विचार
सीएए के साथ क्यों वह नहीं होना चाहिए जो कृषि कानूनों के साथ हुआ

कृषि कानून के विरुद्ध आंदोलन की मांगों को देखते हुए प्रधानमंत्री ने कानून को वापस लेने का निर्णय लिया तो सरकार के इस निर्णय से उत्साहित होकर कई और ऐसे मुद्दे हैं जिनपर फिर से आंदोलन किए जाने की मांग तूल पकड़ने लगी हैं।

ऐसे में सीएए जैसे कानून के विरुद्ध आंदोलन भी है जिसे शाहीन बाग में लंबे समय तक चली नौटंकियों के बाद कोविड के कारण बंद कराना पड़ा था, लेकिन यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि कृषि कानून और सीएए जैसे कानून में गंभीर अंतर है।

सीएए-विरोधी आंदोलन मजहबी उन्माद पर खड़ा किया गया एक बड़ा विमर्श है; यह विमर्श प्रतिक्रियावादी और पूर्वाग्रहों से प्रेरित अवधारणाओं पर खड़ा किया गया है, न कि ऐतिहासिक और सामाजिक सच्चाइयों पर।

इस कानून पर सांप्रदायिक होने का आरोप लगाया जाता रहा है, जबकि इस कानून का प्रयास तो मात्र उन लोगों को आश्रय देना है जो धर्म और मजहब के नाम पर कतिपय देशों में उत्पीडित हुए हैं या हो रहें हैं।

इस संदर्भ में दुनिया के कुछ राष्ट्रों पर एक दृष्टि डालते हैं तो हम देखते हैं कि पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफगानिस्तान, अरब, ईरान आदि इस्लामिक/अर्ध-इस्लामिक देशों में गैर-मुस्लिमों को न्यूनतम मानवाधिकार प्राप्त है और दशकों से मजहबी आधार पर उनका दमन या उनके विरुद्ध भेदभाव किया जाता रहा है!

दुनिया में 50 से अधिक इस्लामिक राष्ट्र हैं जिनका संविधान कोई धर्मनिरपेक्ष-संविधान नहीं बल्कि क़ुरान, हदीस और शरियत के आधार पर निर्मित किया गया है, और इसमें नास्तिकों और गैर-मुस्लिमों के लिए या तो जगह नहीं है या फिर इतनी ही जगह है जितने में कि वे किसी तरह जीवित रह सकें।

ये सब के सब इस्लामिक रिपब्लिक हैं जो अधिकारिक तौर पर इस्लामी मान्यताओं और विश्वासों से संचालित होते हैं। यह भी ध्यान देने की बात है कि इसी तरह दर्जन से अधिक ऐसे राष्ट्र हैं जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर ईसाई सिद्धांतों को केंद्र में रखकर चलाए जा रहें हैं, जैसे डेनमार्क, इंग्लैंड, हंगरी, जोर्जिया, नोर्वे, वैटिकन सिटी, सामोआ आदि।

अगर केवल इस्लामी राष्ट्रों पर एक सरसरी दृष्टि डालें तो पाकिस्तान ने 1956 में, ईरान ने 1979 की क्रांति के बाद, अफगानिस्तान ने तालिबानी वर्चस्व के बाद ऐसे धार्मिक संविधान को अधिकृत रूप से जारी किया। बांग्लादेश का संविधान शेख मुजीबुर रहमान के समय में धर्मनिरपेक्ष था, लेकिन 1979 में इसने इसमें ‘बिस्मिल्लाह-अर-रहमाने रहीम’ जोड़ा और 1988 के बाद इस्लाम राजकीय धर्म हो गया।

आप चाहे ईरान के संविधान के मूल्यों को देख लें, या फिर पाकिस्तान आदि के, इन सबका सार्वभौमिक मानवाधिकारों और धर्मनिरपेक्ष मूल्यों से दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं है। इसमें एक विशेष मजहबी झुकाव स्पष्ट रूप से दर्ज है।

