु परमार्थ एंड हिज़ डिसिपल्स’ से लिया गया है। वह सन् 1700 में गोवा आये थे और फिर दक्षिण भारत का रुख किया था जहाँ उन्होंने चंदा साहब के लिए काम शुरू किया, जो कि उस समय एकमात्र स्थानीय नवाब थे। जब मराठाओं ने चंदा साहब को पराजित किया तो बेस्ची और ज्यादा दक्षिण की ओर भाग गए। यही वह समय था जब उन्होंने मूर्खतापूर्ण कारनामों के संग्रह को संकलित किया और इन्हें एक मठ से सम्बंधित एक हिन्दू गुरु के मत्थे मढ़ दिया। साहित्य, विशेष रूप से बच्चों के लिए, में हास्य में एक अग्रणी गद्य के रूप में यह अदूरदर्शी तमिल लोगों के बीच काफी लोकप्रिय हो गया। आज भी, ‘परमार्थ गुरु’ नाम मूर्ख शब्द के समानार्थक है।

परमार्थ गुरु और उनके शिष्यों के मूर्खतापूर्ण कार्य बेस्ची की वास्तविक कल्पना नहीं थे। ईस्ट इंडिया कम्पनी के एक अधिकारी बेंजामिन बाबिंगटन ने 1822 में इन कहानियों का अंग्रेजी में अनुवाद किया। कहानी के अपने विश्लेषण में वह इन कहानियों के लिए इस स्रोत पर पहुँचे:

यह कहानी “द मैरी टेल्स ऑफ़ द वाइज मेन ऑफ़ गोथम” के सादृश्य है, जिससे हम निश्चित रूप से निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि यह उसी कहानी से ली गयी है या इस बात की ज्यादा सम्भावना है कि दोनों की उत्पत्ति कुछ उभयनिष्ठ रूप से तत्कालीन कहानी से हुई हो।

ईस्ट इंडिया कम्पनी अधिकारी, बेंजामिन बाबिंगटन

वाइज मेन ऑफ़ गोथम  की कहानी में विशेष भाग कुछ यूं है:

राजदरबारी ने कहा, ‘तुम कितने लोग थे’; उनमें से एक ने कहा, ‘ग्यारह’ और उसने खुद को नहीं गिना। राजदरबारी ने कहा, ‘ठीक है, तुम मुझे क्या दोगे और मैं 12 वें आदमी को ढूंढ दूंगा।’ राजदरबारी ने कहा, ‘मुझे पैसा दो, और पहले के साथ शुरू किया तथा उसके कंधे पर चाबुक मारा जिससे वह कराह उठा, और कहा ‘एक’।’ इसी प्रकार सभी के साथ ऐसा ही किया सभी कराह उठे। जब वह आखिरी व्यक्ति के पास आया तो उसने उसे अच्छा पैसा दिया और कहा ‘यहाँ है बारहवां आदमी’। ‘हमारे भाई को इस तरह ढूँढने के लिए, भगवान तुम्हारा भला करे।’

बेस्ची द्वारा वहां से रूपांतर का मामला निश्चित रूप से यथोचित स्थापित किया गया है। वाइज मेन ऑफ़ गोथम की कहानी तेरहवीं शताब्दी में इंग्लैंड के राजा द्वारा अपने शहर तक नई सड़क बनाने के प्रयास के खिलाफ गोथम शहर के लोगों के प्रतिरोध से उत्पन्न हुई। बाद की लोक परम्पराएँ कहती हैं कि शहर के लोग पागलपन का नाटक करते थे। जैसा कि उस समय ईसाईयों द्वारा पागलपन को संक्रामक माना जाता था, इसलिए राजा ने परियोजना को रोक दिया। उनकी ‘पागल हरकतें’ लोकप्रिय हो गयीं और 1540 में उन पर किताब लिखी गई। इस संग्रह के लेखक यात्री और चिकित्सक एंड्रयू बोर्डे (14 90-1549) थे। जाहिर है, इस कहानी का साहित्यिक प्रमाण सोलहवीं शताब्दी से पहले नहीं जा सकता है।

