संस्कृति
पुचके से पराठे तक और कीमा से कबाब तकः कलकत्ता की सड़कों पर भोजन की भरमार

प्रसंग
  • बंगाली लोग फुटबॉल की तरह ही भोजन के बारे में भी जोशीले हैं क्योंकि उनके लिए यह ऐसा है जिसे वो गम्भीरता से लेते हैं
  • पुचका से पराठा तक और कीमा से कबाब तक, कोलकाता की सड़कों पर लगे हुए फूड स्टाल मुँह में पानी लाने वाली विविधता समेटे हुए हैं, जो सस्ते होते हुए भी स्वास्थ्यकर हैं।

कोलकाता की सड़कें गड्ढायुक्त, भीड़ भरी और अव्यवस्थित हो सकती हैं, लेकिन उनमें से ज्यादातर उससे सजी हुई हैं जिसकी स्वादिष्ट भोजन पसंद करने वाले लोग कसम खाते हैं कि ये संतुष्टि देने वाले भोजन हैं। और भोजन की वास्तविक किस्म, जो शहर की सड़कों पर उपलब्ध है, स्वयं में बेमिसाल है। कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि एक प्रतिष्ठित यात्रा पोर्टल द्वारा किए गए एक वैश्विक सर्वेक्षण में कोलकाता को देश के सबसे अच्छे स्ट्रीट फूड गंतव्य के रूप में नामित किया गया।

एक सटीक गिनती तो असंभव है, लेकिन यह अनुमान लगाया गया है कि मुगलई, बंगाली, दक्षिण भारत, गुजराती, उत्तर भारतीय, चीनी, दक्षिणपूर्व एशियाई और यहाँ तक कि कान्टिनेन्टल तरीके के 1200 से अधिक प्रकार के व्यंजन कोलकाता में लगभग 90,000 छोटे-बड़े स्ट्रीट फूड विक्रेताओं द्वारा बेचे जाते हैं। और साथ ही, कोलकाता में स्ट्रीट फूड खाने के बाद किसी को कभी भी पेट की मामूली परेशानी भी नहीं हुई है, कुछ साल पहले ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हाइजीन एंड पब्लिक हेल्थ द्वारा किए गए एक अध्ययन में एक तथ्य स्पष्ट किया गया, जिसमें सड़क के किनारे खाद्य विक्रेताओं से लिए गए भोजन के सैंपलों को उपयोग के लिए सुरक्षित पाया गया।

कोलकाता में सबसे ज्यादा बिकने वाला स्ट्रीट फूड, कोई अनुमान लगाने की ज़रूरत नहीं है, निःसंदेह पुचका है, या उत्तरी भारतीयों की भाषा में पानीपूरी है। और अब इसमें कई बदलाव आ गए हैं, यहाँ तक कि दक्षिण कोलकाता में सड़क के किनारे स्टालों में लोग इनमें मटन और चिकन कीमा भरकर भी पेश करते हैं। सभी आयु वर्गों और आय के स्तरों के पुरुषों और महिलाओं का पुचके से भरा हुआ मुँह का दृश्य और लोगों के बीच सबसे जादा पचके खाने की प्रतिस्पर्धा कोलकाता की सड़कों पर सर्वव्यापी है।

एक अन्य प्रतिष्ठित कोलकाता स्ट्रीट फूड काठी रोल है। (इसे पढ़ें) कहा जाता है कि 20वीं शताब्दी की शुरुआत में इसकी उत्पत्ति हुई थी जब घोड़े पर बैठे हुए एक अंग्रेज नज़ाम (भोजनालय), एक बहु-प्रतिष्ठित कोलकाता भोजनालय जो एक समय में अपने कबाब और बिरयानी के त्वरित नाश्ता के लिए प्रसिद्ध था, पर रुका था। यह समझते हुए कि साहब कुछ भी अव्यवस्थित नहीं पसंद आएगा, रसोइये ने तुरंत एक पराठे में कुछ कबाब डाले और इसे पेपर नैपकिन से लपेट दिया। आगे जो भी हुआ, वे कहते हैं, एक इतिहास है। कोलकाता के फूड ब्लॉगर्स के अनुसार, शहर में अनुमानित 1.2 लाख काठी रोल और 2 लाख पुचका का उपभोग प्रतिदिन किया जाता है। और वैसे यह सिर्फ़ एक अनुमान है।