अरबों की तो बात ही अलग है, यह तो धार्मिक-राजतंत्र का केंद्र है जो और भी अधिक अमानवीय और लोकतांत्रिक मूल्यों के उलट है। इन तमाम मुल्कों ने बहुत ही स्पष्ट और आधिकारिक रूप से मजहबी आधार पर सामाजिक और राजनीतिक अधिकारों और कर्तव्यों का वर्गीकरण कर रखा है।

इनके संविधान और कानून का अधिकांश हिस्सा मतांध अवैज्ञानिक संकल्पनाओं से ही चल रहा है जिसमें विज्ञान, तर्क, बुद्धि, मत-विभिन्नता और मानवाधिकारों के लिए जगह ढूंढना अत्यंत ही कठिन है। लेकिन इन राष्ट्रों की इस सामंती और कट्टर मजहबी रूप पर शायद ही कहीं कोई लिखता-बोलता मिलेगा और जिसने मुँह खोला उसपर एक लेबल लगाकर चुप करा दिया जाता है।

इसके अलावा एक तथ्य यह भी है कि अलग-अलग देशों में इस्लाम की अलग-अलग व्याख्याएँ हैं और इनके मानने वाले लोग भी अलग-अलग तरीकों से इसका अनुपालन करते आ रहे हैं। एक मुस्लिम समुदाय अपने अलग जीवन दर्शन और मान्यताओं के कारण एक देश विशेष में तो मुसलमान के रूप में मान्यता प्राप्त होता है, लेकिन किसी अन्य मुस्लिम देश विशेष में उसे काफिर आदि के रूप में भी देखा जाता है।

मुस्लिम समाज में अनेक पंथ, फिरके, भाषाई, जातीय, प्रजातीय समूह हैं जिनके साथ भेदभाव सामाजिक और राजनीतिक तंत्र के अंदर ही लगातार मुस्लिम समाज के द्वारा ही किया जा रहा है। कई इस्लामी देशों में कुछ मुस्लिम समुदायों को नागरिकता तक के अधिकार से वंचित रखा गया है; जैसे अहमदिया मुसलमानों को मात्र भारत और बहरीन में मुस्लिम के रूप में मान्यता प्राप्त है, पाकिस्तान और अन्य इस्लामिक देशों में तो उन्हें काफ़िर का दर्जा प्राप्त है जिनकी “हत्या” भी “सुन्नत” है।

आप किसी खान, सैय्यद, बरेलवी, देवबंदी, जैदी जैसे असरफी मुसलमानों से पूछिए तो वे आपको बताएँगे कि कौन कितना पक्का मुसलमान है और कौन काफिर है। सूफियों को भी सल्फियों और वहाबियों ने गैर-इस्लामिक का ही दर्जा दे रखा है। इसी तरह शिया और सुन्नी का सैद्धांतिक संघर्ष जग-जाहिर है।

अरब देशों में तो किसी भारतीय, पाकिस्तानी या बंगलादेशी आदि देशों के मुस्लिमों को भी प्रजातीय रूप से हीन ही माना जाता है, वैवाहिक संबंध तो बहुत दूर की बात है इनकी नागरिकता भी वहाँ प्रतिबंधित है। क्या किसी सामान्य भारतीय मुसलमान की मजाल है कि कभी किसी अरबी स्त्री से आधिकारिक रूप से वहाँ निकाह कर सके?

ऐसे भेदभाव के लिए वहाँ का सामाजिक तंत्र ही नहीं, बल्कि वहाँ का पूरा राजनीतिक और सांविधानिक तंत्र जिम्मेवार है जिसमें एक विशेष मजहबी पंथ या संप्रदाय को आधिकारिक रूप से विशेषाधिकार प्राप्त है। मतलब इस्लाम के अंदर वे तमाम अंतर्विरोध हैं जो अन्य धर्मों के भीतर हैं।