हालाँकि इस विशेष उपाख्यान की उत्पत्ति यूरोप में नहीं हो सकती है। शायद यह भारत में हुई हो। हिंदू अध्यात्मिक साहित्य और ईसाई जगत के साहित्य में इनके उपयोग के तरीके की तुलना में भी दोनों सभ्यताओं की मूल्य प्रणालियों के बारे में कुछ न कुछ प्रकट होता है।

पंचदासी एक अद्वैत वेदांत कृति है जिसे श्रृंगेरी शारदा पीठम् के 12 वें जगद्गुरु श्री विद्यानारायण और उनके उत्तराधिकारी श्री भारती तीर्थ द्वारा लिखा गया है। यह सन् 1386 से सन् 1391 के बीच लिखा गया था। किताब को पंचदासी इसलिए कहा जाता है क्योंकि इसमें प्रकरणों के 15 अध्याय हैं। प्रत्येक प्रकरण दर्शन का एक विशेष पहलू लेता है कि लेख इसे इस तरह सबल बनाता है और व्याख्या करता है कि यह छात्रों के लिए समझना आसान हो। पंचदासी के सातवें प्रकरण को ‘त्रिप्तिदीप प्रकरणम्’ कहा जाता है। यह सर्वोच्च संतुष्टि या पूर्ति, जो स्वयं की वास्तविक प्रकृति की अनुभूति पर उत्पन्न होती है, से सम्बंधित है। सभी प्रकरणों में से यह प्रकरण 298 श्लोकों के साथ सबसे बड़ा है। वे बृहदारण्यक उपनिषद (4.4.12) के एक श्लोक को समझाने के लिए हैं। इस अध्याय में नदी पार करने वाले 10 यात्रियों और फिर 10 वें व्यक्ति की मृत्यु पर शोक मनाने के उपाख्यान का वर्णन किया गया है।

प्रत्यक्ष ज्ञान और अप्रत्यक्ष ज्ञान दोनों के साथ-साथ ज्ञान और अज्ञानता एक ही समय में दसवें व्यक्ति के समान सर्वदा ज्ञात इकाई में मौजूद हो सकते हैं।

दसवां व्यक्ति स्वयं को 9 गिने जाने के कारण, साथ ही वह बाकी 9 को भी देखता है, डर के मारे अपने आपको 10 वें व्यक्ति के रूप में नहीं पहचान पाता।

यद्यपि 10 वाँ व्यक्ति होने के साथ वह 10 वें व्यक्ति, जिसे वह गायब मानता है, को ढूँढने में अपनी अक्षमता की घोषणा करता है। यह अज्ञानता का आवरण है।

वह 10 वें व्यक्ति के लिए शोक मनाता है और रोता है। अज्ञानता द्वारा पैदा हुए इस शोक और विलाप को बुद्धिमानों द्वारा विक्षेप कहा जाता है।

जब अच्छे इरादों वाला एक व्यक्ति मदद करने के उद्देश्य से शोक मनाने वाले व्यक्ति से कहता है कि 10 वाँ व्यक्ति मरा नहीं है इस अपरोक्ष ज्ञान को वह मानता है कि अपरोक्ष ज्ञान है।

जब उसे स्वयं को दसवां व्यक्ति गिनने पर प्रत्यक्ष ज्ञान प्राप्त होता है तो वह खुश होता है और शोक मानना बंद कर देता है। [अनुवाक्य 22-27]

इस प्रकार, एक तत्वज्ञान सम्बन्धी समस्या की स्पष्ट व्याख्या के लिए इस हास्यपूर्ण घटना का उपयोग करने के बाद पंचदासी के लेखक अध्याय में बाद में इस उपाख्यान का फिर से उल्लेख करते हैं:

यह सुनकर कि दसवां व्यक्ति मौजूद है, अप्रत्यक्ष ज्ञान परोक्ष ज्ञान है। लेकिन यह गलत नहीं है। इसी प्रकार महावाक्य ‘ब्राह्मण मौजूद है’ गलत नहीं है। अज्ञानता के कारण दोनों कथनों की छिपी हुई प्रकृति फिर से एक ही जैसी है।

