संस्कृति
डॉ. ऐरावतम महादेवन : एक सिंधु बुद्धिजीवी को श्रद्धांजलि

प्रसंग
  • भूतपूर्व सिविल सेवक और पुरालेखवेत्ता ऐरावतम महादेवन अब चिरनिद्रा में लीन हो चुके हैं लेकिन वह सिंधु लिपियों और तमिल-ब्राह्मी शिलालेखों पर अपनी प्रसिद्ध कृतियों को पीछे छोड़ गए हैं।

कहानी अप्रामाणिक है। भारतीय प्रशासनिक सेवा का एक युवा अधिकारी भारत के प्रधानमंत्री के सामने था। प्रधानमंत्री ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के साथ उसके संबंध पर सवाल उठाया। क्या वह एक सदस्य था? युवा अधिकारी ने सीधे प्रधानमंत्री की नज़रों में नज़रें डालकर कहा कि अगर वह उसको केवल आरएसएस से उसकी संबद्धता की वजह से सेवा से हटाते हैं तो वह एक ईमानदार अधिकारी को खो देगें। यह प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू थे और यह अधिकारी ऐरावतम महादेवन थे, जिन्होंने साल 1958 से 1961 तक वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय में बतौर सहायक वित्त सलाहकार के रूप में काम किया। मुझे नहीं पता कि यह बात सही है या नहीं लेकिन मुझे इतना जरूर पता है कि अपने शुरूआती दिनों में महादेवन एक स्वयंसेवक रहे हैं और गुरूजी गोलवलकर के प्रशंसक थे। साल 2006 में जब तमिलनाडु आरएसएस ने गोलवलकर पर एक शतवर्षीय संस्करण प्रकाशित किया तो गोलवलकर की महानता और सादगी की याद दिलाते हुए महादेवन ने इसमें अपना योगदान दिया था।

डॉ महादेवन को हड़प्पा लिपि के अपने अध्ययन में अपना पक्ष रखने के लिए जाना जाता है – एक ऐसा पक्ष जिसके बारे में कई लोग सोचते थे कि यह द्रविड़वादियों के साथ गहरी समानताएँ रखता था। हालाँकि, भारतीय-आर्यन-प्रवासन और मूल द्रविड़ के प्रति झुकाव के बावजूद उनका पक्ष अधिक सूक्ष्म था। Harappa.com को दिए गए एक साक्षात्कार में उन्होंने विस्तारपूर्वक यह समझाया –

“भारत में न तो आर्य हैं और न ही कोई द्रविड़ हैं। जो लोग राजनीतिक मायनों में द्रविड़ों के बारे में बात करते हैं मैं उनसे बिलकुल भी सहमत नहीं हूँ। यहाँ द्रविड़ लोग या आर्य लोग नहीं हैं – जिस तरह से पाकिस्तानी और भारतीय दोनों ही नस्लीय रूप से काफी हद तक समान हैं। हम लोग अन्तर्विवाह की एक बहुत लंबी अवधि की उपज हैं, प्रवास होते रहे हैं। अब आप भारतीय आबादी के किसी भी तत्व को नस्लीय रूप से अलग नहीं कर सकते हैं। इस तरह से यह कहने का कोई मतलब नहीं है कि तमिलनाडु के लोग सिंधु घाटी सभ्यता के उत्तराधिकारी हैं। सही मायनों में आप यह कह सकते हैं कि हड़प्पा और मोहंजो-दारो में मौजूदा समय में रहने वाले लोग उस सभ्यता के उत्तराधिकारी होने की ज्यादा संभावना रखते हैं। दरअसल, इस मामले में मेरी राय कुछ अलग है। मैं अक्सर कहता हूँ कि अगर भाषा की दृष्टि से सिंधु लिपि की कुंजी द्रविड़ है तो सांस्कृतिक रूप से सिंधु लिपि की कुंजी वैदिक है। मेरे कहने का मतलब यह है कि संभावित रूप से सिंधु घाटी सभ्यता के सांस्कृतिक लक्षणों का पंजाब और सिंध में उनकी उत्तराधिकारी भारत-आर्य सभ्यता के द्वारा अवशोषण कर लिया गया होगा और दूर दक्षिण में यह सभ्यता मान्यता में बदल गई होगी। दक्षिण भारत की मौजूदा सभ्यता पहले से ही भारत-आर्य और द्रविड़ दोनों ही संस्कृतियों की उपज है और भाषा भी पूरी तरह से दोनों तत्वों का मिश्रण है। अकेली तमिल ही द्रविड़ भाषा की अधिकांश संरचना को धारण किए हुए है।”

