राजनीति
ईसाई संगठनों पर पाबंदियाँ क्यों आवश्यक

महात्मा गांधी ब्रिटिश शासन के दौरान ईसाई मिशनरियों के क्रियाकलापों से खिन्न थे। उन्होंने अपने संस्मरणों में लिखा है कि किस प्रकार राजकोट में उनके स्कूल के बाहर एक मिशनरी हिंदू देवी-देवताओं के लिए बेहद अपमानजनक शब्दों का उपयोग करता था।

गांधी जीवन भर ईसाई मिशनरियों द्वारा सेवा कार्यों के नाम पर किए जाने वाले धर्म परिवर्तन के विरुद्ध रहे। जब अंग्रेज़ भारत से जाने लगे तो ईसाई मिशनरी लॉबी ने प्रश्न उठाया कि स्वतंत्र भारत में क्या उन्हें धर्म परिवर्तन करते रहने दिया जाएगा, तो गांधी जी ने इसका जवाब न में दिया। उनके अनुसार लोभ-लालच के बल पर धर्म परिवर्तन करना घोर अनैतिक है। इस पर मिशनरी लॉबी ने बहुत हंगामा किया।

स्वतंत्रता के समय भारत आर्थिक रूप से संपन्न देश नहीं था और वित्तीय सहायता के लिए पाश्चात्य ईसाई देशों और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों पर निर्भर था, इसलिए भारत को मिशनरियों के आगे झुकना पड़ा। उसके बाद सरकार मिशनरी लॉबी के सामने और मजबूर होती गई।

ईसाई मिशनरी विदेशी पैसे का इस्तेमाल करते हुए पिछले सात दशकों में पूर्वोत्तर के आदिवासी समाज का बड़े पैमाने पर धर्मांतरण करा चुके हैं। यही सब मध्य भारत के आदिवासी क्षेत्रों में भी चल रहा है, जहाँ इन गतिविधियों का फायदा नक्सली भी उठाते हैं।

पैसे से धर्म परिवर्तन कराने के अलावा और भी बहुत तरह के प्रयोग किए जाने लगे हैं। मिशनरियों ने अपने अनुभवों से पाया कि भारतीय धर्मों के लोग अपनी सांस्कृतिक मान्यताओं से भावनात्मक तौर पर इतने गहरे जुड़े हैं कि तमाम प्रयासों के बावजूद भारत में करोड़ों की संख्या में धर्म परिवर्तन संभव नहीं हो पा रहा है।

इस कठिनाई से पार पाने के लिए नए हथकंडों का प्रयोग शुरू किया गया, जैसे मदर मैरी की गोद में ईसा मसीह की जगह भगवान् गणेश या श्रीकृष्ण को चित्रांकित कर ईसाइयत का प्रचार शुरू किया गया, ताकि आदिवासियों को लगे कि वे तो हिंदू धर्म के ही किसी संप्रदाय की सभा में जा रहे हैं।

ईसाई मिशनरियों को आप भगवा वस्त्र पहनकर हरिद्वार, ऋषिकेश से लेकर तिरुपति बालाजी तक धर्म प्रचार करते पा सकते हैं। यही हाल पंजाब में है, जहाँ बड़े पैमाने पर सिखों को ईसाई बनाया जा रहा है। पंजाब में चर्च का दावा है कि प्रदेश में ईसाइयों की संख्या 7-10 प्रतिशत हो चुकी है।

देश के विकास में कैसे आड़े आती हैं ईसाई मिशनरियाँ

विदेशी पैसे का धर्मांतरण के लिए उपयोग देश की सुरक्षा और स्थिरता के लिए बड़ी चुनौतियों को जन्म दे रहा है। विकसित पाश्चात्य ईसाई देशों की सरकारें धर्मांध कट्टरपंथी ईसाई मिशनरी तत्वों को धर्म परिवर्तन के नाम पर एशिया और अफ्रीका जैसे देशों को निर्यात करती रहती हैं। इससे दो तरह के फायदे होते हैं।

एक तो इन कट्टरपंथी तत्वों का ध्यान गैर-ईसाई देशों की तरफ लगा रहता है, जिस कारण वे अपनी सरकारों के लिए कम दिक्कतें पैदा करते हैं और दूसरे, जब भारत जैसे देशों में विदेशी चंदे से धर्मांतरण होता है, तो धर्मांतरित लोगों के ज़रिए विभिन्न प्रकार की सूचनाएँ इकट्ठा करने और साथ ही सरकारी नीतियों पर प्रभाव डालने में आसानी होती है।

