संस्कृति
उत्साही पर्यावरणविद्: जोधपुर के एक गाँव की महिलाएं कैसे पारिस्थितिकी और जीवन के लिए बिश्नोई भावनाओं को देती हैं प्रोत्साहन
उत्साही परियावारणविद

प्रसंग
  • बिश्नोई महिलाओं में ऐसा बहुत कुछ है जो प्रशंसनीय और प्रेरणीय है। विशेष रूप से, ‘पारिस्थितिकीय संरक्षण’ से एक संस्कृति में कैसे जाया जाता है जहाँ पर्यावरण की सेवा एक पूज्य परंपरा और सामान्य जीवन शैली में शुमार हो जाती है

सूर्योदय के बाद तीन घंटे बीत चुके हैं। जोधपुर के गुडा बिश्नोई गाँव में बैशाख के महीने में जमकर जश्न मनाया जाता है, यह वह महीना है जब किसान उत्सव और प्रार्थनाओं के साथ फसलों की कटाई की शुरुआत करते हैं। गुडा बिश्नोई की एक निवासी बरजू देवी बिश्नोई फावड़े, गुड़, बर्तन, घी और एक दीपक के साथ बैसाख के रिवाज के लिए एक नजदीकी झील पर हैं। वह कहती हैं, “गुडा में बिश्नोई महिला झील जाकर अपने दिन की शुरुआत करती है। हम झील पर प्रार्थना और सेवा (रिवाज का एक हिस्सा) करते हैं। सेवा में शामिल है मिट्टी खोदना और यह सुनिश्चित करना कि आस-पास कोई प्रदूषण न हो एवं दिन में प्यासे पक्षियों के स्वागत के लिए झील अच्छी स्थिति में रहे। अगली सुबह हम फिर से ऐसा करने के लिए वापस लौटते हैं।”

उत्साही परियावारणविद1इस साल की शुरुआत में बिश्नोई गुडा के निकट एक अन्य गाँव कनकनी में काले हिरन के शिकार के मामले में बॉलीवुड अभिनेता सलमान खान के खिलाफ दोषसिद्धि ने बिश्नोई समुदाय को एक बार फिर सुर्खियों में ला दिया है। सलमान खान मामले में बिश्नोइयों का प्रतिनिधित्व करने वाले जोधपुर के एक प्रसिद्ध वकील महिपाल बिश्नोई ने कहा कि “इस दोषसिद्धि ने शिकारियों को कड़ा संदेश दिया है, वन्यजीवन पर हो रहे अपराधों पर और ज़्यादा कठोर सजा का प्रावधान होना चाहिए।“

महिपाल के मुताबिक, जबकि पारिस्थितिकी की रक्षा के लिए बिश्नोई पुरुषों द्वारा लगातार प्रयास किये जाते हैं वहीं इस संप्रदाय की महिलाएं इसके लिए ठोस आधार तैयार करने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। वह कहते हैं, “बिश्नोइयों के इतिहास और संस्कृति ने पारिस्थितिकी के संरक्षण में महिलाओं की अगुवाई को देखा है। महिलाएं बिश्नोई समुदाय के मूल्यों को स्थापित करती हैं और सुदृढ़ करती हैं। ये मूल्य पुरुषों को गुरु जम्बेश्वर जी के सिद्धांतों या अमृता देवी बिश्नोई के बलिदान के मर्म के खिलाफ आने वाले किसी भी व्यक्ति या कार्यवाही के खिलाफ खड़ा होने के लिए प्रेरित करते हैं।

बीस और नौ। उनत्तीस सिद्धांत। बिश्नोई समाज के संस्थापक गुरु जम्बेश्वर को सप्रेम ‘जम्बो जी’ बिश्नोई नाम से भी बुलाया जाता है, उनके अनुयायी 29 सिद्धांतों का पालन करते हैं।

बरजू देवी एक नजदीकी मंदिर के रास्ते पर थीं जहाँ वह पूजा में अन्य महिलाओं के साथ शामिल होतीं। यह पूजा सिर्फ प्रार्थनाओं और दीप जलने तक ही सीमित नहीं है। इसमें शामिल है सेवा – गाँव में वृक्षों, वन्य पशुओं, मवेशियों और जल निकायों की सेवा। फावड़े की मदद से वे मंदिर परिसर में वृक्षों के आस-पास की मिट्टी को खोदकर ढीला करती हैं जिससे वे वृक्ष तपन में बेहतर श्वसन कर सकें।