डॉ. महादेवन ने हड़प्पा सभ्यता की वैदिक संस्कृति प्रकृति की पुष्टि कैसे की? उन्होंने प्रसिद्ध यूनिकॉर्न मोहर पर ‘धार्मिक अंकन’ को सोम फिल्टर के रूप में पहचाना। ऐरावतम महादेवन दावा करते हैं कि वैदिक संस्कृति का केन्द्रीय पहलू, अर्थात सोम अनुष्ठान द्रविड़ियन था, जिसे आने वाले आर्यों के द्वारा गृहीत और समाकलित किया गया था। आर्य-द्रविड़ बाइनरी परिदृश्य में हड़प्पा सभ्यता की वैदिक प्रकृति की व्याख्या करने के लिए महादेवन ने जो किया वह देखना मुश्किल नहीं है। जो सबसे अहम है वह है उनका हड़प्पा संस्कृति के सबसे मुख्य पहलू के लिए ऋग वैदिक ज्ञान के सबसे पवित्र पहलू का उपयोग करना। कई द्रविड़वादियों की असुविधा की वजह से, हड़प्पा की मुहरों में अंतिम संकेतों पर डॉ. महादेवन के अध्ययन ने हड़प्पा समाज में मौजूद वर्ण जैसी संरचना के बारे में बताया।

डॉ ऐरावतम महादेवन ने अयोध्या मामले में वामपंथियों की बेईमानी का खुलासा किया। 1990 में चेन्नई में दिए एक लेक्चर में उन्होंने बताया कि एक तरफ जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के गणमान्य लोगों ने डॉ बी बी लाल के नाम का उल्लेख किए बिना उनके पुरातात्विक अध्ययन के डेटा के साथ राम जन्मभूमि आंदोलन पर हमला बोलना शुरू किया, वहीं दूसरी तरफ वे उनकी एक अन्य मुख्य खोज, कि बाबरी मस्जिद के स्थान पर एक प्राचीन संरचना मौजूद थी, पर चुप्पी साधे हुए थे। इससे प्रकट होता है कि जेएनयू के ‘विद्वान’ ‘इतिहास के राजनीतिक दुरुपयोग’ में शामिल थे। (अयोध्या एंड आफ्टर, 1991, डॉ इल्स्ट द्वारा उद्धृत)

पुरातात्विक डॉ के. के. मुहम्मद ने स्वराज्य के साथ साक्षात्कार के दौरान पिछली घटनाओं को याद करते हुए बताया कि ऐरावतम महादेवन एक ‘वास्तविक उदार व्यक्ति’ थे जो जेएनयू के कट्टरपंथियों के विपरीत सत्य के लिए प्रतिबद्ध थे। यह वही थे जिन्होंने डॉ मुहम्मद का समर्थन किया जो तथ्यों का खुलासा करने के लिए अयोध्या की खुदाई करने वाले एकमात्र मुस्लिम पुरातात्विक थे। डॉ मुहम्मद ने लाल द्वारा किए गए उत्खनन के तथ्यों का खुलासा किया जिससे 6 दिसंबर को हुई कारसेवा से दो साल पहले इंडियन एक्सप्रेस में बाबरी मस्जिद के नीचे एक संरचना का खुलासा किया गया। अगर मीडिया ने महादेवन और मुहम्मद द्वारा किए गए पर्दाफाश का प्रचार-प्रसार किया होता, तो 6 दिसंबर के बाद सांप्रदायिक दंगों के रूप में हुई भयंकर बर्बादी से बचा जा सकता था।

