संस्कृति
होली का मानवतावाद- बाल मन पर न लगाएँ प्रतिबंध
Aloy Buragohain - 20th March 2019

आशुचित्र-

  • इस होली हम अपने बच्चों को सभी मतभेदों और पूर्वधारणाओं से मुक्त करें।
  • क्या विज्ञापन उद्योग सुन रहा है?

यशोदा के चंचल पुत्र बाल कृष्ण फागुन मास के एक दिवस पर अस्वाभाविक रूप से स्थिर होकर शांत यमुना के तट पर बैठे थे। अपने उदास पुत्र को देखकर यशोदा ने कान्हा से कारण पूछा। कृष्ण की आँखों में भोलेपन की चमक थी। उन्होंने कहा, “हे मैया यशोदा। मेरे रंग को देखो। नीलम से भी साँवला है और मेरी प्रिय राधा कितनी गोरी है। वह सबसे गोरी है। मैं उसके जितना गोरा क्यों नहीं हो सकता?”

अपने पुत्र के भोले प्रश्न से प्रभावित होकर यशोदा ने मुस्कुराकर कान्हा को सुझाया कि वे रंग लगाकर राधा के रंग को बदल सकते हैं। ऐसा माना जाता है कि होली पर प्रियजनों को रंग लगाने की प्रथा राधा और कृष्ण की इस दिव्य गाथा से शुरू हुई।

मुझे जो प्रभावित करता है वह इस संदेश की सरलता और इसके बावजूद उत्कृष्टता है। माता-पुत्र के वात्सल्य के साथ-साथ इसमें हिंदू जीवन-शैली के भी एक आयाम को उजागर किया गया है- वह है मानवतावाद। औपनिवेशिक यूरोपीय तर्क दृष्टि से हिंदू विचार को प्राचीन यूनानी धर्म की तरह रहस्यमयी, अलौकिक और वैश्विक समस्याओं का समाधान माना गया।

इसके आध्यात्मिक आधार के महत्त्वपूर्ण भाग- मानवतावाद को नज़रअंदाज़ किया गया और समय के सात भुला दिया गया। हिंदू विचार में भी तर्क है, गंभीरता है और तत्व की खोज है। लेकिन चेतना की उन्नति के साथ-साथ मनुष्य दैनिक जीवन की वास्तविकताओं के अर्थ भी समझने लगता है। बाल कृष्ण के बालमन की ईर्ष्या, यशोदा का वात्सल्य और राधा का सौंदर्य, ये सभी दैवीय नहीं बल्कि मानवीय प्रवृत्तियों की अभिव्यक्ति हैं। और इनमें सबसे मानवीय अभिव्यक्ति यशोदा का क्षणिक समाधान है जो वह कृष्ण को सुझाती हैं।

अपने पुत्र की व्याकुलता को शांत करने के लिए यशोदा स्त्री और पुरुष के अंतर का सहारा ले सकती थीं जैसा कि हम आज की उपभोक्तावादी संस्कृति में देखते हैं कि पुरुषों में साँवले रंग और महिलाओं में गोरे रंग को श्रेष्ठ माना जाता है। वे यह तक कह सकती थीं कि एक युवती के लिए अपनी त्वचा उजागर कर उसके पुत्र जैसे भोले लड़कों को बिगाड़ना गलत है। वे माखन से कृष्ण का ध्यान भी इस बात से हटा सकती थीं।

तत्वमयी भारतीय माँ होने के कारण वे और अधिक अनुमानित प्रयास कर सकती थीं, वे अपने पुत्र को दूध पीने (संभवतः हॉरलिक्स क साथ) के लिए कहतीं जिससे उसका रंग गोरा हो जाएगा, और निस्संदेह टॉलर (लंबा), स्ट्रॉन्गर (बलपूर्ण) और शार्पर (चतुर)। लेकिन तर्क में उलझाने, उपदेश देने, पीछे हटने या मामले को नज़रअंदाज करने की बजाय उन्होंने कृष्ण से एक सरल कार्य करने को कहा, राधा को रंग लगाने को, भले ही यह क्षणिक हो लेकिन कान्हा की ईर्ष्या भी तो क्षणिक ही थी। इसी प्रकार दूसरे मनुष्यों से मिलने, बातचीत करने और विचार साझा करने से ही हमारे मनोवैज्ञानिक अवरोधकों का खंडन होता है।

