राजनीति
“कांग्रेस मुक्त भारत”- जनभावना, चुनावी जुमला या सिर्फ एक पुस्तक?
आनंद कुमार - 19th September 2021

ंबेपंजाब कांग्रेस में जो टूट-फूट जैसा हाल हो गया है, वह कोई नई बात ही नहीं है जो कांग्रेसियों ने पहले नहीं देखी हो। इसकी नींव तो स्वयं मोतीलाल नेहरु ने 1923 में चित्तरंजन दास के साथ मिलकर कांग्रेस को तोड़ते हुए रखी थी। यह कोई पहली या अंतिम टूट नहीं थी।

सुभाषचंद्र बोस वाला फॉरवर्ड ब्लॉक तो मजबूरी में गांधी से मतभेदों के कारण 1939 में अलग हो गया था। स्वयं गांधी ने भी वैचारिक मतभेदों के कारण 1934 में ही कांग्रेस से त्याग-पत्र दे दिया था और आजीवन फिर कभी उन्होंने कांग्रेस की सदस्यता नहीं ली।

भारत की स्वतंत्रता के ठीक बाद, इस टूट फूट ने और ज़ोर पकड़ा और 1951 में कृपलानी ने अलग होकर किसान मजदूर प्रजा पार्टी नाम से अपनी पार्टी बना ली। हैदराबाद और सौराष्ट्र में भी 1951 में कांग्रेस टूटी थी। कांग्रेस 1956 में फिर टूटी और इस बार सी राजगोपालाचारी एक पार्टी बनाकर अलग हो गए।

1959 में स्वतंत्रता पार्टी कांग्रेस से अलग होकर बनी। केरल कांग्रेस 1964 में, ओड़िसा जन कांग्रेस 1966 में और 1967 में बंगाल कांग्रेस अलग हो गई। हरियाणा और उत्तर प्रदेश में चरण सिंह भी 1967 में ही अलग हुए थे।

बड़ी टूट 1969 में हुई जब कांग्रेस एक तरफ इंदिरा और दूसरी तरफ के कामराज और मोरारजी देसाई के दो बड़े धड़ों में बँट गई। फिर से 1978 में जब इंदिरा ने कांग्रेस को तोड़ा तो उसे चुनाव आयोग ने 1983 में आईएनसी के रूप में मान्यता दी। इसके बाद भी कांग्रेस कई बार टूटी है।

अभी के दो चर्चित राज्यों को देखेंगे तो ममता बनर्जी 1998 में अलग हुई थीं और शरद पवार 1999 में। कश्मीर वाले मुफ़्ती मुहम्मद सईद भी 1999 में ही अलग हुए थे। वायएसआर वाले जगनमोहन रेड्डी 2011 में अलग हुए थे और छत्तीसगढ़ वाले अजीत जोगी 2016 में।

पंजाब केवल दिल्ली के पास है, इसलिए हलचल अधिक सुनाई दे रही है। वरना जैसे ही सत्ता जाने लगती है, कांग्रेस के खेमे से निकलने वालों की गिनती तेज़ी से बढ़ती है। अब प्रश्न है कि पिछले 25 वर्षों में जो ये टूट-फूट बहुत तेज़ हो गई है, उसका परिणाम क्या निकलेगा?

क्या हम अब “कांगेस मुक्त भारत” का स्वप्न देखें? इसके लिए हम लोग इसी नाम की एक किताब पर चलते हैं जिसे हाल ही में अमित बागरिया ने लिखा है। अंग्रेज़ी में आई इस किताब में बिना कांग्रेस समर्थक की दृष्टि से देखे, कांग्रेस के बारे में काफी लिखा गया है।

अगर आपकी रुचि “सेफोलॉजी” (चुनावों के सर्वेक्षण के माध्यम से अध्ययन) जैसे विषयों में हो तो ये किताब आपकी रुचि की हो सकती है। यह पुस्तक शुरू तो “नेहरू काल” और भ्रष्टाचार पर होती है मगर दूसरे ही अध्याय में ये “इकोसिस्टम” पर पहुँच जाती है।