इस कथन कि ‘तुम दसवें व्यक्ति हो’ के माध्यम से वह व्यक्ति विश्लेषण के मार्ग पर चला जाता है और गणना के माध्यम से वह अपने स्वयं के अनुभवी ज्ञान (अपरोक्ष ज्ञान) के माध्यम से सत्य तक पहुँचता है। इसी तरह कथन कि ‘आत्मा ब्राह्मण है’ के माध्यम से कोई गहन विश्लेषण के माध्यम से बिना किसी संदेह के प्रत्यक्ष ज्ञान पाता है, ‘आत्मा स्वयं ब्राहमण है’।

ज्ञान, कि वह दसवां व्यक्ति है, कभी भी अस्वीकार नहीं होता है। चाहे वह कतार में कहीं से भी शुरू करते हुए स्वयं इस तक पहुँचे, वह हमेशा इस पर पहुँचेगा कि वही 10 वाँ व्यक्ति है और फिर कभी भी 9 लोगों की मौजूदगी के संदेह में नहीं आएगा।

‘सारे अस्तित्व के उद्भव से पहले सत के रूप में अकेला ब्राह्मण’ का वैदिक कथन इस प्रकार ब्राह्मण का परोक्ष ज्ञान है, जिसे जब (एक मार्गदर्शक सिद्धांत के रूप में) गहन विश्लेषण के लिए लिया और उपयोग किया जाता है, तब यह ‘’तत त्वम् असि’ में ब्राह्मण का अपरोक्ष ज्ञान बन जाता है। [अनुवाक्य 57:61]

अतः यहाँ हमारे पास एक उपाख्यान है जिसका एक बच्चे से लेकर वयस्क तक कोई भी व्यक्ति आत्म-खोज तक ले जाने वाली प्रक्रिया के माध्यम से गुजरते हुए आनंद ले सकता है।

यदि इस कहानी ने 14 वीं शताब्दी के अंत में पंचदासी में प्रवेश किया था तो इसे स्थानीय दंतकथाओं के रूप में एक काफी लम्बे समय के लिए प्रचलित होना चाहिए था। संभवतः विजय नगर साम्राज्य के एक बड़ी ताकत के रूप में उदित होने और अनुवर्ती शताब्दियों में यूरोपीय व्यापारियों से संपर्क शुरू करने के साथ, इस तरह की कहानियाँ शायद पश्चिम तक पहुँच गईं होंगी।

फिर दो दशकों बाद कहानी को कैथोलिक मिशनरी बेस्ची द्वारा दुबारा गढ़ा गया लेकिन कुल मिलाकर इसका उद्देश्य भिन्न था। बहुत सारे कारण दिए गए हैं कि बेस्ची (या वीरामामुनी जैसा कि वह तमिलों के धर्मान्तरण के दौरान स्वयं को कहता था) ने यह किताब क्यों लिखी। अनुवादक बेंजामिन बाबिंगटन ने कहा कि कैथोलिक मिशनरी वास्तव में हिन्दू भिक्षुओं का मजाक उड़ा रहे थे। बाबिंगटन का समर्थन करते हुए याज्हापनम विश्वविद्यालय, श्री लंका के प्रोफेसर कुमारन इस्वरंथा पिल्लई व्याख्या करते हैं:

बेस्ची के समय के दौरान मठ धर्मान्तरण मिशनों के खिलाफ बड़ी बाधाओं के रूप में खड़े थे। मठों, जो चोलों के समय से ही मजबूत होने शुरू गए थे, ने नायक के समय में स्वयं को धार्मिक, आर्थिक, शैक्षिक गतिविधियों के केंद्र के रूप में स्थापित किया था। बेस्ची ने इन कहानियों के माध्यम से मठों के मुखियाओं और उनके शिष्यों पर निशाना साधा।

