संस्कृति
हम सब राम के वंशज हैं- राम की वंशावली पर एक अध्ययन

दिन की रोशनी की तरह अपने आप में एक स्वयंसिद्ध मामले में अगर महीनों तक रोज सुनवाई हो तो कहा-सुना क्या जाएगा? कोई क्या कहेगा, क्या सुनेगा? क्या सवाल होंगे और उनके जवाब क्या होंगे? अयोध्या में राम मंदिर एक स्वयंसिद्ध मामला है, जिसे किसी सुनवाई की भी ज़रूरत नहीं है मगर लोकतंत्र के अपने तकाजे हैं। हर कब्जाधारी को यह सिद्ध करने का अधिकार है कि उसका कब्जा गैरकानूनी नहीं है। भले ही कब्जे की कहानी भी स्वयंसिद्ध हो दिन की रोशनी की तरह।

ज़मीन के भीतर, ज़मीन के ऊपर उपलब्ध सारे सबूत अयोध्या की बेहद पुरानी कहानी को बुनने के लिए काफी हैं। यह कहानी इतनी पुरानी है कि जब दुनिया के कई धर्म पैदा भी नहीं हुए थे। पुरातात्विक सबूतों के अलावा पुरानी किताबों में और हमारी स्मृतियों में अयोध्या काल के सब अंधेरों के पार से चमचमाती रही है।

जज कानून के जानकार हो सकते हैं लेकिन कतई ज़रूरी नहीं कि वे संस्कृति के ज्ञाता भी हों, इतिहास के जानकार भी हों। राेज सुनवाई की बाध्यता है तो अंताक्षरी की तरह हो सकता है। चलिए यही बताइए कि राम के वंशज कहीं हैं?

सवाल सब तरफ चल गया। कौन राम का वंशज। जयपुर राजघराने ने मय नक्शा और सबूत के साथ पेश कर दिया कि भई अब पूछा ही जा रहा है तो बताना ज़रूरी हो जाता है कि राम की वंशावली में उनका नाम किस क्रम में परंपरा से मौजूद है और किस तरह अयोध्या उनके अधिकार में रही है।

विवाद की ज़मीन कभी जयसिंह पुरा हुआ करती थी, जो जयपुर के कछवाहा (या कुशवाहा) राजवंश के अधिकार में थी। बहुत कम लोग जानते होंगे कि जिस जगह ताजमहल बना हुआ है, यमुना किनारे का वह इलाका भी एक समय जयसिंह पुरा ही कहलाता था। इसलिए विवाद इस पर भी है कि ताजमहल के निर्माण के लिए यह ज़मीन शाहजहां ने मुगलों के ही सूबेदार रहे कछवाहा राजवंश के नुमाइंदों से हासिल की थी।

अंग्रेज़ों ने अपने 200 साल के राज में भारत में अपने हिस्से की बरबादी जमकर की होगी लेकिन हमें उनके कुछ कामों के लिए शुक्रिया अदा करना नहीं भूलना चाहिए। कुछ जिज्ञासु अंग्रेज़ों ने अपनी नौकरी के साथ कुछ गजब के काम किए।

कर्नल जेम्स टाड इनमें से ही एक है, जो नक्शानवीस था। उसके पिता का नाम भी जेम्स टाड ही था, जो नील की खेती करने मिर्जापुर आया था। जेम्स टाड द्वितीय 1782 में पैदा हुआ था। 1818 में वह पश्चिमी राजस्थान में पॉलिटिकल एजेंट बना और इस भूमिका में बिताए चार सालों में उसने राजस्थान के गौरवशाली इतिहास पर गजब का काम किया है।

वह राजपूतों के इतिहास से खासा प्रभावित हुआ और कई बार अंग्रेज़ हुकूमत की नीतियों की आलोचना भी की। वह कई राजघरानों के निकट संपर्क में रहा। राजघरानों के निजी संग्रहों में मौजूद दस्तावेजों में गया। तीन खंडों में लिखे दुनिया भर में चर्चित राजस्थान का पुरातत्व और इतिहास में उसने राजवंशों के रिकॉर्ड भी खंगाले हैं। भारत छोड़ने के 13 साल बाद 1830 में उनकी मृत्यु हुई, लेकिन इंग्लैंड में लौटकर जेम्स ने अपने बचे हुए जीवन का ज्यादातर हिस्सा इसी इतिहास को लिखने और सहेजने में लगाया।

