संस्कृति
गोविंदा आला रेः कोर्ट के झटके के बाद संवरता मुंबई का लोकप्रिय दही हांडी
गोविंदा आला रे

प्रसंग
  • धन की कमी के बावजूद भी दही हांडी का उत्सव मनाने के लिए मुंबई में गोविंदाओं की शानदार वापसी

मझगाँव, तद्वादी में पुरानी चॉलों की भूलभुलैया के बीच मंदिर के सामने एक छोटी सी कच्ची जगह पड़ी हुई है। इसी जगह से मुंबई के कुछ सबसे प्रसिद्ध और पुरस्कार विजेता गोविंदा फले-फूले हैं।

रात 8 बजे इस जगह पर अंधेरे के सिवा कोई नहीं है। लेकिन दो घंटों के बाद, सोमवार (3 सितंबर) को एक खास दिन बनाने की तैयारी के लिए यहाँ पर लड़कों और आदमियों का काफी जमावाड़ा था। इसी समय को मुंबई के बहुप्रतीक्षित समारोहों में से एक, दही हांडी, को मनाने के लिए तय किया गया था।

श्री दत्त दही हांडी मंडल के बाला पाडेलकर ने बताया कि टीम के सदस्य अपने ऑफिस से निकल चुके हैं और रास्ते में हैं। श्री दत्त दही हांडी मंडल मुंबई के सबसे पुराने गोविंदा संगठनों में से एक है जिसकी स्थापना 1950 में हुई थी।

“हम ऑफिस से फुरसत मिलने के बाद इसका अभ्यास करते हैं यह पूरा महीना हमारे लिए बहुत ही व्यस्त होता है। लेकिन कई-कई दिन हम लोगों की शिफ्ट और यहाँ तक कि आधी-शिफ्ट में कुछ छूट देने के मामले मे हमारे नियोक्ता काफी उदार हैं।”

58 साल के पाडेलकर अपनी उम्र से बहुत छोटे दिखते हैं, वह मंदिर की सीढ़ियों पर काफी फुर्ती से चढ़ते हैं, एक आवारा कुत्ता मंदिर के बाहर बने बरामदे में चैन की नींद सो रहा है। पाडेलकर कहते हैं कि “जब हम अभ्यास करते हैं तो भगवान हमें देखते हैं। इसीलिए हम इस मैदान का उपयोग करते हैं।”

गोविंदा आला रेपाडेलकर एक सरकारी कर्मचारी हैं और मुंबई तथा उसके आसपास 1500 मंडलों का प्रतिनिधित्व करनी वाले दही हांडी उत्सव समन्वय समिति के अध्यक्ष हैं। इसमें महाराष्ट्र के करीब आधे दही हांडी मंडल शामिल हैं।

चार साल रोक के बाद इस बार उनके मंडल के कार्यकर्ता पूरी तरह से उत्साहित और जोश से भरे हुए हैं। उनका कहना है कि “त्यौहार धीरे-धीरे फिर से तरक्की कर रहा है।”

पाडेलकर 2014 में इस त्यौहार में न्यायालय के हस्तक्षेप की बात करते हुए कहते हैं कि उससे इनको एक बड़ा झटक लगा था। एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट ने 2014 में एक विवादास्पद आदेश दिया था। इस आदेश में मानव पिरामिडों की अधिकतम ऊँचाई 20 फीट और प्रतिभागियों की न्यूनतम आयु 18 वर्ष तय की गई थी। याचिकाकर्ता ने प्रतिबंध लगाने के लिए पिरामिड बनाने के दौरान होनी वाली दुर्घटनाओं और मौतों का हवाला दिया था।

जब मानव पिरामिड बनाने वाली टीमें 10 स्तर बनाने का लक्ष्य रखती थीं तब इसकी निर्दिष्ट ऊँचाई को चार स्तरों तक ही सीमित कर दिया गया था। आयु पर लगने वाले प्रतिबंध से बच्चों को भी इससे दूर कर दिया गया था, जो आसानी से पिरामिड पर चढ़ जाते हैं।

पडेलकर याद करते हुए बताते हैं, “उस वर्ष यह एक आघात से कम नहीं था। आदेश त्योहार से केवल दो हफ्ते पहले आया था। न के बराबर हुआ उस साल।”

सर्वोच्च न्यायालय में उच्च न्यायालय के आदेश को चुनौती देने के लिए 2015 में  समिति महाराष्ट्र सरकार में शामिल हो गई।

