संस्कृति
लोगों का हैदराबाद, भाग्यनगर: हमारी स्मृतियों से कभी नहीं होगा ओझल

प्रसंग
  • किस्मत की हर उठापटक से पता चलता है कि एक ही स्थान पर दो शहर थे – एक जनता का भाग्यनगर और दूसरा शासकों का हैदराबाद।

हैदराबाद की स्थापना चारमीनार के निर्माण के साथ सन् 1591-2 में मुहम्मद कुली कुतुबशाह के द्वारा की गई थी। लेकिन भाग्यनगर की कहानी उनके पिता इब्राहीम कुली कुतुबशाह के साथ बहुत पहले से शुरू होती है।

मुहम्मद कुली कुतुबशाह का जन्म इन परिस्थितियों में हुआ था। इब्राहीम कुली कुतुबशाह ने कई साल विजयनगर से निर्वासन में गुजारे (1943-50 ईसवी), जबकि गोलकोण्डा पर उनके भाई का शासन था। कहा जाता है, यहीं पर उन्होंने भागीरथी से शादी कर ली और शायद तेलुगू भी सीखी। हालाँकि, वह गोलकोण्डा वापस लौट आए, यहाँ पर “कार्कुनों, अधिकारियों, नेकवारिसों, लोहारों, ओडस, कुँआ खोदने वालों, सुरक्षाकर्मियों, बोझा ढोने वालों, बैंड वालों, ठेकेदारों” और कई हिंदुओं तथा मुस्लिमों द्वारा उनका स्वागत किया गया (शेरवानी 1967: 8-9)। दूसरे शब्दों में, स्थानीय तेलुगु लोगों के साथ-साथ मुसलमानों ने उनका स्वागत किया।

अपने निर्वासन के दौरान, इब्राहीम कुली ने तेलुगुओं का काफी स्नेह हासिल किया था, उन्होंने अपने दरबार में कई बड़े तेलुगु दिग्गजों जैसे – अद्दंकी गंगाधर, कंदुकूरु रूद्र और पोन्नागंटी तेलगन्ना को आमंत्रित किया। अद्दंकी कहते हैं कि उनका दरबार वेदों, पुराणों और सगोत्रीय विज्ञान के विद्वानों से भरा पड़ा था (शेरवानी 1968: 75)। उन्होंने तेलुगुओं और हिंदुओं को बड़े पद प्रदान किए, जिन्होंने उन पर अपना स्नेह लुटाया था, उन्हें ‘मालकीभ्रम‘ और ‘अभिराम‘ कहकर संबोधित किया जाता था। ऐसा प्रतीत होता है वे उनके साथ ही रहे, यहाँ तक कि तब भी जब वह विजयनगर को नष्ट करने के लिए अन्य सुल्तानों के साथ शामिल हुए क्योंकि शेरवानी के अनुसार, तेलुगु साहित्य की मशाल उनके पास चली गई थी (शेरवानी 1967: 9)। कुतुब शाहियों ने अधिपत्य के लिए तेलुगु भाषी क्षेत्रों को जानबूझकर लक्षित किया (पूर्वोक्त: 4 fn 2)। मुहम्मद कुली कुतुबशाह का जन्म इन परिस्थितियों में हुआ था

भाग्यनगर – हैदराबाद की बुनियाद

उनके पिता ने सन् 1578 में मूसी नदी (पुराना पुल) पर एक पुल का निर्माण करवाया। इस पुल के पार, एक “प्राधान्य ब्राह्मण” रिहाइश है, जिसमें एक सूफी, शाह जाकर बस गए (शेरवानी 1967: 14)। इस ब्राह्मण रिहाइश के पास या इर्द-गिर्द अन्य सामाजिक समूहों और पर्याप्त आर्थिक गतिविधियाँ होनी चाहिए, क्योंकि शेरवानी का तर्क है कि मुहम्मद कुली को “क्षेत्र की बढ़ती आबादी के बारे में सूचित किया गया था” (पूर्वोक्त )।

