रक्षा
चीन-पाकिस्तान का आतंकी गठजोड़ भारत की आर्थिक प्रगति रोकना चाहता है

चीनी थिंक टैंकों ने हाल ही में राष्ट्रपति शी जिनपिंग को एक दुखद समाचार दिया- अगले दशक में चीन की जीडीपी वृद्धि दर आधी होकर 4 प्रतिशत रहने वाली है। इसी अवधि में अनुमान है कि भारत की जीडीपी 8 प्रतिशत की वार्षिक दर से बढ़ेगी।

इन दो अनुमानों को कई वैश्विक निवेश बैंकों का समर्थन प्राप्त है और दीर्घ अवधि में इनके प्रभाव क्षेत्र में शक्ति संतुलन को परिवर्तित करेंगे। चीन ने भारत को पीछे खींचने के लिए लंबे समय से पाकिस्तान का उपयोग किया है।

जब तक चीन ने जबरन तिब्बत पर कब्ज़ा नहीं कर लिया था, यानी 1951 तक, भारत और चीन सीमा साझा नहीं करते थे। तबसे ही चीनी नेताओं ने भारत को एक क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धी माना है जिसे देशों के परिवर्तनशील पदानुक्रम के बीच समय-समय पर उसका स्थान दिखाना चाहिए।

बीजिंग विश्व व्यवस्था का भविष्य जी2 (चीन और यूनाइटेड स्टेट्स) के प्रभुत्व में देखता है। लेकिन पिछले कुछ समय से विश्लेषक वैश्विक शक्ति के एक अलग समीकरण का अनुमान लगाने लगे हैं। 31 मार्च 2022 तक भारत की जीडीपी ब्रिटेन को पीछे छोड़ते हुए उसे विश्व की पाँचवी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बना देगी।

देशों की वर्तमान वृद्धि दरों के अनुसार, जर्मनी जो विश्व की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, उसे भारत 2027 तक और विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था जापान को भारत 2030 तक पीछे छोड़ देगा।

शीघ्र ही भारत रूस में बने एस-400 हवाई रक्षा प्रणाली को प्राप्त करके चीन का सामना करेगा। चीन ने हाल ही में प्राप्त एस-400 को भारत के विरुद्ध तैनात किया है लेकिन वह जानता है कि भारत के बढ़ते हथियारों के साथ सैन्य शस्त्रों का धौंस दिखाने का अधिक लाभ नहीं होगा।

एलएसी पर संघर्ष बिंदुओं को लेकर कमांडर स्तर की वार्ता में चीन की कठोरता दर्शाती है कि वह शीघ्रातिशीघ्र भारत की प्रगति को रोकना चाहता है, इससे पहले कि इस अवसर का द्वार बंद हो जाए। अधिकांश अनुमानों के अनुसार 2030 तक ही चीन के पास अवसर है।

आज चीन की अर्थव्यवस्था जो भारत की पाँच गुनी है, वह 2030 तक तीन गुनी रह जाएगी। वहीं, भारत और पाकिस्तान के बीच जीडीपी का अंतर बढ़ेगा और वर्तमान में 10:1 के अनुपात से बढ़कर 15:1 हो जाएगा।

इससे क्षेत्र में परिवर्तन आएगा। चीन के पास भारत पर कोई स्पष्ट आर्थिक या सैन्य बढ़त नहीं होगी इसलिए वह भारत की प्रगति को रोकना चाहता है। हालाँकि, पाकिस्तान उसके लिए अविश्वसनीय और अस्थिर सहयोगी सिद्ध हो रहा है।

बलूचिस्तान में ग्वादर बंदरगाह को विकसित करने की चीन की महत्वाकांक्षा को बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (बीएलए) द्वारा उसके कर्मचारियों पर बढ़ते आतंकी हमलों से झटका लगा है। बीएलए एक स्वतंत्र बलूचिस्तान के लिए लड़ रहा है जो पाकिस्तान के भूभाग का 44 प्रतिशत है।

आतंकी हमलों के कारण ग्वादर चीन के लिए एक कठिन काम हो गया है इसलिए अब वह अपने संकट में घिरे चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलायारे (सीपेक) के तहत कराची बंदरगाह को विकसित करने के लिए विवश हो गया है।

13 अक्टूबर 2021 को निक्केई एशिया ने रिपोर्ट किया था, “चीनी निवेश के लिए ग्वादर एक संकट बन गया है। अगस्त में एक आत्मघाती बम धमाके में चीनी नागरिकों को ले जा रही बस को क्षेत्र में निशाना बनाया गया था जिसमें दो बच्चे मारे गए और तीन घायल हुए।”

बलूचिस्तान में अलगाववादी आतंकियों ने दीर्घ समय से विद्रोही गतिविधियों को जारी रखा है। यह बम धमाका तब हुआ जब प्रधानमंत्री इमरान खान ने जुलाई में चीन के बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव का विरोध कर रहे अलगाववादियों से दुर्लभ वार्ता शुरू की थी।

अफगानिस्तान से यूएस सैनिकों की वापसी के बाद क्षेत्र में बढ़ी अस्थिरता से निपटने के लिए संभवतः वार्ता आरंभ की गई थी। हालाँकि, कुछ लोग अस्थिरता को पहले ही भाँप गए थे, जैसे जून में सऊदी अरब ने एक प्रस्तावित 10 अरब डॉलर की तेल रिफाइनरी को ग्वादर से कराची स्थानांतरित करने का निर्णय लिया था।