अयोध्या, चित्र श्रेय- विजय मनोहर तिवारी

 उसने अयोध्या समेत भारत के कई प्राचीन शहरों और उनके ऐतिहासिक राजवंशों की पड़ताल की है। वह लिखता है

अयोध्या सूर्यवंश के द्वारा प्रतिष्ठित पहली नगरी थी। अयोध्या ने राम के युग में अपनी चरम भव्यता को प्राप्त किया था। उसका क्षेत्र आज के अवध के नाम से सबको मालूम है और यह नाम उसके चारों ओर के उस क्षेत्र का भी है, जिस पर मुगल साम्राज्य का नाममात्र का वजीर शासन करता है। एशिया की प्राचीन राजधानियों का बहुत बढ़ा हुआ महत्व उनकी एक विशेषता है और अयोध्या का महत्व भी बहुत है। वर्तमान राजधानी लखनऊ प्राचीन अवध का एक छोटा सा नगर था, जिसका नामकरण नाम ने लक्ष्मण के नाम पर किया था।

राम के बेटे कुश के चार बेटे थे। इनमें से दो कुशनाभ और कुशांभ परंपरा में प्रसिद्ध हैं। उनके बसाए हुए नगरों का अस्तित्व अभी भी है। कुशनाभ ने गंगा तट पर महोदय नाम का नगर बसाया था, जो बाद में कान्यकुब्ज या कन्नौज कहलाया। इस नगर का ऐश्वर्य 1193 तक बना रहा, जब मोहम्मद गौरी ने इसे ध्वस्त कर मिट्‌टी में मिला दिया।

छठी सदी में इस नगर की परिधि 25 कोस की थी यानी 50 किलोमीटर के आसपास। यहाँ पान की ही 30,000 दुकानें थीं। कुशांब का बसाया हुआ कौशांबी प्रयागराज के पास एक पुराना शहर है, जो यमुना के किनारे बसा है। मैं इन सब जगहों पर खूब घूमा हूँ।

यहाँ की मिट्‌टी में सम्राट अशाेक के समय के स्तूप और स्तंभ आज भी मौजूद हैं। यहाँ कभी गौतम बुद्ध भी आए थे। मैंने यमुना नदी के रास्ते होने वाले जलपरिवहन के लिए कौशाम्बी के किनारों पर प्राचीन पोर्ट के अवशेष भी देखे हैं। राम के दूसरे दो पुत्रों ने भी धर्मारण्य और वसुमति नाम की राजधानियां बसाई थीं, लेकिन इनके बारे में अब बहुत ज्ञान नहीं है।

टाड ने राजस्थान के 36 राजकुलों की गहरी पड़ताल की है। टाड ने परमारों की 35 शाखाओं और सोलंकियों की 16 की सूची तैयार की। वह इनकी वंशावलियों में गया है और इनके उद्गम से लेकर वर्तमान तक का जिक्र किया गया है। कछवाहों का जिक्र वह इन शब्दों में करता है

कछवाहा जाति राम के द्वितीय पुत्र कुश से अवतरित हुई। वे कुशाइट हैं, जिस प्रकार मेवाड़ के राजपूत भारतवर्ष के लवाइट्स हैं। दो शाखाएँ कोशल से आईं, एक ने सोन नदी के तट पर रोहतास बसाया और दूसरे ने लाहर में कुंवारी घाटियों में एक राज्य की स्थापना की। कुछ काल के उपरांत उन्होंने नरवर का किला बनवाया, जिसमें प्रसिद्ध राजा नल रहा करते थे। दसवीं सदी में इसी वंश की एक उपशाखा ने स्थानांतरित होकर आमेर बसाया। कछवाहा उपशाखाएं अव्यवस्थित रूप से इधर-उधर बिखरी हुई हैं।