गुडा बिश्नोई में जंगल के बीच से एक सड़क मुझे मंदिर ले जाती है। यहाँ महिलाएं बिश्नोई संप्रदाय, कृष्ण और विष्णु के संस्थापक भगवान जम्बेश्वर यानी जम्बो जी के लिए भजन गा रही हैं। उनकी आवाजें भारी और समृद्ध थीं। महिलाएं, जिनमें अधिकांश बिश्नोई थीं, चमकीले लाल, गुलाबी और नारंगी रंग के पारंपरिक परिधानों में थीं। मंदिर में झील के हिस्सों और किनारों को साफ़ करने और खुदाई करने के एक थका देने वाले काम के बाद वे समापन की ओर बढती हैं। बरजू देवी उद्देश्य भाव के साथ मंदिर के कुएं के पास जाती हैं। उनके चलने पर उनके चांदी के आभूषणों की झंकार सुनाई देती है।

वह कुएं से पानी खींचती हैं और बताती हैं कि गर्मियों के मौसम में एक बिश्नोई महिला के लिए एक औसत दिन कैसा होता है। वह कहती हैं, “हम हमारे आस-पास की प्रकृति प्रदत्त वस्तुओं की सेवा करने के बाद ही भोजन ग्रहण करने के बारे में सोचते हैं। बिश्नोई महिलाएं बैसाख के बाद और भी व्यस्त हो जाती हैं, जब असली काम शुरू होता है, यानी फसलों की वृद्धि का। सांगरी  बिश्नोई रसोई में कई तरह और कई व्यंजनों के लिए तैयार की जाती है।” वह वृक्षों को जल के पात्र अर्पित करती हैं। वह विस्तार से बताती हैं कि “वृक्ष माथे पर लगी बिंदी की तरह जीवन का बिंदु है। आपकी बिंदी सामान्य से थोडा ऊपर है लेकिन हम दोनों ही इसे लगाते हैं। आप कृष्ण के भजन गाती हैं हम कृष्ण, विष्णु और जम्बो जी के भजन गाते हैं। हमारा धर्म है प्रकृति से प्रेम करना लेकिन बिश्नोई इसके पालन में एक कदम आगे हैं।”

जोधपुर के एक अग्रणी पर्यावरण कार्यकर्ता खम्मा राम बिश्नोई पर्यावरण के प्रति बिश्नोई समुदाय की प्रतिबद्धता और प्लास्टिक के इस्तेमाल के खिलाफ अपने कार्य पर एक भाषण देने के लिए हाल ही में दिल्ली आये थे। खम्मा राम पर्यावरण के विषय पर यूनेस्को मुख्यालय में चर्चा कर चुके हैं। वह ‘स्वराज्य’ को बताते हैं कि “जम्बो जी ने भक्ति आन्दोलन के दौरान पारिस्थितिकी और पर्यावरण की रक्षा के लिए आन्दोलन की शुरुआत की थी। उनके द्वारा स्थापित सिद्धांतों में वैज्ञानिक विचार शामिल हैं। मैं उन्हें पर्यावरण के लिए कार्य करने वाले पहले वैज्ञानिकों में से एक मानता हूँ। पारिस्थितिकी की सुरक्षा के लिए उनके द्वारा शुरू किया गया आन्दोलन असाधारण है। बिश्नोई महिलाएं इसमें सबसे आगे रही हैं।”