ग्वादर बंदरगाह

ऊर्जा और पानी की कमी के कारण भारी विरोध प्रदर्शनों को झेल रहे ग्वादर को एक ऊर्जा केंद्र के रूप में विकसित करने की सरकार की योजनाओं को इससे बड़ा झटका लगा था। अब ग्वादर और विदेशी निवेश को खोएगा।

पाकिस्तान का सबसे बड़ा शहर और प्रमुख व्यावसायिक केंद्र है कराची तथा सबसे व्यस्त बंदरगाह भी यहीं है। एक न्यूयॉर्क आधारित राजनीतिक जोखिम विश्लेषण कंपनी विज़ियर कन्सल्टिंग के अध्यक्ष आरिफ रफीक कहते हैं कि परियोजना को लंबी यात्रा तय करनी है।

पर्यावरण प्रभाव सहित व्यवहार्यता अध्ययन करने होंगे। निर्माण के लिए समुद्री तट को साफ करने से मैंग्रोव पेड़ नष्ट होंगे जो तूफानों और मिट्टी कटाव के विरुद्ध प्राकृतिक रक्षक की तरह काम करते हैं। उनका दावा है कि 5 लाख लोगों का पुनर्स्थापन करना पड़ेगा जो एक राजनीतिक चुनौती वाली प्रक्रिया है।

ग्वादर में कार्य सुलभ न होना बेल्ट एंड रोड प्रयास के लिए उलझनें खड़ी करेगा। विश्लेषकों का कहना है कि जिस तरह से पाकिस्तान और चीन ग्वादर की समस्या से निपट रहे हैं, उससे लगता है कि बेल्ट एंड रोड की कोई भी कठिन परियोजना को वे छोड़ सकते हैं, भले ही उसमें कितनी ही संभावनाएँ क्यों न हों।

समय निकल रहा है और बीजिंग व इस्लामाबाद ने दोनों मोर्चों पर अपनी गतिविधियाँ बढ़ा दी हैं- वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर बढ़ता सैन्य दबाव और कश्मीर घाटी में बढ़ता आतंकवाद। घाटी में हिंदुओं व सिखों पर हुए हमले और नियंत्रण रेखा (एलओसी) से आतंकवादियों की घुसपैठ चीन-पाकिस्तान रणनीति का ही भाग हैं।

वे चाहते हैं कि कोविड-19 महामारी से अर्थव्यवस्था उभरने से पहले ही वे भारत पर वार करें। तालिबान-शासित अफगानिस्तान में आईएसके के आतंकी हमलों के कारण तेहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) से समझौता करने के लिए पाकिस्तान विवश हो गया है जिससे इमरान खान और सेना प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा के बीच तनाव बढ़ा है।

इस आतंकी समूह ने काफी वर्षों से पाकिस्तान में हमले किए हैं जिनमें 2014 में पेशावर के एक सेना विद्यालय में 150 लोगों को मारने वाला हमला भी सम्मिलित है। इसमें अधिकांश मरने वाले सैन्य अधिकारियों के बच्चे थे।

तब पाकिस्तानी सेना ने टीटीपी नेताओं को खदेड़कर दुरंड रेखा के पार अफगानिस्तान में पहुँचा दिया था जहाँ उन्हें यूएस व नाटो सेनाओं से लड़ रहे अफगान तालिबान का आश्रय मिला। जब तालिबान ने अगस्त 2021 में अफगानिस्तान का नियंत्रण प्राप्त किया तो उसने 3,000 टीटीपी लड़ाकों को कारावास से रिहा किया।

अब टीटीपी पाकिस्तान में लौट आया है और इस्लामाबाद को युद्धविराम संधि करने के लिए विवश कर रहा है। भारत के लिए अभी की रणनीति स्पष्ट है। ज़ोर से और जल्दी वार करो। कश्मीर में पाकिस्तान के हर छद्म आतंकी हमले को तुरंत उत्तर मिलना चाहिए।

लेकिन दृष्टि में लंबे समय का परिदृश्य रखें। समय भारत के साथ है। पाकिस्तान एक पतन की ओर जाता आतंकी राज्य है। इसकी अर्थव्यवस्था जर्जर है। आतंकवाद का सहायक होने के कारण इसकी विश्व में प्रतिष्ठा धूमिल है।

चीन भी दशक भर में अपने सबसे बुरे समय से गुज़र रहा है। आर्थिक वृद्धि धीमी पड़ गई है, संभवतः सदा के लिए। बीजिंग के शत्रु पूर्व, पश्चिम और दक्षिण- ताइवान, भारत और ऑस्ट्रेलिया- में हैं। यूनाइटेड स्टेट्स के साथ इसके व्यापार टकरावों के कारण कई कंपनियों ने उत्पादन सुविधाएँ चीन से बाहर स्थानांतरित कर दी हैं।

भारत को विषैले चीन-पाकिस्तान गठजोड़ का सामना कड़ी प्रतिबद्धता और ठंडे दिमाग के साथ करना होगा। चीन और पाकिस्तान जानते है ंकि भारत को रोकने के लिए समय उनके हाथ से रेत की तरह फिसला जा रहा है।

मिन्हाज़ मर्चेंट लेखक एवं प्रकाशक हैं।