जयपुर राजघराने की राजकुमारी दीया ने अपने वंश के उपलब्ध उनकी दस्तावेजों के आधार पर यह कहा कि वे राम के पुत्र कुश की 310वीं पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करते हैं। उनका कहना है कि सवाई जयसिंह ने 1717 में अयोध्या में मंदिर भी बनवाया था। साथ ही सरयू नदी जहाँ श्री राम ने समाधि ली थी, वहीं पूजा भी कराई थी।

1776 में नवाब वजीर असफ-उद-दौला ने राजा भवानी सिंह को हुक्म दिया था कि अयोध्या और इलाहाबाद स्थित जयसिंहपुरा में कोई दखल नहीं दिया जाएगा। ये ज़मीनें हमेशा कच्छवाहा के अधिकार में रहेंगी। औरंगज़ेब की मृत्यु के बाद सवाई जयसिंह द्वितीय ने हिंदू धार्मिक इलाकों में बड़ी-बड़ी जमीन खरीदीं। 1717 से 1725 में अयोध्या में राम जन्मस्थान मंदिर बनवाया था।

मैंने अपने परिवार में बुजुर्गों से सुना है कि हम कभी कन्नौज से पलायन करके मध्यप्रदेश की तरफ आए थे। कान्यकुब्ज ब्राह्मणों का मूल स्थान वही है। राम के सुपुत्र कुश के बेटे यानी राम के पोते कुशनाभ द्वारा बसाया गया कान्यकुब्ज या कन्नौज। मोहम्मद गौरी के हमले के समय इसकी समृद्धि चकाचौंध करने वाली थी। गौरी ने कन्नौज काे वाकई मिट्‌टी में मिला दिया था।

मैं कन्नौज के पुराने खंडहरों पर खूब घूमा हूँ। मेरी मुलाकात यहाँ के एक कवि डॉ. जीवन शुक्ल से हुई थी। उन्होंने बताया था कि गौरी ने कन्नौज पर हमले के बाद अपने उस्ताद को यहाँ का हाल लिखकर भेजा था। गौरी ने लिखा था– “कन्नौज की इमारतें इतनी पुख्ता हैं, जिना हमारा इस्लाम पर अकीदा। लेकिन हमने उन्हें जमींदोज कर दिया है।” यह विवरण 1193 के हैं।

भारत के महान अतीत की हर गाथा बीते एक हजार साल में इसी तरह मिट्‌टी में मिलाई जाती रही है। गौरी ने कन्नौज को मिटाया हो या बाबर ने अयोध्या के मंदिर को नेस्तनाबूत किया हो। विध्वंस की उसी कहानी के हज़ार दोहराव हैं। अच्छा हुआ अदालत ने राम के वंश के बारे में पूछ लिया और जयपुर से एक आवाज़ मय सबूत के पूरी दुनिया ने सुनी।

जयपुर ही क्यों, भारत भूमि का हर आदमी राम का वंशज है। वे हमारे आदर्श हैं। उनको अपना पूर्वज मानना सबके लिए गौरव की बात होगी। अपनी वंश परंपरा को उनसे जोड़ने का मतलब है कि उनके आदर्शों की डोर हमें उनसे जोड़ती है। हमारे पुरखों ने भी कभी अयोध्या या कन्नौज या कौशांबी या आज के लाहौर में उनके युग में कोई न कोई भूमिका निभाई ही होगी।

वही एक चीज हमें उनसे जोड़ने के लिए काफी है। वे चाहे आज के जज हों या वकील, नेता हों या अफसर, इतिहासकार हों या पुरातत्वविद्। भारत में हरेक के पुरखों की परंपरा राम से जुड़ी है। बाद की सदियों में वह भले ही उसने अपना नाम और धर्म बदल लिया हो, वह यहीं का है, राम उसी के हैं। यह बात दिन की रोशनी की तरह ही सच है।

विजय मनोहर तिवारी भारत के काेने-कोने की आठ से ज्यादा परिक्रमाएँ करने वाले सक्रिय लेखक हैं। उनकी छः पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। वे स्वराज्य में सहयोगी लेखक हैं। संपर्क- vijaye9@gmail.com