संस्कृति
ईसाइयत के संतों के नेतृत्व में कैसे चला वैज्ञानिक और दार्शनिक विचारों के विरुद्ध अभियान

हम साँस एक ही तरह से लेते हैं, जीते भी एक ही तरह से हैं और हमारी मृत्यु भी एक ही तरह की है। ऐसे में आखिर प्रश्न है कि ऐसा क्या है जो लोगों को इन मूलभूत समानताओं के बावजूद अलग-अलग करके रख देता है और व्यक्ति फिर अपनी ही बनाई हुई अलंघ्य सीमाओं में ऐसे बंधकर रह जाता है कि अपनी दासता भी वह दूसरों पर बलपूर्वक थोप देना चाहता है।

इसके कारणों को खोजें तो ये अनगिनत हो सकते हैं, लेकिन इसमें “रिलिजन” की भूमिका को अनदेखा नहीं किया जा सकता जिसका मानवीय चेतना पर सबसे अधिक प्रभाव रहा है और यह प्रभाव इतना गहरा है कि इसपर कुछ कहने-लिखने से पहले आपको इस बात के प्रति आश्वस्त होना होता है कि कहीं आप भावनाओं के आहत होने वालों का शिकार तो नहीं हो सकते!

भारतीय भूमि में उपजे धार्मिक दर्शनों पर इतना कुछ लिखा गया है कि बच्चा-बच्चा भी यहाँ मनुवाद और जातिवाद, आदि पर बहुत कुछ बता सकता है। लेकिन आज लेखन का संदर्भ अलग है। आज न तो हमें दारुल-इस्लाम के आदर्शों से संचालित इस्लामिक वैश्विक-आतंक पर कुछ कहना है और न ही हिंदू सामाजिक-धार्मिक जीवन की विद्रूपताओं और पाखंड पर कोई व्याख्यान देना है।

हमारा संदर्भ संक्षिप्त है, और ऐसा दो कारणों से है, एक तो लेखन की सीमाओं के कारण और दूसरा एवं सबसे महत्वपूर्ण, विषय पर उपलब्ध अत्यंत ही अल्प सामग्री के कारण। फिर भी हमारा प्रयास है कि हम मसीही दुनिया के उन पक्षों पर कुछ प्रकाश डाल सकें जो अद्यतन हिंदी दुनिया से दूर ही रहा है।

इतिहास विजेताओं ने लिखा है और इस संदर्भ में ईसाइयत की विजय तो चरम रही है। विजय प्रभाव तो ऐसे देखा जा सकता है कि वर्ष 1871 तक ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के छात्रों के लिए भी किसी-न-किसी रूप में चर्च का सदस्य बनना अनिवार्य था।

चर्च और इसके अग्रदूतों ने पश्चिम के ही बहुविध वैज्ञानिक विचारों और दार्शनिकता को कैसे निबटाया, इतिहास के पन्नों में ये सब कुछ तो साफ-साफ नहीं लिखा, लेकिन ग्रीक सभ्यता के चट्टानों और पत्थरों पर इन कहानियों के जीवाश्म उपस्थित हैं।

एक धारणा-सी है कि ईसाइयत के प्रसार के साथ ही फादर और संतों ने मानवीय सभ्यता को “प्यार” और “करुणा” का ज्ञान दिया, लेकिन यह एक पक्ष हो सकता है, इसका दूसरा पक्ष क्रूर और अमानवीय दृष्टांतों से भरा हुआ है। यह बात छिपी नहीं है कि कैसे ‘मॉडर्निटी’ और ईसाइयत के संयुक्त मिलन ने तीसरी दुनिया की विपन्नताओं पर पश्चिम में सभ्यता का सर्वोच्च कालखंड जिया।

हम बस उन मिट चुके पन्नों पर थोड़ा प्रकाश डालेंगे जिनमें यह दर्ज है कि ईसाइयत ने वस्तुतः ‘विज़डम-इज़-फुलिशनेस’ का कुपाठ किया और इस कुपाठ के दरमियान इसने ‘पैगन’ या ‘हीथेन’ (जो अब्राह्मिक रिलिजन को नहीं मानते, विशेषकर ईसाइयत) की दुनिया और उसके बौद्धिक विमर्शों को नेस्तनाबूद कर दिया।

