राजनीति
जाति जनगणना की मांग का पुरजोर विरोध करना आवश्यक क्यों है

हमारे देश में हर 10 वर्ष पर जनगणना करने का प्रावधान है। 2011 के बाद 2021 में जनगणना होनी थी लेकिन कोविड-19 वैश्विक महामारी के कारण इसमें विलंब हो गया है। इसी बीच पिछले कुछ दिनों से जाति जनगणना की मांग जाति आधारित राजनीति करने वाले कई नेताओं की तरफ से उठ रही है।

उनकी मांग है कि इस बार की जनगणना में लोगों की जाति की भी गिनती की जाए। वे चाहते हैं कि इस बात का आँकड़ा सामने आए कि भारत गणराज्य में कितनी अलग-अलग जातियों में कितने लोग रहते हैं। अभी तक जनगणना में किसी परिवार में लोगों की संख्या के अतिरिक्त, उनकी शिक्षा, आय, नौकरी, शौचालय, रसोई गैस की उपलब्धता आदि कई चीजों की जानकारी ली जाती रही है।

इन आँकड़ों से आने वाले समय में देश की नीतियों-योजनाओं पर फर्क पड़ता है। सरकार इसके अनुसार ही लोगों की स्थिति को ध्यान में रखकर योजनाएँ बनाती है। इस प्रकार यह आवश्यक काम है लेकिन इसमें जाति नामक एक अनावश्यक तत्व को जोड़ने का प्रयास कुछ राजनीतिक दल कर रहे हैं।

हालाँकि, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि जाति भारतीय सामाजिक व्यवस्था का एक ऐसा तत्व है जिससे राजनीति, व्यवसाय, शिक्षा आदि चीज़ें तय होती रही हैं। बावजूद इसके कि जाति एक काल्पनिक अस्मिता है, इसका बहुत ज्यादा हस्तक्षेप हमारे राजनीतिक विमर्शों में रहा है।

हमारा देश विभिन्न अस्मिताओं का देश है। ये अस्मिताएँ जाति आधारित होने के अलावा सांप्रदायिक, क्षेत्रीय, भाषायी, लैंगिक भी रही हैं। अस्मिताओं का यह खेल बहुत जटिल है। कब कौन-सी अस्मिता मजबूत हो जाएगी और कौन सी कमजोर, यह कह पाना मुश्किल है। लेकिन इन सबके बावजूद हमारा देश एक राष्ट्र के रूप में हमेशा संगठित रहा है।

जब-जब देश के सम्मान और सुरक्षा की बात आई है देश में भिन्न-भिन्न अस्मिताओं के लोग अपनी किसी विशिष्ट अस्मिता को त्यागकर भारतीय होने की पहचान को मजबूत करते नज़र आए हैं। देश की एकता और अखंडता के सूत्र इसी भावना में छिपे हैं कि हम अपनी उन सभी अस्मिताओं को जो देश की एकता के विरुद्ध जाती हैं, भूल जाएँ, समाप्त कर दें या उनसे आगे निकल आएँ।

विभिन्न अस्मिताओं वाले हमारे समाज में जाति की अस्मिता कैसे कमज़ोर हो और राष्ट्रीयता की अस्मिता कैसे मजबूत हो? यह एक ऐसा प्रश्न है जिसमें राष्ट्रनिर्माण का आधार छिपा है। सर्वप्रथम, हम राष्ट्र से क्या समझते हैं? इसका उत्तर मैं किसी और से नहीं संविधान निर्माता डॉ बाबासाहेब अंबेडकर से प्राप्त करता हूँ।

डॉ अंबेडकर का मानना था कि राष्ट्र किसी भौगोलिक भूभाग में ऐसे लोगों का समूह है जिनके बीच करुणा, भाईचारा और सह-अस्तित्व की भावना हो। इसलिए उनका साफ-साफ कहना था कि सबसे पहले अगर कोई चीज राष्ट्र-विरोधी है तो वह है– जाति। यही वह चीज़ है जो करुणा, भाईचारे और सह-अस्तित्व की भावना को रोकती है।

वहीं, जाति की जनगणना देश में पहली बार 1881 में और अंतिम बार 1931 में हुई थी। इसे करने वाले अंग्रेज शासक थे जिन्होंने ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति से इस देश पर शासन किया। जाति की जनगणना भी उनकी इसी नीति से प्रभावित थी। आज भी कुछ लोग उनकी इस नीति पर काम कर रहे हैं।

चुनाव जीतने और इसके लिए किसी भी हद तक जाने के विचार का ही प्रतिफल है- जाति जनगणना की मांग। जाति जनगणना अगर होगी तो अलग-अलग क्षेत्रों में हरेक छोटी-बड़ी जाति की संख्या सामने आएगी, फिर इसपर खड़ी होगी चुनावी तुष्टिकरण की राजनीति।

हर चुनावी दल चुनाव जीतने के लिए जाति आधारित हथकंडे अपनाएगा और इसके पीछे विकास की राजनीति बहुत पीछे छूट जाएगी। हरेक भारतवासी के अंदर राष्ट्रीयता की अस्मिता जो दिनोंदिन मजबूत हो रही है वह कमजोर होती जाएगी और हमारा यह देश भिन्न-भिन्न जातियों में बटा एक भूभाग बनकर रह जाएगा।

इसलिए यह आवश्यक है कि जाति जनगणना के इस विचार का पुरजोर विरोध किया जाए। हमारे युवा जो जाति विरोधी राजनीति के प्रमुख प्रस्तावक हैं, वे इसमें अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। हम ‘आज़ादी का अमृत महोत्सव’ मना रहे हैं और स्वतंत्रता के 75 वर्ष पूरे करने पर तकनीक, ऊर्जा, शिक्षा, विकास की बातें करें या जाति की, यह निर्णय हरेक देशवासी को करना है।

शैलेंद्र कुमार सिंह बिहार के पश्चिम चंपारण के निवासी हैं। वे सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता और उद्यमी हैं।