संस्कृति
दिवाली के दौरान अँधेरे को दूर करना: दीया प्रज्ज्वलित करने की बारीकियाँ

प्रसंग
  • दिवाली असल में घर के दक्षिण में दीया जलाने से साथ शुरू होती है। तिल का तेल या घी दीया जलाने के लिए सबसे अच्छा माध्यम है, जिसमें बाती को लम्बी करके रखा जाता है।
  • दीया जलाने के कई कारण हैं, जिन्हें यह आलेख स्पष्ट करता है।

दीपावली का त्यौहार पूरे भारत में बहुत उल्लास के साथ मनाया जाता हैI जब कोई अनजान इन्सान पूछता है कि दीपवाली का क्या मतलब है, तो पहला जवाब जो उसे मिलता है वह यह कि यह रोशनी का त्यौहार हैI

आगे सवाल करते हुए, अगर कोई पूछेगा कि ‘कोई क्यों दीया जलाता है’? तो उसे यह जवाब मिलेगा कि यह अँधेरे या अज्ञान को मिटाने के लिएI आगे के सवाल कि दिये कैसे अज्ञानता को मिटने में मदद करते हैं, दुविधा पैदा कर सकते हैंI जैसे कि दीपावली भारत के ज़्यादातर हिस्सों में मनाई जाती है, इसकी और गहराई में जाते हुए हम देखते हैं कि आमतौर पर तीन दिनों में तीन विशिष्ट त्यौहार होते हैं, नरक चतुर्दशी, लक्ष्मी पूजा जो अमावस्या को होती और आखिर में बाली पद्यामीI सभी दिन परिवार और दोस्तों के साथ पकवान और मिठाई साझा करते हुए आनंद में बीततें हैंI

जहाँ यह आनंद अच्छा है, इस आनंद के परे जाकर इसकी सच्चाई को गहराई में जाकर भी तलाश करना चाहिएI

त्यौहार को मनाने से किसी को कितना फायदा मिलेगा, यह इस बात पर निर्भर करता है कि इसको किस स्तर पर मनाया गया हैI सभी त्यौहार प्रतीकात्मक हैं, जिनके गहराई के अर्थ समझने की जरुरत है।

दीपावली वास्तव में चंद्र महीने के दूसरे छमाही के तेरहवें दिन त्रयोदाशी पर घर के दक्षिण की ओर एक दीये को प्रज्ज्वलित करने के साथ शुरू होती है, वैदिक ग्रंथों के अनुसार, दक्षिणी दिशा यम की दिशा है। आम गलतफहमी यह है कि यह मृत्यु से रक्षा करती हैI

हालाँकि मृत्यु अटल सच्चाई है और यह सभी को आनी हैI तो हम असल में किसको दूर भागने की कोशिश कर रहें हैं? वेदों के अनुसार, तमसो माँ ज्योतिर्गमय, मृत्योर्मा अमृताम्गमयI यहाँ अमृता का मतबल मृत्यु से आज़ादी नहीं, जैसा कि गलत अनुवाद किया गया है, बल्कि एक ऐसी स्थिति जहाँ रूप में कोई बदलाव नहीं हैI तो प्रतीकवाद त्रियोदशी पर दीया जलाने के साथ शुरू होता हैI अगला त्यौहार चंद्र महीने के दूसरे छमाही के चौदहवें दिन, चतुर्दशी होता है, जिस दिन कृष्ण ने नरकासुर से छुटकारा पाया थाI आइये, नरकासुर नाम के बारे में जानते हैंI यह इसका असली नाम नहीं है, यह उपनाम है, जो इस असुर को दिया गया था, जो यह दर्शाता है कि यह वही है जो नरक देता है या लोगों को पीड़ा देता हैI इसलिए, दीपावली के पहले दिन कृष्ण को हमारे और हमारे आस-पास के लोगों के दुःखों के लिए ज़िम्मेदार लोगों से छुटकारा पाने के लिए एक दीया जलाया जाता हैI अगर ऐसा होता है तो, जब हम दीया जलाएं, हमें यह कहना चाहिए कि वहां ऐसे लोग हैं जो दूसरों को दुःख देते हुए ‘प्रतीत’ होते हैंI हम सिर्फ ‘प्रतीत’ कह सकते हैं क्योंकि हमें सच्चाई नहीं पता और हमारी सोच विकृत हो सकती हैI हम वास्तव में यह कह रहे हैं “कृपया हमें ऐसे लोगों या शक्तियों से बचाएं।” ऐसा होने के बाद ही लक्ष्मी का हमारे जीवन में आने के लिए रास्ता साफ हो सकता है।