और सेंट शेनौट के शब्दों में कहें तो- ‘जिनके पास ईसा है, वे अपराध नहीं कर सकते’, इसलिए ऐसे सैकड़ों अपराध हुए हैं जो अक्षम्य थे लेकिन वे अपराध की श्रेणी में शायद ही रखे गए। और यह अपराध था पश्चिम में ज्ञान और दार्शनिक विमर्शों की परंपरा का समूल नाश कर दिया जाना।

एथेंस, कभी दार्शनिक विमर्शों की जन्मस्थली थी, में सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक जीवन के प्रश्नों पर बहुत ही खुला विमर्श होता था और नास्तिकता के दर्शन पर भी किसी प्रकार की कोई रोक-टोक नहीं थी, बल्कि ऐसी महिलाएँ भी थीं जिनका ऐसे दर्शन में उल्लेखनीय योगदान था।

तत्कालीन ग्रीक दार्शनिक गलेन के शब्दों में वहाँ की वैज्ञानिक चेतना के उत्स को देखा जा सकता है- ‘बौद्धिक प्रगति प्रश्न करने की स्वतंत्रता और उसपर संदेह करने की प्रवृति पर ही निर्भर करती है, और उससे भी बढ़कर प्रयोग करने की छूट पर’।

चौथी सदी आते-आते तक स्थितियाँ बदल चुकी थीं। अब दार्शनिकों के लिए दार्शनिक होना संभव नहीं रह गया था, उनके विचारों पर पहरा लगा दिया गया और यह पहरा अक्सर मृत्यु दंड में भी बदल दिया जाता था। ‘पैगनों’ के धार्मिक स्थलों को ढहा दिया जाना एक स्थापित परंपरा बन चुकी थी।

वैज्ञानिक और दार्शनिक पुस्तकों से ईसाइयत को इतना भय था कि किताबों को पुस्तकालय सहित आग के हवाले कर दिया जाता था। पश्चिम में ईसाइयत के अग्रदूतों ने अनगिनत पुस्तकालयों को यह जानते हुए फूँक डाला कि यह ज्ञान-विज्ञान का केंद्र है। यह लड़ाई मात्र पैगनों से नहीं थी, बल्कि एक तरह से यह लड़ाई वैज्ञानिक चेतना और दार्शनिकता के विरुद्ध भी थी।

आधुनिक समय के लेखक लुसियानो कैनफोरो ने लिखा कि जलती हुई पुस्तकों ईसाइयत की विजय यात्रा का अहम् भाग थीं। जिन्होंने बपटाइज़ होने से मना किया या फिर जिन्होंने ‘पवित्र चर्च’ के सामने घुटने टेकने से मना कर दिया, उन्हें अलग-अलग तरीकों से दंडित किया गया।

इन घटनाओं का चित्रण उस समय के एक प्रख्यात दार्शनिक दमस्कस ने अपने लेखन में किया था, लेकिन दुर्भाग्य से उनके लेखन के अधिकांश भाग अनुपलब्ध हैं। इसी तरह प्रसिद्ध ग्रीक दार्शनिक और आण्विक-सिद्धांत के जनक डेमोक्राइटस के लेखन के अधिकांश भाग भी मिटा दिए गए जिससे एथेंस के वास्तविक गौरव काल का पता लगता।

ग्रीक सभ्यता के बौद्धिक और दार्शनिक विमर्शों का बहुत ही कम भाग ही आज उपलब्ध है लेकिन जितना है उतने से ही ईसाइयत का विज्ञान और दर्शन पर किये गए आघात का साक्ष्य मिल जाता है। सबसे आश्चर्य की बात यह रही कि विचारों और दर्शनों पर ऐसे आक्रमण उस समय के “महान्” संतों के संरक्षण और नेतृत्व में हुआ, न कि किसी सनकी शासक द्वारा।

जैसे संत ऑगस्ताइन ने इसे ‘ईश्वर की इच्छा’ के रूप में देखा। फ्रांस के संत मार्टिन ने भी ऐसे तोड़फोड़ को प्रश्रय दिया, इसी तरह संत थिओफाईलस ने मिश्र के सुंदर धार्मिक भवनों को ध्वस्त कर दिया। इटली में संत बेनेडिक्ट ने ग्रीक देवता अपोलो के ‘टेम्पल’ को तुड़वा डाला।

चौथी शताब्दी के अंत तक बिशप मर्सलास ने ग्रीक देवता जेयस के अपेमिया के मंदिर को “अपनी दैवीय प्रार्थना” से तोड़ डाला और आज उसे मसीही दुनिया में संत की तरह पूजा जाता है। संत पॉल तो बड़े ही ज़ोरदार तरीके से कहा करते थे- ‘विश्व में ज्ञान का विकास ईश्वर के साथ किया गया मूर्खतापूर्ण व्यवहार है’।