लेकिन यह सिर्फ पुचका और काठी रोल के बारे में ही नहीं है, काठी रोल को ऐसा इसलिए कहा जाता था क्योंकि पराठे को रोल करने वाले कबाब को बनाने के लिए अनावश्यक लोहे की सलाई को नर्कल और बांस की छड़ (जिसे बंगाली में कथिस कहा जाता है) से प्रतिस्थापित किया गया था। कोलकाता में स्ट्रीट फूड वेन्डर्स का सबसे बड़ा जमाबड़ा शहर के केंद्रीय व्यापार जिले, डलहौसी-एस्प्लानेड क्षेत्र, में इकट्ठा होता है। यह बड़ी संख्या में मध्यम और निचले मध्यम वर्ग के कार्यालय आने-जाने वाले लोगों और काम पर आने वाले आगंतुकों के जमावड़े की वजह से है, क्योंकि यह सरकारी कार्यालयों, बैंकों, कॉर्पोरेट कार्यालयों और बड़े और छोटे व्यापारिक प्रतिष्ठानों का एक व्यस्त केंद्र है। यह वह जगह भी है जहाँ स्ट्रीट फूड़ की विस्तृत विविधता स्टूज़ और सूप, भुना हुआ चिकन, बिरयानी और इडली-डोसा से लगाकर मच्छी-भात (बंगाली चावल और मछली करी), चाउमीन, थाई हरी मछली करी, रसगुल्ला और पेस्ट्री तक उपलब्ध है। मोमोस, भेल पूरी और यहाँ तक कि कारमेल कस्टर्ड को भी न भूलें !

कोलकाता में स्ट्रीट फूड़ की इतनी आश्चर्यजनक विविधता क्यों है? इसके पीछे एक कारण और इतिहास है। मुख्य शहर की बड़ी अस्थिर आबादी, जिनका उपनगरों से रोज का आना-जाना रहता है। कोलकाता नगर निगम (केएमसी) द्वारा इस अनुमान के अनुसार, शहर की अस्थिर आबादी 5.5 मिलियन है, जो शहर की निवासी आबादी 4.58 मिलियन से अधिक है। यही कारण है कि रोजाना 5.5 मिलियन लोग कोलकाता में काम पर आते हैं। इससे पहले यह मुख्य रूप से उन लोगों का भोजन-स्थल था, जो अत्यंत गरीब और निम्न मध्यम वर्ग से संबंधित थे, कोलकाता में स्ट्रीट फूड़ वेंडरों की संख्या वास्तव में काफी विस्तृत है। प्रारंभ में, स्वतंत्रता से पहले के युग में, यहाँ-वहाँ छोटे रेस्तरां उपलब्ध थे जिन्हें  ‘पाइस होटल’ कहा जाता था, जहाँ एक पैसे में (ब्रिटिश युग की मुद्रा इकाई, एक पैसा एक आना का एक चौथाई था, 16 आना में एक रूपया हो जाता था) भरपेट भोजन की सुविधा उपलब्ध थी। इनमें से कई पाइस होटल (यह और यह पढ़ें) अभी भी मौजूद हैं और बहुत सस्ती कीमतों पर (भरपेट भोजन के लिए, औसत मूल्य: 20 रुपये) पर अच्छी तरह से बंगाली भोजन (चावल, दाल, भाजी, सब्जी और एक मछली या चिकन करी) सर्व करते हैं।

लेकिन पूर्व पूर्वी पाकिस्तान द्वारा हिंदू प्रवासियों के साथ से उत्पीड़न और बढ़ती बेरोजगारी तथा व्यस्तता के कारण पाइस होटल टिक नहीं पाए। इन्हीं प्रवासियों में से कई ने शहर में आने-जाने वाले लाखों लोगों की मांग को पूरा करने के लिए सड़क के किनारे भोजन के स्टालों को स्थापित किया। सड़क के किनारे या फुटपाथ पर भोजनालयों को लोकप्रिय बनाने वाला एक और कारक ‘ओपार’ बांग्ला (‘अन्य’ बंगाल, या पूर्वी बंगाल, जो पूर्वी पाकिस्तान बन गया था और अब बांग्लादेश है) के लोगों का प्रसिद्ध पाक कौशल है; ‘बंगाल’ (पूर्वी बंगाल से बंगालियों) और ‘घोटियों’ (पश्चिम बंगाल से) के तुलनात्मक कौशल पर लंबे समय की बहस के बाद जीत पहले वाले पक्ष (बंगालियों) की हुई। इसमें बंगाली फूड-लविंग विशेषता जुड़ी हुई है और इस प्रकार, लेखक बुद्धदेव बोस कहते हैं, कोलकाता का स्ट्रीट फूड़ बहुत ही विविध और स्वादिष्ट है।