यदि होली एक प्रकार से विविधता का उत्सव है तो इसके ये रंग हमें इसमें समानता का दर्शन देते हैं। और इसी विचार के साथ पुराने समय से चले आ रहे हँसी-मज़ाक और लुका-छुपी का केल आज भी देखा जाता है। अन्य शब्दों में कहें तो हिंदू जीवन-शैली की यह जीवंतता, कभी न खत्म होने वाली व्यस्तता और मनुष्यों के संसार न कि स्वर्गलोक से इसका संबंध इसे विशिष्ट बनाता है।

हाल ही में सर्फ एक्सल ने होली विशेष एक विज्ञापन प्रसारित किया था जिससे लोग व्याकुल इसलिए हुए क्योंकि यह हिंदू विचार के इस मानवीय आधार पर वार करता है। इसकी शुरुआत में एक लड़की होली के दिन आवासीय कॉलोनी में साइकल चलाते दिखाई देती है और खुद पर रंगों के हमलों को प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार करती है और इतना कि हिंदू बच्चों के रंग खत्म हो जाते हैं। और उसके इस बलिदानी सक्रियता का कारण क्या है? बस यह कि उसका एक मुस्लिम मित्र नमाज़ के लिए मस्जिद जा सके और उसके टाइड से भी सफेद, सर्फ एक्सल से धुले कपड़े रंगों में सने हिंदू मित्रों (?) के द्वारा गंदे न हों।

ये हिंदू बच्चे इतने खतरनाक और अविवेकी हैं कि उनके रंग खत्म होने के बावजूद भी इस साहसी एक्टिविस्ट हिंदू लड़की को उस मुस्लिम बच्चे को साइकल पर मस्जिद छोड़ना पड़ा जिससे उसे सुरक्षित रखा जा सके। इसकी सांप्रदायिकता को कम करने के लिए अंत में एक भाग जोड़ गया है जिसमें मस्जिद की सीढ़ियों से लड़का बोलता है “नमाज़ पढ़कर आता हूँ” (जैसे हमें तो पता ही नहीं था) और लड़की कहती है, “बाद में रंग पड़ेगा”। और इसके बाद बहुप्रतीक्षित व्यावसायिक टैगलाइन आती है, “अपनेपन के रंग से औरों को रंगन में दाग लग जाएँ तो दाग अच्छे हैं।”

इस पूरे विज्ञापन में होली के जीवंत मानववाद के विपरीत रंगों को कलहपूर्ण और विवादपूर्ण दिखाया गया है और दाग माना है जिसे सिर्फ सर्फ एक्सल ही धो सकता है। और ध्यान दें कि ये दाग अच्छे तब ही हैं जब इन्हें इस्लाम के दायरे से बाहर रखा जाए जैसा कि हमारी साहसी ‘सेक्युलर’ लड़की चाहती थी। लड़की के अंतिम कथन के अनुसार ये दाग मुस्लिम मित्र पर भी लगाए जा सकते हैं लेकिन शर्तों के साथ, केवल नमाज़ के बाद।

जैसे कि अविवेकी, समानुभूति न रखने वाले हिंदू बच्चों ने ऐतिहासिक रूप से मुस्लिम पड़ोसियों के धार्मिक क्रियाकलापों में व्यवधान डाला हो। (और इस प्रकार विभाजन जैसी “ऐतिहासिक राहत” को सही ठहराना?) एक बार एक प्रबुद्ध व्यक्ति (जैसे हमारी सेक्युलर लड़की) काफिरों की सांकेतिक मोह-माया से मुक्त होकर मस्जिद की चौखट पर पहुँचती है, तो अपनेपन का एकमात्र रंग सफेद ही है, अपनी पूरी शुद्धता के साथ।

