भारती / संस्कृति
राम जन्मभूमि हारकर पगड़ी त्यागने वाला समुदाय 500 वर्षों के बाद फिर पहनेगा पगड़ी

5 अगस्त को जब अयोध्या में श्री राम मंदिर का भूमि पूजन हुआ तो अयोध्या में सरयू नदी के दोनों किनारे पर बसे गाँवों में रहने वाले सूर्यवंशी क्षत्रिय समुदाय के सदस्यों की आँखे भर आईं।

उनके लिए यह कई भावों से विभोर कर देने वाला क्षण था। पहली बार तब जब उन्होंने टीवी पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को हनुमान गढ़ी के दर्शन करते देखा और कुछ क्षणों बाद जब उन्होंने अपने ही भावों में डूबे दोनों नेताओं को राम मंदिर का भूमि पूजन करते देखा।

अतीत का बोझ धीरे-धीरे हल्का हो रहा था।

अयोध्या के सूर्यवंशी क्षत्रिय स्वयं को भगवान राम का वंशज और राम जन्मभूमि एवं अयोध्या का प्रतिवादी मानते हैं। वे भगवान राम को राजा राम कहकर संबोधित करते हैं।

पाँच सदियों पूर्व उनके साहसी राम-भक्त पूर्वजों ने एक सौगंध ली थी कि वे पगड़ी नहीं पहनेंगे। यह तब हुआ था जब वे मुगल सेना के आगे मंदिर का नियंत्रण हार गए थे। जो व्यक्ति मुगलों के विरुद्ध रक्षात्मक और आक्रामक नीति का नेतृत्व कर रहे थे, वे थे ठाकुर गजसिंह।

सूर्यवंशी क्षत्रियों ने पगड़ी पहनने को एक आध्यात्मिक प्राप्ति मान लिया है। अयोध्या के गाँव में रहने वाले महेंद्र प्रताप लेखिका को समझाते हैं, “हमारे पूर्वजों ने पगड़ी न पहनने का निर्णय लिया था। उनकी सौगंध थी कि वे तब तक पगड़ी नहीं पहनेंगे जब तक वे राम जन्मभूमि को फिर से न जीत लें और आक्रमणकारियों- मुगल सेनाओं से इसकी गरिमा न बचा लें।”

पगड़ी से पाँच सदियों की दूरी

प्रताप ने बताया कि सूर्यवंशी क्षत्रियों ने इन संकेतों और वस्तुओं को इसलिए त्याग दिया था क्योंकि वे उस हार को सह नहीं पाए थे जिसके कारण उन्होंने भगवान राम के जन्मस्थान और मंदिर को शत्रुओं के आगे खो दिया था।

“हमारे वंश ने छतरी का उपयोग छोड़ दिया था जो गर्मी से हमारी रक्षा करती है।”, प्रताप ने कहा। लकड़ी के खड़ाऊँ की जगह उन्होंने चमड़े की पादुकाएँ पहननी शुरू कर दी थीं। सिर ढँकने के लिए वे पगड़ी के स्थान पर गमछे या मौरी का उपयोग करने लगे थे।

प्रताप कहते हैं, “पुरानी पीढ़ी के लोग गमछे का भी उपयोग नहीं करते थे। और हमारे समुदाय की महिलाएँ आज भी छतरी का उपयोग नहीं करती हैं।”

इस दुख में सूर्यवंशी क्षत्रिय स्वयं को दोषी मान रहे थे। उनकी कथा के अनुसार हार के कारण उनका आत्मबल क्षीण हो गया था। सरयू नदी के दोनों किनारों पर बसे गाँवों में मुगलों द्वारा नरसंहार ने उनकी आत्मा को झकझोर दिया था।

लेकिन उनका साहस अप्रभावित रहा और उनके रक्त में बहता रहा। “हमारे पूर्वज बलवान थे।”, समुदाय के एक वरिष्ठजन शीतला सिंह ने स्वराज्य  को बताया।

सदियों के बीतने के साथ यह संकल्प दृढ़ होता गया, आने वाली पीढ़ियों ने इस सौगंध को माना और इसपर चलीं क्योंकि राम जन्मभूमि की पवित्रता के लिए चुनौतियाँ कम नहीं हो रही थीं।

अतीत के मूर्त प्रतीकों को नकारना उनकी पहचान का एक भाग बन गई।

सौगंध की समाप्ति

समुदाय के लोगों के लिए इससे दुखद और कुछ नहीं था कि राम लल्ला एक तंबू में विराजमान हैं।