पडेलकर कहते हैं, “अदालत ने एक तरफा विवरण के आधार पर एक कठोर कानून पारित किया। उन्होंने हमारी एक न सुनी। लेकिन जब हमने अपनी राय प्रस्तुत की तो उन्होंने हमारा विचार मान लिया।”

उनकी उम्मीदें एक बार फिर जीवंत हो गईं क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय ने उच्च न्यायालय ने नए सिरे से मामले की सुनवाई करने को कहा था।

अदालत का यह स्वांग 2017 में समाप्त हुआ जब उच्च न्यायालय ने ऊंचाई पर प्रतिबंध को हटाकर और 14 साल से अधिक उम्र के बच्चों को भाग लेने की अनुमति देकर मंडलों को बड़ी राहत प्रदान की।

इस मामले में अदालत के पर्यवेक्षण ने गोविंदा की भावना को उचित ठहराया, जैसा कि केवल दही हांडी के दौरान ही नहीं बल्कि क्रिकेट, जिमनास्टिक और एरोबिक्स जैसे खेलकूद में दुर्घटनावश जान तक चली जाती है।

भारत पाटिल, जो कि पडेलकर के पड़ोसी हैं और एक अन्य लोकप्रिय संस्था माझगांव दक्षिण विभाग सार्वजनिक मंडल के सदस्य हैं, कहते हैं, “2014 में कोर्ट के पहले आदेश के बाद हम सभी को लगता है कि कोर्ट चुन-चुनकर हिंदू त्योहारों के प्रति सख्त रवैया अपना रहा है। यह बहुत ही अन्यायपूर्ण था। लेकिन आभारस्वरूप हमें राज्य सरकार का समर्थन मिला।”

सरकार ने न केवल अदालत के आदेश को चुनौती दी बल्कि 2015 में पिरामिड गठन को एक साहसिक खेल के रूप में घोषित करके गोविंद मामले में भी मदद की, जिससे इसे किसी अन्य खेल की तरह व्यवस्थित किया जा सके।

लेकिन पिछले वर्ष अदालत का फैसला इतनी देरी से आया था कि समारोह में किसी भी दुर्घटना से बचने में देरी हो चुकी थी जैसा कि यह त्योहार से सिर्फ एक हफ्ते पहले आया था। पडेलकर कहते हैं, “अधिकांश प्रायोजक पहले से ही बच कर निकल गए थे।”

इसलिए सभी उम्मीदें 2018 पर टिकी हुई थीं।

गोविंदा आला रेजब हमने पडेलकर से गुरुवार (30 अगस्त) को मुलाकात की तो उन्होंने बताया, “इस बार (प्रतियोगिता के) प्रबन्धक कई लोग हैं और हम बेहतर पुरस्कार राशि की उम्मीद करते हैं।”

समाचार पत्रों ने सोमवार (3 सितंबर) को रिपोर्ट दी कि कई राजनेताओं द्वारा विशेष रूप से शिवसेना, महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना और भारतीय जनता पार्टी द्वारा हाई प्रोफ़ाइल हांडियों का आयोजित किया गया। कई स्पर्धाओं में नौ-स्तरीय पिरामिड का निर्माण किया गया।

पाडेलकर ने यह स्वीकार किया कि पिछले चार सालों में हुई प्रायोजकों की कमीं ने मंडल के खजाने को खाली कर दिया है जिससे उनको बहुत मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। मंडल के चरम पर राजनीतिक दलों और बड़े कॉर्पोरेट हाउसों ने बहुत अधिक पैसों की पेशकश करते हुए प्रतियोगिताओं का आयोजन करवाया, कुछ प्रतियोगिताओं में यह राशि बढ़कर 1 करोड़ तक हो जाती थी। गोविंदाओं ने 40 फीट से ऊपर तक की अविश्वसनीय ऊंचाइयों तक पहुंचकर अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन दिखाया।

लेकिन इस समय, पुरस्कार राशि कम होकर कुछ लाख रह गई है और अदालत के नियमों की अवहेलना के डर से प्रतियोगिताओं का आयोजन कम हो गया है। पाटिल ने समझाया कि कैसे इस प्रथा को जारी रखना लगभग असंभव हो गया: उन्होंने कहा, “अगर सबसे साधारण मंडल की बात करें तो वह गोविंदाओं को अनुकूल कपड़े, भोजन, बीमा और प्रतियोगिताओं में भाग लेने के लिए एक जगह से दूसरी जगह आने जाने के लिए एक ट्रक की व्यवस्था करते हैं। हमारे लिए यह खर्च एक दिन में 2.5 लाख रूपए आता है। त्योहार के लिए भी बहुत पैसा खर्च किया जाता है। पुरस्कार की राशि हमारे लिए पर्याप्त नहीं थी, वह सिर्फ हमें प्रेरित करती है।”