उत्साही परियावारणविदपशु जीवन, पौधे और पेड़ भारत के मूल पारिस्थितिकीय योद्धा बिश्नोईयों के लिए एक “निमित्त मात्र” से अधिक हैं। यह जोधपुर और इसके आस-पास के गांवों में जीवन का एक पहलू है जिसे बहुत सारे बाहरी लोग धार्मिक या सांस्कृतिक सन्दर्भ में देख या समझ नहीं पाते हैं। जानवरों, पौधों और पेड़ों को होने वाले किसी भी नुकसान को जोधपुर के सांस्कृतिक और धार्मिक सन्दर्भ में देखा जायेगा। बिश्नोई गुडा में पेड़ों, जानवरों और पर्यावरण के लिए प्यार भक्ति, धार्मिकता और संस्कृति से लिपटा हुआ है। यह सबसे जीवंत अभिव्यक्तियों और रंगों में मौजूद है। पारिस्थितिकी को बचाने का हर प्रयास घर से शुरू होता है। वृक्षों के लिए प्रेम इसके चारों ओर लिपटे पवित्र धागों से पता चलता है। कुछ धागे दिखाई पड़ते हैं और बहुत सारे धागे अदृश्य हैं। बिश्नोई सभी जानवरों की रक्षा करते हैं लेकिन हिरन विशेष है। इसे पवित्र माना जाता है।

बिश्नोई महिलाओं की तस्वीरों, विशेष रूप से बिश्नोई गुडा में रहने वाली महिलाओं की, जिन्हें हिरन के अनाथ बच्चों को स्तनपान कराते हुए देखा गया, को यहाँ आने वाले आगंतुकों और यात्रियों द्वारा व्यापक रूप से साझा किया गया है। ये तस्वीरें वात्सल्य प्रेम (बच्चे के लिए माँ का प्यार) का जीता-जागता उदहारण हैं। सुन्दर बिश्नोई महिलाएं माँ की अनुपस्थिति को अस्थायी रूप से प्रतिस्थापित करते हुए हिरन के दुधमुहें बच्चों से प्यार करती हैं और उनकी देखभाल करती हैं। यहाँ बिशनोई महिलाएं प्रकृति से एकरूप होती दिखती हैं।

वन्य-आधारित जीवन और परंपराओं को कायम रखते हुए गुडा बिश्नोई के बिश्नोईयों द्वारा हिरन के बच्चे को स्तनपान कराना कैसे उन्हें अन्य समुदायों से अलग करता है? बरजू देवी स्पष्ट करती हैं, “हम उन्हें वैसे ही स्तनपान कराते हैं जैसे हम अपने बच्चों को कराते हैं। जानवरों और पौधों के प्रति दयालुता हमारे द्वारा पालन किये जाने वाले सिद्धांतों का हिस्सा हैं। यह हमारी दैनिक दिनचर्या से प्रकट होता है। यह हमारा धर्म है। ”

बिश्नोई समुदाय में महिलाएं इस अटल पारिस्थितिकीय आन्दोलन के केंद्र में तब से हैं जब से खेजरी वृक्षों और खेजरली गाँव की रक्षा के लिए अमृता देवी बिश्नोई ने अपना जीवन न्यौछावर किया था। बिश्नोईयों के प्रतिरोध ने भारत और दुनिया को पर्यावरण आंदोलन दिया। आज बरजू देवी बिश्नोई जैसी महिलाएं मजबूत ताने-बाने वाले बिश्नोई समाज में पेड़ों, पशु जीवन, प्राकृतिक संसाधनों और पर्यावरण की रक्षा और संरक्षण में सबसे आगे हैं। वे पारिस्थितिकी को बचाने के लिए प्रत्येक बलिदान में अमृता देवी बिश्नोई के बलिदान का जश्न मनाते हैं और खेजरली गाँव में लगने वाले एक सालाना मेले में उनके बलिदान को याद करते हैं।

1730 में बिश्नोईयों ने जोधपुर के तत्कालीन महाराजा के एक महल के निर्माण के लिए पेड़ों को काटे और गिराए जाने का विरोध किया था और उन्हें कुल्हाड़ी से बचाने के लिए पेड़ों से लिपट गए थे। अमृता देवी बिश्नोई इस प्रतिरोध की अग्रणी ताकत बन गयीं थीं। इस प्रतिरोध ने रफ़्तार पकड़ी और 363 बिश्नोईयों ने अपनी जिंदगियां कुर्बान कर दीं। महाराजा ने विनाश के बाद माफ़ी मांगी। इस ग्लानि में उन्होंने एक राजाज्ञा जारी की कि बिश्नोई गाँव में कोई पेड़ नहीं काटा जायेगा और किसी हिरन को चोट नहीं पहुंचाई जाएगी या मारा नहीं जायेगा।

