संस्कृति
प्राण देकर चुकाना पड़ा दीपावली मनाने का मूल्य- जानिए क्यों और कैसे मुग़लों ने की भाई मनी सिंह की हत्या
आशुचित्र- जब एक विद्वान योद्धा भाई मनी सिंह ने धर्म के लिए अपने प्राणों की बलि चढ़ा दी।

प्रथम-

लाहौर के मुग़ल शासक और मुग़ल सेना के सेनाध्यक्ष ज़करिया खान पंजाब में 1737 ईसवी में नवंबर की शुरुआत में अपनी सेना के साथ सुबह होने का इंतज़ार कर रहा था। धीरे-धीरे उजाला हो रहा था। कभी-कभी दमक भी दिखाई पड़ती थी। मुग़ल सेनाध्यक्ष काफ़िरों के देश में इस समय कहीं भी चैन से नहीं रह पाता था। रातें दीयों से प्रकाशवान रहती थीं और वह सोचता था कि कैसे वह अपनी सेना को इन घरों में लूटने के लिए भेजे, जैसा कि वह पहले किया करता था। कैसे औरंगज़ेब की मृत्यु के तीन दशकों में चीज़ें बदल गई थीं। काफ़िरों की ताकत बढ़ती जा रही थी। सिख खुद को एक व्यवस्थित रूप से तैयार कर रहे थे और मराठा दक्षिण में साम्राज्य को चुनौती दे रहे थे। जल्द ही वे अपना साम्राज्य स्थापित कर सकते थे। लेकिन कैसे यह सेनाध्यक्ष अपनी नाक के नीचे काफ़िरों को प्रकाश का यह पर्व मनाने देता। वह सोचता था कि कैसे वह इस त्यौहार को रोके। पहले के अच्छे दिनों में राजा के एक फरमान, यहाँ तक कि स्थानीय मौलवी के फरमान से भी सेना यह काम कर सकती थी। अब उसे एक धर्मनिरपेक्ष कारण खोजना होगा।

किसी के कदमों की आहट से वह अपने ख्यालों से बाहर निकला। जो आदमी आया था, वह था दीवान लखपत राय। ज़करिया खान के मन में उसके लिए कुछ नहीं, केवल अपमान था। वह एक यथार्थ दीमक था, जिसने अपने ही लोगों को धोखा दिया था। लेकिन इन सब के बावजूद वह काम का आदमी था। वह अभी भी एक हिंदू था और सिख उसपर भरोसा करते थे। ज़रूरत पड़ने पर वह खुद को एक शिव भक्त भी सिद्ध कर सकता था और लोग उसपर भरोसा करके अपने रहस्य उसके सामने खोल देते थे। लखपत राय की बुझी हुई आँखें सेनाध्यक्ष के शिविर के प्रवेश पर मशाल की रोशनी से भेड़िये की आँखों की तरह चमक रही थीं। उसके पास ज़रूर कोई खबर थी और यह दीपावली के एक सप्ताह पहले था।

लखपत ने मुस्कुराते हुए इस्लामिक पारंपरिक लहजे में झुककर सलाम किया। ज़करिया ने कहा, “क्या खबर है?”। उसे घृणा होती थी जब धिम्मी और काफ़िर सच्चे मुसलमान की तरह बनने की कोशिश करते थे।

लखपत ने खुद को धीरे से सीधा किया और फुसफुसाते हुए बोला, “हुज़ुर! इस दीपावली पर सिख सामूहिक रूप से हरमंदिर साहेब पर इकट्ठा होने की योजना बना रहे हैं। अगर वे सफल हुए तो मुश्किल हो सकती है।” वह अपने मालिक की प्रतिक्रिया देखने के लिए थोड़ी देर रुका। “इसे कौन आयोजित कर रहा है लखपत? मैंने सुना कि सभी काफिरों, जिनका दिमाग़ अल्लाह भ्रमित कर देते हैं, की तरह सिख भी अपने अंतिम गुरु की मृत्यु के बाद सत्ता के लिए लड़ रहे हैं?”