लेखिका से वार्ता के दौरान प्रताप फोन पर कई बार फूट पड़े, “मैं आपको बता नहीं सकता किस पीड़ा में हम वर्षों से रह रहे हैं- हमारे आराध्य श्रीराम को तंबू में देख रहे हैं- जबकि हम स्वयं पक्के घरों में रह रहे हैं। यह हमारी दुर्बलता है- हिंदुओं की सामूहिक कमज़ोरी है।”

पाँच शताब्दी पूर्व हमारे पूर्वजों ने आक्रांताओं के समक्ष खुद को कैसा असहाय पाया होगा, इससे उसका आभास हो सकता है। “हम राम का मूल स्थान नहीं दे पाए इतने समय तक।”, वे आगे कहते हैं।

पगड़ी वापस आने की कई परतें

भूमि पूजन के गुज़रे तीन दिनों तक रामायण पाठ, सुंदरकांड पाठ, घर के अंदर और बाहर रंगोली बनाने, पूरे अयोध्या में प्रसाद और मिठाइयों के वितरण से वे अपनी प्रसन्नता व्यक्त करते रहे।

पूरे अयोध्या में भजन-कीर्तन, पटाखे फोड़े जाना, दीये जलाना, आदि भूमि पूजन के बाद के उत्सव के रूप में होता रहा। लेकिन सूर्यवंशी क्षत्रिय समुदाय के पुरुष अभी तक पूरी पगड़ी के स्थान पर गमछा ही धारण कर रहे हैं।

2019 में सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक निर्णय के बाद समुदाय के पुरुषों ने पगड़ियाँ बाँटीं और 105 गाँवों में पगड़ियों के वितरण के लिए बैठकें कीं। अब वे वरिष्ठों और समुदाय के लोगों से मिल रहे हैं व सरयू के तट पर स्थित दशरथ समाधि स्थल पर गए।

अभी तक उन्होंने पगड़ी को धारण नहीं किया है। पगड़ी को स्वीकार करना उनके लिए घावों को भरने की भावनात्मक प्रक्रिया होगी, समुदाय के इतिहास की पीड़ा से वे मुक्त होंगे, ऐसा समुदाय के लोग मानते हैं।

“पहनेंगे पगड़ी और साफा पहनेंगे। भूमि पूजन हो गया है। निर्माण कार्य शुरू होगा। पगड़ी पहनकर हम इस अध्याय का अंत करेंगे। निर्माण कार्य शुरू होने दीजिए, पगड़ी वापस आ जाएगी।”, शीतला सिंह ने कहा।

ध्यान दें कि कैसे पगड़ी पहनने की दिशा में नए-नए मील के पत्थर प्राप्त किए जा रहे हैं। राम जन्मभूमि के लिए चिर न्यायिक संघर्ष ने उनके उत्साह को निर्बल कर दिया था, अब इसके अंत का भाव उन्हें छू रहा है।

पगड़ी न पहनने का भाव अब दूर जा रहा है, पिघल रहा है। लेकिन फिर भी समुदाय के लिए नई आध्यात्मिक और सांस्कृति भोर में पगड़ी धारण करने में एक संकोच है।

जब लेखिका ने सूर्यवंशी क्षत्रिय समुदाय के एक अन्य सदस्य रमेश सिंह से बात की, तब वे अयोध्या में बाँटने के लिए बन रहे 3.5 लाख लड्डू बनाने के कार्य को देख रहे थे। लेकिन अतीत का भय भी उन्हें नहीं छोड़ रहा था, क्या होगा, क्या होगा यदि इतिहास लौट आए या आक्रांता।

रमेश सिंह ने कहा, “हमें बस ये सुनिश्चित करना है कि अतीत लौटकर न आए।”

प्रताप सिर्फ बातें नहीं बना रहा थे। “हम एक सौभाग्यशाली पीढ़ी हैं जो राम मंदिर के भूमि पूजन के साक्षी बने और यह प्रधानमंत्री मोदी व मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की उपस्थिति में हो रहा है। वे उन मुद्दों से पीछे नहीं हटे जो दूसरे छूना तक नहीं चाहते थे। अगर हम एक और भूल कर देते तो उसे सुधारने का अवसर नहीं मिलता।”, वे आगे कहते हैं।

कारसेवा के लिए क्षत्रिय और कारसेवक

1990 के दशक में कारसेवकों के हिंसक दमन के बाद समुदाय के लोगों को अपेक्षा नहीं थी कि राम, राम जन्मभूमि और अयोध्या के लिए धर्म के काम में जाति विविधताओं की पराकाष्ठा देखने को मिलेंगी। भूमि पूजन ने यह संयोजन किया।