उदाहरण स्वरूप, भारत-रूस के सहयोग से स्थापित कुडनकुलम परमाणु संयंत्र से नाखुश कुछ विदेशी ताकतों ने इस परियोजना को अटकाने के लिए वर्षों तक मिशनरी संगठनों का इस्तेमाल कर धरने-प्रदर्शन करवाए। तत्कालीन यूपीए सरकार में मंत्री वी नारायणस्वामी ने यह आरोप लगाया था कि कुछ विदेशी ताकतों ने इस परियोजना को बंद कराने के लिए धरने-प्रदर्शन कराने के लिए तमिलनाडु के एक बिशप को 54 करोड़ रुपये दिए थे। इस मामले में विदेशी चंदा प्राप्त कर रहे चार एनजीओ पर कार्रवाई भी की गई थी।

इसी प्रकार का दूसरा उदाहरण वेदांता द्वारा तूतीकोरीन में लगाए गए स्टरलाइट कॉपर प्लांट का है। इस प्लांट को बंद कराने में भी चर्च का हाथ माना जाता है। 8 लाख टन सालाना तांबे का उत्पादन करने में सक्षम यह प्लांट अगर बंद न होता, तो भारत तांबे के मामले में पूरी तरह आत्मनिर्भर हो गया होता।

यह कुछ देशों को पसंद नहीं आ रहा था और इसलिए उन्होंने मिशनरी संगठनों का इस्तेमाल कर पादरियों द्वारा यह दुष्प्रचार कराया कि यह प्लांट पूरे शहर की हर चीज़ को जहरीला बना देगा। इस दुष्प्रचार के बाद हिंसा भड़की और पुलिस फायरिंग में 13 लोगों की मौत हो गई। परिणाम यह हुआ कि यह प्लांट बंद कर दिया गया। यह अभी भी बंद है और भारत को तांबे का आयात करना पड़ रहा है।

ईसाइयत अपनाने के बाद भी नहीं सुधरी स्थिति

कहने को ईसा मसीह ने दुनिया को शांति का संदेश दिया था। लेकिन गरीब ईसाइयों के जीवन में अंधेरा कम नहीं हो रहा। दलित-आदिवासी ईसाइयों की स्थिति इतनी दयनीय ही है। विशाल संसाधनों से लैस चर्च अपने अनुयायियों की स्थिति से पल्ला झाड़ते हुए उन्हें सरकार की दया पर छोड़ना चाहता है। दरअसल चर्च का इरादा एक तीर से दो शिकार करने का है।

कुल ईसाई जनसंख्या में आधे से अधिक अनुसूचित जातियों की श्रेणी में ही रहते हैं और मिशनरी इनके विकास की जिम्मेदारी सरकार पर डालते हुए देश की कुल जनसंख्या के पाँचवें हिस्से हिंदू दलितों को ईसाइयत का जाम पिलाने का ताना-बाना बुनने में लगे हैं। यीशु के सिद्धांत कहीं पीछे छूट गए हैं। चर्च आज साम्राज्यवादी मानसिकता का प्रतीक बन गया है।

सहस्रों शिक्षण संस्थानों, अस्पतालों, सामाजिक सेवा केंद्रों का विस्तार पूरे भारत में किया गया। उसी का परिणाम है कि आज देश की 30 प्रतिशत शिक्षा एवं 22 प्रतिशत स्वास्थ्य सेवाओं पर चर्च का अधिकार है। भारत सरकार के बाद चर्च के पास सर्वाधिक भूमि है और वह भी देश के प्रमुख क्षेत्रों में।

आज भारत में कैथोलिक चर्च के छह कार्डिनल हैं पर कोई दलित नहीं है। 30 आर्च बिशप में कोई दलित नहीं हैं। 175 बिशप में केवल नौ दलित हैं। 822 मेजर सुपीरियर में 12 दलित हैं और 25,000 कैथोलिक पादरियों में 1,130 दलित ईसाई हैं।

इतिहास में पहली बार भारत के कैथलिक चर्च ने यह स्वीकार (2016 में अपने ‘पॉलिसी ऑफ दलित इम्पावरन्मेंट इन द कैथलिक चर्च इन इंडिया’ रिपोर्ट में) किया है कि जिस छुआछूत और जातिभेद के दंश से बचने को दलितों ने हिंदू धर्म को त्यागा था, वे आज भी उसके शिकार हैं। वह भी उस धर्म में जहाँ कथित तौर पर उनको वैश्विक ईसाईयत में समानता के दर्जे और सम्मान के वादे के साथ शामिल कराया गया था।

