संस्कृति
बंगाल की दुर्गा पूजा से नदारद है ‘पूजा’
बंगाल की दुर्गा पूजा से नदारद है ‘पूजा’

प्रसंग
  • आकार, स्तर, चमक और धमक के बीच पूजा की वास्तविक भावना दुर्भाग्य से पृष्ठभूमि में धकेल दी गयी है।

निर्विवाद रूप से दुर्गा पूजा बंगाल और बंगाली लोगों का सबसे बड़ा त्यौहार है। यह एक भव्य आनंदोत्सव है जो निहारने के लिए एक दृश्य है और जीवन भर आनंद उठाने के लिए एक अनुभव है।

लेकिन जैसे-जैसे समय गुजरा है और समुदाय, या बरोवारी दुर्गा पूजा, के आकार, स्तर, चमक और धमक में वृद्धि हुई है, इसमें जो धीरे-धीरे गायब हुआ है वह है इस त्यौहार का धार्मिक भाग। आज बस इतना ही है कि अधिकांश बड़ी बरोवारी पूजायें एक भव्य प्रदर्शनी मात्र हैं जिन्हें अधिकाधिक लोगों को आकर्षित करने, प्रशंसा और पुरुस्कार प्राप्त करने के लिए आयोजित किया जाता है। वे सभी बड़े बजट की वाणिज्यिक उद्यम हैं जहाँ वास्तविक ‘पूजा’ – देवी की पूजा और इस पूजा के लिए अंतर्भूत रीति-रिवाज’ – कहीं एक उपेक्षित कोने में चले गए हैं।

उदाहरण के तौर पर, इस वर्ष कोलकाता में कम से कम एक दर्जन सामुदायिक दुर्गा पूजाओं के पास 75 लाख रुपए से ज्यादा का बजट है। यह अनुमान लगाया गया है कि राज्य के शहरी इलाकों में 25 प्रतिशत पूजा आयोजनों में 20 लाख रुपए से ज्यादा का बजट है और 60 प्रतिशत के पास कम से कम 10 लाख रुपए का बजट है। पांडाल रचनात्मकता और शैली के कारण अत्यंत आकर्षक होते हैं और अक्सर एक थीम के हिसाब से सजाये जाते हैं। बहुत सारे पांडाल मंदिरों और विश्व भर से अक्सर ऐतिहासिक अन्य प्रसिद्ध संरचनाओं की प्रतिकृतियाँ होते हैं। प्रसिद्ध कलाकार उन्हें डिजाइन करते हैं।

इन भव्य पांडालों के आतंरिक भाग चकाचौंध से भरे तथा देदीप्यमान होते हैं और इसकी कुशल कारीगरी परिपूर्ण प्रतिभा का उदाहरण होती है। महिषासुर और देवी की सवारी (सिंह) के साथ देवी माँ और उनके बच्चों की बहुत सारी मूर्तियाँ प्रतिष्ठित कलाकारों द्वारा डिजाइन की जाती हैं और इनकी लागत काफी ज्यादा होती है। इस वर्ष कोलकाता की एक प्रसिद्ध सामुदायिक पूजा में देवी माँ के वस्त्रों को सोने और चांदी के धागों से बुना गया है और इसे एक प्रसिद्ध सुनार द्वारा स्पोंसर किया गया है।

लगभग सभी सामुदायिक पूजा आयोजनों को सीमेंट और स्टील निर्माताओं से लेकर कपड़ा और घरेलू समान निर्माताओं तक से, कॉर्पोरेट घरानों से पैसा मिलता है। छोटे सामुदायिक पूजा आयोजन भी स्पोंसरशिप के लिए स्थानीय छोटे व्यवसायों पर निर्भर होते हैं। वे (स्पोंसर्स) सामुदायिक दुर्गा पूजा के आयोजकों को मोटा पैसा सिर्फ दान में नहीं देते हैं बल्कि इसमें उनका प्रचार-प्रसार भी होता है। आयोजक स्पोंसर करने वाली कंपनियों और व्यवसायों के बड़े-बड़े बैनर और होर्डिंग लगाते हैं। पांडाल जितना बड़ा, जितना आकर्षक और जितना भड़काऊ होगा उतने ही ज्यादा लोग वहां पधारेंगे और स्पोंसर्स को यही चाहिए होता है। इस प्रकार बड़े सामुदायिक पूजा आयोजनों को सबसे बड़े स्पोंसर मिलते हैं और सभी पूजा आयोजन सबसे बड़ा स्पोंसर पाने के लिए एक दूसरे से होड़ लगाते हैं। ये प्रतिस्पर्धाएं पूजा की वास्तविक भावना का क्षरण कर रही हैं।