यह “इकोसिस्टम” एक चर्चित विषय रहा है। अधिकांश लोग आज ये मानेंगे कि वर्षों सत्ता में कांग्रेस केवल बैठी नहीं रही, उसने सरकारी विभागों से लेकर विश्वविद्यालयों तक, तमाम ऐसी जगहों पर अपनी पैठ बना ली है कि इस “इकोसिस्टम” के रहते कांग्रेस को ख़त्म करना अत्यंत कठिन होता है।

आगे बढ़ते हुए यह पुस्तक 2019 के चुनावों पर जाती है। इन चुनावों से क्या सीखा या देखा जा सकता है, उसकी चर्चा करने के बाद यह “फ़ेक न्यूज़” पर आ जाती है। नौवें और 10वें अध्याय में “कांग्रेस मुक्त भारत” केवल कांग्रेस की ही नहीं, बल्कि वाम दलों के पिछड़ने पर भी प्रकाश डालती है।

इसके बाद के कुछ अध्याय सीधे-सीधे प्रधानमंत्री मोदी को केंद्र में रखते हैं। यहाँ उनकी सफलताओं की बात है, तो उनकी नाकामियों पर भी चर्चा हुई है। फिर कुछ अध्याय भारत के बुनियादी ढाँचे के विकास पर हैं और मोदी सरकार की योजनाओं पर भी।

भारत के लिए हाल में बड़े मुद्दे रहे, कश्मीर के पूरी तरह भारत में शामिल होने और किसानों पर भी एक-एक अध्याय आता है। इसके आगे के 80 पन्ने फिर से सैफोलोजी का अध्ययन करने वालों के लिए काम के हैं।

आगे एक लंबे अध्याय में भारत के कई पूर्व प्रधानमंत्रियों और उनके काम की चर्चा है। जिनकी राजनीतिशास्त्र में या फिर भारतीय राजनीति के इतिहास में रुचि होगी, उनके लिए प्रधानमंत्रियों की सफलता-असफलताओं के ये छोटे-छोटे हिस्से काम के होंगे।

जो हिटलर जैसे नेताओं से प्रधानमंत्री मोदी की समानता करने के प्रयास अक्सर पक्षकारों और राजनेताओं के एक बड़े वर्ग में नज़र आते हैं, उनपर भी चर्चा की गई है। अंत के अध्यायों में भारत की नई सरकारों या राजनीतिक दलों से क्या अपेक्षाएँ हैं, उनपर बात हुई है और फिर से पुस्तक कांग्रेस पर लौट आती है।

कांग्रेस की नीतियाँ भारत के विरुद्ध कैसे जा रही हैं, लेखक उसकी चर्चा करते हैं। अंत का अध्याय इस बात पर है कि क्या कांग्रेस अपने अंत की ओर अग्रसर है? कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि इस पुस्तक को पढ़ने के बाद समझ में आता है कि “कांग्रेस मुक्त भारत” कोई ऐसा सपना नहीं जिसे प्रधानमंत्री मोदी ने जनता को दिखाया।

यह सपना जनता पिछले 25 वर्षों में देखना शुरू कर चुकी थी और मोदी ने केवल इस सपने को एक आवाज़ दी, उसे सार्वजनिक पटल पर, आम चर्चाओं में ले आए। पुस्तक में काफी संदर्भ दिए हुए हैं लेकिन इस बात का ध्यान रखने का प्रयास किया गया है कि यह आम लोगों के लिए उबाऊ और अकादमिक-सी न हो जाए।

खैर, अगर भारतीय राजनीति, कांग्रेस के राजनीतिक और नीतिगत स्वरूप या चुनावों में सेफोलॉजी की दृष्टि से रुचि हो तो “कांग्रेस मुक्त भारत” एक पढ़ने योग्य पुस्तक हो सकती है। बाकी जहाँ तक कांग्रेस के टूटने का प्रश्न है, ऐसा पहले भी हुआ है और आगे भी होता ही रहेगा। अभी हो ही जाए, ऐसा भी तो ज़रूरी नहीं।