संस्कृति
अब्राह्मिक मतों जैसा न बने हिंदू धर्म- विष्णुपुराण पर प्रसार भारती का सेन्सर क्यों गलत है

आशुचित्र- एक ऐसे समय में जब कई लेखक और निर्माता हमारे प्राचीन ग्रंथों और पुस्तकों पर आधारित सामग्री रचना चाह रहे हैं, अब्राह्मिक मतों के समान व्यवहार करने का नुकसान हमें ही होगा।

भारत की सबसे बड़ी सार्वजनिक प्रसारण संस्था प्रसार भारती ने कोविड-19 महामारी के दौरान घर बैठे दर्शकों के मनोरंजन और पुराने समय की अनुभूति कराने के लिए 1980, 1990 और 2000 के दशक से सबसे लोकप्रिय टीवी धारावाहिकों का पुनः प्रसारण किया। इसमें रामायण और महाभारत जैसे धारावाहिक भी थे जिन्होंने दर्शक संख्या के नए कीर्तिमान स्थापित किए।

लेकिन अब इस संस्था ने लोकप्रिय धारावाहिक विष्णुपुराण के 16 एपिसोड को सेन्सर करने का निर्णय लिया है जो कि दूरदर्शन एवं ज़ी टीवी पर 2000 से 2002 के बीच पहले ही प्रसारित हो चुके हैं और वर्तमान में 14 मई से डीडी भारती पर प्रसारित हो रहे हैं।

एपिसोड क्रमांक 47 से 62 को वापस लेने का निर्णय तब लिया गया जब कार्तवीर्य अर्जुन (सहस्रार्जुन के नाम से भी जाने वाले) के चरित्र पर कुछ समुदायों ने विरोध किया। हिंदू ग्रंथों के अनुसार कार्तवीर्य अर्जुन को पृथ्वी के सबसे बड़े योद्धाओं के रूप में जाना जाता है जिसने रावण को भी सरलता से पराजित किया था।

जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है यह चरित्र सत्ता के मद में घमंडी होता जाता है और लोगों एवं ईश्वरों को परेशान करने लगता है। तब भगवान विष्णु ऋषि जमदग्नि के पुत्र का अवतार लेते हैं जिन्हें परेशान करके राजा ने उनकी कामधेनु गाय भी चुरा ली थी।

इस प्रकार भगवान विष्णु का जन्म परशुराम के रूप में ऋषि और उनकी पत्नी रेणुका के पुत्र के रूप में हुआ। परशुराम ने सहस्रार्जुन की हत्या की और नर्मदा के तट पर स्थित माहिश्मति नामक साम्राज्य में धर्म की पुनः स्थापना की।

आज भी मध्य प्रदेश में सहस्रार्जुन को कुछ समुदायों द्वारा ईश्वर के रूप में पूजा जाता है क्योंकि राजा में कई गुण थे। टीवी धारावाहिक विष्णुपुराण के 47 से 62 तक के एपिसोड को प्रसार भारती ने काट दिया है जहाँ सहस्रार्जुन और परशुराम की कहानी आती है।

लेकिन सहस्रार्जुन को पूजने वाले कुछ समुदाय उनके चरित्र के चित्रण का विरोध कर रहे थे जो उनके अनुसार गलत और भ्रामक है। पिछले कुछ दिनों से इंदौर में अखिल भारतीय जायसवाल सरवर्गीय महासभा आंदोलन कर सरकार को इन 16 एपिसोड का सेन्सर करने के लिए विवश कर रही थी।

प्रसार भारती इस दबाव के अधीन आती कि उससे पहले ही संतोष कुमार जायसवाल नामक एक याचिकाकर्ता ने कुछ एपिसोड का प्रसारण रोकने के लिए इलाहाबाद उच्च न्यायालय का द्वार खटखटाया। चरित्र के चित्रण पर जायसवाल ने वकीलों की सहायता से कड़ी आपत्ति दर्ज करवाई कि भगवान विष्णु समेत अन्य देवताओं का भी गलत चित्रण किया गया है।

