राजनीति
विपक्षी दलों की बेबुनियादी आलोचनावादी राजनीति उन्हीं पर पड़ रही भारी

यदि विपक्ष के लिए “अंगूर खट्टे हैं” कहा जाए तो गलत नहीं होगा, क्योंकि स्वतंत्रता के 65-70 सालों बाद 2014 से देश मुंगेरी लाल के हसीन सपनों से निकलकर सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी की वास्तविकता, जन भागीदारी समाज को समर्पित सरकार, समावेशी सरकार, समान जन की सरकार, धरातल पर अपने पाँव जमा चुकी है, फिर भी रसातल में जाता हुआ विपक्ष अपने अलोचनावादी रवैये में कोई परिवर्तन नहीं ला पा रहा।

विपक्षी दल भाजपा के कार्य करने की शैली, उसके दृढ़ इरादे, इच्छा-शक्ति, सशक्त नेतृत्व और देश में हो रहे बदलाव से अपने आपको असहाय पा रहे हैं, या यूँ कहें कि विपक्ष की भूमिका से ही नदारद हैं। देश की जनता ने उनको इस भरोसे के लायक भी नहीं छोड़ा कि वह विपक्ष में रहने के लिए 54 लोकसभा की सीटें भी पा सकें। हम बात 2014 के लोकसभा चुनाव की कर रहे हैं, जिसमें कांग्रेस ने सिर्फ 40 सीटें जीतीं जबकि भारत में आधिकारिक विपक्षी दल बनने के लिए एक पार्टी को लोकसभा में 10 प्रतिशत सीटें (54) प्राप्त करनी पड़ती हैं।

विपक्ष हमेशा भाजपा पर यह आरोप लगाता रहा है कि यह मुसलमान-विरोधी सरकार है और हिंदुत्व के एजेंडे पर हिंदुओं को अधिक बढ़ावा देती है, किंतु उन्हें इस बात की खबर ही नहीं है कि भाजपा की बुनियाद ही इसी मुद्दे के साथ जुड़ी है कि भारत में हिंदुओं को दोयम दर्जे के व्यवहार से कैसे मुक्ति दिलाई जाए।

भाजपा के हमेशा अल्पमत में रहने के कारण, विपक्ष हिंदुत्व के एजेंडे को हमेशा नगण्य समझती रही और इसी का फायदा भारत-विरोधी ताकतें उठाती रहीं, लेकिन भाजपा की सरकार बनते ही, उसने अपने हिंदुत्व पर कार्य करना शुरू किया किंतु कान में रूई डाले विपक्ष को यह पता ही नहीं है कि देश की जनता यह समझ चुकी है कि ‘अयोध्या में श्रीराम मंदिर’ का निर्माण कर उनकी खोयी हुयी अस्मिता को वापस लाना, हिंदू-विरोधी विपक्ष के वश की बात नहीं।

साथ में यह कह देना भी आवश्यक है कि भाजपा की सरकार में मुसलमान, सिक्ख, ईसाई और सभी धर्मों के लोग सौहार्दपूर्वक रह रहे हैं, किसी को भी किसी तरह का कोई कष्ट नहीं है। कहने का तात्पर्य यह है कि मुसलमानों को विपक्ष जिस प्रकार का भय दिखाता रहा है, और राजनीति करता रहा है, वह मुसलमान भी देख चुका है कि भाजपा के कार्यकाल में किसी भी योजना में मुसलमानों के हितों की अनदेखी नहीं की गई है।

यह कहना अनुचित नहीं होगा कि भारतीय लोकतंत्र में विपक्षी दल अपनी सार्थक भूमिका निर्वाह करने में असमर्थ है, क्योंकि उसके पास कोई ठोस एवं बुनियादी मुद्दा है ही नहीं, और दूसरे उनके बीच आपस में स्वीकार्य नेतृत्व का अभाव है, जो विपक्ष की विडंबना एवं विसंगतियों को ही उजागर करता है।

विपक्ष के पास कोई ठोस मुद्दा न होने के कारण अपनी कमजोरियों को छुपाने के लिए एक नारा बनाया- ‘पहले  मोदी को मात, फिर पीएम पर बात’, जो उनकी असफलताओं को दर्शाता है। कहा जा सकता है कि आज वर्तमान समय में नीतियों को मुख्य मुद्दा न मानकर विपक्ष नेतृत्व पर जोर दे रहा है, या यूँ कहें नीतियों को मुख्य मुद्दा न मानकर विपक्ष स्वयं को कमजोर एक नकारा घोषित कर चुका है।

बात यही नहीं रूकती बल्कि उनकी एकजुटता में उनके संकीर्ण स्वार्थ भी बाधक बन रहे हैं। वे स्वयं को अपनी विचारधारा को प्रस्तुत करते हुए अवसरवादी राजनीतिज्ञ भी घोषित कर चुके हैं।

बात निकली है तो उत्तर प्रदेश की सरकार की तरफ भी जाएगी। योगी सरकार ने प्रदेश को 1 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने की दिशा में आत्मविश्वास भरा कदम उठाया है। विपक्ष दल की सरकारों में जिन अपराधियों के अपराध का गढ़ बना दिया था, उन्हें उचित दंड देकर, अपराध और अपराधियों के विरुद्ध शून्य सहिष्णुता नीति से अपराध पर प्रभावी अंकुश लगाना योगी के ही वश की बात थी।

वर्ष 2010 की तुलना में 2020 में डकैती के मामलों में 67.69% लूट में, 60% हत्या में, 25.70% बलवा में, 29.75% रोड होल्ड अप में, 100% फिरौती हेतु अपहरण में, 41.51% दहेज मृत्यु में, 9.18% बलात्कार के मामलों में कमी आई है जो मौजूदा सरकार में ही संभव हो सकती थी। खेल हो, शिक्षा हो, बेटी बचाओं बेटी पढ़ाओ का मामला हो, अपराधियों को खत्म करने का जज्बा हो ये सब भाजपा सरकार के वश का ही रहा।

फिर भी विपक्ष गांधी जी का बंदर बना केवल और केवल आलोचना कर रहा है, उसे यह भी नहीं दिखाई दे रहा है कि जनता ने उसे अस्वीकार कर उसके अस्तित्व को ही नकार दिया है। और यह सब समाज की समर्पित सरकार का परिणाम है समावेशी सरकार का परिणाम है।

डॉ कुँवर पुष्पेंद्र प्रताप सिंह काशी क्षेत्र में भाजपा के सोशल मीडिया क्षेत्र संयोजक हैं।