दूसरे शब्दों में कहा जाए तो, जिस जगह पर सन् 1591-92 में चारमीनार का निर्माण किया गया था और हैदराबाद की स्थापना की गई थी वहाँ पर पहले से ही बढ़ती आबादी, कई सामाजिक समूह और पर्याप्त आर्थिक गतिविधि थी। इस प्रकार हैदराबाद, फारसी विचारों से प्रेरित एक शहर, को एक सामाजिक और आर्थिक खालीपन में नहीं बनाया गया था बल्कि इसे देशी मिट्टी और संस्कृति में ही स्थापित किया गया था।

शहर को काल-लेख-विषयक शीर्षक, फारसी में ‘फरखुंडा बुनियाद’, दिया गया था जिसका अर्थ होता है ‘भाग्य या किस्मत की नींव‘ (लूथर 2016)। भाग्य या किस्मत को तेलुगू में ‘भाग्यमु’ और संस्कृत में ‘भाग्य’ कहा जाता है। लोकप्रिय स्थानीय परंपराओं के मुताबिक, मुहम्मद कुली को मंदिर गणिका – भाग्यमती से  प्यार हो गया, जिसने भाग्यलक्ष्मी मंदिर की देवदासिन के रूप में सेवा की थी। उसके प्रेम में पड़कर उन्होंने नए शहर का नाम भाग्यनगर रखा।

भाग्यनगर के साक्ष्य

सन् 1594 के करीब फैज़ी द्वारा सम्राट अकबर को लिखे गए एक समकालीन पत्र में लोकप्रिय परंपरा को प्रतिबिंबित किया गया था, पत्र में लिखा था कि “अहमद कुली (जैसा पत्र में लिखा था) शियावाद में डूब गए हैं। और भाग्यमती, जो एक पुरानी वेश्या (फाहिशा-ए-कुहना) है और लंबे समय तक उनकी रखैल (माशूका-ए-कदीमी) रही है, के नाम पर एक शहर भाग्यनगर बसाया है (उद्धरण – शेरवानी op cit)।

मुहम्मद कुली (ऊपर के पत्र में गलती से ‘अहमद’ कह दिया गया है) ने जब चारमीनार का निर्माण करवाया था तब वह केवल 22-25 साल के थे। इसलिए “लंबे समय तक माशूका रहने” से अर्थ यह निकलता है कि इस संबंध की शुरुआत उन्होंने अपनी किशोरावस्था में की होगी। भाग्यमती उनके किशोरावस्था का प्यार थीं और उनके पहले प्यार के नाम पर शहर का नाम रखा गया था (माना जाता है कि उनकी मृत्यु के समय तक सुल्तान की 19 प्रेमिकाएँ या रखैलें थीं)।

सन् 1594 में तब्कत ए अकबर शाही लिखते समय निज़ामुद्दीन ने भी यह प्रमाणित किया था कि “मुहम्मद ‘अली (कृति के मुताबिक) कुतबुल-मुल्क, इब्राहीम के पुत्र, अपने पिता के उत्तराधिकारी बने। वह एक हिंदू वेश्या भागमसी (कृति के मुताबिक) के प्यार में इतने पागल हो गए थे कि उन्होंने उसके नाम से एक शहर भागनगर बसाया और आदेश दिया कि एक हजार घुड़सवार हमेशा वेश्या (फाहिशा) के साथ रहें।” (उद्धरण: शेरवानी पूर्वोक्त)

सन् 1610 में फ़िरिश्ता ने अपनी हिस्ट्री ऑफ देक्कन में मुहम्मद कुली के बारे में लिखा कि “इस राजकुमार ने अपने पिता की मृत्यु पर बारह साल की उम्र में गोलकोण्डा का सिंहासन संभाला…गोलकोण्डा की हवा उसके संविधान से असहमत थी, उन्होंने आठ मील की दूरी पर अपनी खास रखैल भौग के नाम पर एक शहर बसाया जिसको उन्होंने भौगनुग्गुर नाम दिया, लेकिन बाद में अपनी प्रेमलीला से शर्मिंदा होने के बाद उन्होंने इसको हैदराबाद में बदल दिया” (स्कॉट 1794 :409)।

