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आरकॉम दिवालियापन- बड़े नामों से कोई अंतर नहीं, आईबीसी सबके लिए समान
आशुचित्र- 
  • आरकॉम दिवालियापन में सबसे बड़ा विजेता स्पष्ट रूप से आईबीसी है। अब यह स्पष्ट रूप से स्थापित है कि यह खराब ऋणों को हल करने के लिए एक शक्तिशाली उपकरण है और प्रतिष्ठा का भी अब कोई सम्मान नहीं है।
  • अगर आपने कर्ज़ बकाया किया है तो प्रमोटर का भी नाम मायने नहीं रखता।
अनिल अंबानी की कंपनी रिलायंस कम्युनिकेशंस (आरकॉम) का कुछ दिनों पहले खुद को दिवालिया घोषित करने का निर्णय इन्सॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (आईबीसी) के प्रभावकारिता की गवाही है। यह एक मजबूत संकेत भेजता है कि चाहे भारतीय उद्योग में सबसे बड़े नामों में से एक का प्रवर्तक अंबानी ही क्यों न हो, वे व्यावसायिक विफलता से नहीं बचे हैं और इसके लिए कीमत अपनी कंपनी और प्रतिष्ठा का नुकसान है करके चुकानी पड़ेगी।
आरकॉम दिवालिया होने की अर्जी डालने वाली एयरसेल के बाद दूसरी टेलीकॉम कंपनी होगी और यह प्रक्रिया कंपनी को सक्षम करेगी कि जो कुछ अब बचा है उसको सबसे अधिक बोली लगाने वाले को नीलाम किया जाएगा या भागों में परिसमापन किया जाएगा।
दिवालिएपन की अर्ज़ी दूरसंचार विभाग द्वारा रिलायंस जियो को आरकॉम के पिछले स्पेक्ट्रम का बकाया भुगतान करने से छूट देने से इनकार करने के मद्देनजर आया है और इस प्रकार यह कंपनी की परिसंपत्तियों की बिक्री के लिए 17,000 करोड़ रुपये के सौदे को प्रभावी ढंग से रोक लगा दिया है।
आरकॉम ने दिसंबर 2017 में जियो को बेचने के लिए चार संपत्तियों पर अपनी सहमति जताई थी ताकि दिवालियापन की कार्यवाही से बचा जा सके जिसमें आरकॉम ने फाइबर और स्विचिंग नोड्स को लगभग 5,000 करोड़ रुपये में बेच दिया था। कंपनी के पास टावर और स्पेक्ट्रम की संपत्ति अभी भी बनी हुई है जिसकी अंतिम गणना में कुल 46,000 करोड़ रुपये का बकाया है।
जियो द्वारा 18 महीने तक से अधिक में बेलआउट प्राप्त करने में पूर्ण विफल होने से पहले ही आरकॉम ने 2017 के मध्य में वित्तीय संकट के संकेत दे दिए थे जो कि उनके सभी प्रवर्तकों और बैंकरों और लेनदारों के लिए सबक था।
पहले, आप जितने लंबे समय तक बिक्री योग्य परिसंपत्तियों को उतारने में जितनी देरी करते हैं उतनी ही ऋण की समस्या बदतर होती जाती है। आरकॉम 2017 के मध्य के पहले के कई वर्षों से अपने टावरों के कारोबार की बिक्री के बारे में बात कर रहा था लेकिन वास्तव में बिक्री को पूरा करने के लिए कभी आगे नहीं आया शायद वे बेहतर कीमत पाने की उम्मीद में थे। समय पर बिक्री की गई होती तो शायद ऋण पर होने वाले नुकसान से बच सकते थे।
