संस्कृति
विरासत पर विवाद – अमेरिका पुरानी वस्तुएं लौटाने को तैयार लेकिन भारत में अभी भी घपलेबाजी
विरासत पर विवाद – अमेरिका पुरानी वस्तुएं लौटाने को तैयार लेकिन भारत में अभी भी घपलेबाजी

प्रसंग
  • जिन मूर्तियों को वापस करने के लिए अमेरिकी सरकार ने दो साल पहले ही हामी भर दी थी उसको वापस लाने में एएसआई ने इतना समय क्यों लगा दिया?

समाचार रिपोर्टों के अनुसार भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग, दिल्ली की एक उच्च स्तरीय टीम पुराने समय की 180 वस्तुओं को वापस लेने के लिए अमेरिका जाएगी। पुराने समय में इन वस्तुओं को भारत से तस्करी करके ले जाया गया था। यह उन्हीं मामलों में से एक है जहाँ एक पश्चिमी देश ने सहयोगी रवैया अपनाते हुए भारत से तस्करी की हुई पुरानी कलाकृतियों को वापस करने की इच्छा जताई है। तो वहीं दूसरी तरफ भारतीय अधिकारी इसको लेकर ज्यादा उत्साहित नहीं दिख रहे हैं।

इन 200 पुरानी वस्तुओं को वापस करने का पहला प्रस्ताव करीब दो साल पहले प्राप्त हुआ था। उस समय अमेरिकी सरकार ने 12 पुरानी वस्तुएं भारत को देकर बाकी 100 मिलियन अमेरिकी डॉलर की पुरानी कलाकृतियाँ वापस करने की मंशा जाहिर की थी। यह वही संग्रह है जिसे एएसआई अब वापस लाने को प्रस्तावित है। यह पूरा इंतजाम करने में भारतीय अधिकारियों ने ज्यादा नहीं तो करीब 24 महीनों का समय लगाया है।

पुराने समय में भारतीय अधिकारियों ने इसपर या तो धीमी प्रतिक्रिया दी है या काम ही गलत किया है। चर्चित ब्रह्मा ब्रह्मणी मामले में भी एएसआई ने तस्करी की हुई संदिग्ध वस्तु को पहले तो नकली बताया दिया था। विभाग का यह फैसला और जांच-पड़ताल बहुत ही कमजोर और घटिया आधार पर की गई थी। स्वयंसेवकों ने विशेषज्ञों की राय पर आपत्ति जताई और फिर मामला विवादित होते देख विशेषज्ञों की एक समिति का गठन किया गया जिसमें मूर्ति को असली पाया गया। तब यह मूर्ति भारत को वापस लौटा दी गई थी।

जाना माना कपूर मामला इस बात का जीता जागता उदाहरण है कि आधिकारिक कामचोरी और लाल फीताशाही किस तरह से एक निष्पक्ष जाँच को तबाह कर देते हैं। इस मामले का नतीजा यह हुआ कि अब 180 वस्तुओं को वापस लाना है।

सुभाष कपूर को अक्टूबर 2011 में इंटरपोल की रेड कॉर्नर नोटिस पर जर्मनी में गिरफ्तार कर लिया गया था और 2012 में अमेरिकी नागरिक होने के बावजूद भी उसे भारत को सौंप दिया गया था। अप्रैल 2015 में आन्तरिक सुरक्षा विभाग ने औपचारिक रूप से कपूर को आरोपी ठहराते हुए कुछ चौंकाने वाले खुलासे किए। अमेरिका में कपूर के ‘आर्ट ऑफ पास्ट’ के 12 ठिकानों पर छापेमारी में 108 मिलियन अमेरिकी डॉलर की कीमत की 2622 मूर्तियों को बरामद किया गया था। (आप आज के रुपयों में इसकी गणना करके कीमत निकाल लें)

संरक्षकों को इसकी सत्यता की जाँच करने के लिए साढ़े तीन साल क्यों लग गए?

इन कलाकृतियों को किसी ऐसे व्यक्ति के हाथों भारत को सौंपा जा रहा है जो मूर्तियों की अवैध तस्करी के लिए खुद अमेरिकी अदालत में दोषी है, जिसके आधार पर भारत को नेशनल गैलरी ऑफ आस्ट्रेलिया, आर्ट गैलरी ऑफ न्यू साउथ वेल्स, एशियन सिविलाइजेशन म्यूजियम-सिंगापुर, जर्मनी के लीडन म्यूजियम और अमेरिका के कई संग्रहालयों सहित ओहियो में तोलिदो संग्रहालय और हार्न म्यूजियम ऑफ आर्ट को 20 से अधिक मूर्तियाँ वापस करनी पड़ी। (या इसको स्वैच्छिक वापसी कहनी चाहिए, जैसा कि विभाग कहना पसंद करता है)।

तो वास्तव में क्या हो रहा है?