फैज़ी द्वारा अकबर को लिखे गए पत्रों को मूल स्त्रोत ठहराते हुए शेरवानी ने इतिहासकारों के समकलीन लेखों को अस्वीकार कर दिया (वह अपना दुख व्यक्त करते हैं- “…. फैज़ी के व्यंग्यमिश्रित छोटे वाक्यों पर बहुत असमंजस हो गया था” और आखिरकार वाक्य अध्यायों तक बढ़ गए” (शेरवानी 1967: 143-4)। फैज़ी खुद एक इतिहासकार न होने, शिया विरोधी तथा दक्कन विरोधी होने के लिए अस्वीकार किये गए हैं और अहमदनगर से आगे नहीं गए हैं। लेकिन वह यह नहीं बताते हैं कि सम्राट को लिखा गया एक पत्र इतिहासकारों के बीच क्यों घूमा और उनके लेखों में अतिरिक्त जानकारी कहाँ से आई थी। न ही उन्होंने इस बारे में कुछ जानकारी दी कि यात्रा के बिना अहमदनगर में हैदराबाद के बारे में जानना क्यों असंभव था।

संभवतः सन् 1614 में एक किताब लिखी गई थी जिसका शीर्षक था, रिलेशन्स ऑफ गोलकोंडा, इस किताब में हैदराबाद की नींव रखने के दो दशक बाद गोलकोण्डा में प्रचलित एक अजीब रिवाज का वर्णन किया गया है। इसमें कहा गया है कि “हर साल अप्रैल के महीने में, पूरे राज्य की वेश्याओं को बागनगर की यात्रा करनी पड़ती थी जहाँ उन्हें बुलाया जाता था….पहले मुस्लिम राजा की मृत्यु के उत्सव में नृत्य करने के लिए, एक ऐसी चीज जो मुझे बहुत अजीब लगती है।” (उद्धरण: लूथर 2016)

एक मुस्लिम राजा के तहत ऐसे रिवाज से एक ही बात समझ में आती है कि हैदराबाद का नाम मूल रूप से भाग्यलक्ष्मी के नाम पर रखा गया था जो कि एक देवदासिन थीं।

भाग्यनगर और भाग्यमती का दमन

फिरिश्ता के लेख से पता चलता है कि शर्म की वजह से भाग्यनगर का नाम बदलकर हैदराबाद कर दिया गया था। प्रेम में शर्म कहाँ से आ गई?

इसकी एक वजह यह भी हो सकती है कि सुल्तान के संपर्क में रहने के बावजूद भी भाग्यमती ने धर्म परिवर्तन नहीं किया था। अगर उसने अपना धर्म बदल लिया होता और हैदर, मुश्तरी या कोई और नाम रख लिया होता तो उसके नाम पर शहर का नाम रखने में कोई शर्म नहीं होती। इस प्रकार ऐसा लगता है कि भाग्यमती एक शाही प्रेमिका होने के बावजूद भी मृत्यु तक हिंदू बनी रहीं। दरअसल बर्नियर के लिए अपनी पादटीका (फुटनोट्स) में कांस्टेबल लिखते हैं कि खफी खान कहते हैं कि उसकी (भाग्यमती) मृत्यु के बाद हैदराबाद का नाम बदल दिया गया था। (बर्नियर 1916: 19 fn 2)।

इस बदलाव की राजनीतिक वजहें भी थीं। कला के संरक्षण और हथियारों की ताकत ने तेलुगुओं के बीच कुतुब शाहियों के अधिकार और शक्ति को सुरक्षित कर लिया था। लेकिन उत्तर में कुछ दिक्कतें सामने आईं। मुगलों ने अहमदनगर को छोटा कर दिया था, चांद बीबी की मृत्यु हो गई थी और साल 1601 में मलिक अंबर की हार हो गई थी। इन बढ़ती दिक्कतों का सामना करने के लिए ज्यादा रूढ़िवादी मुस्लिमों का समर्थन बहुत जरूरी था।

