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चेलो के संगीत से आरडी बर्मन के गीत सजाने वाले बासुदेब चक्रवर्ती (सरगम के सितारे)

चेलो को वायलिन के परिवार में रखा जाता है जिसका जन्म आप 1530 के आसपास मान सकते हैं। उस शताब्दी में वायलिन, वायोला और चेलो चलन में आने लगे थे। कुछ लोगों का मानना है कि चेलो “वायोला दा गाम्बा” परिवार से विकसित हुआ है जो कि एक गलत धारणा है। चेलो लगभग ढाई शताब्दियों तक “वायोला दा गाम्बा” से अलग चलन में रहा था।

तार वाले सभी वाद्य यंत्र जिन्हें संगीत भाषा में जिसे स्ट्रिंग सेक्शन कहा जाता है। इस चार स्ट्रिंग वाले वाद्य यंत्र को नीचे वाली तस्वीर की तरह बजाया जाता है।

Street Music Cello Spain Listening Pleasure Classic

यह तस्वीर को देखने के बाद आपको लगा होगा कि ऐसा कुछ आप हिंदी फिल्मों में देख चुके हैं तो ऐसा मौका शायद एक से ज़्यादा बार आया नहीं है। वह मौका लेकर आये थे रहमान साहब जब उन्होंने कटरीना के हाथ में, फिल्म युवराज में, यह वाद्य यंत्र दिया था।

कुछ और गीत जिनमें आप यह आवाज़ सुन सकते हैं, वे थे, ये जो मोहब्बत है (कटी पतंग 1970), ज़िंदगी के सफर में (आप की कसम 1973), कुछ तो लोग कहेंगे (अमर प्रेम 1972), पन्ना की तमन्ना (हीरा पन्ना 1973) और मेरी भीगी-भीगी सी (अनामिका 1973) आदि।

आपको जिन गीतों के नाम मैंने बताए हैं, उनमे अगर आपने खास बात नोटिस की होगी तो वह यह कि सभी गीत पंचम दा के बनाए हुए हैं। इन गीतों में चेलो के स्वरों को आप तक लाने वाले इस शख्स का नाम था बासुदेब चक्रवर्ती।

वही बासुदेब जिन्होंने पंचम दा के कैरियर को आगे बढ़ाने में मनोहारी दा और मारुती राव के साथ कंधा मिलाकर यात्रा की थी। वही बासु दा जिन्होंने महबूबा-महबूबा गीत में उस बोतल से निकलने वाली आवाज़ को अमर कर दिया था। इस लाइव शो में आप उनको दोबारा से वही कारनामा करते देख सकते हैं।

आपको याद है वो बैकग्राउंड में बजता हुआ रहस्यमयी संगीत जब गब्बर सिंह शोले में स्क्रीन पर आते थे? यह संगीत चेलो पर बासु दा ने ही निकाला था। उनके पुत्र, उसी को दोहराते हुए दिखाई रहे हैं इस वीडियो में।

इस वाद्य यंत्र को बासु दा ने बसंत गुप्ता से सीखा था जो स्वयं केसी डे के सहायक हुआ करते थे। 1950 के दशक में जब कोलकाता के फिल्म निर्माता पेशवर ऑर्केस्ट्रा वालों से पार्श्व संगीत तैयार कराते थे, बासु दा ने सुरश्री ऑर्केस्ट्रा में काम शुरू कर दिया था।

यही वह समय था जब उनकी भेंट आरसी बोराल, पंकज मलिक, अनुपम घटक जैसे दिग्गजों से हुई थी। विभाजन के बाद कलकत्ता अपनी फ़िल्मी दुनिया वाली चमक खोता जा रहा था। हिंदुस्तान की फ़िल्मी दुनिया का केंद्र अब या तो बंबई था या मद्रास।

इसी के चलते बासु दा ने 1953में  मद्रास में भी अपना भाग्य आज़माया लेकिन एक साल बाद वे कलकत्ता लौटकर आ गए। उसी दौरान एक नए फिल्म निर्माता के संगीतकार पंडित रविशंकर के साथ उन्हें काम मिल गया। यह नए निर्माता थे सत्यजीत रे जिनके साथ बासु दा ने चार फिल्मों में काम किया था।

संगीत के कार्यक्रम में जब सलिल चौधरी और नौशाद ने बासु दा को देखा, उन्हें बम्बई आने का आमंत्रण दे डाला। लेकिन बंबई उन दिनों बंगाली संगीतकारों को अधिक मौके दिया नहीं करता था। उन्हीं दिनों में एक उनकी बिटिया के जन्म के करीब के हफ्ते बाद उनको पंचम दा का संदेश आता है कि बड़े बर्मन साहब ने बासु दा को याद किया है।

यह वक़्त था जब सुजाता का संगीत तैयार हो रहा था। बासु दा का जीवन उसके बाद, बड़े और छोटे बर्मन के लिए ही समर्पित होकर रह गया।स्ट्रिंग विभाग के शाहकार बासु दा, ब्रास के महाराजा मनोहारी दा और रिदम के महारथी मारुती राव इस जोड़ी ने बर्मन के संगीत को हमेशा के लिए इतिहास में दर्ज करा दिया।

आपने मनोहरी-बासु की जोड़ी में फिल्मों में संगीत देते हुए नहीं सुना होगा। यह जोड़ी उनकी फिल्मों के असफल होने की वजह से ज़्यादा चल नहीं पाई। जलाल आगा की एक अनाम फिल्म और यास्मीन नाम की एक फिल्म, जिससे इस जोड़ी ने शुरुआत की थी, कभी परदे पर नहीं आ पाई। लेकिन सबसे बड़ा रुपैया और इसको सुनने के गीतों को सुनने के बाद आपको पंचम दा की याद आना तय है।

सत्ते पर सत्ता आखिरी फिल्म थी जिसमें उन्होंने पंचम दा के साथ काम किया था और फिर 27 जुलाई 2001 को वे अपने प्रिय दोस्त पंचम से मिलने चले गए। चलते-चलते आप शोले की वह धुन भी सुन लीजिए जो परदे पर अमिताभ ने और असल में भानु गुप्ता जी ने बजाई थी लेकिन इस धुन को पंचम दा ने नहीं, बासु दा ने तैयार किया था।