बड़े पूजा आयोजन प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में अच्छी पब्लिसिटी पाने और अपने पांडालों में सेलिब्रिटीज को लाने के लिए, जो बदले में उस विशेष पूजा आयोजन के लिए और अधिक पब्लिसिटी पैदा करते हैं, पीआर फर्मों को काम पर लगाते हैं। वे बड़े कलाकारों को अपने सांस्कृतिक कार्यक्रमों में परफॉर्म करने हेतु बुलाने के लिए इवेंट मैनेजमेंट फर्मों की सेवाएं भी लेते हैं। वे अपने पूजा आयोजनों के उद्घाटनों के लिए फ़िल्मी जगत की हस्तियों को बुलाते हैं। कैटरिंग फर्मों से भोजन के लिए करार किया जाता है। और इस प्रकार पैसों के खेल के कारण पूजा आयोजन अब पूरी तरह से वाणिज्यिक बन गए हैं।

कई बड़े सामुदायिक पूजा आयोजनों में देवी माँ की मुख्य मूर्ति की पूजा नहीं की जाती है। मुख्य मूर्ति सिर्फ देखने के लिए लगाई जाती है। पूजा एक छोटी सी मूर्ति की होती है और यह पूजा, या वास्तविक पूजा, शायद मुख्य पांडाल में नहीं होती है बल्कि एक समीपस्थ पांडाल में होती है जहाँ आयोजकों और उनके परिवारों के अतिरिक्त कुछ ही लोग जा सकते हैं। दक्षिणी कोलकाता में एक बड़ी पूजा समिति के सचिव ने नाम न बताने की शर्त पर स्वीकार किया कि “हमारी मुख्य मूर्ति पूजा करने के लिए बहुत बड़ी है इसलिए वास्तविक पूजा के लिए हमारे पास एक अन्य मूर्ति है। साथ ही, पुष्पांजलि के दौरान हम भक्तों को देवी माँ की मुख्य मूर्ति पर फूल फेंकने नहीं दे सकते। वास्तविक पूजा मुख्य पांडाल के पीछे होती है।”

सामुदायिक पूजा, या बरोवारी पूजा (यह नाम इसलिए पड़ा क्योंकि पहली सामुदायिक दुर्गा पूजा का आयोजन 1970 में हुगली के गुप्तीपारा में 12, या बरो, ब्राह्मण मित्रों द्वारा किया गया था) का आयोजन करने का प्राथमिक उद्देश्य सामुदायिक मेलजोल को बढ़ावा देना था। तब तक, केवल समृद्ध जमींदार और व्यापारी ही अपने स्वयं के मकानों में दुर्गा पूजा का आयोजन किया करते थे और उन्हीं के अनुसार सारा काम होता था, जबकि स्थानीय समुदाय कुछ रीति रिवाजों में भाग ले सकते थे और हर दिन भोग (प्रसाद) ग्रहण करते थे। सामुदायिक पूजाओं का आयोजन इसलिए शुरू किया गया ताकि जाति, वर्ग और पंथ के अनपेक्ष सभी की भागीदारी सुनिश्चित हो सके। सभी स्थानीय निवासी छोटे-छोटे व्यक्तिगत चंदे प्राप्त करने और आडम्बरहीन पूजाओं के आयोजन के लिए खुशी से एक साथ इकट्ठे होते थे एवं पूजा के चार दिनों के दौरान एक साथ मिलकर खाते, पूजा करते, प्रार्थना करते, जश्न मनाते, नाचते और गाते थे। इससे समुदाय की भावना को प्रोत्साहन मिला और इस उत्सव में धार्मिक पहलू ने केंद्र में अपनी जगह बनायी। आखिरकार यह दुर्गा पूजा जो थी।