हालांकि इसकी यह स्वीकारोक्ति नई बोतल में पुरानी शराब भरने जैसी ही है। फिर भी दलित ईसाइयों को उम्मीद है कि भारत के कैथलिक चर्च की स्वीकारोक्ति के बाद वेटिकन और संयुक्त राष्ट्र में उनकी आवाज़ सुनी जाएगी।

कुछ साल पहले दलित ईसाइयों के एक प्रतिनिधिमंडल ने संयुक्त राष्ट्र के पूर्व महासचिव बान की मून के नाम एक ज्ञापन देकर आरोप लगाया था कि कैथोलिक चर्च और वेटिकन दलित ईसाइयों का उत्पीड़न कर रहे हैं, जातिवाद के नाम पर चर्च संस्थानों में दलित ईसाइयों के साथ लगातार भेदभाव किया जा रहा है।

ज्ञापन में मांग की गई थी कि वह चर्च को अपने ढांचे में जातिवाद के नाम पर उनका उत्पीड़न करने से रोके और अगर चर्च ऐसा नहीं करता तो संयुक्त राष्ट्र में वेटिकन को मिले स्थाई ऑब्ज़र्वर के दर्जे को समाप्त कर दिया जाना चाहिए।

ईसाइयत के साथ समस्याएँ

स्वतंत्रता के बाद से भारतीय ईसाई एक धर्मनिरपेक्ष राज्य के नागरिक रहे हैं। यहाँ के चर्च को जो खास सहूलियतें हासिल हैं, वे बहुत से ईसाइयों को यूरोप एवं अमेरिका में भी हासिल नहीं है। विशेष अधिकार से शिक्षण संस्थान चलाने, सरकार से अनुदान पाने की सहूलियतें शामिल हैं। इन सुविधाओं के बावजूद भारतीय चर्च अपनी छोटी-छोटी समस्याओं को लेकर पश्चिमी देशों का मुँह ताकते रहता है।

ओडिशा, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, गुजरात, बिहार, झारखंड़, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश, पूर्वी राज्य या यों कहे कि पूरे भारत में ईसाइयों के रिश्ते दूसरे धर्मों से सहज नहीं रहे हैं। धर्मांतरण को लेकर अधिकतर राज्यों में दोनों वर्गों के बीच तनाव पनप रहा है और चर्च का एक वर्ग इन झंझावतों को समाप्त करने के स्थान पर इन्हें विदेशों में हवा देकर अपने हित साध रहा है।

पुअर क्रिश्चियन लिबरेशन मूवमेंट के अध्यक्ष आरएल फ्रांसिस के शब्दों में, “यही समय है जब ईसाई समुदाय को स्वयं का सामाजिक लेखा-परीक्षण करना चाहिए, ताकि पता चले कि ईसाई समुदाय अपनी मुक्ति से वंचित क्यों हैं। शांति के पर्व क्रिसमस पर ईसाइयों को अब इस बात पर आत्ममंथन करने की आवश्यकता है कि उनके रिश्ते दूसरे धर्मों से सहज कैसे बने रह सकते हैं और भारत में वे अपने अनुयायियों के जीवन स्तर को कैसे सुधार सकते है।”

हाल में केंद्रीय गृह मंत्रालय ने 13 बड़े ईसाई मिशनरी संगठनों को विदेशी अनुदान विनियमन अधिनियम के तहत मिली चंदा लेने की अनुमति रद्द कर दी। इनमें से अधिकतर संगठन झारखंड, छत्तीसगढ़ और पूर्वोत्तर के राज्यों में सक्रिय थे और विदेशी चंदे का दुरुपयोग धर्मांतरण कराने के लिए कर रहे थे।

हमेशा की तरह इंटरनेशनल क्रिश्चियन कंसर्न जैसे संगठनों ने इस फैसले पर हाय-तौबा मचानी शुरू कर दी। अब इसके आसार हैं कि धार्मिक स्वतंत्रता के नाम पर ईसाई मिशनरियों के काम को सुगम बनाने वाले विदेशी संगठन भारत में कथित रूप से घटती धार्मिक स्वतंत्रता पर कोई रिपोर्ट जारी कर दें।

भारत सरकार पर दबाव बनाने के लिए वे ऐसा करते रहते हैं। यह सही है कि भारतीय संविधान धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार देता है, जिसमें अपने पंथ के प्रचार का भी अधिकार शामिल है, लेकिन हर अधिकार की तरह इस अधिकार की भी कुछ सीमाएँ हैं। यह जानना भी आवश्यक है कि यह अधिकार किन परिस्थितियों में दिया गया था।