एक संत ने लिखा- ‘शर्मनाक पुस्तकों को जलाना अनिवार्य है… क्योंकि अगर आप ईसाई हैं तो फिर यह आपका कर्तव्य है’। सीरिया में भी मसीही संतों ने दार्शनिक और धार्मिक स्थलों का बहुत नुकसान किया। सीरिया के अलेप्पो शहर में ग्रीक देवी एथीना की मूर्तियों को तोड़ा गया और दुर्भाग्य से अभी हाल के वर्षों में आईएसआईएस ने भी इसे दुबारा क्षतिग्रस्त कर दिया।

इस आतंक से निस्संदेह बहुत बड़ी संख्या में ग्रीक सभ्यता का मतांतरण हुआ और ईसाईयत को स्वीकारा गया लेकिन इनमें से अधिकांश का मतांतरण स्वैच्छिक तो कतई नहीं था; इसके पीछे भय और असुरक्षा बड़ा कारण था। “एकेश्वरवाद”, तौहीद, या मोनोथीज़्म के आतंक ने ग्रीक सभ्यता के बहुलतावादी या बहुदेवादी दर्शन और विचारों को एक तरह से मिटा ही डाला।

संत ऑगस्टिन ने ऐसे विधवंस को ऐसे वैधता दी- ‘सभी पैगन शैतान की सत्ता में थे। मंदिरों में शैतानों का निवास था… पुजारी इन शैतानों के उपासक थे’। अतः इनका अंत तो आवश्यक ही था। लेकिन ग्रीक दुनिया के अधिकांश बौद्धिकों और विचारकों के लिए उनके द्वारा दिए गए मृत्यु में अधिक आनंद मिल रहा था, बजाय अनुदान में या शर्तों पर दिए गए जीवन से।

अतएव बहुतों ने पलायन करना ही उचित समझा। इसी तरह अलेक्जेंड्रिया में भी संतो का सामरिक विजय अभियान चलता रहा, और यहाँ यहूदी उनके मुख्य शिकार बने, क्योंकि उस समय उनकी यहाँ ठीक-ठाक आबादी हुआ करती थी। ज्ञान-विज्ञान और दर्शन का यह इतना बड़ा केंद्र था कि पूरी दुनिया में इसकी चर्चा हुआ करती थी।

यहाँ के पुस्तकालयों पर विभिन्न तरह से प्रहार किया गया। इनकी पुस्तकों को शैतान की पुस्तकों के रूप में प्रचारित किया गया। यहाँ पाँचवी सदी में एक महिला दार्शनिक हुई थी हिपेसिया, उसके पिता एक गणितज्ञ थे। उसके बारे में कहा जाता है कि जब एक युवक ने उसके सामने प्रेम प्रस्ताव रखा तो उस युवक को इस मोह से मुक्त करने के लिए उसने उसे अपना सैनटरी पैड दिखाया।

और उस युवक से कहा कि मेरे मित्र तुम इससे प्रेम करते हो और इसमें कुछ भी सुंदर नहीं है। हिपेसिया की कहानी अलेक्जेंड्रिया के दार्शनिक वैभव को दिखाने के लिए पर्याप्त है। अपनी तमाम क्रूरताओं को वैध सिद्ध करने के लिए ईसाइयत के पास जो सबसे बड़ी ऐतिहासिक कहानी है वह कहानी सम्राट नीरो की “अराजकता” पर अधिक टिकी है।

हालाँकि इसमें बहुत अंतर्विरोध भी हैं; लेकिन यह कहानी भी ईसाइयत के उन काले कारनामों को नहीं ढँक सकती जिनमें इनके “महान्” संतो ने खूनी “क्रूसेड” का नेतृत्व किया। उनके द्वारा हत्याएँ की गईं, विचारों और दार्शनिक चिंतनों की।

इस लेख में कुछ जानकारियाँ क्रिस्टीना निक्सी (2017), ‘द डार्केनिग एज: द क्रिस्चियन डिस्ट्रक्शन ऑफ़ द क्लासिकल वर्ल्ड’, पैन बुक्स से ली गई हैं।

केयूर पाठक लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी में सहायक प्राध्यापक हैं। चित्तरंजन सुबुद्धि केंद्रीय विश्वविद्यालय तमिलनाडु में सहायक प्राध्यापक हैं।