हालाँकि न्यायालय ने याचिका यह कहकर खारिज कर दी कि “विष्णुपुराण जैसे प्राचीन ग्रंथ हमेशा वाद-विवाद और परिचर्चा के लिए खुले रहते हैं क्योंकि उसके अनेक अर्थ निकाले जा सकते हैं जिसकी चर्चा धर्मगुरुओं और अध्यात्म से जुड़े लोगों से करनी चाहिए। यह हमारे के बहुवाद का सौंदर्य है।”

“इसमें कोई दोराय नहीं है कि ‘आपत्तिजनक’ कृति मुख्य रूप से मनोरंजन के लिए बनी है। यह ग्रंथों और प्राचीन पुस्तकों पर आधारित है इसलिए संभावना है कि इसमें जान-बूझकर या गलती से त्रुटी आई हो।”, न्यायाधीश सुनीत अग्रवाल और सौमित्र दयाल सिंह के आदेश में कहा गया।

एक ओर हम भारत की न्यायपालिक पर आरोप लगा सकते हैं कि इसे “बहुवाद का सौंदर्य” तब ही दिखता है जब बात हिंदू धर्म की हो लेकिन हिंदुओं को भी ऐसी ढलान से बचना चाहिए जो धर्म को अब्राह्मिक मतों की ओर ले जाती है जहाँ प्राचीन पुस्तकों पर किसी परिचर्चा, वाद-विवाद और मतभेदों की कोई गुंजाइश नहीं रहती।

विष्णपुराण के निर्माता वही बीआर चोपड़ा हैं जिन्होंने टेलीविज़न पर महाभारत को भी नाटकीय रूप दिया है। अवश्य ही चोपड़ा और उनका दल पूर्ण रूप से ग्रंथों के अनुसार नहीं चले और कहानी के कई भाग और चरित्रों के संवादों का आविष्कार धारावाहिक के लेखकों ने किया। उन्होंने अवश्य ही कलात्मक छूटों का लाभ उठाया परंतु हिंदू धर्म की संवेदनाओं को आहत नहीं किया।

इसलिए हिंदू जनसमूह ने न सिर्फ इसे बाधारहित चलने दिया बल्कि इसे प्रोत्साहित भी किया। विष्णुपुराण भी कुछ अलग नहीं था। ध्यान देने योग्य बात यह है कि 2000 में जब यह पहली बार प्रसारित हुआ, तब कोई विवाद नहीं हुआ लेकिन अब यह विवाद दर्शाता है कि संभवतः हम गलत दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।

एक ऐसे समय में जब कई लेखक और निर्माता हमारे प्राचीन ग्रंथों और पुस्तकों पर आधारित सामग्री रचना चाह रहे हैं, अब्राह्मिक मतों के समान व्यवहार करने का नुकसान हमें ही होगा, यह हिंदू संस्कृति के पुनर्जागरण को आहत करेगा।

अगर यह जारी रहा तो राजमौली बाहुबली जैसी फिल्में नहीं बनाएँगे, नहीं अमीश त्रिपाठी हमारी पौराणिक कथाओं को अपने अनुसार गढ़कर पॉप उपन्यास के रूप में बेच पाएँगे जो लाखों पाठकों तक पहुँचती है, विशेषकर युवाओं तक जिन्हें जड़ों से जोड़ने के लिए हम चिंतित रहते हैं।

विरोधी तत्वों द्वारा निर्मित सामग्री का विरोध करना एक बात है लेकिन सही उद्देश्य से कलात्मक सामग्री बनाने वालों के मार्ग का रोड़ा बनना दूसरी। हिंदुओं को चुनना सीखना होगा कि कहाँ लड़ना आवश्यक है।

अब्राह्मिक मतों की असहिष्णुता वहाँ स्वीकार करनी चाहिए जहाँ हम असहिष्णु अब्राह्मिक मतों से ही लड़ रहे हों। हिंदू छेनी की तरह अनावश्यक वस्तुएँ हटाएँ, न कि हथौड़े की तरह हर जगह कील ठोकते चलें।