इस विज्ञापन का अचेतन संदेश होली के संदेश से पूर्णतः विपरीत है क्योंकि वहाँ रंग मतभेद भुलाकर लोगों को निकट लेकर आते हैं, न कि उनके बीच कलह उत्पन्न करते हैं। जो और चिंताजनक है, वह यह है कि इसमें कोई भयावह एजेंडा भी निहित हो सकता है जिसमें बच्चों का उपयोग सांप्रदायिक विवाद खड़ा करने के लिए किया जा रहा हो। अगर विज्ञापन निर्माताओं का उद्देश्य मात्र रंगों के माहौल में सफेदी बचाए रखने के लिए सर्फ एक्सल के उपयोग को बढ़ावा देना था तो उन्होंने एक हिंदू श्रद्धालु को क्यों नहीं दिखाया। आखिरकार, होली पर भी, अधिकांश हिंदू बिना रंग लगे कपड़ों में मंदिर जाते हैं। क्यों जानबूझकर धर्मों के बीच विवाद दिखाना जबकि इसकी आवश्यकता थी ही नहीं।

इस विज्ञापन से विज्ञापन उद्योग के नैतिक पतन के साथ-साथ जो सबसे ज़्यादा ुभने वाली बात है, वह यह है कि राजनीतिक-पूंजीवादी एजेंडा के लिए बच्चों का उपयोग किया जा रहा है। वास्तव में बचपन ही भोलेपन का आखिरी गढ़ बचा है। चाहे वह उनकी हँसी में हो या उनकी भूख में, अगर मानवता है तो बच्चे ही हमारी साझा मानवता का स्पष्ट प्रतिबिंब हैं।

हम तर्कयुक्त वयस्कों ने इस पूरी धरती को इतनी कुशलतापूर्वक विभाजित किया है कि अपक्षपातपूर्ण दृष्टि सिर्फ बच्चे की ही होती है, जो न किसी धर्म को देखता है, न देश को। संभवतः यही भोलापान था जो मैया यशोदा ने उस दिन यमुना तट पर भगवान कृष्ण की आँखों में देखा होगा और उसे अपनी चहेती राधा से व्यवहार के लिए उकसाया, न कि उसके कोमल मन पर कोई गतिहीन तर्क थोपा।

होली की गाथा से संबंधित पुनः एक भोलेपन का किस्सा प्रह्लाद का है जो जलती चिता पर अपनी बुआ की गोदी में बैठ गया और उसे ईश्वर ने बचाया। प्रह्लाद की कहानी हमें याद दिलाती है कि एक बच्चे का भोलापन कितना निर्मल है और इसका दुष्प्रयोग अस्वीकार्य। इस बात में कोई संदेह नहीं कि भगवान विष्णु ने सबसे भयंकर अवतार नरसिम्हा प्रह्लाद की उसके पिता हिरण्यकश्यपु से रक्षा के लिए लिया था।

समय के साथ हम जैसे-जैसे बड़े हो रहे हैं हमें एक त्रासदी का भान हो रहा है- सामाजिक मानक, चाहे आयु, लिंग या धर्म के कारण हमारा कार्यक्षेत्र सीनित हो रहा है। कुछ चीज़ें जो मैं पहले बिन सोचा-समझे कर लेता था जैसे दूसरे धर्मों के त्यौहारों को मनाना, दूसरे लिंग के लोगों का हाथ पकड़ लेना या ऐसे ही गाना गाने लग जाना, वे समय के साथ एक ठोस अर्थ ग्रहण कर रही हैं।

भाग्यवश बच्चे इन सीमाओं को नहीं समझते हैं। वे अभी भी वह कर सकते हैं जो हम वयस्क नहीं कर पाते हैं। धर्म के नाम पर उनसे यह स्वतंत्रता न छीनें जिसपर उनका अधिकार है। इस होली एक बार अपने बच्चों को सभी मतभेदों और पूर्वधारणाओं की संकीर्ण दीवारों से मुक्त करें जो हमने आसपास बना ली हैं और उन्हें दौड़ने दें, बेहतर होगा कि उड़ने दें स्वतंत्रता के स्वर्ग में जहाँ न ईश्वर और न कोई और उन्हें ढूँढ सके।