2015 की बात करते हैं जब यह मामला पहली बार प्रकाश में आया और अमेरिकी अधिकारियों द्वारा जब्त की गई चीजों के रिकार्ड को सार्वजनिक कर दिया गया।

एक विस्तृत वस्तुसूची और प्राचीन कलाकृतियों की तस्वीरें अदालत में दर्ज की गईं और अब वे सार्वजनिक अधिकार क्षेत्र में हैं। विभाग में विशेषज्ञता की कमी और कुल मिलाकर अंतर्राष्ट्रीय तथा राष्ट्रीय विशेषज्ञों, जो निश्चित रूप से वस्तुओं की पहचान करते हैं, की कमी को ध्यान में रखते हुए किसी ने अभिग्रहण की गई वस्तुओं की त्वरित समीक्षा करने के लिए विभाग द्वारा एक उच्च स्तरीय समिति बनाए जाने की उम्मीद की होगी। इस पर, जब मैंने जून 2016 में बेंगलुरु में आयोजित एक कार्यशाला में एएसआई के विभिन्न अधिकारियों से मुलाकात की, तो विभाग के मंडल और क्षेत्र अधिकारी इस तरह के अभिग्रहण से अनजान थे।

आपको फिर से बताता हूँ- हम 2015 में हुए कपूर लूट और अभिग्रहण के बारे में जानते हैं; जब्त किए गए सामान सार्वजनिक रिकॉर्ड का हिस्सा हैं; और 2016 में, एएसआई के क्षेत्रीय अधिकारियों को अभिग्रहण के बारे में जानकारी नहीं थी।

जैसा कि कपूर ने इस बात को उजागर कर दिया था, अभिग्रहण की गंभीरता और लूट के परिमाण को ध्यान में रखते हुए और अभिग्रहण सूची और तस्वीरों पर एक नजर डालने से यह स्पष्ट था कि लगभग हर राज्य लूट का भागीदार था।

यह सूची को व्यापक रूप से प्रसारित करने का मौका था और यहां तक कि गवाहों और विशेषज्ञों के लिए भारत से तस्करी की गई वस्तुओं की पहचान करने के लिए स्थानीय प्रेस में विज्ञापन भी दिए गए थे। इसके बावजूद भी ऐसा कुछ नहीं हुआ।

अभिग्रहण में वे वस्तुएं थीं जिनका मिलान हमने एएसआई के संग्रहालय से बाहर निकाली गईं कलाकृतियों से किया- हम आंध्र प्रदेश से चंदवारम वस्तुओं के साथ अत्रू, नगदा, करी तलई और अन्य के बारे में पहले से ही जानते हैं।

वास्तव में, सबसे दुखद मामला भरहुत याक्षी का था, जो मध्य प्रदेश के सतना में एक किसान द्वारा पंजीकृत की गई एक पुरानी शिल्पकृति थी जो 2004 में चोरी हो गई थी। कपूर ने 15 मिलियन डॉलर में यक्षी की बिक्री कर दी थी। यदि इस शिल्पकृति को फिर से वापस लाया जाए तो केवल यही दुनिया में आज तक की सबसे महंगी कलाकृति होगी।

समझ की कमी और इस अपराध के सभी अधिकारियों -तस्करी गिरोह की तलाश करना इस पूरे प्रकरण का सबसे दुखद हिस्सा है। अभिग्रहण के एक साधारण विश्लेषण से खुलासा हुआ है कि 2,622 में से 34 मामले तमिलनाडु से संबंधित हैं। तमिलनाडु में कपूर के खिलाफ केवल पांच मामले हैं और चंदवारम एएसआई स्थल से वापस आई वस्तुओं सहित अन्य राज्यों के मामलों में उसे पकड़ने का एक भी प्रयास नहीं किया जा रहा है।