अमृता देवी बिश्नोई के बलिदान के सदियों बाद पूनमचंद बिश्नोई, जिन्हें सलमान खान मामले में दृढ प्रतिज्ञ रहने के लिए महिपाल द्वारा सम्मानित किया गया है, के साक्ष्य बिश्नोई समुदाय के जानवरों और पारिस्थितिकी की रक्षा के लिए दृढ़ संकल्प एक नम्र अनुस्मारक के रूप में आए। महिपाल कहते हैं, “पूनमचंद बिश्नोई दबाव में नहीं झुकते थे। पूरा समुदाय उनके पीछे खड़ा था। हमारे संगठित मूल्य हमारे पीछे खड़े थे। यह एक संघर्ष था जो 20 वर्षों तक चला।” बिश्नोई समुदाय ने सलमान खान की दोषसिद्धि का स्वागत किया था।

महिपाल कहते है, “बॉलीवुड अभिनेता के खिलाफ मामला और दोषसिद्धि चुनौतियों से भरी हुई थी। बिश्नोई समुदाय सभी बाधाओं के खिलाफ खड़ा रहा और ऐसे किसी भी कारक या दबाव से निडर रहा जो गुरु जम्बेश्वर जी द्वारा निर्धारित मूल्यों और सिद्धांतों में हमारे विश्वास का मुकाबला करते।” हालाँकि, यह पहली बार नहीं था जब एक बिश्नोई अपने मूल्यों के लिए खड़ा था। बिश्नोई शिकारियों से मुठभेड़ में गोलियों का सामना कर चुके हैं। कुछ लोगों ने अपनी जिंदगियां जानवरों की रक्षा के लिए लड़ते हुए खोई हैं। महिपाल कहते हैं, “निहाल चंद बिश्नोई उनमें से एक हैं। गंगा राम बिश्नोई भी उन्हीं में से एक हैं।”

निहाल चंद एक चिंकारा को बचा रहे थे। गंगा राम चिंकारा के हत्यारों से बहादुरी से लड़े और उनका सामना करते समय मारे गए। खम्मा राम कहते हैं, “दोषसिद्धि सहायक साबित हुई। नीचे तबके के शिकारी डरने लग गए, कि इतने बड़े आदमी को सजा हो गयी तो हम तो मच्छर हैं। इससे उन पर दबाव बन गया।

”गुडा बिशनोई में खुद को मैं आध्यात्मिक मूल्यों पर पाता हूँ, जो उत्तरखंडी लोगों की पहचान है, वह जगह जहां मेरा घर है। उत्तराखंड का चिपको आन्दोलन बिश्नोई प्रतिरोध का एक आधुनिक अनुस्मारक था जो खेजरी गाँव, जहाँ अमृता देवी ने अगुवाई की थी, में नृशंस हत्याओं के दो शताब्दियों बाद आया। गुडा बिश्नोई की एक अन्य निवासी जन्गपू देवी बिश्नोई उत्तराखंड को “यमुना जी और गंगा जी के घर” के रूप में जानती हैं।

गंगा का उल्लेख उनकी आँखों को गीला कर देता है। वह कहती हैं, “हमारे परिवार की सभी बुजुर्ग महिलाएं हरिद्वार और ऋषिकेश में गंगा जी की तीर्थयात्रा के लिए गये हैं। आध्यात्मिक रूप से गंगा जी को स्पर्श करने का चलन बढ़ रहा है। पंद्रह साल पहले, तीर्थयात्रा से लौटने से पहले मेरे ससुर ने 84 गाँवों के लोगों के लिए भव्य भोज की मेजबानी की थी। भोजन के लिए सभी जातियों के लोगों को आमंत्रित किया गया था। सभी जातियों और जीवन के सभी क्षेत्रों से आये लोगों की मेजबानी करना हमारे लिए सम्मान का विषय था।”