यह किसी भी तरह से अपवाद नहीं और शायद इन्हीं बातों को ध्यान में रखते हुए सीएए-विरोधी लोगों का मानना है कि ऐसे सताए हुए मुस्लिमों को भी इस बिल में जगह मिलना चाहिए था। लेकिन हमें ध्यान रखना चाहिए हर कानून और हर राष्ट्र की अपनी सीमाएँ होती हैं, किसी एक प्रावधान से तमाम प्रकार के उत्पीड़नों का अंत नहीं किया जा सकता और न ही कोई एक राष्ट्र सभी समस्याओं का समाधान कर सकता है।

वैश्विकृत विश्व में संकट और संघर्ष भी वैश्विक हो गए हैं। यह भी समझने की आवश्यकता है कि सीएए के निर्माण का मूल आधार है मुस्लिम बहुल देशों में मजहबी आधार पर हो रहे भेदभावों और उत्पीड़नों से वहाँ के धार्मिक अल्पसंख्यकों के मानवाधिकारों की रक्षा करना।

उपरोक्त तीनों देशों में धार्मिक अल्पसंख्यकों में मुस्लिम को छोड़कर अन्य सभी जैसे हिंदू, इसाई, बौद्ध, जैन, सिख आदि ही आते हैं, न कि मुस्लिम। सीएए कानून ‘धर्म के आधार पर विभिन्न राष्ट्रों में भेदभाव’ के विरुद्ध एक सकारात्मक पहल है न कि ‘धर्म के भीतर अनगिनत प्रकार के भेदभाव’ को मिटाने की मुहिम।

उपरोक्त इस्लामी राष्ट्रों में एक मुस्लिम समुदाय का दूसरे मुस्लिम समुदायों के विरुद्ध जो भेदभाव और उत्पीड़न है, वह मत-आधारित, सैद्धांतिक, राजनीतिक, भाषाई, प्रजातीय, क्षेत्रीय आदि है, न कि धार्मिक, इसलिए तकनीकी आधार पर धार्मिक-अल्पसंख्यक में अहमदिया, इस्मायली, शिया, सिंधी, बलूची या फिर वे मुलसमान जो 1947 में पाकिस्तान चले गए आदि को लाना इस कानून की मूल आत्मा के विरुद्ध हो जाता है।

यह ऐसा ही है जैसे हिंदू या सिख या बौद्ध समुदाय के भीतर जातीय, भाषाई और क्षेत्रीय भेदभाव आदि का होना। सीएए अपने कानूनी और वैधानिक रूप में कहींं से दोषपूर्ण नहीं है, बल्कि यह एक राष्ट्र के द्वारा किया गया एक उदार प्रयास है- धार्मिक रूप से वैश्विक जगत में हो रहे उत्पीड़ित समुदायों को आश्रय देने का।

स्वतंत्रता के बाद से अब तक अगर बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफगानिस्तान के सरकारी जनसांख्यिकी आँकड़ों को ही देखें तो यह स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है कि गैर-मुस्लिमों जैसे सिख, हिंदू, इशाई, बौद्ध की जनसंख्या आश्चर्यजनक तरीके से इन देशों में घटती गई है।

इसके पीछे इन देशों की सरकारी नीतियाँ ही हैं जिसने इन समुदायों को कभी बराबरी का दर्जा नहीं दिया, बल्कि ये यहाँ द्वितीयक समुदाय के रूप में ही जीवन बसर कर रहें हैं। कोई भी राष्ट्र जैसे ही किसी एक मजहबी मूल्यों को अपना राजकीय मूल्य निर्धारित करता है तत्क्षण ही वह अपनी समानता की अवधारणा का गला घोंट देता है, और इन राष्ट्रों में ऐसा ही कुछ होता चला आ रहा है।

सीएए कानून समावेशन के दर्शन पर बना है और इसमें उपरोक्त देशों के धार्मिक अल्पसंख्यकों की सुरक्षा इसका केंद्रीय विषय है, न कि तमाम प्रकार के मुद्दों के संदर्भ में समाधान प्रस्तुत करना। भारत की ही तरह अन्य पड़ोसी देशों को भी चाहिए कि ऐसे कानून लाएँ ताकि पड़ोसी देशों में सताए जा रहें धार्मिक अल्पसंख्यकों को आश्रय मिल सके।

