संस्कृति
दीपावली विशेष- श्रीलंका के मंदिर में सुरक्षित सीता की स्मृतियाँ

कोलंबो से 220 किलोमीटर दूर है बेहद खूबसूरत नुवारा एलिया। श्रीलंका के इस दूरदराज कोने में हिंदी कोई नहीं जानता मगर हनुमान चालीसा की गूंज अयोध्या और चित्रकूट की अनुभूति कराती है। दिवाली के समय दक्षिण भारतीय शैली के सीता अम्मन टेंपल में विशेष पूजन इस खूबसूरत देश की हजारों साल पुरानी स्मृतियों में ले जाने वाला अनुभव है।

श्रीलंका के सबसे लोकप्रिय पर्यटन केंद्र नुवारा एलिया से सिर्फ 5 किलोमीटर दूर एक हरी-भरी पहाड़ी की तलहटी में यह जोरदार बारिश का मौसम होता है। समुद्र तल से 6,200 फुट ऊँचाई पर औसत तापमान 15 डिग्री।

हिंदी और तमिल में राम, सीता और हनुमान की स्तुतियाँ कड़कड़ाती ठंडी हवाओं में अमृत घोलने वाली हैं। हम यह सुनकर ही यहाँ पहुँचे थे कि राम के वनवास के दिनों में रावण ने सीता का हरण कर यहीं कहीं उन्हें रखा था।

स्थानीय लोगों की स्मृति में यह दर्ज है कि सामने गगनचुंबी पहाड़ियों पर ही कहीं अशोक वाटिका थी। यह एकमात्र मंदिर आज लंका में सीता की उपस्थिति का प्रतीक है। ठंडे मौसम ने यहां आने का आनंद दो गुना कर दिया था। ऐसी जगह कहाँ बार-बार आना होता है। इसलिए हर पल को कैमरे में उतारना ज़रूरी था।

हमने बारिश के रुकते और सूरज के बादलों से झाँकते ही दिन की चमकती रोशनी में मंदिर की छवियाँ लीं। पुरोहित ने राम, लक्ष्मण, सीता और हनुमान की प्राचीन प्रतिमाएँ 5,000 साल पुरानी बताईं। हम उनकी विशेष आरती के साक्षी बने। गुजरात और दिल्ली के कई श्रद्धालु भी हमें यहाँ मिले।

हम नुवारा एलिया से रात को फिर मंदिर लौटे। इस समय बारिश रुक-रुककर हो रही थी। बाहर हवा काफी तेज थी। दिन के समय घनी हरियाली की पृष्ठभूमि में देखे मंदिर का रूप इस समय एकदम अलग है।

शाम ढलते ही इसकी अलग छटा नज़र आई। हरियाली अंधेरे में छिप गई है और उस पहाड़ी सोते की आवाज़ लगातार गूंज रही है, जिसके बारे में कहते हैं कि सीता अशोक वाटिका से उतरकर यहीं स्नान के लिए आती थीं।

पानी रुका तो हमने रात की रोशनी में सोने से दमकते मंदिर की यादगार तस्वीरें हर कोने से लीं। स्थानीय श्रद्धालु शाम सात के बाद यदाकदा ही आते हैं इसलिए इस वक्त पूरी तरह शांति है। रात की जगमग में हमने दीयों की खास रोशनी की।

अशोक वाटिका में 11 महीने

युग बीत गए। उधर भारत की चेतना में राम बसे हैं तो इधर श्रीलंका की स्मृतियों में सीता भी सुरक्षित हैं। नुवारा एलिया के घुमावदार ऊँचे पहाड़ों की सघन हरियाली में ही कहीं अशोक वाटिका थी। दो दिशाओं में आधे आसमान तक ऊँचे ऐसे ही एक पहाड़ी कोने में सीता का मंदिर है। इस इलाके में कई मंदिर हैं मगर वानर सिर्फ सीता मंदिर में ही नज़र आए। मंदिर के प्रवेश द्वार से लेकर अंदर तक हनुमान यहाँ वीर योद्धा के रक्षक रूप में अनेक प्रतिमाओं में हैं। मंदिर के पीछे एक चट्‌टान पर हनुमान के चरण चिह्न भी हैं।

एक खास किस्म का अशोक वृक्ष सीता निवास के इसी दायरे में मिलता है, जिसमें अप्रैल के महीने में लाल रंग के फूल आते हैं। गॉल नाम के क्षेत्र में ऐसी जड़ी-बूटियों की भरमार है, जो पूरे श्रीलंका में कहीं नहीं होतीं। कथा है कि हनुमान संजीवनी बूटी के लिए जिस पहाड़ को उठा लाए थे, उसमें आईं वनस्पतियों का ही यह विस्तार हैं। सिंहली आयुर्वेद में यह औषधियाँ आज भी वरदान मानी जाती हैं।