अमावस्या के दिन हम लक्ष्मी पूजा करते हैंI अमावस्या ही क्यों? अमावस्या के दिन चन्द्रमा अपने सबसे छोटे आकर में होता हैI इस दिन चन्द्रमा की रोशनी या सूरज से प्रतिबिंबित रोशिनी नहीं होती हैI चंद्रमा की रोशिनी मन के प्रतिबिम्ब का प्रतीक होती हैI प्रतिबिंबित के प्रकाश में वैसी चीजों की कल्पना की जा सकती है जैसी हम चाहते हैं, ना कि जैसी वह हैंI जब वह प्रतिबिंबित प्रकाश सबसे कम होता है तब लक्ष्मी का आगमन होता हैI लक्ष्मी सिर्फ धन ही नहीं बल्कि आठ अलग-अलग रूपों में आशीर्वाद का प्रतिनिधित्व करती हैI हम प्रार्थना करते हैं कि लक्ष्मी हमें आशीर्वाद के सभी रूपों के साथ आशीर्वाद दें जिससे हम सही रोशनी में देख सकते हैं।

अगले दिन हम बाली पद्यामी मनाते हैंI बाली, जैसा कि प्रचलित है, बुरा व्यक्ति नहीं थाI बल्कि उसने यह कसम खायी थी कि ब्राह्मण उससे जो भी दान मांगेगा वह उसे दे देगाI हालाँकि यह सोच उसकी अहम की वजह से थी कि उसके पास बहुत कुछ देने के लिए थाI इसके अलावा, उसका एक मकसद था – उसने ऐसा इसलिए किया क्योंकि वह इंद्र की गद्दी लेना चाहता था। यही कारण है कि विष्णु एक छोटे लड़के, वामन के रूप में आए और बाली से तीन पग की भूमि का दान माँगाI असल में, बाली के गुरु शुक्राचार्य ने इस अनुरोध के खिलाफ सलाह दी थी; हालांकि, बाली ने भी अपने गुरु को नजर अंदाज कर दिया! तब, वामन त्रिविक्रमा के रूप में प्रकट हुए। तो जब हम बाली पद्यमी पर ज्ञान के दीपक को प्रज्ज्वलित करते हैं, तो हमें खुद से यह पूछना चाहिए “बाली को वास्तव में क्या दिखा था’’? जब वामन त्रिविक्रमा के रूप में प्रकट हुए तो इसका मतलब क्या था? जो बाली ने देखा कि त्रिविक्रमा ने पहले पग में पूरी धरती नाप ली, तो उन्होंने, धरती पर सब चीज़ों में विष्णु को देखाI दूसरे पग में, उन्होंने देखा कि विष्णु ने अंतरिक्ष को नाप लिया- जिसमें आकाश और अन्य आध्यात्मिक दुनिया भी शामिल थीI तो बाली को पुरे ब्रह्माण्ड में सिर्फ विष्णु को देखाI ब्रह्मांड में कुछ भी नहीं बचा था जहां बाली ने भगवान के पैर नहीं देखे। तब त्रिविक्रमा ने उनसे पूछा, “मैं तीसरा पग कहां रख सकता हूं?” भगवान को परम पेशकश अपनी आत्मा की ही की जा सकती है। तो अंत में, बाली ने खुद को पेश करते हुए कहा, “विष्णु अपना पग मुझ पर रख दें।”

दिलचस्प बात यह है कि, खुद को त्रिविक्रमा को पेश करके, बाली को वह सबकुछ मिला जो वह असल में चाहता था! इसके अलावा, भगवंत ने उसे बताया कि जब उन्हें कठिनाइयों का सामना पड़ेगा, जो नरक का प्रतीक है, वह वहां बाली की रक्षा करेंगे, ताकि वह पीड़ित न हो। इसलिए, जब हम बाली पद्यमी पर एक दीया प्रज्ज्वलित करते हैं, तो यह विचार हमारे मन में आना चाहिएI

पूर्व की संस्कृतियां दीये के प्रकाश को बहुत मानती हैंI सवाल यह पुछा जा सकता है कि ” लोग दीया या मिट्टी के दीपक में क्या प्रतीक शामिल करने की कोशिश कर रहे थे।” मोमबत्ती या धातु के कंटेनर को प्रज्ज्वलित करके दीये के रूप में क्यों न उपयोग करें? कोई भी बाती को कई आकारों में प्रज्ज्वलित कर सकता हैI इसी तरह एक जीव को अलग-अलग रूपों में शरीर प्रदान किया जा सकता है। इस प्रकार, यह एक सौभाग्य है कि किसी के पास साधना शिरिरा, अर्थात् एक ऐसा शरीर है जो आध्यात्मिक प्रगति को जगा सकता है। इस शरीर को मिट्टी के दीये द्वारा दर्शाया जाता है। दीया का छोर ज्यादातर गोल होता है जो धर्म चक्र का प्रतीक है। हमारे ज्ञानी लोग चाहते थे कि हम धर्म चक्र के बारे में विचारें और वह धर्म हर समय आकांक्षी का अभिन्न हिस्सा होना चाहिए। हालांकि, सभी गोल पात्र दीये नहीं हो सकते हैं।