साल 1585 में, युवा मुहम्मद कुली ने हाल ही में ईरान से मीर मुमिन अस्त्राब्दी को अपना पेशवा नियुक्त किया था। संभवत: सन् 1603 में मीर मुमिन के अच्छे अधिकारियों ने ईरान के राजा अब्बास से एक दूतावास हासिल किया। लेकिन ईरानियों को एक ऐसे सुल्तान से प्रभावित होने की संभावना नहीं थी जिसके राजधानी शहर का नाम हिंदू देवदासिन के नाम पर रखा गया था। इसलिए, सन् 1584 के बाद कुतुब शाहियों द्वारा जारी किए जाने वाले पहले सिक्के सन् 1603 में ‘दरसु सल्तनत हैदराबाद’ से जारी किए गए थे।  इसी साल ईरानी दूतावास राज्य में आया था। भाग्यनगर में आधिकारिक चुप्पी छा गई थी।

परंपराओं से पता चलता है कि मीर मुमिन ने भाग्यमती की कहानी को दबा दिया था। अहमदनगर के सिकुड़ने के बाद राजनीतिक विकास से पता चलता है कि मुमिन ने हैदराबाद का नाम उपयोग में लाने में करीब एक दशक का समय क्यों लगा दिया और हिंदू देवदासिन भाग्यमती से जुड़े नाम को क्यों दबा दिया। भाग्यनगर अब राजनीतिक रूप से सुविधाजनक नहीं था। सिक्कों, फरमानों और आधिकारिक संदेशों में उसे नजरअंदाज कर दिया गया था। यहाँ तक कि सुल्तान के कसीदों में भी जिसमें बहुत सारे गंदे शब्द कहे गए थे, में भी इसका जिक्र नहीं मिलता है।

हालाँकि, इसके मूल निवासियों ने इसे भाग्यनगर कहना जारी रखा। नाम बदले जाने वाले शहरों के साथ अक्सर ऐसा होता है,  फ़िरिश्ता ने इसका जिक्र किया है (लूथर 2016)। आधिकारिक अभ्यास और आम बोलचाल ने कई लोगों को भ्रमित कर दिया। इसलिए, अब्दुल-बक़ी निहावंडी ने दो अलग-अलग शहरों का जिक्र किया है: एक “भागमती” जिसको सुल्तान ने अपनी युवावस्था में स्थापित किया था और दूसरा “हैदराबाद” जिसको मुमिन के अच्छे अधिकारियों के माध्यम से उसके शासनकाल के अंत में स्थापित किया गया था। (उद्धरण शेरवानी 1967: 140)

“भाग्यनगर” नाम का कोई आधिकारिक खंडन क्यों नहीं था? इसके संभवतः दो कारण हैं। पहला, आधिकारिक खंडन स्थानीय लोगों के प्रेम को कम करता, जबकि नए नाम का उपयोग उनके द्वारा सत्ता में कट्टरता की गुंजाईश के रूप में समझा जाता। दूसरा, सुल्तान अपने पहले प्रेम की यादगार के प्रति निष्ठावान रहे होंगे। इस तथ्य से यह पता चलता है कि शहर का काल-लेख-विषयक नाम “फरखुंडा बुनियाद” था, जहां फारसी शब्द फरखुंडा संस्कृत के भाग्य शब्द से जुड़ता है।

सत्य भले ही राजनीतिक हो लेकिन पूरी तरह से छिपाया नहीं जा सकता। इस प्रकार, राज्य अभिलेखागार में 1637 ईस्वी के उत्तराधिकार का एक दस्तावेज पाया गया है जो भागनगर के काज़ी ‘जहीरुद्दीन’ द्वारा जारी किया गया था (लूथर 2016)। 1672 में, अब्बे कैरे ने शहर को बागनगर कहा (पूर्वोक्त)। 1656-1668 के अपने यात्रावृत्त में, फ्रांस्वा बर्नियर ने मीर जुमला द्वारा लिखे गए पत्र का अनुवाद किया जिसका लक्ष्य सुल्तान को औरंगजेब के सामने स्पष्ट करना था। जहाँ उन्होंने “बागनगर में राजा का निवास संदर्भित किया है, जहाँ राजा किसी भी खाई या दुर्ग के बिना खुले स्थान पर रहता था।” (बर्नियर 1916: 19-20)