हाँ, इसके अतिरिक्त इन मत-आधारित, भाषाई, प्रजातीय, क्षेत्रीय आदि आधार पर बहिष्कृत और उत्पीड़ित मुस्लिमों के समावेशन के लिए अलग नीतियों का प्रस्ताव रखा जा सकता है, लेकिन यह मात्र भारत की ही नहीं सभी मुस्लिम देशों और यूरोपीय देशों की भी सामूहिक ज़िम्मेदारी है।

अकेले भारत से तमाम मानवीय आदर्शों की आशा करना ज्यादती है, क्योंकि यह तो तय है कि अगर मुस्लिम किसी देश में उत्पीड़ित होते हैं तो अनगिनत मुस्लिम राष्ट्र हैं जो इन्हें आश्रय देंगे और देना भी चाहिए, क्योंकि वे मुस्लिम रिपब्लिक हैं या मुस्लिम उम्मा के सिद्धांतों में विश्वास करते हैं, लेकिन हिंदुओं, सिखों, बौद्धों, और ईसाइयों के लिए दक्षिण और पूर्वी एशिया में आश्रय पाना कठिन है।

वे इस्लामी राष्ट्र जो इस कानून पर आपत्ति जता रहें हैं, उन्हें पहले अपने धार्मिक-संविधान को फाड़कर नए धर्मनिरपेक्ष-संविधान और समाज बनाने की आवश्कता है। सच तो यह है कि इस कानून की आलोचना का उन्हें नैतिक अधिकार ही नहीं है; प्रश्न तो इन आधिकारिक रूप से मजहबी राष्ट्रों से किया जाना चाहिए था कि उन्होंने अपने संविधान को इतना बर्बर क्यों बना रखा है, लेकिन हो इसका उल्टा रहा है, जो इस पूरे प्रकरण का अभियुक्त है वह दोषमुक्त है।

इससे बड़ी विडंबना और क्या हो सकती है! भारत के “धर्मनिरपेक्षतावादियों” के विरोध का हमें व्यक्तिगत रूप से कोई भी तार्किक कारण नहीं दिख रहा। इनके आंदोलन का स्रोत न्याय या मानवाधिकार हैं, यह भ्रामक है, क्योंकि अगर ऐसा होता तो दुनिया के तमाम देशों में मुस्लिमों का भयंकर शोषण किया जा रहा है, लेकिन उनपर ये ऐसे चुप हैं जैसे सब ठीक ठाक है, जैसे चीन के उइगर मुसलमानों पर भारत में एक भी आंदोलन कहीं हो रहा हो तो बताएँ!

बलूचों का नरसंहार हो रहा है, लेकिन सब चुप हैं। इस नागरिकता संशोधन कानून का भारतीय मुसलमानों से कोई संबंध ही नहीं, लेकिन इसे भारतीय मुसलमानों का मुद्दा बनाना हास्यस्पद और गंभीर विषय है। भारत का संविधान भारत के नागरिकों के न्याय के प्रति प्रतिबद्ध है, न कि दुनियाभर के लोगों के।

अगर मानवीय आधार पर भारत ने कोई ऐसा कानून बनाया है जिसमें अन्य देशों के अल्पसंख्यकों के लिए सुरक्षा और संरक्षण का प्रावधान है, तो यह एक अतिरिक्त प्रयास है जिसकी सराहना की जानी चाहिए थी न कि आलोचना।

दुनिया को चाहिए कि वे इन 56-57 इस्लामिक-रिपब्लिक में धर्मनिरपेक्ष-लोकतंत्र की बहाली के लिए आवाज़ बुलंद करें, न कि एक लोकतांत्रिक देश की उदारता पर प्रहार। भारत का संविधान कम से कम आज तक की तारीख तक समावेशी और लोकतांत्रिक ही है जहाँ किसी मजहब विशेष को कोई विशेषाधिकार प्राप्त नहीं है।

केयूर पाठक लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी में सहायक प्राध्यापक हैं। चित्तरंजन सुबुद्धि केंद्रीय विश्वविद्यालय तमिलनाडु में सहायक प्राध्यापक हैं।