दूसरा, खुदरा उपभोक्ता-सामना वाले व्यवसायों में वास्तविक मूल्य ग्राहक आधार में रहता है न कि अचल संपत्ति में। सितंबर 2016 के आसपास जब मुकेश अंबानी रिलायंस जियो को लॉन्च कर रहे थे तब आरकॉम के पास 8.7 करोड़ से अधिक भुगतान करने वाले ग्राहक थे। जब जिओ ने टैरिफ वॉर छेड़कर इस उद्योग में अपना दबदबा बनाना शुरू किया तब से आरकॉम ने ग्राहकों को खोना शुरू कर दिया और इसका व्यावसायिक मूल्य मिटने लगा। 2017 के अंत के आसपास जब इसके संचालन तेजी से अस्थिर हो रहा था तब ज्यादातर ग्राहक पहले से ही डूबते हुए जहाज से कूद चुके थे और आरकॉम का ग्राहक आधार 3.3 करोड़ तक नीचे आ गया था। उस के साथ मूल्य की पुनर्प्राप्त करने के लिए केवल जो एक चीज बची हुई थी जो थी संपत्ति की बिक्री। तेजी से नीचे गिरने वाले ग्राहक आधार अधिक मूल्य की तुलना में 8.7 करोड़ ग्राहकों के साथ वाली आरकॉम में अधिक मूल्य प्राप्त होता।
तीसरा, जब आप सरकार को पैसे देने हैं और कानून यह कहता है कि पुराने स्पेक्ट्रम के बकाये का भुगतान वो करेगा जो कंपनी को खरीदेगा, तो यह ज़ाहिर है कि यह पहला बकाया भुगतान सरकार का ही होगा ।यही कारण रहा है डिपार्टमेंट ऑफ टेलिकम्युनिकेशन ने जिओ को कोई भी पिछले भुगतान में छूट देने से इनकार कर दिया जिसके कारण जिओ-आरकॉम डील असफल रही। अगर जियो द्वारा 2017 में शुरुआती कुछ बकाया भुगतान पहले कर दिए गए होते तो शायद ये पूरा सौदा संभवतः बच सकता था परंतु कम मूल्य पर। जियो हालाँकि वैसे भी जीतता क्योंकि यह एनसीएलटी पर कम कीमतों पर आरकॉम की संपत्तियों की बोली नहीं लगाता।
चौथा, आरकॉम के बैंकर स्पष्ट रूप से कंपनी के प्रति अति-भोगवादी थे। 2016 के अंत में जिओ के टैरिफ युद्ध छेड़ने के बाद से कंपनी की ऋण चुकाने की क्षमता कुछ संदेह में थी। बैंकरों को अपनी ताकत का इस्तेमाल परिसंपत्तियों की बिक्री को मजबूर करने के लिए करना चाहिए था लेकिन वे सरकार या मुकेश अंबानी की ओर से बेलआउट के लिए इंतज़ार कर रहे थे। जब मुकेश अंबानी आए तब बहुत देर हो चुकी थी।
आरकॉम के दिवालियापन की अर्जी डालने का मतलब है कि बैंकों को थोड़ा झटका लग सकता है और उनके ऋण मूल्य के आधे से कम की वसूली हो सकती है। एरिक्सन जैसे क्रियाशील लेनदार जिन्हें आईबीसी कानून के तहत वित्तीय लेनदारों की तुलना में कम वरीयता मिल रही है और जब ढंग से पूर्ण दिवालियेपन की कार्यवाही होगी तब इन्हें शायद अधिक नुकसान का सामना करना पड़ सकता है। इससे पता चलता है कि परिचालन लेनदारों दिवालियेपन की अर्जी डालने से पहले ही प्रोमोटरों के साथ अपने सभी रिश्तें खत्म कर लेना चाहती हैं।
सरकार के लिए सीखने के लिए सबक स्पष्ट है कि सोने का अंडा देने वाली मुर्गी से उतना ही निकालने की कोशिश करें जितना वो दे सकती है। जब कोई क्षेत्र बहुत अधिक स्पेक्ट्रम शुल्क के कारण संकट में आ रहा हो तो उसपर संकट आने से पहले ही उसे राहत प्रदान करने पर अधिक ज़ोर होना चाहिए। अब दिवालियेपन की प्रक्रिया के जरिए जो स्पेक्ट्रम नीलाम किया जाएगा वह पहले के मुकाबले काफी कम कीमत पर जा सकता है। बहुत सारे आरकॉम और एयरसेल स्पेक्ट्रम अब अप्रत्यक्ष रूप से बैंकों के स्वामित्व में हैं जिनके पास इसे गिरवी रखा गया है।
आरकॉम दिवालियापन में सबसे बड़ा विजेता स्पष्ट रूप से आईबीसी है। अब यह स्पष्ट रूप से स्थापित है कि यह खराब ऋणों को हल करने के लिए एक शक्तिशाली उपकरण है और प्रतिष्ठा का भी अब कोई सम्मान नहीं है। अगर आपने कर्ज़ बकाया किया है तो प्रमोटर का भी नाम मायने नहीं रखता।
जगन्नाथन स्वराज्य के संपादकीय निदेशक हैं। उनका ट्वीटर हैंडल @TheJaggi है।