हम मिट्टी के बर्तन में दीये को प्रज्ज्वलित नहीं कर सकते। साधना शिरिरा में एक दीया बाती के नुकीले हिस्से में एक बिंदु बनाता हैI अगर यह नुकीला बिंदु बाती को ऊपर रखने में मदद करेगा, तभी बर्तन दीया जलाने के लिए उपयुक्त होगाI कोई भी मिटटी के बर्तन में दीया नहीं जलाता क्योंकि उसमें कोई केंद्र बिंदु है ही नहींI जब भी कोई दीया प्रज्ज्वलित करता है तो बाती को हमेशा नुकीली बिंदु पर रखता है, और उसे दीये से थोड़ा आगे निकाल दिया जाता हैI ऐसा इसलिए कि रोशनी जो जलती है, दीये के अंदर नहीं है, यह बाहर की तरफ है और खुद से परे अंधेरे को दूर करती है। प्रतीकात्मकता को आगे बढ़ाते हुए, यदि कोई मानव तंत्र में चक्रों को देखता है, तो सहस्रहर वास्तव में भौतिक शरीर के बाहर है जो दशान्गुलम के माप द्वारा बताया गया है।

जीव की तीन प्रमुख अवस्थाएं होती हैं, जिसमें हम जागते हैं, सोते हैं, और सपने देखते हैं जो स्वाभाविक रूप से होते हैं। हालांकि, चौथी अवस्था तुरीय है, जो प्राकृतिक अवस्थाओं से थोड़ी अलग  है, यह केवल तभी हो सकती है जब भगवन्था की ओर उस बिंदु या भगवान मौजूद हों। बाती समय या जीवन का प्रतिनिधित्व करती है। तीन सामान्य रूपों में एक शरीर में मौजूद होना अच्छा नहीं होताI यह कोई भी नहीं जानता कि उसके पास कितना समय है या बाती कितनी देर तक जल पाएगी। अक्सर लोग अपनी उम्र को बढाने के लिए कई चीज़ें अजमाते हैंI यह बाती को बढ़ाने की कोशिश की तरह है। इसको करने का सबसे बढ़िया तरीका बाती को बढाना नहीं बल्कि दीये के बाहर बाती को बढ़ाना हैI यह एकमात्र सही उपाय है कि रोशिनी कितनी देर तक रहेगीI

एक दार्शनिक सवाल उठता है कि दीये में जो तेल है क्या वह जल रहा है या फिर बातीI इसका जवाब है, दोनोंI पदार्थ को निचोड़कर तेल निकला जाता हैI उन्हीं चीजों को दीये में उपयोग किया जाता है जिनके पास बाती को पोषित करने की क्षमता है ताकि वे प्रज्ज्वलित हो सके और जब उन्हें बाती के नजदीक लाया जाए वह जलती रहे। दीये में तेल निरंतर शक्ति प्रदान करता है। बाती को तेल सोखने की क्षमता होनी चाहिएI यदि तेल निरंतर शक्ति प्रदान नहीं कर सकता है तो बाती बहुत लंबे समय तक नहीं जल पाएगीI आप इसे आध्यात्मिक आकांक्षियों में भी देखते हैं जो कुछ दिनों के लिए बहुत उत्साहित हो जाते हैं लेकिन परेशानियां आने से पहले संकेत पर गायब हो जाते हैं, असल में उनमें निरंतरता बरकरार रखने की क्षमता नहीं होतीI

अंत में, बाती को प्रज्ज्वलित करने के लिए एक तरीका होना चाहिए। कार्तिक मास में लक्षदीप उत्सव में हम देखते हैं कि एक दीये का प्रयोग दूसरे दीये को प्रज्ज्वलित करने के लिए किया जाता है। यह दर्शाता है कि केवल एक गुरु एक शिष्य में ज्ञान की रोशिनी ला सकता है। एक और दीये के बिना जो पहले से ही जल रहा है, जिसमें सभी अवयव हैं, नया दीया बेकार हैI पहले से ही जल रहे दीये को कुछ अदृश्य बल लाते हैं और इसे प्रज्ज्वलित करते हैंI अगर आत्मा या जीव वास्तव में ऊर्जा में बदलते हुए बाती की रोशिनी में बदल जाते हैं, और इसके आस-पास प्रकाश डालते हैं, जिसे हम अंत में मोक्ष के रूप में संदर्भित होते हैं; यह छोटी रोशनी सबसे बड़ी रोशनी से साथ मिलकर एक बन रही हैI जब हम मिलना कहते हैं, तो हम ज्ञान और चेतना के बारे में बात कर रहे हैं जो प्रकृति में भगवान के समान हैं और इस प्रकार अनन्त आनंद का आनंद लेते हैं।

