संस्कृति
दिवाली : अंधेरे के बीच में रोशनी की आहट

प्रसंग
  • ‘दीपावाली’ शब्द का मतलब व्यवस्था या रोशनी की एक पंक्ति से है।    
  • परंपरागत रूप से, दीपावाली साल की सबसे अंधेरी रात को मनाई जाती है जब रोशनी की सुंदरता और रहस्य को विशेष तरीके से अनुभव किया जा सकता है।

हिंदू परंपरा में,  रोशनी ईश्वर और सच्चाई का प्रतीक है। भगवान को भगवद्गीता (13:17) में अंधेरे से परे, सभी रोशनियों की रोशनी के रूप में वर्णित किया गया है। कथा उपनिषद (5:15) सिखाते हैं कि भगवान में मूल और अनियंत्रित प्रकाश, बाकी सब कुछ मौजूद है और चमकता है। हिंदू धर्म भगवान के अनंत प्रकाश को दिखाने के लिए हमें सूर्य, चंद्रमा, सितारों और अग्नि की रोशनी को देखकर सृष्टि के लिए आदरणीय दृष्टिकोण के लिए आमंत्रित करता है। दिवाली के अवसर पर, हिंदु अंधेरे से प्रकाश (तामसो माँ ज्योतिर गमय) का नेतृत्व करने के लिए प्रार्थना करते हैं।

त्यौहार पास आते ही हिन्दुओं के घर पूरी तरह से साफ़ किए जाते हैं, क्योंकि दिवाली पर जब शाम अंधेरे में बदलती है, तो घर मिट्टी के दीयों से जादुई तरीके से रोशन किए जाते हैंI ये रचनात्मक रूप से सममित पंक्तियों और कलात्मक स्वरुप में रखे जाते हैं। हिंदू बच्चे इस रोशनी को व्यवस्थित ढंग से रखने और पुनर्व्यवस्थित करने की आजादी का आनंद लेते हैं।

हालाँकि, यह स्वतंत्रता आवश्यकताओं के बिना नहीं है। कुछ विशेष स्थान हैं जहाँ पर रोशनी रखी जाती है। हर उन जगहों पर जहाँ अंदरूनी बहरी से मिलता है, अंदर बाहर से मिलता है और स्वयं दुनिया से मिलता हैI हिन्दू घर की देहलीज पर छोटी सी रोशनी की सादगी, आध्यात्म जीवन और दिवाली के मतलब को शक्तिशाली रूप के बारे में बताती हैI हिंदू परंपरा में, घर, शरीर के लिए एक रूपक है। भगवद्गीता (5:13) शरीर की तुलना घर के नौ दरवाजों के साथ करती है। इस घर के भीतर जो रोशनी चमकती वह भगवान है। यह रोशनी जिसके कारण हम देखते हैं, हम सुनते हैं, हम स्वाद लेते हैं, हम स्पर्श करते हैं और हम गंध महसूस करते हैं। इसकी चमक में, हमारे दिमाग सोचते हैं, कल्पना करते हैं और निर्माण करते हैं। जीवन के लिए अपनी अनिवार्यता पर जोर देने के लिए, केना उपनिषद (अध्याय 1) दिव्य प्रकाश को कानों के कान, दिमागों के दिमाग,  भाषणों के भाषण, साँसों की साँस और आंखों की आंख के रूप में वर्णित करता है। यह प्रकाश आपकी या मेरी रोशनी नहीं है। यह वह प्रकाश है जिसके कारण सभी आँखें देखती हैं, सभी कान सुनते हैं और सभी दिमाग जानते हैं। यह वही प्रकाश है जो समान रूप से सभी शरीरों और सभी दिमागों को जीवंत करते हुए सभी में उपस्थित हैI संस्कृत भाषा में इस प्रकाश उपयोग किया जाने वाला शब्द आत्मा हैI भगवद्गीता (10:20) में, श्री कृष्ण अपने शिष्य अर्जुन से पूछते हैं कि उन्हें सभी प्राणियों के दिल में चमकती हुई आत्मा जाना जाए।

हिंदू परंपरा में मानव जीवन की पूर्ति अपने मन और हर किसी के मन इस दिव्य प्रकाश के ज्ञान में है। यह वही ज्ञान है जो हमें लालच और भय से मुक्त करता है और हमें शांति, आत्म-स्वीकृति और खुशी के साथ आशीर्वाद देता है। भगवद्गीता (2:70) इस शांति की तुलना महासागर की गहराई में स्थिरता के साथ करती है,  जिसमें भले ही लहरें नाराज हो जाएं और नदियों को तटों तक ले जायें।

इस धार्मिक ज्ञान और जागृति के सबसे बड़े लालच में से एक इसका निजीकरण है। भीतर की शांति का आनंद लेने के लिए, हम मानते हैं कि हमें अपने घर का दरवाजा बंद करना होगा, और दुनिया से मुंह मोड़ना पड़ेगा। हम मानते हैं कि प्रामाणिक धर्म, दुनिया में उदासीनता और इसकी चिंताओं को अन्दर की तरफ दर्शाता हुआ मोड़ है। हम ईश्वर और दुनिया, आंतरिक और बाहरी, घर और सार्वजनिक स्थान पर एक-दूसरे को पारस्परिक रूप से अलग मानते हैं। हम मानते हैं कि एक के करीब बढ़ने के लिए और किसी दूसरे से आगे बढ़ना है। दुनिया की तरफ मुड़ने के लिए भगवान से दूर जाना है; भीतर देखने के लिए, हमें बाहर की ओर देखना बंद कर देना चाहिए। धार्मिक निजीकरण अक्सर दुनिया की नकारात्मकता से जुड़ा होता है; दुनिया को अंधेरे और मुक्ति के स्थान के रूप में दर्शाया जाता है जो दुनिया से बचने के समान होता है।