जांगपू देवी अपने आंगन में परिवार की अन्य महिलाओं के साथ खेजरली गांव में स्थित अपने खेतों से तोड़कर लाई गयी खेजरी के पेड़ पर उगने वाली ताजी, हरी और कोमल सांगरी की फलियों के दिन भर के ढेर को छांटने और साफ करने के लिए बैठती हैं। सूर्य की गर्मी उन फलियों को और अधिक कोमल बना देती है। उनकी सुगंध जांगपू देवी के आंगन में बनी रहती है। इसके साथ ही 363 बिश्नोइयों के विचार भी विद्यमान रहते हैं। बिश्नोइयों के लिए, खेजरी पेड़ पर उगने वाली सांगरी की फलियों का महत्व भोजन से कहीं अधिक है। यह तपस्या का फल है, जो एक ऐसे पेड़ से उत्पन्न होता है जिसे वे लोग पवित्र दाता मानते हैं। जांगपू देवी कहती हैं, “खेजरी भयभीत है। यह बलिदान और साहस का अनुस्मारक है। आप ऐसे पेड़ की रक्षा क्यों नहीं करेंगे जो बहुत कुछ देता है और जीवन संभालता है?”

जांगपू देवी के अनुसार, उनके द्वारा उत्पन्न किए जाने वाले बाजरा का एक अच्छा हिस्सा उन पक्षियों के लिए रखा जाता है जो गुडा झील पर आते हैं। ” हम अपने खेतों में जो कुछ उगाते हैं वह गेरइयां (जिसे गौरैय्या भी कहा जाता है), मोर, सारस, कबूतर और अन्य पक्षियों को भी प्राप्त होता है। “पक्षियों में से कुर्जान संरक्षित पक्षी है, जिसका उल्लेख इस क्षेत्र के लोक गीतों में किया जाता है।

उत्साही परियावारणविद

गुडा बिशनोई में अपने आंगन में बैठी जांगपू देवी

अपने पर्यावरण को बचाने और उसकी रक्षा करने के लिए बिश्नोई की महिलाओं का आंतरिक आंदोलन कुछ वर्षों से भावनात्मक मील के पत्थर से कुछ यथार्थवादी प्रभावों की तरफ प्रेरित हो गया है। युवा पीढ़ियों को धर्म के सिद्धांतों में ढाल दिया जाता है और रोजमर्रा के जीवन में मूल्यों को बनाए रखा जाता है।

जागरुकता और पहुँच के इस समय में बिश्नोई की युवा पीढ़ी की लड़कियां जानती हैं कि मीडिया उनकी आस्था के बारे में क्या दिखाता है। पूजा और विमला बिश्नोई,कंकानी(वह गांव जहां बहुत प्रसिद्धकुख्यात काले हिरण शिकार हुआ था) की ओर जाती सड़क पर स्थित एक सरकारी स्कूल में कक्षा XI की विज्ञान वर्ग की छात्रा हैं।स्वराज्य के साथ बातचीत में,विमला बिश्नोई ने करारा जवाब दिया। उन्होंने कहा, ”अन्य शहरों और पृष्ठभूमि के लोगों को यह समझना चाहिए की हमारे लिए हमारा पर्यावरण क्या मायने रखता है। ऐसी शिक्षा का क्या फायदा यदि आप बिश्नोई औरजानवरों, पक्षियों, पेड़ों-पौधों और पर्यावरण के प्रति यहां के लोगों की प्रतिबद्धता को समझने में नाकाम रहते हैं?”शुरुआत में बातचीत के दौरान उदास दिख रही पूजाकहती हैं, “गुदा बिश्नोई में युवा बिश्नोई लड़कियां पढ़ाई कर रही हैं और उनकी राजस्थान में सफल प्रशासक बनने की आकांक्षा है।राज्य पर्यावरण के प्रति जागरूक महिला अधिकारी पाने का हकदार है।”

गुदा बिश्नोई की एक अन्य निवासी इलायची बिश्नोई ने वार्ता में धार्मिक मूल्यों की व्याख्या की। उन्होंने कहा, कोई भी बाहरी जो हमारे धर्म के प्रति आस्था रखेगा वह हमें या हमारे पेड़ पौधों तथा जानवरों को नुकसान नहीं पहुंचाएगा, जिन्हें हम पवित्र मानते हैं। यह सरल शिष्टाचार है।जो व्यक्ति अपने धर्म को समझता है वह हमारे धर्म को समझ जाएगा।”

