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केंद्र ने सर्वोच्च न्यायालय से कहा, “राज्य हिंदुओं को अल्पसंख्यक का दर्जा दे सकते हैं”

केंद्र सरकार ने रविवार को सर्वोच्च न्यायालय से कहा कि राज्य और केंद्र शासित प्रदेश भी हिंदुओं को अल्पसंख्यक का दर्जा दे सकते हैं।

हिंदुस्तान लाइव की रिपोर्ट के अनुसार, केंद्र सरकार ने वकील अश्विनी कुमार की ओर से दाखिल याचिका के जवाब में दाखिल एक हलफनामे में यह जानकारी दी है। याचिका में उन्होंने अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों के लिए राष्ट्रीय आयोग अधिनियम-2004 की धारा-2 (एफ) की वैधता को चुनौती दी है।

केंद्रीय अल्पसंख्यक मंत्रालय ने सर्वोच्च न्यायालय को एक जवाब दाखिल करते हुए कहा, जिस तरह राष्ट्रीय स्तर पर ईसाई, सिख, मुस्लिम, बौद्ध, पारसी और जैन को अल्पसंख्यक का दर्जा दिया गया, वैसे ही राज्यों को स्वतंत्रता है कि वे भाषायी या फिर संख्या के आधार पर हिंदुओं को भी अल्पसंख्यक का दर्जा दे सकें।

अश्विनी कुमार उपाध्याय ने अपनी अर्जी में कहा कि धारा-2 (एफ) केंद्र को अकूत शक्ति देती है, जो स्पष्ट रूप से मनमाना और आहत करने वाला है। उन्होंने देश के कई राज्यों में अल्पसंख्यकों की पहचान हेतु दिशा-निर्देश जारी करने की मांग की।

उन्होंने कहा, यहूदी, बहाई और हिॆंदू धर्म के अनुयायी जो लद्दाखा, मिजोरम, लक्षद्वीप, कश्मीर, नगालैंड, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश, पंजाब और मणिपुर में वास्तविक अल्पसंख्यक हैं, वे अपनी पसंद से शैक्षणिक संस्थान की स्थापना व संचालन नहीं कर सकते। ये गलत है।”

इस पर अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय ने जवाब दिया, यहूदी, बहाई और हिॆंदू धर्म के अनुयायी उक्त राज्यों में अपनी पसंद के शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना कर सकते हैं। राज्य में अल्पसंख्यक के रूप में उनकी पहचान से संबंधित मामलों पर राज्य स्तर पर विचार किया जा सकता है।

वहीं, मंत्रालय ने उस दावे को भी अस्वीकार कर दिया, जिसमें कहा गया कि धारा-2 (एफ) केंद्र सरकार को ढेर सारी शक्ति देती है।