संस्कृति
होली के गीतों का समृद्ध भंडार और विविधताएँ जिनकी जड़ें शास्त्रीय संगीत में हैं

भारत में होली गीत गायन की समृद्ध परंपरा रही है। मीरा बाई, पद्माकर से लेकर रसखान और आधुनिक हिंदी कवियों में भारतेंदु से लेकर निराला तक, सभी ने होलियाँ लिखी हैं। गीत हमारी संस्कृति के लोक-व्यवहार और आचार-विचार से इस प्रकार गूँथे हुए हैं कि वे जीवन का एक अनिवार्य अंग बन गए हैं।

वास्तव में यह भावाभिव्यक्ति का एक सशक्त माध्यम भी हैं जो पीढ़ियों के अनुभवजन्य विचारों का शब्दांतरण स्वरूप हैं। इनमें धरती की महक है। पर्वतों से उतरते झरनों की चंचलता है। सागर की उत्ताल तरंगों का उल्लास है। प्रकृति की सुंदरता का सम्मोहन है।

प्रत्येक ग्रामीण अंचलों में होली समूह में गाई जाती है और लोगों को कंठस्थ है। वह जिस शास्त्रीय राग में है उसी में या उसके आसपास रहते हुए गाई जाती है और उसी के रस रंग की सृष्टि करते हैं। यह लोक तथा शास्त्रीय के बीच एक अदृश्य पुल का काम करती है। उसमें भक्ति भी है और संगीत भी, रस भी है और रंग भी,  वियोग भी है और संयोग भी उल्लास भी है और उमंग भी।

ज्यों-ज्यों होली का पर्व समीप आता है इन संगीत गोष्ठियों का रंग तथा उल्लास और गहरा होता चला जाता है। मृदंग, झांझ, ढफ की थापों पर सब थिरक रहे हैं। रंग-गुलाल उड़ रहा है, सब हिल-मिलकर फाग खेल रहे है। अबीर और गुलाल की खुमारी लिए गायकों की टोली दोपहर बाद गम्मत के लिए जमती है, बिना रंग झरे ही रस की वर्षा से सारा वातावरण सराबोर हो जाता है।

मधुमास के नीलगगन की उज्जवलता कब सिंदूरी होकर सुरमई हो जाती है इसका भान किसी को भी नहीं होता। होली के गीत अपने दामन में इन्हीं सारी खूबियों को समेटे होते हैं। भाव तथा बंदिश की दृष्टि से यह संगीत अपनी विविधता में अनूठा है।

होली की गम्मतों की अपनी अलग और अनूठी शब्दों और भावों की सुंदर कसीदेकारी होती है, शैली होती है। गायन का एक क्रम होता है। प्रारंभ में गंभीर तथा विलंबित तालों पर गाए जाने वाले काफी, पीलू आदि रागों का गायन होता है।

गंभीर रागों के साथ हल्की-फुल्की रचनाओं का दौर भी चलता है जो गम्मत को गति प्रदान करती हैं। इन होली गीतों में उत्सव है, शिकायतें हैं, हास-परिहास है, भक्तिभाव है। इन गीतों की भाषा, इनमें बैठा रस, इनकी गहरी उदासी और कविता में उत्सर्ग की भावना अचानक हमको बहुत गहरे तक छू सकती है और हमको भीतर से उजला और पवित्र बना सकती हैं।

संगीत, सौंदर्य का साकार और सजीव चित्र होता है और गीत, शास्त्रीय संगीत की जीवन धारा। फाग इन गीतों में अपनी सभी कलाओं के साथ उपस्थित है और बिखरा है चारों ओर होली का उल्लास। रस, भाव, छंद की विविधता तथा भाषा का सौष्ठव इनमें देखते ही बनता है।

अपनी विविधता तथा समृद्धि के कारण यह भंडार अमूल्य तथा दुर्लभ है। शब्द स्वर तथा भावों के सुंदर समन्वय ने इसमें अद्भुत सम्मोहन भर दिया है। इसलिए कला मर्मज्ञ इसके प्रति सदा से ही आकर्षित होते रहे हैं। एक-एक पद सुंदरता का नमूना है जैसे किसी मूर्तिकार ने मिट्टी में प्राण फूँक दिए हों।

ब्रज के अधिकतर होली गीत भगवान कृष्ण की लीलाओं पर केंद्रित होते हैं। वहाँ भगवान कृष्ण के विविध रूप हैं, राधा और गोपियाँ हैं, संयोग और वियोग है, प्रेम और विरह है और हैं प्रकृति की अनुपम छटाएँ। मर्यादा पुरुषोत्तम राम इन होलियों में कम ही दिखाई देते हैं लेकिन समय के साथ-साथ लोक चेतना ने उन्हें भी होली के उत्सव में शामिल कर लिया है।

शास्त्रीय संगीत की जड़ें लोक संगीत में है। यही वजह है कि लोक संगीत में कई बार शास्त्रीय राग रागिनियों का पुट मिल जाता है। लोक गीतों में संगीत के अलावा भाषा का भी अपना ही एक अलग रस होता है। रस और माधुर्य से सराबोर यह भाषा शताब्दियों से कविता और छंद की भाषा कही जाती है। ठुमरी, दादरा, चैती जैसी उप शास्त्रीय गायन शैलियों को इसने अद्भुत सुंदरता प्रदान की है।

भाषाओं की इस विविधता और सौंदर्य को बचाना भी हमारा काम होना चाहिए। थोथी आधुनिकता के शोर-शराबे के बीच अब इन लोक गीतों का माधुर्य लुप्त होने लगा है। कला में रचनात्मक स्फूर्ति के लिए, नवीनता के लिए और सौंदर्य के लिए हमें अपने लोक कलाओं के पास जाना ही चाहिए। उनके सतत पुनः अवलोकन और उनसे आत्मीय संवाद की जरूरत हमेशा बनी रहेगी।