देवुरुम वेला नाम की जगह के बारे में प्रचलित है कि यहीं सीता की अग्नि परीक्षा हुई थी। यहाँ की मिट्‌टी आश्चर्यजनक रूप से काली राख की परत जैसी है, जबकि देश भर में भूरी और हल्के लाल रंग की मिट्‌टी पाई जाती है।

श्रीलंका के तमिल समुदाय के जाने-माने नेता वी राधाकृष्णन तब शिक्षामंत्री भी थे और वे ट्रस्ट के अध्यक्ष भी हैं। वे नुवारा एलिया से ही संसद में चुने जाते रहे। उन्होंने बताया-रावण की लंका का दहन यहीं हुआ। मिट्टी में मोटी काली परत स्थानीय लोकमान्यता में इसी दहन कथा से जुड़ती है। सीता की स्मृतियों से जुड़ा यह स्थान अब एक पवित्र तीर्थ बन चुका है। आस्था की दृष्टि से हमारे लिए यह स्थान उतना ही महत्वपूर्ण है, जितना भारत में अयोध्या।

वनवास के 14 सालों में राम, लक्ष्मण और सीता ने कहाँ-कितना समय गुज़ारा और सीता कितने दिन लंका में रहीं? रामेश्वर में रह चुके और इन दिनों त्र्यंबकेश्वर में मौजूद वैदिक पंडित विष्णु शास्त्री ने बताया-

“भगवान ने वनवास के 12 वर्ष चित्रकूट में बिताए थे। लगभग एक वर्ष पंचवटी में रहे। यहीं से रावण ने सीता का हरण किया। यहीं से राम ने किष्किंधा की ओर प्रस्थान किया, जहां हनुमान और सुग्रीव से उनकी मित्रता हुई। बालि वध हुआ। रामेश्वर में जटायु के भाई संपाति ने ही सीता की तलाश में निकले वानरों को सीता का पता बताया था। फिर राम का रामेश्वरम आगमन, सेतु निर्माण और युद्ध के लिए लंका प्रस्थान के प्रसंग हैं। ऐसा अनुमान है कि लंका में सीता 11 माह रहीं।”

सीता मंदिर के एक ट्रस्टी एस थियागु भी स्थानीय मान्यता के आधार पर इसकी पुष्टि करते हैं।

शुरू में मंदिर विरोध यहाँ भी

नुवारा एलिया श्रीलंका के सेंट्रल प्रोविंस में है। यहाँ की 15 लाख आबादी में 10 लाख तमिल हैं। सबसे पहले 1818 में ब्रिटिश शासक तमिल लोगों को यहाँ लेकर आए थे। इस क्षेत्र में संसद की आठ सीटों में से पांच पर तमिल सांसद हैं। वी राधाकृष्णन इन्हीं में से एक हैं, जो अपकंट्री पीपुल्स फ्रंट के लोकप्रिय नेता हैं। बीस साल पहले भव्य सीता मंदिर के निर्माण को लेकर एक विरोध यहां भी हुआ।

दरअसल स्थानीय बौद्ध सिंहली नहीं चाहते थे कि सीता के मंदिर को कोई बड़ी ऐतिहासिक पहचान इस इलाके को मिले। तब राधाकृष्णन ही थे, जिन्होंने तमिलों को एकजुट कर मंदिर को भव्य रूप दिलाया। तत्कालीन पर्यटन मंत्री धर्मश्री सेनानायक मंदिर के लिए अलग से जमीन देने को राजी हुए। यहां मोरारी बापू की कथा हुई। कुंभाभिषेकम् में श्रीश्री रविशंकर आए। भारत की तत्कालीन लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन आकर गईं। अब हर दिन कई भारतीय यहां आते हैं।

मुद्रिका प्रसंग पर रिंग फेस्टिवल

हर महीने श्रीलंका में पोएडे यानी पूजा का एक दिन तय है। इस दिन देशभर के मदिरालय बंद रहते हैं और लोग शाकाहार पर ज़ोर देते हैं। सीता अम्मन टेंपल में तब सबसे ज्यादा चहलपहल होती है।

सैकड़ों पर्यटक भी स्थानीय श्रद्धालुओं के साथ मिथिला के राजा जनक की बेटी और अयोध्या के युवराज राम की अर्धांगिनी सीता की कहानी रावण की लंका के इस कोने में आकर सुनते हैं और बुराई पर अच्छाई की जीत की प्रतीक राम-रावण के युद्ध की कथा स्मृतियों में ताज़ा हो जाती है।

जनवरी में पोंगल के एक महीने पहले से तमिल समाज के गाँव-गाँव में भजन गाए जाते हैं। 15 जनवरी को पूर्णाहुति पर शोभायात्रा निकलती है। राम के दूत के रूप में हनुमानजी ने यहीं अशोक वाटिका में मुद्रिका भेंट की थी। यह दिन रिंग फेस्टीवल के रूप में प्रसिद्ध है।