“वो पहले थे हुज़ुर! अब गुरु माता भाई मनी सिंह को लेकर आ गई हैं और सभी सिखों का संगठन स्थापित हो चुका है। और उसी ने सभी गाँवों से सिखों को दीपावली के लिए हरमंदिर साहेब पर इकट्ठा होने के लिए बोला है और वे इसे स्वतंत्रता दिवस की तरह मनाने वाले हैं।”

“भाई मनी सिंह?” ज़करिया खान शांत पड़ गया। उसे पता था कि अगर भाई मनी सिंह है, तो यह उसका दुर्जेय शत्रु है। उसने गुरु की रक्षा में अपने बच्चों को खो दिया था। वह क विद्वान भी था और एक योद्धा भी, अगर सखपत सही था, तब वह एक अच्छा व्यवस्थापक भी था। लेकिन यह एक महत्त्वपूर्ण समय था। अगर ज़करिया खान यह सिद्ध कर सकेगा कि मुग़ल राज्य में हरमंदिर साहेब पर दीपावली मनाने से रोकने की ताकत है, तो वह सिखों को भी यह अहसास दिला पाएगा कि भाई मनी सिंह एक असफल व्यवस्थापक है जिससे सिख फिर से बँट जाएँगे। और यह जीत उसकी धार्मिक जीत भी होगी जहाँ वह उत्सव को हार की खामोशी में बदल देगा।

लखपत ने अपने मालिक के मस्तिष्क के विचारों को समझ कर कहा, “हुज़ुर! आप पंजाब में मुग़ल सेना के सेनाध्यक्ष हैं और लाहौर के शासक हैं, उसे आपकी अनुमति लेने आना होगा।”

फिर वे दोनों एक दूसरे को देखकर मुस्कुराए- ज़करिया की मुस्कान एक धार्मिक विजय की थी और लखपत की मुस्कान सोने की आशा में एक धर्मनिरपेक्ष मुसकान थी।

 द्वितीय-

“बस दीपावली मनाने की अनुमति, है ना?” ज़करिया खान ने दरबार के बीचो-बीच खड़े भाई मनी सिंह की ओर देखकर कहा।

“हाँ”, भाई मनी सिंह ने कहा, “हरमंदिर साहेब पर।”

“ज़रूर, मुग़ल राज्य धिम्मी, बल्कि काफ़िरों के प्रति भी धर्मनिरपेक्ष है, ओह सिख। तो हम अनुमति देंगे। लेकिन…” उसने सीधे भाई मनी सिंह की आँखों में देखा।

विद्वान-योद्धा वृद्ध था। उसकी दाढ़ी सफेद थी और पगड़ी के नीचे बंधे लंबे बालों में भी चांदी की चमक थी। लेकिन उनके व्यक्तित्व में तेज था, और वह कमज़ोर नहीं लगता था। थोड़ी सी कंपन उसके शरीर में हुई। क्यों सभी सिखों की निगाह में भयभीत करने वाली चमक होती है, जैसे कि गुरु तेग़ बहादुर की आँखों में थी, जब उनका सर काटा जा रहा था, उसने सोचा।

भाई मनी सिंह शांत थे जिससे वह और भयभीत हुआ।

“देखो यह, दी… दी… जो भी त्यौहार है, वह असल में बुरा है। दावत, पटाखे और ये सब। इससे सरकार पर बहुत बोझ बढ़ता है। तो तुम्हें क्या करना है कि सरकार के 5000 रुपए देने हैं और फिर तुम अपना त्यौहार मनाओ। और हाँ, ये 5000 रुपए एक सप्ताह के भीतर जमा करा देना।”

सभी गाँवों से सिख आएँगे और सभी की तरफ से कुछ सिक्कों से आसानी से 5000 रुपए इकट्ठा हो जाएँगे। लेकिन एक सप्ताह के भीतर? यह असंभव होगा। यह साफ तौर पर उत्पीड़न था और अभी सिख खुद के व्यवस्थित कर ही रहे थे, वे राज्य से एक मुठभेड़ का भार नहीं उठा पाते। लेकिन फिर भी उसे अपने अंदर एक ताकत महसूस हुई। यह अलग प्रकार का खेल होने वाला था।

भाई मनी सिंह को उसके माध्यम से गुरु कहते हुए प्रतीत हुए, “हाँ, हो जाएगा।”

“अगर नहीं, ओह सिख…” ज़करिया थान गुर्राया जैसे भाई मनी सिंह द्वार तक पहुँचे, “तुम्हें हमारा दरबार सज़ा देगा।”