1990 के दशक में सूर्यवंशी क्षत्रिय समुदाय के लोगों ने देशभर के कारसेवकों के आतिथ्य का दायित्व लिया था। शीतला सिंह बताते हैं कि कारसेवा के लिए दक्षिणी राज्यों जैसे “कर्नाटक और आंध्र प्रदेश (तत्कालीन)” से लोग आए थे।

समुदाय के लोगों ने 1990 के दशक में अयोध्या को कारसेवकों का घर बना दिया था, शीतला सिंह ने बताया। गोंडा और बस्ती से आने वाले कारसेवकों को तराई क्षेत्र में आश्रय दिया जाता था और 1990 के दशक में पुलिस की गोलियों से बचकर निकले कई कारसेवकों को हर जाति के ग्रामीणों ने कुशलतापूर्वक और सहृदय विदा किया था।

वे कहते हैं, “अयोध्या से बाहर के कारसवेक रास्ते और अयोध्या की गलियों को नहीं जानते थे। उन्हें मंदिर जाने का मार्ग बताया जाना था, नदी के तटों के माध्यम से।” 1990 में प्रताप 15-16 साल के थे। इसी वर्ष पुलिस को कारसेवकों पर खुली गोलीबारी का आदेश मिला था।

1990 में प्रताप ने अयोध्या के गाँवों में रहने वाले अपने समुदाय के लोगों, अन्य जाति के लोगों और सैकड़ों अनजान कारसेवकों का मार्च में साथ दिया था जिसे हिंसा से भंग कर दिया गया था। युवाओं को सूर्यवंशी क्षत्रिय समुदाय और अन्य जातियों के बड़े निर्देश दे रहे थे, वे मिलकर कारसेवा को सशक्त कर रहे थे।

परिस्थिति कभी भी बिगड़ सकती थी, उन्हें भय था लेकिन उन्हें चिंता थी अयोध्या के बाहर से आए हुए कारसेवकों की, विशेषकर दूसरे राज्य के लोगों की।

प्रताप याद करते हैं, “हम जगहों को जानते थे। अयोध्या की गलियों से परिचित थे। अंततः हिंसा हुई- पुलिस ने गोलीबारी की। दुर्भाग्यवश अयोध्य से बाहर के कारसेवकों को अधिक क्षति पहुँची।”

कुछ देर रुककर, वे आगे कहते हैं, “मुझे याद है, मैंने देखा था कि लोग अपनी जान बचाने के लिए नदी में कूद रहे थे। मैंने पुल पर कई जूते-चप्पल पड़े देखे थे।”

हिंदू एकता से खड़े रहो या जाति भेदों के आधार पर बिखर जाओ

सूर्यवंशी क्षत्रिय समाज के लोगों का मानना है कि जाति के आधार पर बँटकर हिंदू पुनः भूल कर बैठेंगे। “जाति, उप-जाति, बस हिंदू ही बताता है, और कोई नहीं। इसका अंत होना चाहिए।”, वे कहते हैं।

आदित्यनाथ और प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में हुआ समारोह ऐतिहासिक क्षण था जिसने उन्हें याद दिलाया कि कैसे उनके पूर्वज और अन्य जाति के लोग साथ मिलकर राम जन्मभूमि की पवित्रता को बचाने के लिए कई सदियों तक लड़े थे, उन्होंने बताया।

सूर्यवंशी क्षत्रिय समुदाय ने उस मिलाप और एकता को भी याद किया जो उन्होंने 1990 में देखी थी। समुदाय के लोग कारसेवकों के पैर धोया करते थे और उन्हें घर में आश्रय भी देते थे।

“हम जो कर सकते थे, हमने किया।”, वे कहते हैं। “भूमि पूजन और नई शुरुआत देखने के लिए हम जीवित हैं, यह हमारा सौभाग्य है। बहुत सारी पीढ़ियाँ मर-खप गईं इस दिन को देखने के लिए।”, प्रताप अंत में कहते हैं।

अयोध्या के सूर्यवंशी क्षत्रिय हिंदू एकता का आह्वान कर रहे हैं लेकिन अपनी पगड़ी पहनने में झिझक रहे हैं।

राम मंदिर पर हिंदुओं का गर्व सामूहिक है और इस नए परिदृश्य को सूर्यवंशी क्षत्रिय के दृष्टिकोण से समझना आवश्यक है।

यदि किसी विशेष आयोजन से इस समुदाय के पुरुष पगड़ी पहनते हैं- उनके पूर्वजों की सौगंध की पाँच सदियों के बाद तो यह हमारे सामूहिक उत्सव के योग्य क्षण होगा।

सुमति महर्षि स्वराज्य में वरिष्ठ संपादक हैं। वे @sumati_mehrishi के द्वारा ट्वीट करती हैं।