संस्कृति
हिंदुत्व का गढ़ क्या है व मीडिया इसे भाजपाई क्षेत्र का पर्याय मानकर कैसे गलती कर रहा है

पत्रकार कभी-कभी अज्ञानता में और कभी-कभी धूर्तता में अमूमन ही भाजपा-आरएसएस के प्रभाव वाले क्षेत्रों को ‘हिंदुत्व का गढ़’ साबित करने हेतु उत्तेजित रहते हैं। पहले केवल गुजरात के लिए लिखा जाता था लेकिन अब जैसे-जैसे भाजपा का प्रभाव बढ़ा वैसे-वैसे मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र और दूसरे राज्यों के लिए भी ‘हिंदुत्व का गढ़’ उपयोग में लिया जा रहा है।

ऐसे में हमारे लिए आवश्यक है कि इस संदर्भ में पहले तो हम ‘हिंदुत्व’ क्या है समझें और फिर ‘हिंदुत्व का गढ़’। हिंदुत्व शब्द की व्याख्या करते हुए सावरकर लिखते हैं-

“आज इस नाम के अभिप्राय की जो अभिव्यक्ति है, वह इसे 40 शताब्दियों में उपलब्ध हुई है। अनेक महानतम योद्धा तथा दार्शनिक व कविगण और विधिनिर्माता शास्त्रों के प्रकांड पंडित इसी नाम का संघर्ष करते रहे हैं और उसके लिए संग्राम ही नहीं किया अपितु सर्वस्व भी समर्पित किया है। वस्तुतः हिंदुत्व केवल शब्द मात्र ही नहीं अपितु अपने-आप में एक संपूर्ण इतिहास ही है।”

इस प्रकार ‘हिंदुत्व का गढ़’ का अभिप्राय हमारी सभ्यता के कोरे धार्मिक, आध्यात्मिक तथा सामाजिक इतिहास के प्रतीक-स्थान के रूप में होना चाहिए। लेकिन आश्चर्य है कि वर्तमान में इसे केवल राजनीतिक चश्मे से ही देखा जा रहा है।

पिछले चुनावों के पहले राजदीप सरदेसाई ने कहा था कि गुजरात में भाजपा ही जीतेगी और अपने तर्कों में उनका सबसे बड़ा तर्क था, ‘क्योंकि गुजरात हिंदुत्व का गढ़ है।’ वहीं चुनावों के बाद बीबीसी ने अपनी एक स्टोरी को शीर्षक दिया था “अहमदाबाद का खड़िया जो ‘हिंदुत्व का गढ़’ हुआ करता था, वहाँ कांग्रेस कैसे जीत गई?”

प्राचीनता का अबोध

हिंदुत्व को समझाते हुए सावरकर इस संस्कृति की प्राचीनता पर भी विशेष बल देते हैं। वे लिखते हैं कि “हिंदू शब्द इतना अधिक प्राचीन है कि प्राचीन गाथाएँ भी इसके मूल की खोज कर पाने में समर्थ नहीं हैं।”

शीर्षकों को चटपटा बनाने की होड़ में प्रतिदिन बनते-बिगड़ते इन ‘हिंदुत्व के गढ़ों’ में प्राचीनता का अबोध स्पष्ट देखा जा सकता है। और यही कारण है कि आज ‘हिंदुत्व का गढ़’ जैसे शब्दों का प्रयोग काशी, कांची, हरिद्वार, प्रयाग, अयोध्या, उज्जैन, द्वारिका की तुलना में राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में फिट बैठते क्षेत्रों के साथ अधिक होने लग गया है।

इस विषय पर बात करते हुए हुए साँची बुद्धिस्ट-इंडिक स्टडीज़ की कुलपति नीरजा अरुण गुप्ता का कहना है कि “वर्तमान समय में ‘हिंदुत्व का गढ़’ इसे एक पोलिटिकल टर्म बना दिया गया है। पहले हिंदू वोट बँटे हुए थे लेकिन अब जब इकट्ठा हो रहे हैं तो उस क्षेत्र को ‘हिंदुत्व का गढ़’ कह दिया जाता है जोकि सही नहीं है।”