जबकि कुछ विद्वानों ने कहा है कि बेस्ची किसी अन्य इरादे के बिना केवल एक व्यंग्य के रूप में इसे पेश करना चाह सकते थे, वहीं अट्ठारहवीं शताब्दी में बच्चों की शिक्षा में शुरू की गई यह कहानी भारतीय संस्कृति और संस्थानों पर नकारात्मक प्रभाव डालती है। ऐसा इसलिए है क्योंकि कहानियों में न सिर्फ रचनात्मक कल्पना होने की अस्पष्टता है बल्कि एक विदेशी द्वारा भारत के अवलोकनों को दोहरा रही है। उदाहरण के लिए, यह कहानी धर्माध्यक्षों और उनके शिष्यों को अन्धविश्वासी मूर्खों और सामान्य भारतीयों को बेईमान धोखेबाजों के रूप में चित्रित करती है।

चेन्नई के इंस्टीट्यूट ऑफ एशियन स्टडीज की मदद से जॉन सैमुअल विपथगामी सिद्धांत (लेकिन अब तमिलनाडु में एक प्रसिद्ध ईसाई धर्म प्रचारक टूल) का समर्थन और प्रचार करते रहे हैं कि यह सेंट थॉमस थे जो पहली शताब्दी के बाद भारत में धार्मिक दर्शन, साहित्य और कला में सभी विकासों के लिए जिम्मेदार थे। तमिल सामाजिक इतिहास पर श्रृंखला, जिसमें वह (शू हिकोसाका और पी थियागराजन, 2000 के साथ-साथ) लेखक एन. सुब्रमनियन के साथ जनरल एडिटर थे, में यह दावा किया गया था कि हालाँकि बेस्ची द्वारा यह कहानी एक व्यंग्य थी लेकिन यह एक “आवश्यक सत्य” को भी दर्शाती थी कि “कैसे शैक्षणिक प्रक्रिया परमर्त्ता कुरु जैसे लोगों के हाथों में थी”। इस प्रकार कोई कह सकता है कि बेस्ची हिन्दुओं को अपने स्वयं के संस्थानों और धर्म प्रमुखों के बारे में हीनता और यहाँ तक कि नकारात्मक महसूस करने के अपने मिशन में सफल रहा था।

प्राथमिक विद्यालयों में तमिल बच्चे परमार्थ गुरु और कैथोलिक मिशनरी बेस्ची द्वारा तमिलों तक पहुंचाई गयी सेवाओं के साथ क्या सीखेंगे? यह बच्चे के दिमाग में एक साथ दो तस्वीरों को जन्म दे सकता है – कैथोलिक मिशनरी तमिल लोगों को प्रबुद्ध कर रही हैं और उनकी सेवा कर रही हैं, जबकि पारंपरिक तमिल हिन्दू मठों के मुखिया मूर्खतापूर्ण कार्य कर रहे हैं, लेकिन जनता, जो खुद बेईमान है, से सम्मान पाते हैं। दूसरे शब्दों में, यह कहानी आत्म-समालोचना की वाहक बन जाती है और सभ्यता हीनता के औपनिवेशिक बंधन प्राप्त करती है।

मूल रूप से हिंदू परम्परा का हिस्सा, वही कहानी न केवल आत्म ज्ञान प्रदान करने लिए उपयोग होती रही है बल्कि यह भी दिखाने के लिए उपयोग हुई है कि कैसे कहानी से सम्बद्ध प्राधिकारी का नाश होता है जब यह धीरे-धीरे किसी के व्यक्तिगत अनुभव का रूप ले लेती है। यहाँ पवित्र पाठ प्रत्यक्ष ज्ञान प्राप्त करने और ब्राह्मण के साथ किसी को स्वयं की पहचान की खोज करने के लिए केवल एक मार्गदर्शक है। इस प्रकार यह आत्म-मूल्य और आत्म-परीक्षण तथा सोच की भावना को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से एक दृष्टान्त है। यह एक उत्कृष्ट उदहारण भी है कि कैसे शिक्षा प्रदान करने और शिक्षा के अंतिम उद्देश्य को लेकर ईसाईजगत और हिंदू राष्ट्र में काफी भिन्नता थी।

अरविन्दन स्वराज्य में सहयोगी संपादक हैं।