ऐरावतम महादेवन की द्रविड़ परिकल्पना के साथ निकटता कभी-कभी 1990 के दशक के अंत में उभरते नव-हिंदुत्ववादियों के साथ टकराई। महादेवन, जिन्हें 1970 में जवाहरलाल नेहरू फैलोशिप से सम्मानित किया गया था, ने एक अवधारणा प्रस्तुत की कि हड़प्पा लिपि ‘एक भाषा है जो सामान्य रूप से दक्षिणी द्रविड़ (तेलुगू समेत) और विशेष रूप से प्राचीन तमिल के सदृश है।’ उन्होंने पहले 1966 में तमिल-ब्राह्मी अभिलेखों का संग्रह प्रकाशित किया था। दि इन्डस स्क्रिप्टः टेक्स्ट्स, कॉनकॉरडेन्स एंड टेबल्स, जिसकी रचना उन्होंने 1977 में कड़ी मेहनत के साथ की थी, एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है और आज भी इस विषय पर शोध के लिए स्रोत-पुस्तक मानी जाती है।

ऐरावतम महादेवन और हिंदुत्व लेखक डॉ एन एस राजाराम 2002-2003 में हड़प्पा की मुहरों की व्याख्या पर एक तीखी बहस में शामिल हुए। माइकल विट्जेल और स्टीव फार्मर, हार्वर्ड विश्वविद्यालय से भारत-विरोधी इंडोलॉजिस्ट (भारतीय साहित्य, इतिहास, दर्शन इत्यादि का ज्ञाता) की एक टीम, ने राजाराम और पूरे हिंदुत्व आंदोलन पर हमला करने और उनका विरोध करने के लिए महादेवन के प्रमाण का इस्तेमाल किया। इसमें उन्हें चेन्नई की माउंट रोड पर स्थित माओवादी मीडिया संस्थान की मदद मिली, जिसके बाद विट्जेल-फार्मर की जोड़ी ने महादेवन को भी नहीं छोड़ा।

फार्मर सक्रिय रूप से इस अवधारणा की अगुवाई कर रहे थे कि हड़प्पा सभ्यता में अज्ञानता व्याप्त थी। महादेवन इसके आलोचक थे। फार्मर महादेवन पर सिंधु संकेतों को भाषा की वर्णमाला की तरह प्रतीत होने के लिए विकृत करने का आरोप लगाने में नहीं हिचकिचाए। 2009 में, महादेवन ने वैज्ञानिकों की एक टीम के साथ कठोर गणितीय पद्धति का उपयोग करते हुए हड़प्पा लिपि का अध्ययन किया और प्रमाणित किया कि प्रतीकों में एक भाषा निहित है। जब विज्ञान में दस्तावेज प्रकाशित किया गया तो फार्मर और विट्जेल ने यह कहते हुए इस पर निशाना साधा कि ‘इसमें त्रुटिपूर्ण सामग्री है जिसके गलत परिणाम होंगे’। उस समय महादेवन ने अनुभव किया कि ये लोग, विशेष रूप से फार्मर, “लगातार आक्रामक शैली” का प्रदर्शन कर रहे थे।

डॉ ऐरावतम महादेवन का जीवन ईमानदारी, सादगी और मुख्यतः सैद्धांतिक तपस्या का जीवन है। वह द्रविड़ अवधारणा के समर्थक थे लेकिन इसने उन्हें हड़प्पा संस्कृति और प्रतीकों का अध्ययन करने के लिए वैदिक साहित्य का उपयोग करने से नहीं रोका। यहाँ तक कि जब नव-हिंदुत्ववादियों ने इन पर हमला किया और जब वह छद्म-धर्मनिरपेक्षतावादियों से घिरे हुए थे, तब भी उन्होंने आरएसएस के साथ अपने संबंधों को स्वीकार करने और गुरूजी गोलवलकर की प्रशंसा करने में संकोच नहीं किया। लेकिन उनके प्रोत्साहन के लिए, डॉ मुहम्मद ने 1990 में जेएनयू शिक्षाविदों का पर्दाफाश करने वाला पत्र नहीं लिखा होता, जो आज भी इसके एक प्रमाण के रूप में है कि मार्क्सवादी इतिहासकारों ने आपराधिक रूप से मैत्रीपूर्ण समाधान और सांप्रदायिक सद्भावना को विफल कर दिया था।

अस्सी वर्षीय डॉ. ऐरावतम महादेवन का 26 नवंबर को निधन हो गया लेकिन वह सिंधु लिपियों और तमिल-ब्राह्मी शिलालेखों पर अपनी कृतियों को पीछे छोड़ गए जो लोगों को इस तरह के कठोर परिश्रम करने के लिए प्रेरित करती रहेंगी।

अरविंदन स्वराज्य के एक सहायक संपादक हैं।