संस्कृति
शंकराचार्य की क्षतिग्रस्त समाधि के पुनर्निर्माण के प्रति उत्तराखंड सरकार की उदासीनता

2013 की आपदा के दौरान केदारनाथ मंदिर एवं मंदिर परिसर को अत्यधिक जानमाल का नुकसान हुआ था जिसमें आदि शंकराचार्य की समाधि भी क्षतिग्रस्त होकर बह गई थी। आज इस घटना को करीब सात वर्ष बीत चुके हैं लेकिन अभी तक राज्य सरकार की ओर से समाधि का पुनर्निर्माण नहीं हुआ है।

सनातन संस्कृति में आदि शंकराचार्य का अत्यंत ही महत्त्वपूर्ण स्थान है। शंकराचार्य ने भारतभर में भ्रमण कर वैज्ञानिक, दार्शनिक, व्यावहारिक एवं सांस्कृतिक रूप से चारों दिशाओं में मठों की स्थापना कर सांस्कृतिक एवं धार्मिक रूप से देश को जोड़ने का एक अभूतपूर्व कार्य किया था।

कहा जाता है कि आदि शंकराचार्य के जन्म से पूर्व वैदिक संस्कृति के अवैदिक होने की शुरुआत हो चुकी थी। वैदिक काल के दौरान ही कईं विभिन्न संप्रदायों-विचारधाराओं ने सनातन संस्कृति की निंदा करना एवं सनातन विचारों का खंडन करना  शुरू कर दिया था।

उस दौरान जब सनातन संस्कृति को मानने वाले भी विभिन्न संप्रदायों को एक-दूसरे से भिन्न साबित करने पर उतारू हो गए थे तब आदि शंकराचार्य ने पंच-भेद उपासना संस्कृति से लोगों को अवगत करवाते हुए समझाया, “भले आप किसी भी एक इष्टदेव को मान रहे हों लेकिन शिव, शक्ति, गणेश, विष्णु एवं सूर्य का परस्पर सम्मान एवं पूजन अनिवार्य है और यही आपके हिंदू होने की पहचान भी है।”

आदि शंकराचार्य ने उस समय की प्रचलित शास्त्रार्थ-परंपरा के माध्यम से सनातन संस्कृति एवं विचारों को सिद्ध किया एवं सदैव ही दिग्विजयी रहे। विभिन्न संप्रदायों, विभिन्न विचारधारों के प्रकांड विद्वानों ने जब भी आदि शंकराचार्य से शास्त्रार्थ किया, अंत में वे शंकराचार्य के शिष्य बन गए।

आज के समय में सनातनी आचार-विचार, चित्त-चेतना, व्यवहार, संस्कार, स्वाभाव इन सब पर आदि शंकराचार्य के विचारों का सबसे अधिक प्रभाव देखा जा सकता है।

आदि शंकराचार्य ने ही दशनामी संप्रदाय की स्थापना कर वर्षों तक सनातन संस्कृति की सुरक्षा के लिए आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक रक्षा-कवच बनाया था। उन्हीं के प्रयासों से ही विभिन्न संप्रदायों एवं पूजन पद्धतियों में बँटा सनातन समाज एकजुट हो सका।

आदि शंकराचार्य केवल 32 वर्ष की आयु में ब्रम्हलीन हो गए। उन्होंने जीवन के अंतिम समय में उत्तराखंड की भूमि पर आकर ब्रम्ह-सोपान किया। उत्तराखंड को देवभूमि के नाम से भी पहचाने जाने में उनका प्रयास विलक्षण है लेकिन यह मौजूदा समय की विडंबना ही है कि सनातन धर्म का पुनर-संस्थान करने वाले आदि शंकराचार्य की समाधि का पुनर-संस्थान नहीं हो पा रहा है!

इस विषय पर उत्तराखंड उच्च न्यायालय में जनहित याचिका लगाने वाले अजय गौतम का कहना है, “राज्य ने अपने राजस्व के लिए चारधाम यात्रा तो शुरू कर दी लेकिन आदि  शंकराचार्य की समाधि जिसे इसी मंदिर के एक भाग के रूप माना गया है, उसे लेकर राज्य की स्थिति सकारात्मक नहीं है।”

गौतम कहते हैं, “एक साल में तो बड़े से बड़े पुल बन जाते हैं, बड़ी से बड़ी बिल्डिंगें भी बन जाती हैं तो सात साल में एक समाधि नहीं बन सकती क्या? यहाँ साफ देखा जा सकता है कि इस विषय में सरकार की मंशा है ही नहीं और इसीलिए हम न्यायालय की शरण में हैं।”

2018 में उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार को एक साल के भीतर ही शंकराचार्य की समाधि का परंपरागत रूप से पुनर्निर्माण करने का आदेश पारित किया था लेकिन आज 2021 में भी स्थिति ज्यों की त्यों ही है।

बहरहाल, बीते सप्ताह न्यायालय ने राज्य सरकार को दो सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने के निर्देश देते हुए कहा कि क्यों ना सरकार के खिलाफ अवमानना की कार्रवाई शुरू की जाए।