भारत की स्वतंत्रता के बाद संसद ने कई धर्मांतरण विरोधी बिल पेश किए, लेकिन कोई भी प्रभाव में नहीं आया। सबसे पहले 1954 में इंडियन कनवर्ज़न (रेग्यूलेशन एंड रजिस्ट्रेशन) बिल पेश किया गया था, जिसमें “मिशनरियों के लाइसेंस और धर्मांतरण को सरकारी अधिकारियों के पास रजिस्टर कराने की बात कही गई थी।

इस बिल को लोकसभा में बहुमत नहीं मिला। इसके बाद 1960 में पिछड़ा समुदाय (धार्मिक संरक्षण) विधेयक लाया गया, जिसका मकसद था कि हिंदुओं को ‘गैर-भारतीय धर्मों’ में परिवर्तित होने से रोका जाए। विधेयक की परिभाषा के अनुसार, इसमें इस्लाम, ईसाई, यहूदी और पारसी धर्म शामिल थे।

इसके बाद 1979 में फ्रीडम ऑफ रिलीजन बिल आया जिसमें “धर्मांतरण पर आधिकारिक प्रतिबंध” की बात कही गई थी। राजनीतिक समर्थन न मिलने की वजह से ये बिल संसद में पास नहीं हो सके। 2015 में कानून मंत्रालय ने राय दी थी कि जबरन और धोखाधड़ी वाले धर्मांतरण के खिलाफ राष्ट्रीय स्तर पर कानून नहीं बनाया जा सकता, क्योंकि कानून और व्यवस्था राज्य का विषय है।

पिछले कुछ वर्षों में कई राज्यों ने जबरन, धोखाधड़ी से या प्रलोभन देकर धर्म परिवर्तन को प्रतिबंधित करने के लिए “फ्रीडम ऑफ रिलीजन” कानून लागू किया है। रिसर्च करने वाले संगठन पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च ने हाल ही में कई राज्यों में मौजूदा धर्मांतरण विरोधी कानूनों की तुलना करते हुए एक रिपोर्ट जारी की है।

“धार्मिक स्वतंत्रता” से जुड़े कानून वर्तमान में आठ राज्यों में लागू हैं- ओडिशा (1967), मध्य प्रदेश (1968), अरुणाचल प्रदेश (1978), छत्तीसगढ़ (2000 और 2006), गुजरात (2003), हिमाचल प्रदेश (2006 और 2019), झारखंड (2017) और उत्तराखंड (2018)।

इसके अलावा, तमिलनाडु ने 2002 में और राजस्थान ने 2006 और 2008 में इसी तरह का कानून पारित किया था। हालाँकि, 2006 में ईसाई अल्पसंख्यकों के विरोध के बाद तमिलनाडु के कानून को निरस्त कर दिया गया था, जबकि राजस्थान के विधेयकों को राज्यपाल और राष्ट्रपति की स्वीकृति नहीं मिली।

देश को गहरे नुकसान से बचाने के लिए विदेशी चंदे पर पूरी तरह रोक के साथ-साथ मिशनरी संगठनों की गतिविधियों पर सख्त पाबंदी आवश्यक है। आरएसएस  के सर संघचालक मोहन भागवत जी के शब्दों में, “हिंदू परंपरा ऐसे धर्म परिवर्तन की इजाज़त नहीं देता, जिसमें किसी व्यक्ति के मानवाधिकार का उल्लंघन होता हो।”

धार्मिक सभाएँ करने से पहले ऐसे संगठनों के लिए स्थानीय पुलिस-प्रशासन को जानकारी देना आवश्यक होना चाहिए। अपनी धार्मिक सभाओं में ऐसे संगठनों द्वारा दूसरे धर्मों के देवी-देवताओं और प्रतीकों का प्रयोग करने को छल की श्रेणी में रखा जाना चाहिए और धार्मिक नगरों और साथ ही सामरिक रूप से महत्वपूर्ण ठिकानों के आसपास उनपर कड़ी निगाह रखी जानी चाहिए, क्योंकि धर्मांतरण सामाजिक ताने-बाने को कमज़ोर करने के साथ देश की सुरक्षा के लिए चुनौती बन रहा है।

सुखदेव वशिष्ठ विचारक और चिंतक हैं। वे @Sukhdev_1979 के माध्यम से ट्वीट करते हैं।