जहां तक हम जानते हैं कि राजस्व खुफिया निदेशालय (डीआरआई) द्वारा मुंबई, दिल्ली, कोलकाता, राजस्थान और अन्य हवाई अड्डों से कपूर के आर्ट ऑफ पास्ट और निम्बस को निर्यात किए गए शिपमेंन्ट के लिए ईडीआई (इलेक्ट्रॉनिक डेटा इंटरचेंज) डेटा को सुरक्षित करने के लिए कोई प्रयास नहीं किया गया है। कस्टम डेटा अब ईडीआई पर उपलब्ध है जिस तक आसानी से पहुंचा जा सकता है, और यह प्राप्त करना और देखना कि किस अधिकारी ने इन पर साइन किया है और यदि इस पर कोई पैटर्न और लाल झंडा है, मुश्किल नहीं है। यहां तक कि तमिलनाडु के 34 में से – हमारे पास थचुर मुरुगन जैसे मामले हैं, जहां हमने लूट की जगह की पहचान की है और पहचान किए जाने के बावजूद भी, कोई प्राथमिकी दर्ज नहीं की गई है।

यहां पर इस बात पर प्रकाश डालना महत्वपूर्ण है कि पुरातात्विक सर्वेक्षण ने सोथबी के घोटाले में आरोपी वमन घीया को निर्दोष साबित करने वाले फैसले को चुनौती देने के लिए याचिका दायर की है।

2002 में बीबीसी के पीटर वाटसन के द्वारा किए गए स्टिंग ऑपरेशन के बाद घीया को गिरफ्तार कर लिया गया था, लेकिन राजस्थान उच्च न्यायालय ने 2013 में राजस्थान पुलिस के ऑपरेशन ब्लैक होल की कमजोर जाँच और आधिकारिक निष्क्रियता के परिणाम स्वरूप उसे बरी कर दिया गया था। इस तस्करी के घटनाक्रम पर एक किताब भी लिखी गई है जिसका नाम सोथबी द इनसाइड स्टोरी (1998) है।

इस अवधि (2002-2013) में वमन हिरासत में थे, भारत अपनी लूट का “0” प्रतिशत (भारत के नियन्त्रक एवं महालेखापरीक्षक की 2013 की रिपोर्ट के अनुसार डेटा) पुनर्प्राप्त करने में कामयाब रहा। ऐसा, लंदन के एक डीलर जे कासमीन के चित्तौड़गढ़ के बरौली से चुराई गई एक नृत्य करने वाले शिव की सुन्दर मूर्ति वापस करने के बावजूद था। 1998 में इस मूर्ति को चुरा लिया गया था और इस मूर्ति के स्थान पर चोरों ने अधिकारियों को गुमराह करने के लिए बिल्कुल वैसी ही नकली मूर्ति रखी थी। 2003 में लौटाई गई मूर्ति भारतीय उच्चायोग में छोड़ी गई थी। दिसंबर 2017 में एएसआई, दिल्ली का उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल मूर्ति को सत्यापित और प्रमाणित करने के लिए लंदन गया।

नृत्य करने वाले शिव की मूर्ति अभी भारत वापस लायी जानी बाकी है, और कुछ कारणों से एएसआई घीया के निर्दोष साबित होने पर याचिका दायर नहीं करना चाहता। ऐसा, भारत में इनके विभिन्न फार्महाउसों से 400 से अधिक जब्त की गई प्राचीन कालीन वस्तुओं के अब भी एक पुलिस स्टेशन में बंद होने के बावजूद है। भारत की विरासत के लिए कोई संग्रहालय नहीं, बस पुलिस स्टेशन का गोदाम है!

इतने लम्बे समय से चले आ रहे इस प्रकार के व्यवहार के हिसाब से, मैं बस इतना कह सकता हूं कि मुझे अमेरिका में प्रस्तावित एएसआई ‘यात्रा’ से कुछ ज्यादा वापस आने की उम्मीद नहीं है। हमारी विरासत का सम्मान करने और उसकी रक्षा करने से पहले हमें लंबा सफर तय करना है।

यह लेख ‘स्वराज्य’ के विरासत कार्यक्रम का हिस्सा है। अगर आपको यह लेख पसंद आया और आप चाहते हैं कि हम आगे भी इस तरह के और अधिक काम करते रहें, तो हमारे प्रायोजक बनने पर विचार करें – आप 2,999 रुपये की सहयोग राशि से योगदान कर सकते हैं।

विजय एक शिपिंग प्रोफेशनल हैं जो सिंगापुर में काम करते हैं। यह उत्साही विरासत समर्थक हैं और भारतीय कला के बारे में जागरूकता को बढ़ावा देने के उद्देश्य से एक ब्लॉग पोइट्रीइनस्टोन चलाते हैं।