व्यापार
इक्विटी का सहारा ले रहे एयरटेल और वोडाफ़ोन आइडिया घटा सकते हैं जियो की बढ़त

आशुचित्र- अभी तक कि कहानी यह रही है कि दो कंपनियों के मूल्य पर जियो लाभ कमा रहा है लेकिन इसकी संभावना कम है कि यही भविष्य में भी जारी रहेगा।

दूरसंचार खेल में बाज़ी एक बार फिर पलट सकती है। सितंबर 2016 से जब रिलायंस जियो ने कम दाम पर डाटा और डाटा आधारित उपभोक्ता सेवा शुरू की तो एकतरफा रूप से ग्राहक जियो की ओर जाने लगे और इससे भारती एयरटेल और वोडाफ़ोन आइडिया का वित्त भी जियो की ओर जा रहा था।

दिसंबर 2018 तक वोडाफ़ोन आइडिया के 41.8 करोड़ उपभोक्ता थे, दूसरे स्थान पर एयरटेल के 34 करोड़ और तीसरे स्थान पर जियो के 28 करोड़ ग्राहक थे जो कि तेज़ी से बढ़ भी रहे थे। भारतीय दूरसंचार विनियमन प्राधिकरण (ट्राई) के डाटा के अनुसार जहाँ भारती एयरटेल और वोडाफ़ोन आइडिया ग्राहक खो रहे थे (उनके बीच 38 लाक), वहीं जियो ने उनकी कीमत पर 85 लाख नए उपभोक्ता पाए, साथ ही अन्य कंपनियाँ बंद होने की कगार पर आ गईं।

यदि अभी तक बाज़ार की वही एकतरफा दिशा बरकरार है- भारती एयरटेल और वोडाफ़ोन आइडिया से जियो की ओर तो इसका कारण है कि इन दोनों कंपनियों ने फाइबर और नेटवर्क में बहुत कम निवेश किया है और कर्ज़ में डूबी हुई हैं जिससे मूल्य शर्तों, सेवा गुणवत्ता और उच्च ऋण दरों के कारण पिछड़ रही हैं।

हालाँकि बड़ी मात्रा में इक्विटी लाकर भारती एयरटेल और वोडाफ़ोन आइडिया सुधार के पथ पर चल पड़े हैं। जहाँ भारती एयरटेल 32,000 करोड़ की राशि जुटा रही है- 25,000 करोड़ रुपये अधिकार मामलों और 7,000 करोड़ रुपये सतत विदेशी बॉन्ड से, वहीं वोडाफ़ोन आइडिया 25,000 करोड़ रुपये अधिकार मामलों से जुट रही है।

इसका अर्थ यह कि भारत की प्रथम और द्वितीय कंपनियाँ कुल मिलाकर कर्ज़ उतारने के लिए 52,000 करोड़ रुपये का निवेश करने जा रही हैं जिससे वे नेटवर्क व फाइबर संपदा को उन्नत करेंगी, नया स्पेक्ट्रम खरीदेंगी, विशेषकर 5जी स्पेक्ट्रम जिसकी बोली लगना संभवतः 2019 के मध्य से शुरू होगी।

लेकिन ऋण ऐसी चीज़ नहीं है जो सिर्फ इन बाज़ार के प्रणेताओं पर भारी पड़ रही है, बल्कि इसका प्रभाव जियो पर भी है। जहाँ भारती एयरटेल और वोडाफ़ोन आइडिया का ऋण 1.12-1.15 लाख करोड़ रुपये के आसपास है, वहीं जियो का 2.1 लाख करोड़ रुपये है। जियो अभी तक साँस ले पा रहा है क्योंकि इसे रिलायंस से वित्तीय सहायता मिल जाती है जो रिफाइनिंग और पेट्रोकेमिकल से काफी कमाती है।

लेकिन जियो पर भी ऋण का भार है और दिसंबर में इसने फाइबर और टावर संपत्ति को अन्य ईकाई से इकट्ठा करने की घोषणा की थी जिससे कर्ज़ को कम किया जा सके। इसका अरथ यह कि तीनों ही बड़ी कंपनियाँ इक्विटी निवेश की योजना बना रही हैं जिससे वे नेटवर्क विस्तार कर बाज़ार शेयर को बढ़ा या बनाकर रख सकें।

अभी तक कि कहानी यह रही है कि दो कंपनियों के मूल्य पर जियो लाभ कमा रहा है लेकिन इसकी संभावना कम है कि यही भविष्य में भी जारी रहेगा। भविष्य की कुछ चीज़ों को समझें-

पहला, टैरिफ पर दबाव बना रहेगा और ग्राहक लाभ उठाते रहेंगे। यह तह तक जारी रहेगा जब तक जियो कम से कम दूसरे स्थान पर नहीं आ जाता जो थोड़ी दूरी पर है। यह एयरटेल और वोडाफ़ोन आइडिया के ग्राहकों की संख्या के करीब नहीं पहुँचेगा यदि दोनों कंपनियाँ अगले कुछ माहों में अपने ग्रहकों को खोने से बच पाएँ तो।

दूसरा, नेटवर्क, फाइबर और स्पेक्ट्रम में बड़े निवेश से दूसरसंचार सेवा की गुणवत्ता बढ़ेगी, वॉइस और डाटा दोनों के लिए। नए नेटवर्क आवश्यक रूप से नए ग्राहक नहीं लाएँगे, क्योंकि कुल ग्राहकों की संख्या अपने उच्चतम स्तर के करीब पहुँच गई है। 130 करोड़ की जनसंख्या वाले देश में 117 करोड़ मोबाइल नेटवर्क से जुड़े हुए हैं। स्पष्ट रूप से कुल संख्या नहीं बढ़ेगी और वित्तीय लाभ पाने के लिए इन ऑपरेटरों को डाटा के बाज़ार में गहरा और ग्रामीण स्तर तक जाना होगा, जहाँ टैरिफ प्रमाणित रूप से कम है।

तीसरा, इस उद्योग को चौथा खिलाड़ी बीएसएनएल मूल्य युद्ध में मारा गया और इसे बारी नुकसान उठाना पड़ा। करदाताओं को करोड़ों में पूंजी और सब्सिडी देना होगा क्योंकि 2017-18 में बीएसएनएल ने 7,992 करोड़ रुपये का नुकसान जेला और एमटीएनएल ने 2,973 करोड़ रुपये का। चल रहे टैरिफ युद्ध में वित्तीय वर्श 2018-19 और खराब सिद्ध हो सकता है।

जगन्नाथन स्वराज्य के संपादकीय निदेशक हैं। उनका ट्वीटर हैंडल @TheJaggi है।