घी और तेल के साथ प्रज्ज्वलित करें दीये

शास्त्र बताते हैं कि यदि कोई मूंगफली (मूंगफली) के तेल का उपयोग करता है, तो जो ऊर्जा आती है वह असुर शक्ति के पक्ष में आती है। यह केवल इसलिए है क्योंकि जो भी भूमि के अन्दर मौजूद है वह रोशिनी कभी नहीं देख सकताI ऐसा कुछ करने का क्या मतलब है जो हमेशा अंधेरे में होती है और रोशिनी प्राप्त करने के लिए मेहनत करती है? इस तरह के दीये से रोशिनी केवल आध्यात्मिक अर्थ में अंधेरा बढ़ा सकती है। इस प्रकार, ऐसा दीया केवल अज्न्याना में मौजूद बलों पर ही जायेगा।

शास्त्र यह भी कहते हैं कि तिल का तेल का उपयोग करना बेहतर है। तिल का बीज दो रूपों में होता है, सफेद और काला। अगर किसी ने कभी श्राद्ध देखा है तो हम अपने पूर्वजों का तर्पण करने के लिए तिल के बीज का उपयोग करते हैं। आध्यात्मिक आकांक्षी के पास अपने गुरुओं की वंशावली से पूर्वजों का एक और समूह है। सफेद तिल के बीज इन पूर्वजों के प्रतिनिधि हैं। इस प्रकार, तिल के बीज से जो तेल आता है, जो आध्यात्मिक वंश से सीखे गए सभी चीज़ों को निचोड़ने का प्रतीकात्मक है, जलता भी है और रोशिनी भी देता है। यह ऊर्जा देवता शक्ति में जाती है।

जहाँ घी माध्यम है वह परम दीया है। हालांकि, आप कुछ भी निचोड़ने से आपको घी नहीं प्राप्त कर होगा। घी कहाँ से आता है? शुरुआती बिंदु दूध है जो वेदों के सच्चे ज्ञान का प्रतीक है। दूध को ठोस दही में बदलने के लिए, ठोस ज्ञान,  दही की एक बूंद,  जो गुरु उपदेश है, को लागू किया जाना चाहिए। यह ठोस ज्ञान, जब दैनिक जीवन में लागू होता है या बिलोया जाता है, नवनीता या भक्ति पैदा करता है, जो मक्खन का प्रतीक हैI इसमें भी तामसिक और राजसिक घटक हैं। जब भक्ति या मक्खन गरम किया जाता है – जीवन में चुनौतियों और कठिनाइयों का प्रतिनिधित्व करता है, और तामसिक और राजसिक घटकों को अलग किया जाता है और शुद्ध करके घी निकाला जाता है। यह घी मिट्टी के बर्तन में डाला जाता है – साधना शिरिरा, बाती को  आकांक्षी के जीवनकाल में डुबकी लगवाती है। जब बाती को दीये से बाहर बढ़ाया जाता है, जब कोई खुद से ज्यादा जीता है, तो दीया प्रज्ज्वलित होकर सच्ची रोशिनी देता है। यह रोशिनी सच में यथार्थ ज्ञान है। बुद्धिमान लोग कहते हैं, कि यह  भगवंथ तक पहुंचती है। एक बार दीया प्रज्ज्वलित किया जाता है, और खुद से परे रोशिनी फैलाता है, यही एकमात्र चीज है जो एक और दीये को रोशन करेगी, और यह चक्र जारी रखेगीI यह अध्यात्म ही है जो दीये में और दीपावली में प्रज्ज्वलित हैI मैं उम्मीद और प्रार्थना करता हूं कि इस दीपावली जब हम दीये को प्रज्ज्वलित करेंगे तो यह अध्यात्म हमारे दिल में होगाI दस लाख दीये प्रज्ज्वलित करें और अँधेरे को दूर भगाएंI

(उपरोक्त आलेख को प्रो पी आर मुकुंद द्वारा दी गई वार्ता से लेकर लिखा गया था। डॉ आनंद गोपाल, श्याम अनंतनाथन और डॉ वंदिता मुकुंद ने प्रतिलेखन और संपादन किया था।)  

पी आर मुकुंद एक शिक्षक, शोधकर्ता और उद्यमी हैं। उन्होंने पैनफील्ड-न्यूयॉर्क में ज्ञान के संरक्षण के लिए संस्थान भी शुरू किया जो वैदिक ज्ञान के संरक्षण और प्रसार पर केंद्रित हैI