अंततः घोरपड़े पत्र, जिसे प्रामाणिक माना जाता है (क्रुइटज़र 2008: 289), “भागनुग्गुर” को संदर्भित करता है। चूंकि यह शिवाजी और कुतुब शाहियों के बीच के समझौतों का सूचक है, इसलिए इसका समय 1670 ई. का हो सकता है।

हैदराबाद की द्विविधता और शिवाजी महाराज का दौरा

इस सब से यह प्रकट होता है कि हैदराबाद का नाम भाग्यनगर ही बना रहा, विशेष रूप से लोगों के बीच, भले ही राजनीतिक कारणों से इस नाम का आधिकारिक उपयोग न किया गया हो। गोलकोण्डा सल्तनत की द्विविधता छत्रपति शिवाजी महाराज तथा कुतुबशाह के मंत्रियों के बीच समझौतों और दक्षिण के दौरों के दौरान उन्हें दिए गए सम्मान को व्यक्त करती है। शिवाजी का भाग्यनगर, जिसका उस समय आधिकारिक नाम हैरदाबाद था, का दौरा स्मरणीय है।

डच सूत्रों (क्रुइटज़र 2008: 173) के मुताबिक, शिवाजी महाराज ने हैदराबाद का दौरा किया और 14 मार्च 1677 को बादशाह अबुल-हसन के साथ “बहुत मैत्रीपूर्ण” मुलाकात की। उस यात्रा ने हैदराबाद की द्विविधता, भाग्यनगर और हैदराबाद के बीच दरार, को स्पष्ट किया।

एक प्रतिक्रिया शत्रुतापूर्ण थी। एक डचमैन की रिपोर्ट में कहा गया है कि लूटमार को रोकने के लिए शिवाजी को बड़ी मात्रा में सोना दिया गया था। चूंकि डचमैन ने ब्राह्मणों की अपेक्षा “मूर” लोगों (मुस्लिमों) के साथ बातचीत करना ज्यादा आसान पाया, इसलिए यह उनके मुस्लिम वार्ताकारों की प्रतिक्रिया होनी चाहिए (पूर्वोक्त: 42), संभवतः बड़े पैमाने पर गैर-शिया लोगों की।

शिया लोगों के पास मुगलों के खिलाफ हिंदुओं से हाथ मिलाने के कारण रहे होंगे। मुगल फरमान ने उन्हें मस्जिदों में खुतबा में चार खलीफाओं के साथ 12 इमामों को प्रतिस्थापित करने के लिए मजबूर किया था। जिससे उन्होंने मस्जिदों को त्याग दिया था। रूढ़िवादी सुन्नियों के विपरीत, हिंदू लोग ग्रामीण इलाकों में मुहर्रम का अनुसरण करते हुए मुस्लिमों में शामिल हो गए (पूर्वोक्त पैसिम)।

इसलिए शिवाजी को जन-साधारण ने आनंदपूर्वक स्वीकार किया और बादशाह उनके साथ गए। स्वागत समारोह के एक लेख में वर्णित है, “बादशाह ने पूरे शहर को सजाया था। सड़कों और गलियों को कुमकुम और केसर के साथ सजाया गया था। शहर में उत्सव ध्वज और जीत के मेहराब स्थापित किए गए और ध्वज तथा पताकाएं फहराई गईं। करोड़ों लोग राजा शिवाजी की एक झलक देखने के लिए उमड़ पड़े। महिलाओं ने असंख्य दीपक जलाकर उनका स्वागत किया। राजा पर सोने-चाँदी के फूल बरसाए गए।” (क्रुइटज़र पूर्वोक्त)