पेड़, जानवरों और जीवन के अन्य अभिव्यक्तियों के लिए उनकी सेवा के भाव में क्या झूठ है?गुडा बिश्नोई में रहने वाले कक्षा XI की छात्रा लक्ष्मी बिश्नोई,पानी के स्त्रोत के पास गाय के झुण्ड को संभालते कहती हैं “बिश्नोई परिवार और बिश्नोई समाज की मजबूत इकाइयों के रूप में, हमें जंबो जी द्वारा बनाए गए धर्म के सिद्धांतों को जारी रखना है। वे हमारे जीवन को आकार देते हैं।”

बरजू देवी कहती हैं, “हमारी बेटियां, शिक्षा लेते समय अपनी मूल मान्यताओं और संस्कृति सेजुड़ी रहती हैं। अगर हम अपने गुरुओं द्वारा हमारे लिए निर्धारित किए गए मूल्यों को भूल जाते हैं तो ऐसी शिक्षा का क्या फायदा है?”

इलायची काफी उत्सुकता से बारिश का इंतजार कर रही हैं। वह कहती है कि “बारिश के दौरान बिश्नोई गुडा रंगों और खुशियों से खिल उठता है। हम अपने दिन का ज्यादातर समय खेतों में और सिंचाई के लिए बने तालाबों की देखभाल करने में बिता देते हैं, इन्हीं तालाबों से पूरे परिवार की साल भर की जरूरतें पूरी होती हैं।” वह अपने घर के पास में ही सिंचाई के लिए बने तालाब को दिखाती है। “हम पानी की एक बूँद तक बर्बाद नहीं करते हैं। इसी तरह, बारिश से खेतों में जो कुछ उग आता है उसी को साल भर खाने के लिए भर कर रख लेते हैं। साल भर जानवर भी इसी तालाब से पानी पीते हैं।”

इलायची का पति और एक किसान, राजू राम बिश्नोई, बिश्नोई महिलाओं को उन सिद्धान्तों और तौर तरीकों के लिए आभार जताता है जो युवा पीढ़ियों के लिए प्रार्थना का एक हिस्सा बन गए हैं। वह कहता है, “आज भी बिश्नोई महिलाएं अमृता देवी के उन मूल्यों (तौर तरीकों) का पालन कर रही हैं जिसके लिए उन्होंने अपना जीनव त्याग दिया था। यह काफी कठिन है लेकिन यह उनको और हमारे परिवारों के वजूद को कायम रखता है।”

इस क्षेत्र में हरियाली को वापस लाने के लिए बिश्नोइयों ने आंतरिक रूप से कई, छोटे और बड़े, कठिन निर्णय लिए हैं। जांगपू देवी कहती हैं कि “ईंधन के लिए हम सूखी पत्तियों पर निर्भर हैं और यह बात तो कोई मायने ही नहीं रखती हैं कि इसके कितनी ज्यादा मेहनत और समय लग जाता है।” हरियाली को वापस लाने के लिए उत्साही बिश्नोई अपने मृतकों का दाह संस्कार तक नहीं करते हैं। इन नियमों का पालन केवल पेड़ की छोटी टहनियों को बचाने के लिए ही नहीं बल्कि उनके सांस्कृतिक मूल्यों के लिए महत्वपूर्ण पर्यावरण को बचाने के लिए भी किया जाता है। जांगपू देवी कहती हैं कि अमृता देवी के ये शब्द – “एक पेड़ के जीवन का कर्ज चुकाने के लिए मेरी जिंदगी सस्ती है” – हर बिश्नोई के जीनव में गूँजते रहते हैं।

खम्मा राम का कहना है, “पर्यावरण को बचाने के लिए बिश्नोई महिलाओं ने जो बलिदान दिया है वह खेजरली में होने वाले प्रतिरोध और भीषण नरसंहार से बेहतर है।” जांगपू देवी मनोवेग से एक मुट्ठी भर सांगरी अपने हाथ में उठाती हैं और कहती हैं, “बिश्नोई होना कोई आसान बात नहीं है। मेरी आखिरी मंजिल गंगा है। तब तक, जो हमारा है उसे बचाने के लिए मैं कुछ भी करूँगी।” यह एक भावना है जिसकी बिश्नोई से ज्यादा जरूरत हम लोगों को है।

यह लेख स्वराज्य का विशेष सितंबर 2018 प्रिंट इश्यू – “दि इटरनल धर्म” का हिस्सा है।

सुमति महर्षि स्वराज्य की वरिष्ठ संपादक हैं।