कोलकाता के मेयर सोवन चटर्जी, जो खाने के शौकीन है, कहते हैं कि कोलकाता के सड़क के भोजन की लोकप्रियता इस तथ्य से उपजी है कि यह सस्ता (उदाहरण के लिए चिकन अंडा रोल, यहां जिसकी औसतन लागत 25 रुपये है, यही रोल दिल्ली में ठीक दोगुनी कीमत पर मिलता है), स्वस्थ और स्वादिष्ट है। चटर्जी ने कहा, “स्ट्रीट फूड विक्रेताओं के पास रेफ्रिजरेटर नहीं होता है और इसलिए उनके बारे में इस बात का तो कोई सवाल ही नहीं उठता कि वे बासी भोजन परोसते हैं। उनके पास सीमित वस्तुएं होती हैं जो केवल एक ही दिन चलती हैं। हम नियमित रूप से जांच करते हैं और पूरे शहर के ऐसे विक्रेताओं से खाद्य नमूने एकत्रित करके उनका परीक्षण करते हैं। मुझे यह कहते हुए गर्व है कि एक भी खाद्य नमूना मानव उपभोग के लिए अनुपयुक्त नहीं पाया गया है और न ही किसी विक्रेता को खाद्य सामग्री में निषिद्ध किए गए रंगों या योजकों का उपयोग करते पाया गया है।”

आईटीसी के शीर्ष कार्यकारी नलिन श्रीवास्तव अक्सर त्वरित नाश्ते के लिए अपने कुछ जूनियर सहयोगियों के साथ, कोलकाता की प्रसिद्ध पार्क स्ट्रीट, रसेल स्ट्रीट (जहां आईटीसी मुख्यालय स्थित है) पर जाते हैं। उन्होंने बताया, “जब मैं पहली बार शहर में आया था, तो मैने सड़क के किनारे खाने की दुकान पर खाने के विचार को नकार दिया। लेकिन एक बार जब मैंने अपनी स्ट्रीट फूड ना खाने वाली इच्छाओं को खत्म किया, तो मैने पाया कि यह खाना बहुत ही स्वादिष्ट है। कोलकाता में सड़क के किनारे स्टॉल पर भोजन करना काफी रोमांचकारी है और इसकी विविध विविधता अद्भुत है।” श्रीवास्तव ने हाल ही में कोलकाता की एक खान-पान संबंधी यात्रा पर न्यूयॉर्क से दो दोस्तों को बुलाया है। आईआईएम-अहमदाबाद से स्नातक लगभग 40 वर्षीय श्रीवास्तव, जो भारत आने से पहले संयुक्त राज्य अमेरिका और ब्रिटेन में काम करते थे, ने कहा, “हम तीन प्रसिद्ध सुविधाओं वाले रेस्तरां और लगभग 10 रोडसाइड खाद्य विक्रेताओं के पास गए। मेरे दोस्तों ने स्ट्रीट फूड के लिए मतदान किया और मैं उनसे और अधिक सहमत नहीं हो सका।”

अधिकांश कोलकाता निवासी अत्याधिक स्वछंद होते हैं और जहां तक स्ट्रीट फूड का संबंध है वह वही चुनते हैं जो उनको पसंद है और खाने के मामले में जादा प्रयोग नहीं करते हैं।  एक प्रसिद्ध खाद्य ब्लॉगर इंद्रजीत लाहिरी का कहना है कि डेक्र्रेस लेन में मक्खन टोस्ट और वेजिटेबल स्टू सबसे अच्छा है, जबकि सुनीता मुखर्जी का तर्क है कि भवानीपुर में पुचकावाला सबसे ज्यादा मुंह में पानी लाने वाले व्यंजन परोसता है। जबकि ज्यादातर सरकारी बाबू डलहौजी के काठी रोल को पसंद करते हैं, वहीं दूसरों का कहना है कि पार्क स्ट्रीट में कोई भी विशेष स्टॉल बहुत से सर्वश्रेष्ठ व्यंजनों को परोसता है। शहर में कई लोग यह भी बहस करते हैं कि कौन सा सड़क के किनारे का भोजनालय सबसे अच्छी इडली परोसता है – क्या सभी इडली का स्वाद एक जैसा नहीं होता?

राजनीति और फुटबॉल की तरह – बंगाली के दो अन्य लोकप्रिय विषय – स्ट्रीट फूड पर यह बहस भी अनन्त है – जो कि जुनून पैदा कर सकती है, क्योंकि, बंगालियों के लिए, भोजन एक ऐसी चीज़ नहीं है जिसे हल्के में लिया जा सके।

जयदीप मजूमदार स्वराज में एक सहयोगी संपादक हैं।