अबुल हसन ने शिवाजी का इतना गर्मजोशी से स्वागत क्यों किया? सभासद बखर के अनुसार, अबुल हसन के पास जाने की योजना शिवाजी की थी। सुल्तान द्वारा व्यक्तिगत रूप से स्वागत किए जाने के बाद, अबुल हसन ने शिवाजी को मंत्रमुग्ध करते हुए उन्हें अपने कर्नाटक अभियान को वित्तपोषित करने के लिए प्रेरित किया और अबुल ने उन्हें एक सन्देश दिया कि “आप ईमानदार हैं”। फ्रांसीसी फ्रांस्वा मार्टिन कहते हैं कि मदन्ना ने अबुल हसन को कर्नाटक का एक हिस्सा जीतने और गोलकोण्डा को छोड़ने के लिए शिवाजी को आमंत्रित करने के लिए प्रेरित किया, इस प्रकार वेल्लूर को छोड़कर किले पर कब्जा कर लिया गया। चूंकि गोलकोण्डा ने 450,000 हॉन की अनुबंधित राशि की दूसरी किश्त का भुगतान करने में देरी की, इसलिए शिवाजी ने गिंगी के साथ वेल्लूर पर कब्जा कर लिया, जिससे अभियान के बाद संबंध खराब हो गए।

शिवाजी की मृत्यु के बाद, शाह आलम के नेतृत्व में औरंगजेब की सेना आगे बढ़ी और अक्कन्ना और मदन्ना को कैद कर लिया गया और मुस्लिम दंगाइयों ने हिंदुओं, विशेष रूप से ब्राह्मणों पर हमला किया, जिनमें से कई लोगों को जान और घर से हाथ धोना पड़ा। हैदराबाद से 27 किलोमीटर दूर महेश्वरम का आलीशान शिव मंदिर ढहा दिया गया। इसके बाद मुस्लिमों के अंतर्गत “दक्कन सुन्नियों का निवास” बना दिया गया। (क्रुइटज़र 2008 पैसिम)

उस वक़्त के बाद से किस्मत की हर उठापटक से पता चलता है कि उस समय एक ही स्थान पर दो शहर थे – एक जनता का भाग्यनगर और दूसरा शासकों का हैदराबाद।

भाग्यनगर – एक गलत उच्चारण?

यहाँ तक कि शेरवानी, जो भाग्यमती “कहानी” का विरोध करती है, भी यूरोपीय यात्रियों के सबूतों के आधार पर स्वीकार करती है कि “जहाँ आम लोग शहर को बागनगर कहते थे, वहीं सत्तारूढ़ अभिजात वर्ग और सरकारी अधिकारी इसे हैदरबाद कहते थे (शेरवानी 1967: 145)। हालांकि, हमारे मन से भाग्यनगर को हटाने के लिए, थेवनाट और टेवर्नियर पर भरोसा करते हुए वह “गलत उच्चारण का सिद्धांत” का हवाला देते हैं।

सन् 1665-66 में थेवनाट ने कहा था, “इस साम्राज्य (गोलकोण्डा) की राजधानी को बागनगर कहा जाता है, फारसियों ने इसे ऐदर अबद कहा था।”

दशकों बाद, टेवर्नियर ने आगे कहा, “वर्तमान राजा के दादा ने बागनगर की स्थापना की थी। यहाँ राजा के बहुत ही साफ सुथरे बगीचे थे- जिसे बागनगर या बगीचों का नगर कहा जाता था।”

उपर्युक्त साक्ष्यों के आधार पर, शेरवानी ने निष्कर्ष निकाला कि बागनगर का अर्थ एक ऐसे शहर से था जो बागों या बगीचों का शहर था, जबकि भाग्यनगर और भाग्यमती दोनों ही कल्पित कथाएं हैं जिनका जन्म ‘बाग’ के उच्चारण में असमर्थता और गलत उच्चारण के कारण ‘भाग’ कहने से हुआ है।

इस थ्योरी के खिलाफ कई तर्क दिए जा सकते हैं।

पहला, शर्म की अवधि के बाद, जिसमें हैदराबाद के पक्ष में भाग्यनगर के नाम को नज़र अंदाज किया गया था और भाग्यमती की कहानी को दबा दिया गया था, टेवर्निअर अच्छा लिख रहे थे। ऐसी परिस्थितियों में शब्दों के अर्थ में हेरफेर करके भाग्यनगर नाम का अर्थ समझाना स्वाभाविक होगा। एक हिंदू देवदासिन भाग्यमती की यादगार के लिए बाग श्रेयस्कर रहे होंगे।