गोविंदा आला रेयह पूछे जाने पर कि क्या इस तरह का ग्लैमर और अधिक पैसा त्योहार के लिए वांछनीय है, पाडेलकर ने कहा कि उन्होंने केवल इसमें लाभ ही दिखता है। उन्होंने कहा, “त्यौहार बहुत सारे खर्चे चलाता है।”

उन्होंने कहा, “पुरस्कार राशि गोविंदाओं को प्रेरित करती है। इधर उधर घूमकर समय बर्बाद करने वाले युवाओं को त्यौहार एक उद्देश्य प्रदान करता है। मानसून के खाली समय वाले महिनों में, वह त्योहार में हिस्सा लेने की तैयारी में जिम में कसरत करते हैं। यह उनको टीम भावना और एक साथ रहना भी सिखाता है। प्रत्येक गुजरते हुए साल में प्रतियोगिता में हिस्सा लेने वाली महिलाओं की संख्या बढ़ती जा रही है।”

मंदिर में आई एक महिला, जो सुन रही थी, कहती हैं, “आपको देखना चाहिए कि वे कितनी खूबसूरती से अपना अभ्यास शुरू करती हैं। इसकी शुरूआत गुरू पूर्णिमा की पूजा के साथ होती है। वे हांडी और रस्सी की भी पूजा करते हैं जिससे हांडी को बांधा जाता है। पूरी कॉलोनी को लाइटों से सजाया जाता है। यह दिवाली की तरह लगता है।”

उन्होंने कहा कि पाडेलकर और पाटिल के दोनों मंडल, जिन्होंने विनम्र शुरुआत की थी, ने अवर्णित तदवादी को पूरे शहर से अत्यधिक सम्मान दिलाया।

मयूरेश शिंदे, जिनकी आयु सिर्फ 17 वर्ष है और अभी वह स्कूल में पढ़ने जाते हैं, सात वर्ष की आयु से पाटिल के मंडल का हिस्सा रहे हैं। वह कई बार अपने बड़े पड़ोसियों के कंधों पर खतरनाक रूप से संतुलित होकर बहु-स्तरीय पिरामिड के शीर्ष पर रहे है। उनका कहना है कि पूरा स्कूल उन्हें ताडवाडी मंडल के साथ उनके संबंध के कारण जानता है।

इतना ही नहीं, वह गर्व से कहते हैं, “दही हांडी दिवस पर, हमें हमारी उत्कृष्ट प्रतिष्ठा के कारण समारोहों में विशेष प्रवेश मिलता है। हमें कभी भी खड़े होकर प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती है।” यह पूछे जाने पर कि क्या उनके परिवार ने इन खतरनाक स्टंटों का प्रयास करने का कभी विरोध किया है, शिंदे ने कहा कि उनके पिता खुद वर्षों से प्रतिभागी रहे हैं।

गोविंदा आला रेपाटिल कहते हैं, “यह कहना गलत है कि यह त्यौहार बच्चों का जीवन खतरे में डालता है। मैं मानता हूँ कि कुछ घातक मामले हुए हैं, लेकिन यह तो हर खेल में होता है। हम अपने युवा प्रतिभागियों को अपने बच्चों की तरह मानते हैं। वास्तव में, मेरी अपनी बेटी छह साल पहले तक शीर्ष पर रही है। अब वह 13 वर्ष की है।”

वह हंसते हुए कहते हैं, “यहाँ तक कि जब अदालत का आदेश था, तब भी पुलिसकर्मियों ने हमें कुछ भी करने का विरोध नहीं किया। हमारे मंडल में ज्यादातर बच्चे सिर्फ पुलिसकर्मियों के हैं।”

अब तक, पुरुषों/लोगों ने मैदान पर इकट्ठा होना शुरू कर दिया है, सभी अभ्यास सत्र के लिए तैयार हैं।

एक व्यक्ति ने बताया, “इन चार वर्षों में शायद ही कभी हमें प्रशिक्षित किया गया है। “लेकिन प्रायोजक के पीछे हटने के बाद भी हम डटे रहे।  हमने परंपरा को आगे बढ़ाया। एक अवसर पर हमने पिरामिड बनाते समय काले झंडे उठाए। लेकिन हम एक अनुकूल फैसले के बारे में निश्चित थे।”

स्वाती गोयल शर्मा स्वराज की एक वरिष्ठ संपादक हैं। वह @swati_gs पर ट्वीट करती हैं।