फिर ज़करिया ने बाईं ओर खड़े लखपत को देखकर एक मुस्कान भरी। लखपत ने भी सेनाध्यक्ष को संकेत दिया। वे यह सुनिश्चित करेंगे कि कोई सिख अपने गाँव से हरमंदिर साहेब न पहुँचे। वे उन्हें रोकेंगे, उनका पीछा करेंगे और अगर ज़रूरत पड़ी तो मारेंगे। सभी संचार माध्यमों को बंद कर दिया जाएगा।

तो मुग़ल सेनाध्यक्ष अपने बाईं ओर खड़े दीवान के साथ मिलकर यह सुनिश्चित करेंगे कि तीर्थस्थल तक की यात्रा तबाह कर दी जाए और दीपावली के उत्सव को नाकाम कर दिया जाए।

तृतीय-

पिछली रात की बारिश से मैदान गीला था। मुग़ल सेनाध्यक्ष बंदी के सामने खड़ा था। भाई मनी सिंह वहाँ बैठे थे। पिछली रात की सारी उत्पीड़न उनके शरीर पर दिख रही थी लेकिन फिर भी उनका आँखों में वही तेज था और एक मुस्कान भी थी। “यह आखिरी मौका है” सेनाध्यक्ष ने उनसे कहा, “अपना धर्म त्याग दो और दीन अपना लो। एक फालतु से पर्व को मनाने के अधिकार के लिए, अपनी जान क्यों देना।”

भाई मनी सिंह ने सेनाध्यक्ष को देखा और कहा, “मुग़ल, तुम कभी नहीं समझ सकते। यह धर्म का देश है। यह स्वतंत्रता का देश है। दीपावली हमारे लिए स्वतंत्रता दिवस है। यह अनेक रंगों का उत्सव है और जिसका दिमाग बंद है, वह इसे नहीं समझ सकता। लेकिन अब तुम भी धर्म का साधन बन चुके हो, आगे बढ़ो।”

सेनाध्यक्ष ने मौलवी को देखा और मौलवी ने जल्लाद को इशारा किया। जल्लाद संत के मने घुटनों पर बैठ गया। उसने याद किया। यह वही संत है जिसके पास वह अपनी बीमार बेटी को लेकर गया था और संत ने उसका उपचार किया था और अब उसे इनके टुकड़े-तुकड़े करके धीरे-धीरे मारना है। उसने सोचा कम-से-कम वह यह कर सकता है कि महात्मा को न्यूनतम पीड़ा हो। वह सीधे उनका गला काट दे।

एक ओंकार के जाप में मग्न भाई मनी सिंह ने अचानक अपनी आँखें खोलीं और जल्लाद को प्रेमपूर्वक देखा। उन्होंने अपनी उंगलियों की ओर इशारा करके कहा, “चिंता मत करो। उंगलियों से शुरू करो और पहले इन्हें काटो। तुम शरीर को मारोगे लेकिन जो इसके भीतर है, उसे नहीं। ऐसा न हो कि यातना न देने पर तुम्हें यातना दी जाए। मेरे भाई,, आखिर यह यज्ञ व्यर्थ नहीं जाएगा। इस मुग़ल सेनाध्यक्ष के बाद है सकता है और क्रूर सेनाध्यक्ष आए लेकिन इस धरती पर निस्संदेह ऐसी सुबह होगी जब हम अपने त्यौहार बिना डर के पूरे गौरव से मनाएँगे।”

जब उनकी उंगलियाँ काटी जा रही थीं, उन्होंने खुद को एक ओंकार के जाप में लीन कर लिया। उनके शरीर का खून मिट्टी को गीला, लाल और पवित्र कर दीपावली के निकट होने का संकेत दे रहा था।

उपसंहार-

“और ऐसे भाई मनी सिंह दीपावली के शहीद हुए।”, माँ ने अपने बच्चे को रोटी का आखिरी टुकड़ा खिलाते हुए कहा। “हम कब निडर होकर अपनी धरती पर अपने त्यौहारों को मना पाएँगे माँ?”, एक आँख वाले लड़के ने रोटी चबाते हुए पूछा। विचार में डूबी हुई माँ ने अपने बेटे के चेचक के दाग वाले मुख की ओर देखकर कहा। दागों के बावजूद, वह उसके चेहरे पर तेज और उसकी एक आँक में चमक देख सकती थी, “जल्द ही मेरे बेटटे रणजीत… जल्द ही… सुनिश्चित करना कि तुम अपनी तलवार को सही चीज़ के लिए लड़ने के लिए तैयार करो!”