वहीं दूसरी ओर सनातन संस्कृति के जो क्षेत्र वास्तविक रूप से ‘हिंदुत्व का गढ़’ कहलाने के दावेदार हैं उनके साथ तो मानों कुछ अलग ही खेला चल रहा है।

अयोध्या के लिए कहा जाता है कि इसे भगवान ‘मनु’ ने बसाया था और वेदों में इसकी संपन्नता की तुलना स्वर्ग से की गई है। यहाँ सूर्यवंशी राजाओं का शासन हुआ करता था, भगवान् श्रीराम ने भी यहीं अवतार लिया था। ऐसे क्षेत्र को जहाँ आधिकारिक तौर पर ‘हिंदुत्व का गढ़’ कहा जा सकता है, वहाँ तो ‘गंगा-जमुनी तहजीब’ की मिसाल पेश करने की कवायद चल रही है। और यही हाल काशी, मथुरा जैसे दूसरे शहरों का भी है।

दक्षिण भारत

आधुनिक युग के महानतम कवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ अपनी पुस्तक ‘संस्कृति के चार अध्याय’ में दक्षिण भारत को ‘हिंदुत्व का गढ़’ के रूप में वर्णित करते हैं।

इतिहास में झाँकें तो भक्ति आंदोलन का बीज बोने वाले अलवार-नयनार संत यहाँ से थे, हिंदू धर्म को फिर से खड़ा करने वाले शंकराचार्य यहाँ से थे, विशिष्टाद्वैतवाद के प्रवर्तक रामानुजाचार्य यहाँ से थे, द्वैतवात का सिद्धांत देने वाले माधवाचार्य यहाँ से थे, ऐसे में दक्षिण भारत के क्षेत्रों को भी यथार्थ रूप से ‘हिंदुत्व’ का गढ़’ की संज्ञा दी सकती है।

लेकिन शायद ही आपने कभी पढ़ा हो कि किसी पत्रकार ने केरल अथवा कालडी के लिए ‘हिंदुत्व’ का गढ़’ उपयोग में लिया हो! इसके इतर चूँकि केरल में वामपंथ की सरकार है इसलिए वे इसे ‘वामपंथ का गढ़’ बताते हैं।

दिनकर लिखते हैं “मुसलमानी आक्रमण के पहले भी उत्तर भारत की जनसंख्या में बाहरी मिलावट बहुत अधिक हो चुकी थी, जिससे खाँटी हिंदुत्व धीरे-धीरे खिसककर दक्षिण की ओर जा रहा था। यही कारण है कि शंकराचार्य के आस-पास के समय भारत में जो धार्मिक उत्पीड़न हुए, उनकी संख्या भी उत्तर में कम और दक्षिण में बहुत अधिक रही। गुप्त राजाओं ने वैदिक धर्म के लिए जो आरम्भ में उत्साह दिखाया उसके बाद वह उत्साह दक्षिण के ही राजाओं में दिखाई पड़ता है।”

कदाचित यही कारण है कि प्रारंभ में दूसरी शताब्दी से लेकर 15वीं शताब्दी तक एक के बाद एक संत-आचार्यों ने दक्षिण भारत में ही जन्म लिया और उन्होंने भारत की धार्मिक एवं सामाजिक चेतना के पुनर्जागरण में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया।

भक्ति द्रविड़ उपजी लाये रामानन्द
प्रगट करी कबीर ने, सप्त दीप नवखण्ड।

हिंदी के इस प्रसिद्ध दोहे में भी भक्ति की उपज का श्रेय दक्षिण भारत को दिया गया है जहाँ से रामानंद इसे उत्तर भारत में लेकर आए थे और फिर उनके कबीर, रैदास, पीपा, धन्ना, जैसे शिष्यों ने इसे समूचे भारत में फैला दिया।

लेकिन फिर भी आश्चर्य है कि दिल्ली के पत्रकारों के हवाले से कभी भी दक्षिण भारत के लिए ‘हिंदुत्व का गढ़’, ऐसा कुछ पढ़ने में नही आता! इसका स्पष्ट कारण है कि उन्होंने ना कभी हिंदुत्व को समझा है, ना उनमें समझने का सामर्थ्य है!