अफ़सोस की बात है कि आज अधिकांश सामुदायिक पूजाओं में स्थानीय समुदाय की दिली भागीदारी की कमी है। पुष्पांजलि कार्यक्रम अब बस नाम मात्र का है, भोग की परंपरा समाप्त हो रही है क्योंकि लोग रेस्तरां या यहाँ तक कि सड़क किनारे लगे स्टालों पर खाना पसंद कर रहे हैं और शाम का धुंची नाच अच्छी तरह से कोरियोग्राफ किया जाता है जो स्थानीय युवा लोगों द्वारा नहीं बल्कि पेशेवर नर्तकों द्वारा परफॉर्म किया जाता है। पड़ोसी लोग सांस्कृतिक कार्यक्रमों के लिए बमुश्किल एक साथ आते हैं। यहाँ तक कि कुछ दशक पहले तक, सुबह के समय स्थानीय पूजा पांडाल से धाक की आवाज वहां के स्थानीय लोगों के लिए एक अलार्म होती थी कि वे नहायें और और पहले से निर्धारित अपने-अपने कामों को करने के लिए पांडाल में इकट्ठे हो जाएँ। उनके काम थे – फलों को काटना और देवी माँ को समर्पित करने के लिए उन्हें व्यवस्थित करना, रीति-रिवाजों के साथ पुरोहितों की मदद करना, पुष्पांजलि के लिए फूलों और बेलपत्रों को बांटने में मदद करना, भोग तैयार करना और इसे बांटना, संध्या आरती और अन्य धार्मिक क्रियाओं के लिए पांडाल की सफाई करना, शाम को सांस्कृतिक कार्यक्रमों के मंचन के लिए प्रबंधन करना और चार दिन की पूजा में अगले दिन इस सारे कार्य की पुनरावृत्ति के लिए तैयार रहना। अब ज्यादातर बंगाली लोग पंडालों का नज़ारा लेते हैं, खाते हैं, दोस्तों से मिलते हैं और यदि मन करता है तो पुष्पांजलि अर्पित कर लेते हैं। इस प्रकार बंगाल में दुर्गा पूजा बिना धार्मिकता के एक बड़ा तमाशा बन गयी है।

कॉर्पोरेट घरानों द्वारा बेस्ट पांडाल और बेस्ट मूर्ति के लिए पुरस्कार इस बदलाव का कारण हो सकते हैं। इसने सामुदायिक दुर्गा पूजा के आयोजकों के बीच अधिक और बड़े स्पोंसर्स को लाने और अपने पूजा आयोजनों के पैमाने को बढाने के लिए प्रतिस्पर्धा की आग को हवा दी है। इसके साथ-साथ, पूजा आयोजकों ने कंपनियों से पैसे इकठ्ठा करने के लिए राजनेताओं से मदद मांगनी शुरू कर दी और राजनेताओं को भी लगा कि बड़ी पूजाओं, जो एक भारी भीड़ जमा करती हैं, को सहायता देना अपनी लोकप्रियता बढ़ाने का एक अच्छा तरीका है। आज सभी बड़े सामुदायिक दुर्गा पूजा आयोजक प्रमुख राजनेताओं द्वारा संरक्षण प्राप्त होने की डींगे मारते हैं। और राजनेताओं के साथ उनकी यह सम्बद्धता कुछ बुराइयों को लेकर चलती है जिनके व्यख्यान की कोई आवश्यकता नहीं है।

आज के बंगाल में यह तृणमूल कांग्रेस के बड़े नेता हैं जो बड़ी पूजाओं को संरक्षण देते हैं और एक दूसरे के साथ होड़ लगाते हैं कि उनकी पार्टी प्रमुख उनकी पूजाओं का उद्घाटन करें। ममता बनर्जी ने बहुत सारी दुर्गा पूजाओं का देवी पक्ष (महालय द्वारा घोषित) के आगमन से पहले ही उद्घाटन किया है जो कि अलग हटकर है और कुछ ऐसा है जिसका अधिकांश लोगों को एहसास ही नहीं है। इसलिए स्पष्ट रूप से, चूंकि दुर्गा पूजा से पूजा नदारद हो चुकी है इसलिए अब यह केवल एक त्यौहार है, यद्यपि एक बड़ा त्यौहार जरूर है। बंगाल में दुर्गा पूजा, शायद ‘दुर्गोत्सव (माँ दुर्गा का उत्सव) में परिणत हो चुकी है। दुःख की बात यह है कि माँ दुर्गा या देवी को इस उत्सव और चहल-पहल से कुछ लेना-देना नहीं है।