दिवाली की रात घर की दहलीज पर प्रकाश हमें याद दिलाने के लिए है कि अगर हमारे दिल में भगवान की रोशनी भीतर से बाहर के अंधेरे में नहीं निकलती है तो रोशनी के प्रति जागृति अधूरी है । मानव हृदय में ईश्वर की रोशनी अंधेरे में घिरी हुई दुनिया को उजागर करने का प्रतिनिधित्व करती  है।

ईश्वर का ज्ञान जो सक्रिय करुणा में हमें दुनिया के साथ एकजुट करने के लिए बाहर नहीं दिखता है वह नहीं है और उसकी कमी है। हिंदू परंपरा चाहती है कि ऍम समझें कि हमारे भीतर चमकने वाले भगवान की रोशनी सभी में समान रूप से है। सेव्तास्वतारा उपनिषद (4: 3-4) पुरुषों और महिलाओं में, बूढ़े और युवाओं में, गहरे नीले की तितली, लाल आंखों वाला हरा तोता, बारिश के बादल, मौसम और महासागर के रूप में इस प्रकाश के बारे में खूबसूरती से बताते हैंI अपने भीतर प्रकाश को अपनाने और मूल्यवान करने के लिए सभी प्राणियों के भीतर अपनाना और मूल्यवान बनाना हैI भगवान के बनाये हुए सभी सृजनों को देखते हुए यह दुनिया में गहन और उदार तरीके से खुलना चाहिए। जब हिंदू, और अन्य धर्मों के लोग, इस शिक्षा को भूल जाते हैं, तब हम दूसरों का अवमूल्यन करते हैं, उन्हें पीड़ित करते हैं और उनके साथ अन्यायपूर्वक व्यवहार करते हैं।

देहरी का प्रकाश हमें याद दिलाता है कि अंदरूनी प्रकाश बहार आना चाहिए, यह ये भी याद दिलाता है कि हम अंधेरा नहीं हटा सकते अगर हमारा अंदरूनी प्रकाश जागृत नहीं हैI अगर हमारे मन अज्ञानता (अविद्या), लालच(काम) और नफरत(द्वेष) के अंधेरे में डूबे हुए हैं, तो हम दुनिया के लिए अच्छा नहीं कर सकतेI अंधेरे में खोये हुए हम दुनिया की दुश्वारियों में अपना योगदान देंगे लेकिन इनपर काबू पाने में नहींI बाहर चमकने से पहले प्रकाश को अन्दर चमकना चाहिएI अंधकार, अन्धकार को नहीं हटा सकताI

हिन्दू परंपरा में प्रकाश ज्ञान का प्रतीक है, जैसे अंधकार अज्ञानता काI । यह आसान और लालच भरा है, हालाँकि, जब हम अज्ञानता को दूर करने वाले ज्ञान के बारे में बात करते हैं, तो अज्ञानता को दूर करने के लिए एक अमूर्त,  दूरस्थ और ईश्वरीय घटना मानव जीवन की ठोस वास्तविकताओं से अलग होती है।

देहरी पर प्रकाश, हालांकि, जो सिर्फ दरवाजे के बाहर चमकता है यह हमें याद दिलाता है कि अंधेरे को दूर किया जाना वास्तविकता है। यह यहां है, यह अब है, और यह हमारे अपने समुदायों में मौजूद है। यह सभी सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक, राजनीतिक और धार्मिक संरचनाओं का रूप लेता है जो मनुष्यों को विचलित करते हैं और जिनसे दुःख मिलता है। हम अंधेरे में रहते हैं जब हम अपनी महिलाओं पर दमन करते हैं, एलजीबीटीक्यू समुदाय को अपमानित करते हैं, दलितों के खिलाफ हिंसा करते हैं और बच्चों का अभद्र बोलते हैं, और प्रकृति का शोषण करते हैं। ये अंधेरे के राक्षस हैं जिनके खिलाफ दहलीज पर चमकदार प्रकाश रोशन करना चाहिए।

दिवाली की तमाम खूबसूरत रोशनियों के बीच में, आइए देहरी पर प्रकाश को रखें: वह स्थान जहाँ प्रकाश अंधेरे से मिलता है, आंतरिक भी बाहरी से मिलता है और हमारी आध्यात्मिकता दुनिया से मिलती है। यह वह स्थान है जहाँ हमारे मन से निकलने वाले भगवान (आत्मज्योति) की रोशनी दुनिया को प्रेमपूर्ण करुणा और न्याय के प्रति प्रतिबद्धता से जोड़ती है। यह हमें याद दिलाती है कि, दिवाली पर, हमारे घरों के दरवाजे प्रकाश को दुनिया में प्रवेश के लिए खुले रहना चाहिए। हमें खुद को अपने घरों और अपनी दुनिया में बंद करके दिवाली नहीं मनानी चाहिएI

डॉ अनंतानंद रामबचन सेंट ओलाफ कॉलेज, मिनेसोटा, यूएसए में धर्म के प्रोफेसर हैं। उनकी पुस्तकों में शामिल हैं, ‘अकोम्प्लिशिंग द अकोम्प्लिष्ट : द वेदास एस ए सोर्स ऑफ वेलिड नोलेज इन संस्कारा’, ‘द लिमिट्स ऑफ स्क्रिप्चर: विवेकनंदाज रीइंटरप्रीटेशन ऑफ द अथोरिटी ऑफ द वेदास’, ‘द अद्वैत वर्ल्डव्यू: गॉड, वर्ल्ड एंड ह्यूमैनिटी’ एंड ‘ए हिन्दू थियोलोजी ऑफ लिबरेशन: नॉट-टू इस नॉट वन’