दूसरा, जैसा कि लूथर (2016) ने कुशलतापूर्वक स्पष्ट किया, फ्रांसीसी थेवकॉट ने हैदराबाद के साथ-साथ भाग्यनगर लिखने में अक्षर ‘एच’ की चूक की। यूरोपीय यात्रियों को मूल नामों के साथ कई कठिनाइयाँ उठानी पड़ीं। उदाहरण के लिए, फ्लोरिस की रचनाओं में कुतुबशाह नाम एक डच व्यापारी कोटेबिक्सा में बदल गया, पुलीकट नाम पालियाकट्टी में बदल गया और मीर जुमला नाम मीर सुमेला में बदल गया। इस प्रकार, उनके द्वारा उपयोग किये गए या समझाए गए शब्द रूपों की सटीकता को ग्रहण नहीं किया जा सकता है।

तीसरा, यूरोपियों के विपरीत, स्वदेशी भाषा बोलने वालों के साथ-साथ फारसी लोग ‘भा’ और ‘बा’ के बीच अंतर जानते हैं। इस बात की सम्भावना ही नहीं है कि देशी वक्ता या ‘आम लोग’ ‘भाग’ और ‘बाग’ को लेकर उलझन में रहे होंगे।

चौथा, दि ‘स्लिप ऑफ टंग’ सिद्धांत 1614 ईस्वी के ‘रिलेशन्स ऑफ़ गोलकोण्डा’ में वर्णित वार्षिक घटना की व्याख्या नहीं करता है।

सार्वजनिक स्मृति में भाग्यनगर का पुनरुद्धार

भाग्यनगर और भाग्यामती की कहानी आसफ़ जाही के समय में फिर जीवंत हुई।

1884 में सैयद हुसैन बिलग्रामी और विलमौट की रचनाओं के अनुसार, राजा की एक हिंदू प्रेमिका के नाम पर शहर का नाम भागनगर रखा गया था और “उसकी मौत के बाद मुहम्मद कुली ने शहर का नाम हैदराबाद रख दिया था, हालाँकि आज भी कई मूल निवासी, विशेष रूप से हिंदू लोग शहर को भागनगर कहते हैं।” (उद्धरण- लूथर 2016)

इसी तरह ग्रिबल (1896: 209) भी यह प्रमाणित करते हैं कि भागनगर हैदराबाद का पुराना नाम था, जो मोहम्मद कुतुब शाह द्वारा उनकी पसंदीदा प्रेमिका या पत्नी भागमती के नाम पर शताब्दी के अंत में रखा गया था।

शेरवानी ने इन इतिहासकारों और अन्य इतिहासकारों को यह कहते हुए अस्वीकार कर दिया कि “कहानी के श्रंगार संबंधी भाग ने इतिहासकारों को विशेष आकर्षित किया” (शेरवानी 1967: 143) जो कि इतिहासकारों के लिए अन्यायपूर्ण है और इसमें दृढ़-विश्वास नहीं होता।

हमारे अध्ययन से पता चलता है कि भाग्यमती संभवतः एक हिंदू देवदासिन थीं जिन्होंने कभी भी इस्लाम धर्म स्वीकार नहीं किया। शायद उनके नाम पर शहर का नाम रखे जाने और आधिकारिक तौर पर हैदराबाद नाम इस्तेमाल किए जाने से पहले ही उनकी मृत्यु हो गई थी।

अध्ययन से यह भी खुलासा हुआ है कि भाग्यनगर नाम लोगों के दिलोदिमाग में समाया हुआ है और यह हैदराबाद के केंद्र में स्थित है। हालाँकि विदेशी तौर-तरीकों से प्रेरित शासन द्वारा यह सदियों तक दबाया जाता रहा, लेकिन यह इतिहास के हर अवसरोचित मोड़ पर जीवन और स्वतंत्रता को पूर्ववत स्थापित करने के लिए भुलक्कड़ी को ठुकराता रहा है।

लोगों का हैदराबाद ही भाग्यनगर है जो हमारी स्मृतियों से कभी ओझल नहीं होगा।

उद्धरण

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